क्या आपको पता है की डेरिवटिव्हज में डे ट्रेडिंग कैसे करे ? – Day Trading In Derivatives in Hindi अगर आपको पता नहीं है तो आप इस ब्लॉग को पूरा पढ़े.

डेरिवटिव्हज में डे ट्रेडिंग कैसे करे ? – Day Trading In Derivatives in Hindi

Table of Contents

साधारण रूप से ऐसा माना जाता है कि दिन के दरम्यान शेअर्स की कॅश मार्केट में खरीदी और बिक्री करने को ही डे ट्रेडिंग कहा जाता है।

डेरीवेटिव्हज के बाजार में याने की फ्युचर्स और ऑप्सन के बाजार में इसी तरह से किए जानेवाले ट्रेडिंग को भी यही सिद्धांत लागू होता है।

इस प्रकरण में हम डेरिवेटिव्हज (फ्यूचर्स और ऑप्शन) के विषय में थोडी बहुत जानकारी लेनेवाले है। साथ ही उस में ईन्ट्राडे ट्रेडिंग किस तरह से करनी चाहिए इसकी जानकारी भी लेनेवाले है।

नोट (Note):

फ्युचर्स और ऑप्शन के विषय में विस्तारीत जानकारी लेने के लिए हम ‘फ्युचर्स और ऑप्शन का मार्गदर्शन’ नाम की अंकित गाला और जितेन्द्र गाला की प्रकाशित किताब पढ सकते है।

डेरिवेटिव्हज – What is Derivatives in Hindi

सेकंडरी मार्केट का एक विभाग है फॉरवर्ड मार्केट। इसे डेरिवेटिव्हज मार्केट के नाम से भी जाना जाता है। इस बाजार में सिक्युरिटीज का ट्रेडिंग किया जाता है। परंतु उनकी डिलिवरी अथवा पेमेंट भविष्य में ली जाते है।

डेरिवेटिव्हज के मार्केट में फॉरवर्ड का ट्रेडिंग नहीं होता है। जो ट्रेडिंग होता है वह सिर्फ फ्युचर्स और ऑप्शन में ही होता है।

भारतीय डेरिवेटिव्हज बाजार – Derivatives Market in India

जून २००० वर्ष से भारत में डेरिवेटिव्हज के ट्रेडिंग का आरंभ हुआ था। सिक्योरिटीज अँड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) ने नेशनल स्टॉक एक्सजेंज और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज, इन दो शेअर बाजार में डेरिवेटिव्हज का ट्रेडिंग करने के लिए अनुमती दी थी।

शुरूआत में एस अँड पी सीएनएक्स निफ्टी इंडेक्स और बी.एस.ई – ३० (सेन्सेक्स) इंडेक्स पर आधारीत डेरिवेटिव्हज में सेबी ने ट्रेडिंग करने की छूट दी थी।

उसके बाद ऑप्शन में ट्रेडिंग की छूट जून २००१ में दी और व्यक्तिगत शेअर्स के ऑप्शन में ट्रेडिंग करने के लिए छूट जुलै २००१ में दी। व्यक्तिगत शेअर्स में फ्युचर्स का कॉन्ट्रक्ट नवम्बर २००१ में शुरू हुआ।

डेरिवेटिव्हज के कॉन्टॅक्ट का ट्रेडिंग और सेटलमेंट का कामकाज हर किसी एक्सचेंज, उनका क्लिअरींग हाऊस तथा कॉर्पोरेशन सेबी द्वारा मंजूर किए गए और सरकारी गॅझेट में नोटिफाय किए नियम, पेटा नियम और नियंत्रण के आधिन रहकर किया जाता है।

डेरिवेटिव्हज के प्रकार – Types of Derivatives in Hindi

डेरिवेटिव्हज में खास करके फ्युचर्स और ऑप्शन का समावेष होता है।

फ्युचर्स – What is Futures in Hindi

फ्युचर्स कॉन्ट्रॅक्ट दो पक्षों में किया जानेवाला करार है। एक असेट का भविष्य के अचूक समय में अचूक भाव पर करीदने के लिए यह करार किया जाता है।

