क्या आपको पता है की अर्थतंत्र और शेअर बाजार – Economy and Stock Market Relationship in Hindi अगर आपको पता नहीं है तो आप इस ब्लॉग को पूरा पढ़े.

अर्थतंत्र और शेअर बाजार – Economy and Stock Market Relationship in Hindi

कई प्रकार की आर्थिक जानकारी, अंक और आर्थिक डेटा, इन सभी बातों का शेअर बाजार पर बहुत बड़ा परिणाम होता है। हर हफ्ते प्रसारीत होनेवाले इनफ्लेशन का बाजार पर विशेष परिणाम होता है।

उसी तरह से हर महिने प्रसारीत होनेवाले औदयोगिक उत्पादन के अंको का लेखा-जोखा जैसे की आईआईपी का भी बाजार पर खास परिणाम होता है।

इन दो जानकारीयों का गणित और कई आर्थिक निर्देशकों की इस पाठ में हम चर्चा करनेवाले है। इसका बाजार पर किस प्रकार परिणाम होता है इसकी जानकारी भी दी गई है।

आर्थिक विषय में कुछ पॉजिटिव्ह खबर आई तो उसका अर्थ यह होता है कि आर्थिक विकास के लिए अनुकूल माहौल है।उसी तरह से फुगावा बढने का भी निर्देश उसके द्वारा मिलता है।

साथ ही अर्थतंत्र के विषय में नकारात्मक खबर आई तो आर्थिक विकास का रेट कम होने का निर्देश मिलता है और उत्पादन भी कम होने की संभावना होती है। इसके साथ ही फुगावा घटने का निर्देश भी उसके जरिए मिलता है।

तेजी के लिए अच्छे से अच्छा कारण याने फुगावा के कम रेट के साथ होनेवाले आर्थिक विकास की संभावना हो सकती है।

अर्थतंत्र सक्रिय हो तो विकास की अच्छी संभावना होती है और डिमांड बढती है। डिमांड बढने से भाव बढ़ने की भी संभावना होती है।

बढे हुए भाव के कारण साधारण रूप से फुगावा भी बढता है। किसी भी सरकार को या रिजर्व बँक ऑफ इंडिया को फुगावे के रेट में हुई बढत मंजूर नहीं होती है।

इसलिए फुगावे को नियंत्रण में रखने के लिए रिजर्व बँक जल्द से जल्द कदम उठाती है। इसका अर्थ यह होता है कि रिजर्व बँक आर्थिक प्रवाह कम करके आर्थिक विकास पर अकुंश लगाती है।

इसके लिए रिजर्व बँक ब्याज के रेट में बढोतरी करती है। रिजर्व बँक सीआरआर (कॅश रिजर्व रेशों) में बढोतरी करके आर्थिक प्रवाहिता कम करने केलिए कदम उठाती है।

आर्थिक विकास को गती देने केलिए कदम उठाने के बाद शेअर बाजार उसका पॉजिटिव्ह प्रतिभाव दिखाता है।

उसी तरह से आर्थिक विकास की गती को नियंत्रण में लाने के लिए कदम उठाने के बाद बाजार उसका निगेटिव्ह प्रतिभाव दिखाता है।

ब्याज दर को बढाने के लिए कदम उठाकर रिजर्व बँक विकास की गति को नियंत्रीत करती है। ऐसा करने से शेअर्स के भाव में गिरावट होती है।

ब्याजदर कम करने से आर्थिक प्रवाह एकाएक बढता है। जिस से विकास की गति का जोर बढता है। इसके परिणाम से शेअर्स के भाव में बढोतरी देखने मिलती है।

रिजर्व बैंक ने एकबार ब्याज दर में बढत करने के बाद नजदिकी भविष्य में ब्याज दर में कोई भी बढत नहीं करेगी इसका निर्देश मिलने के कारण ब्याज दर में बढोतरी होने के बाद भी शेअर्स के भाव में सुधार देखने मिलता है।

उसी तरह से ब्याज का भाव कम करने से शेअर्स का भाव कम हो सकता है।

फुगावे का दबाव और आर्थिक विकास, ब्याज दर में बढोतरी करने और शेअर्स के भाव में घटाव करने का माहौल निर्माण करते है।