परंतु फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट के विपरीत फ्युचर्स का ट्रेडिंग स्टॅन्डर्ड बनाया गया है। शेअर बाजार के माध्यम से ही उसका ट्रेडिंग किया जाता है।

ऑप्शन – What is Options in Hindi

कॉल ऑप्शन और पुट ऑप्शन, यह ऑप्शन के दो प्रकार है। कॉल ऑप्शन की खरीदी करनेवालो को निश्चित किए भाव और तारीख या फिर उस से पहले निश्चित की गई संख्या में शेअर्स खरीदने के लिए अधिकार दिए होते है परंतु उन्हे वह शेअर्स खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।

उसी तरह से पुट ऑप्शन में खरीदनेवाले को निश्चित किए भाव से और तारीख या फिर उस से पहले निश्चित की गई संख्या में शेअर्स की बिक्री करने का अधिकार दिया होता है परंतु उन्हे वह शेअर्स बेचने के लिए कोई बंधन नहीं होता।

डेरिवेटिव्हज के कौनसे प्रोडक्ट्स डे ट्रेडिंग के लिए अनुकूल है – Derivative Products Suitable for Day Trading in Hindi

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के अफ अँड ओ विभाग में निचे दिखाए डेरिवेटिव्हज प्रोडक्टस् में ट्रेडिंग करने की सुविधा दी गई है।

  1. इन्डेक्स फ्युचर्स
  2. इन्डेक्स ऑप्शन्स
  3. व्यक्तिगत शेअर्स का फ्युचर्स
  4. व्यक्तिगत शेअर्स का ऑप्शन्स

इन्डेक्स फ्युचर्स और व्यक्तिगत शेअर्स के फ्युचर्स डे ट्रेडिंग करने केलिए अनुकूल है। ऑप्शन में डे ट्रेडिंग करना योग्य नहीं है। उसके ट्रेडिंग पर अमल करना भी संभव नहीं होता है।

उसका एक कारण यह है कि भारत में ऑप्शन का ट्रेडिंग बहुत ही कम प्रमाण में होता है। उसका व्हॉल्यूम भी बहुत कम होता है और उसकी खरीदी और बिक्री के भाव में अधिक फर्क होता है।

फ्युचर्स में डे ट्रेडिंग किस तरह से किया जा सकता है इसकी अधिक जानकारी निचे दी गई है।

मै फ्युचर्स में डे ट्रेडिंग कर सकता हू क्या? (Should I Daytrade in Futures?)

साधारण रूप से लोग ऐसा सवाल करते है कि डे ट्रेडिंग कॅश मार्केट में करना चाहिए या फ्युचर्स मार्केट में। इस सवाल का जवाब बहुत ही सरल है।

वह आपके ट्रेडिंग करने की क्षमता पर निर्भर होता है। उसी तरह से आप कितना जोखिम उठा सकते है इस पर भी निर्भर होता है।

अगर आप एक ही दिन में एक ही ट्रान्झेक्शन में ३.५ से ४ लाख रूपयों की पोजिशन खडी करते हो तो आप फ्युचर्स में डे ट्रेडिंग कर सकते है। अन्यथा आपको कॅश मार्केट में डे ट्रेडिंग करने की सलाह हम देंगे।

दुसरे शब्दों में बताना हो तो अगर आप एक ही स्क्रिप्ट में अधिक संख्या में शेअर्स का लेन देन करते हो और वह संख्या उस स्क्रिप्ट के फ्युचर्स के लॉट से अधिक हो तो हम आपको फ्युचर्स में डे ट्रेडिंग करने की सलाह देते है।

उदाहरण देकर बताना हो तो आप रिलायन्स इन्डस्ट्रीज के एकबार ही १५० से २०० शेअर्स की खरीदी या बिक्री करते हो तो आपको रिलायन्स के फ्युचर्स के २ या ३ लॉट का ट्रेडिंग करना चाहिए।

रिलायन्स फ्यूचर्स के ट्रेडिंग के लिए एक लॉट ७५ शेअर्स का है। तब आपको कॅश मार्केट में ट्रेडिंग करने के बदले लॉट में शेअर्स लेकर फ्युचर्स में ट्रेडिंग करना चाहिए।

फ्युचर्स के बाजार में उपयोग में आनेवाले खास शब्द – Futures Terminology in Hindi

निचे दिए शब्दों का फ्यूचर्स के बाजार में खास उपयोग किया जाता है। डे ट्रेडिंग करने केलिए आपको इन शब्दों की जानकारी होना आवश्यक है। इन शब्दों की जानकारी निचे दी गई है।

स्पॉट प्राईज (Spot Price):

स्पॉट बाजार में जिस भाव पर असेट का ट्रेडिंग होती है वह भाव।

फ्युचर्स प्राईज (Futures Price):

फ्युचर्स के बाजार में जिस भाव पर फ्युचर्स के कॉन्ट्रॅक्ट का ट्रेडिंग होता है भाव को फ्युचर्स प्राईज कहते है।

कॉन्ट्रक्ट की सायकल (Contract Cycle):

जिस कालावधी के लिए कॉन्ट्रैक्ट का ट्रेडिंग होता है वह कालावधी। एन.एस.ई में फ्युचर्स के होनेवाले कॉन्ट्रॅक्ट की दी जानेवाली मुद्दत एक महिना, दो महिने अथवा तीन महिनों के बाद की होती है।

हर किसी महिने के आखरी गुरूवार को यह समय पूरा हुआ ऐसा माना जाता है। महिने के आखरी गुरूवार के बाद उनका ट्रेडिंग रोक दिया जाता है।

महिने के आखरी गुरूवार के बाद आनेवाले शुक्रवार को तीन महिने के दिए जानेवाले समय के नए कॉन्ट्रॅक्ट शुरू किए जाते है।

कॉन्ट्रॅक्ट पूर्ण होने की तारीख (Expiry Date):

कॉन्ट्रैक्ट पूर्ण होने की तारीख का उल्लेख कॉन्टॅक्ट में किया जाता है। कॉन्ट्रॅक्ट में दर्शाई गई आखरी तारीख उस ट्रेडिंग का आखरी दिन होता है। उसके बाद उसका अस्तित्व नष्ट हो जाता है।

कॉन्ट्रॅक्ट की साईज (Contract Size):

कॉन्ट्रॅक्ट के अंतर्गत डिलिवरी देने केलिए बँधे हुए असेट की संख्या को कॉन्ट्रॅक्ट की साईज कहते है। उदाहरण, निफ्ती फ्युचर्स का कॉन्ट्रॅक्ट साईज ५० निफ्ती का है।

बेसिस – मूल किमत (Basis):

फायनान्शियल फ्युचर्स के संदर्भ में फ्युचर्स के भाव में से पॉट भाव को घटाकर मिलनेवाली रकम को फ्युचर्स की किमत का बेसिस कहके जाना जाता है।

डिलिवरी के हर कॉन्ट्रॅक्ट के लिए अलग बेसिस अथवा मूल किमत मिलती है। सामान्य बाजार में मूल किमत अथवा बेसिस पॉजिटिव्ह ही होता है। इस से यह सिद्ध होता है कि पॉट के भाव से साधारण रूप से फ्युचर्स का भाव अधिक ही होता है।

कॉस्ट टू कॅरी (Cost of Carry):

असेट से की जानेवाली कमाइ से फिर दुसरे असेट की खरीदी करने केलिए लगाई गई रकम और उस रकम पर दिए गए ब्याज की रकम और उसको संभाल कर रखने केलिए किए गए खर्च को कॉस्ट टू कॅरी याने की उसे संभाल ने के लिए होनेवाले खर्च के नाम से जाना जाता है।