फुगावे का आंकडा नहीं बडा तो इस प्रकार के आर्थिक विकास का ब्याज दर में बढत या गिरावट नहीं होगी ऐसी स्थिति निर्माण करते है। उसके साथ ही शेअर्स के भाव में बढत होने की संभावना का भी निर्माण होता है।

नकारात्मक खबरों में उत्पादन वृद्धी के आंकडे में गिरावट होना और आर्थिक विकास की दर कम होने की खबरों का समावेष होता है।

आर्थिक विकास की गति धीमी होने के कारण डिमांड कम होकर भाव घटता है। क्योंकि इस कालावधी में सप्लाय बढता है। इस समय के दौरान फुगावा बढने की कोई चिंता नहीं होती है।

दुबली अर्थव्यवस्था में रिजर्व बँक भी आर्थिक विकास को जलद बनाने केलिए बहुत प्रयत्न करती है और ब्याज के भाव में कमी करके आर्थिक विकास को गति देने का प्रयत्न करती है।

ब्याज दर घटने के बाद खर्च करने की और उधार लेने की प्रवृत्ती में बढत होती है। साथ ही खर्च करने की आर्थिक क्षमता में भी बढत होती है।

दुबली अर्थ व्यवस्था के कारण ब्याज दर घटाने की प्रवृत्ती को बढावा मिलता है। तब शेअर्स का और बाँड का भाव बढता है।

आर्थिक निर्देशक और उनके परिणाम (Economic Indicators and Their Effect) :

कॉर्पोरेट रिजल्ट पर हर निवेशक कडी नजर रखते है। उसी तरह से आर्थिक विकास के आँकडो पर भी नजर रखी जाती है।

पहले के तिमाही या वार्षिक कालावधी की तुलना में कॉर्पोरेट आकडों में बहुत बड़ा परिवर्तन आने के बाद भी उसका अर्थतंत्र पर अल्प कालावधी में बहुत बडा परिणाम नहीं होता है।

मगर बाजार के अनुसार यह कॉर्पोरेट रिजल्ट दुबले या मजबूत होने के कारण बाजार में बढोतरी या गिरावट देखने केलिए मिलती है।

डे ट्रेडर के रूप में दलाल स्ट्रीट की इस बारे में क्या अपेक्षाए है, इसकी जानकारी आपको होना बहुत ही जरूरी है।

इस अपेक्षा से अच्छे या खराब अंक आए तो उसका बाजार पर परिणाम हो सकता है यह बात डे ट्रेडर को ध्यान में रखनी चाहिए।

आर्थिक जानकारी प्रसारीत होने के बाद लोगों में उस विषय के बारे में कौनसे विचार तैयार होते है इस पर ही बाजार कौन सा प्रतिभाव दिखाएगा यह निर्भर होता है।

हमने इस किताब में जैसे की पहले देखा रिजर्व बैंक ने ब्याज दर में बढोतरी की तो शेअर्स के भाव भी बढते है।

उसी तरह से ब्याज दर में गिरावट की तो शेअर्स के भाव में भी गिरावट होती है ऐसा दिखाई पडता है।

भारतीय रुपया और शेअर बाजार (Indian Rupee and Stock Market):

ब्याज के दर में बढत की गई तो विदेशी चलन के सामने भारतीय रूपया मजबूत होता है। भारतीय रूपए का मूल्य भारतीय अर्थव्यवस्था के सक्षम होने का प्रतिनिधीत्व करता है।

अर्थव्यवस्था का परफॉरमन्स अच्छा होता है तब उसमें खुद का भी हिस्सा होना चाहिए ऐसी अपेक्षा अन्य व्यक्ति भी करते है। इसलिए अर्थव्यवस्था में डिमांड तैयार होती है।

संभावित सप्लाय से भी अधिक डिमांड तैयार होती है। इस कारण से जोरदार तेजी आ जाती है। इस तरह की एक तेजी सन २००७ के आखिर में देखने को मिली थी।

भारतीय अर्थव्यवस्था सशक्त बनने की संभावना के कारण यह तेजी देखने को मिली थी। उसी तरह से ब्याज के दर में घटाव किया गया तो विदेशी चलन के सामने भारतीय रूपया कमजोर होता है।

भारतीय अर्थतंत्र दुबला हो रहा है ऐसा दिखाई देता हो तो रूपए की कम किमत उसका प्रतिनिधीत्व करती है।

भारतीय रूपए का मूल्य बढा तो विदेशी चलन के बदले में कम रूपए देने पडते है। इसका भारत के निर्यात सेक्टर पर नकारात्मक परिणाम होता है।

इस सेक्टर में इन्फॉरमेशन टेक्नॉलॉजी और अन्य एक्सपोर्ट ओरिएन्टेड सेक्टर का समावेश होता है। पर रूपया मजबूत हुआ तो विदेश में से भारत में इम्पोर्ट करनेवालो को लाभ होता है।

रिजर्व बैंक की आर्थिक (मॉनेटरी) निती (RBI’s Monetary Policy):

आर्थिक निती की मदद से रिजर्व बँक ऑफ इंडिया देश की अर्थव्यवस्था के आर्थिक प्रवाह को नियंत्रित करती है। अर्थव्यवस्था में उपलब्ध पैसों का भी नियमन करती है। तीसरा यह की वह ब्याज के दर को भी नियंत्रित करती है।

उसका मूल उद्देश्य यह है कि देश की अर्थव्यवस्था की स्थिरता के सहित विकास होता रहे यह देखना होता है।

आर्थिक निती को साधारण रूप से विस्तारवादी निती (Expansionary Policy) या संकोचनकारी निती (Contractionary Policy) के नाम से जाना जाता है।

विस्तार की निती के कारण रिजर्व बैंक द्वारा लिए जानेवाले निर्णय से देश के अर्थतंत्र में आर्थिक प्रवाह बढता है। वैसे ही संकोचन की निती से मंदी का परिणाम होकर बेरोजगारी को कम करने के लिए ब्याज दर कम किया जाता है।

संकोचन की निती के कारण लिए गए निर्णय का मूलभूत हेतू यह फुगावे का प्रतिकार करने केलिए ब्याज के दर में बढत करना होता है। दुसरे शब्दों में बताना हो तो यह ओव्हरहिट अर्थतंत्र को ठंडा करने केलिए उठाया गया कदम होता है।

मॉनेटरी पॉलिसी आर्थिक निती या वित्तीय निती के बिलकूल विपरीत होती है। वित्तीय निती में सरकारी कर्ज, खर्च और टॅक्स का समावेष होता है।

आर्थिक निती की शर्तो की जानकारी (Monetary Policy Terms):

बँक रेट (Bank Rate):

बँक रेट लघुत्तम रेट है जिस रेट से रिजर्व बँक कमर्शियल बँकों को ऋण देती है। बँक रेट को डिस्काऊंट रेट कहके भी जाना जाता है।

साधारण रूप से बँक रेट में बढत हुई तो उसके परिणाम से कमर्शिअल बँक उनके ब्याज के दर को बढाते है। बँक रेट में परिवर्तन हुआ तो उसका परिणाम बँकद्वारा दिए जानेवाले ऋण पर भी होता है।

कॅश रिजर्व रेशो (Cash Reserve Ratio):

तमाम कमर्शिअल बँक उनके डिपॉजिट की एक निश्चित रकम नकद रूप में रिजर्व बैंक में जमा करने केलिए कानूनन बँधी होती है। इस के प्रतिशत को कॅश रिजर्व रेशो कहके जाना जाता है। यह प्रकरण लिखा गया उस दिन कॅश रिजर्व रेशो ७.५ प्रतिशत था।

फुगावा (Inflation):

फुगावा (ईन्फ्लेशन) याने वस्तुओं की किमत में गिरावट होना। दुसरे शब्दों में बताना हो तो एक वस्तु आज हमें दस रूपयों में मिलती हो तो वही वस्तु हमें एक वर्ष के बाद दस रूपयों के बजाय ग्यारह या बारह रूपयों में मिल सकेंगी। इसी बढी हुई किमत को फुगावा कहते है।