आरंभिक मार्जिन (Initial Margin):

फ्युचर्स के कॉन्ट्रैक्ट का जब पहले ही समय व्यवहार किया जाता है तब लिए जाने वाले मार्जिन को आरंभ का मार्जिन कहके पहचाना जाता है।

मार्किग टू मर्केट (Marking-to-Market):

फ्युचर्स के मार्केट में ट्रेडींग दिन के आखरी मार्जिन अकाऊन्ट में अॅडजस्टमेन्ट किया जाता है। उस के आधार पर दिन के दरम्यान किए जानेवाले व्यवहार के कारण उनको हुए नुकसान अथवा मुनाफे का अंदाजा लगा सकता है।

फ्युचर्स के बंद भाव के आधार पर यह रकम निश्चित की जाती है। उस को मार्किग टु मार्केट नाम से पहचाना जाता है।

मेन्टेनन्स मार्जिन (Maintenance Margin):

आरंभिक मार्जिन के मुकाबले मेन्टेनन्स मार्जिन थोडा कम होता है। मार्जिन अकाऊंट का बॅलेन्स माईनस में न आए इसलिए मार्जिन रखा जाता है।

मार्जिन अकाऊंट का बॅलेन्स मेन्टेनन्स मार्जिन से कम हुआ हो तो निवेशक को मार्जिन जमा करने का संदेश भेजा जाता है।

इस संदेश को मार्जिन कॉल के नाम से जाना जाता है। मार्जिन कॉल जाने के बाद निवेशक उनके मार्जिन अकाऊंट में अधिक रकम जमा करंगे ऐसी अपेक्षा की जाता है।

दुसरे दिन ट्रेडिंग शुरू होता है उस से पहले ही उनके खाते में मार्जिन जितनी रकम जमा हुई है या नहीं यह निवेशक अथवा ट्रेडिंग करनेवालो को देखना पडता है।

ओपन इन्टरेस्ट (Open Interest):

हर दिन के कामकाज के अंत में बाजार के खिलाडियों द्वारा खडी की गई पोजिशन को ओपन इन्टरेस्ट कहके जान जाता है।

यह बात एकदम आसान शब्दों में कहनी हो तो निश्चित तौर पर ऑप्शन और फ्युचर्स में कितने निवेशकों ने निवेश किया है इसकी गिनती उस से ही मिलती है।

ओपन इन्टरेस्ट में बढत का अर्थ यह होता है कि मार्केट में नई पूँजी का प्रवाह शुरू है। साथ ही ओपन इन्टरेस्ट में गिरावट का अर्थ यह होता है कि मार्केट में निवेश करनेवाले उनका निवेश कम करके साथ ही बाजार में अपने निवेश को लेकर बाहर निकलते है।

फ्युचर्स में डे ट्रेडिंग किस प्रकार करनी चाहिए? (How to Daytrade Futures in Hindi?):

कॅश मार्केट में जिस तरह से डे ट्रेडिंग की जाती है उसी तरह से फ्युचर्स में भी डे ट्रेडिंग की जाती है। फ्युचर्स की खरीदी करके आप लाँग (तेजी) की पोजिशन खडी कर सकते है अथवा फ्युचर्स की बिक्री करके आप शॉर्ट (मंदी) की पोजिशन खडी कर सकते है।

आपने लाँग पोजिशन खडी की हो तो आप की पोजिशन बंद करने के लिए फ्यूचर्स की बिक्री कर सकते है। अथवा आप ने शॉर्ट पोजिशन खडी की हो तो पोजिशन बंद करने केलिए फ्युचर्स की खरीदी कर सकते है।

फ्युचर्स में डे ट्रेडिंग करते समय ध्यान में रखने लायक बाते (Precautions while Day Trading Futures in Hindi) :