फुगावा या ईन्फ्लेशन के विरूद्ध स्थिति को डिफ्लेशन के नाम से जाना जाता है। इस स्थिति में हमेशा भाव में गिरावट होती रहती है।

रिजर्व बँक ईन्फ्लेशन को कम करने केलिए ब्याज दर बढाता है या फिर आर्थिक प्रवाह को घटाकर उसे नियंत्रण में लाने की कोशीश करता है।

मनी सप्लाय (Money Supply – M3) :

देश के अर्थतंत्र में शुरू चलन के प्रवाह से उसके सप्लाय का अंदाजा आता है। साथ ही लोगों के हाथ में के रूपए और डिमांड डिपॉजिट (चालू खाता और बचत खाता) इन में के लोगों के पैसों का समावेष होता है।

पैसों के सप्लाय की गिनती करने केलिए रिजर्व बँक ने तीन सिद्धांतों को स्विकार किया है।

पहला सिद्धांतः एम १(M1) के अनुसार जाना जाता है। इसमें जनता के पास के रूपए, जनता की डिमांड डिपॉजिट और अन्य डिपॉजिट का समावेश होता है। एकदम आसान शब्दों में बताना हो तो जाहिर सर्म्युलेशन में घुमनेवाले हर रूपए का और चलनी नोटो का एम १ में समावेष होता है।

दुसरा सिद्धांतः एम २ (M2) में जाहिर सर्म्युलेशन में सभी रूपयों के साथ पर्सनल डिपॉजिटस् और सरकारी डिपॉजिट के रूपए और रूपयों के बिना चलन में लाए गए अन्य चलनी वस्तुओं का समावेष होता है।

तीसरा सिद्धांतः रूपयों के सप्लाय को लागू करनेवाला यह एक व्यापक नियम है। इसमें निश्चित समय के डिपॉजिट (फिक्स डिपॉजिट), बचत खाते के डिपॉजिट, पोस्ट ऑफिस और बँक सेविंग डिपॉजिट और एम १ में लिए जानेवाले सभी डिपॉजिट का समावेष होता है।

एसएलआर – स्टॅच्युटरी लिक्विडिटी रेशो (Statutory Liquidity Ratio – SLR):

भारत के सभी बँको के लिए २५ प्रतिशत का एसएलआर निश्चित किया गया है। याने की बँक उसके डिमान्ड लायबिलिटी और टाईम लायबिलिटी के २५ प्रतिशत रकम सरकारी सिक्युरिटीज और सरकार की मंजुरीवाले अन्य सिक्योरिटीज में ही निवेश कर सकते है।

निवेश के इन इंस्ट्रूमेंट्स को साधारण रूप से एसएलआर सिक्योरिटीज के अनुसार पहचाना जाता है। इस सिक्योरिटीज की खरीदी – बिक्री से ही १९९२ में हर्षद मेहता घोटाले का मूल रखा गया था।

रेपो रेट (Repo):

सरकारी सिक्योरिटीज पर एक बँक दुसरे बँक से कम कालावधी केलिए (साधारण रूप से १५ दिन) ऋण लेने के कॉन्ट्रॅक्ट को रि-पर्चेस अॅग्रीमेन्ट (रेपो) कहके जाना जाता है।

नियमानुसार बताना हो तो ऋण लेनेवाले ऋण देनेवाले बैंक के पास सिक्योरिटीज बेच कर उसके बदले में नकद लेते है।

इस ऋण की मुद्दत पूरी होने के बाद चालू बाजार भाव के मुकाबले थोडे जादा भाव से उस सिक्योरिटीज को फिर से खरीदने के लिए ऋण लेनेवाली बँक बँधी हुई होती है। उसमें से भाव का फर्क उसके ब्याज की रकम दर्शाता है।

खुले बाजार की कारागरी (Open Market Operations):

क्रेडिट को नियंत्रण में रखने केलिए एक महत्व के उपकरण के रूप में रिजर्व बँक ऑफ इंडिया ओपन मार्केट ऑपरेशन्स के एक भाग के रूप में खुले बाजार की सिक्योरिटीज की खरीदी और बिक्री का काम करते है।

इन्फ्लेशन के समय रिजर्व बँक सिक्योरिटीज की बिक्री करता है। बाजार में घुमनेवाले अधिक चलन को पिछे निकाल लेने केलिए यह कदम उठाया जाता है।उसी तरह से रूपयों का सप्लाय बढाने के लिए रिजर्व बँक सिक्योरिटीज की खरीदी भी करता है।

सीआरआर का ब्याज रेट और शेअर बाजार पर होनेवाला परिणाम (Effect of CRR Hike on Interest Rate & Stock Market):

रिजर्व बैंक के महत्व के कामों में से एक काम इन्फ्लेशन और विकास में संतुलन रखना होता है। जब जब विकास का दर बढता है तब तब इन्फ्ले शन भी बढता है और यह इन्फ्ले शन कम करने केलिए रिजर्व बँक को कडा कदम उठाना पडता है।

इन्फ्लेशन को नियंत्रित करने केलिए उठाए गए कदमों में सीआरआर में वृद्धी करने के निर्णय का भी समावेष होता है।

सीआरआर में वृद्धी करने से बँक की लिक्विडिटी में गिरावट आती है। सीआरआर के कारण बँक को उसके पास के डिपॉजिट में से कुछ निश्चित प्रतिशत रकम रिजर्व बँक में जमा करनी पड़ती है।

यह रकम नकद में ही जमा करनी पडती है। इस रकम पर किसी भी प्रकार का ब्याज नहीं दिया जाता है। इस कारण से बँक के मुनाफे पर बहुत परिणाम होता है।

इस तरह से रिजर्व बँक सीआरआर में बढत करके आर्थिक बाजार में चलन के प्रवाह को मर्यादित करता है। सीआरआर में आधे प्रतिशत की बढत की तो उसका परिणाम बाजार में से अंदाजित रू.१८,५०० करोड वापस खेचे जाने का होता है।

सीआरआर में बढत करने के परिणाम से औदयोगिक विकास की तेजी में गिरावट होती है। बँक के सामान्य ब्याज दर में बढत होती है।

बँक के डिपॉजिट क्रेडिट के पोर्टफोलीओ में होनेवाली बढत भी मर्यादित होती है। साथ ही इसका परिणाम शेअर बाजार पर भी होता है और शेअर के भाव गिरते है।

सीआरआर में होनेवाले बढत का नकारात्मक परिणाम बँकिंग, ऑटो, रियल इस्टेट सेक्टर पर भी होता है।

इन्फ्लेशन का स्टॉक मार्केट पर होनेवाला परिणाम (Effect of Inflation on Stock Market):

भारत में इन्फ्लेशन की गिनती होलसेल प्राईज इंन्डेक्स (डब्ल्यूआयपी) पर से किया जाता है जो हर गुरूवार दोपहर को प्रसारीत होता है (पहले वह हर शुक्रवार को बाजार के समय के दरम्यान प्रसारीत होता था)।

प्राईज इंन्डेक्स में होनेवाली बढत के प्रतिशत के हिसाब से इन्फ्लेशन की गिनती की जाती है। एक वर्ष के समय के प्रति प्रतिशत के हर युनिट से उसकी गिनती की जाती है।

जब इन्फ्ले शन बढता है तब शेअर बाजार में मंदी दिखाई देती है और उसी तरह से जब इन्फ्ले शन कम होता है तब शेअर बाजार में तेजी दिखाई पडती है। परंतु ऐसा हमेशा ही नहीं होता है। कई बार इन्फ्ले शन में बढत होने पर भी बाजार में तेजी नहीं दिखाई देती।

हम आशा करते है की हमारी ये अर्थतंत्र और शेअर बाजार – Economy and Stock Market Relationship in Hindi ब्लॉग पोस्ट आपको पसंद आयी होगी अगर आपको शेयर मार्किट से जुड़ा कोई भी सवाल है तो आप कृपया कमेंट में जरूर पूछे।

।। धन्यवाद ।।

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