  1. जिस फ्युचर्स में अवरेज व्हॉल्यूम कम है उस फ्युचर्स में डे ट्रेडिंग नहीं करना चाहिए।
  2. जिस फ्युचर्स का लॉट साईज बहुत ही बड़ा है उस फ्युचर्स में डे ट्रेडिंग मत कीजिए क्योंकि भाव में आनेवाला थोडा भी फर्क आपको बहुत बडा नुकसान या फायदा दिला सकता है।
  3. जिस स्क्रिप्ट के भाव में बहुत ही बडी बढत या गिरावट होता है उस स्क्रिप्ट के फ्युचर्स का ट्रेडिंग नहीं करना चाहिए।
  4. जो महिना शुरू है उस महिने के फ्युचर्स कॉन्ट्रैक्ट में ही डे ट्रेडिंग करना चाहिए। इस कॉन्ट्रैक्ट में ही अधिक व्हॉल्यूम होता है।
  5. फ्युचर्स कॉन्ट्रॅक्ट के एक्सपायरी के दिन उस कॉन्ट्रैक्ट में डे ट्रेडिंग मत कीजिए। उदाहरण देकर बताना हो तो अगस्त महिने के आखरी गुरूवार को अगस्त श्रेणी के फ्युचर्स के कॉन्ट्रैक्ट का ट्रेडिंग मत कीजिए।

इन्ट्राडे कॅश और इन्ट्राडे फ्युचर्स का फर्क (Comparision of Intraday Cash & Intraday Futures in Hindi) :

इन्ट्राडे कॅश इन्ट्राडे फ्युचर्स
आप अपनी ईच्छा के अनुसार,
चाहे उतनी संख्या में शेअर्स की
खरीदी या बिक्री कर सकते है।
निश्चित किए गए लॉट में ही शेअर्स
की खरीदी या बिक्री कर
सकते है।
फ्युचर्स की तुलना में इन्ट्राडे कॅश
में लगनेवाला ब्राकरेज साधारण
रूप से अधिक होता है।
इन्ट्राडे कॅश की तुलना में फ्युचर्स
में लगनेवाला ब्राकरेज साधारण
रूप से कम होता है।
आप A, B1, B2, S अथवा Z
इन सभी ग्रुप के किसी भी स्क्रिप्ट
में ट्रेडिंग कर सकते है।
फ्युचर्स और ऑप्शन के विभाग में
सामिल किए स्क्रिप्ट में ही आप
ट्रेडिंग कर सकते है।
कॅश मार्केट में आप चाहे उतनी
संख्या में शेअर्स का ट्रेडिंग कर
सकते है। साथ ही समय के
अनुसार आप अपनी पोजिशन बढा
या कम कर सकते है।
फ्युचर्स में एक लॉट के प्रमाण में
ट्रेडिंग कर सकते है और समय के
अनुसार पोजिशन को बढा या घटा
भी लॉट के प्रमाण में ही कर सकते है।
नकद बाजार में फ्युचर्स के बाजार
की तुलना में लिक्विडिटी का
प्रमाण कम होता है।
फ्युचर्स के बाजार में नकद बाजार
की तुलना में लिक्विडिटी का
प्रमाण अधिक होता है।
आपको नुकसान हो या फायदा हो
दिन के अंत में आपको अपनी
पोजिशन बंद करके बाहर निकलना
ही पडता है।
फ्युचर्स के बाजार में हमेशा लोग
अपने नुकसान की पोजिशन वैसे
ही दुसरे दिन भी आगे लेकर जाते है।
इस तरह से वह डे ट्रेडिंग के
अनुशासन को भंग करते है।

नोट (Note):

एक बात खास ध्यान में रखिए कि आपने शेअर बाजार में नए सिरे से ट्रेडिंग आरंभ की हो तो आप फ्युचर्स का ट्रेडिंग करना टालिए। फ्युचर्स के बाजार में

ट्रेडिंग की शुरूआत करने से पूर्व कॅश मार्केट में ट्रेडिंग करके अनुभव लीजिए। शुरूआत में कम क्वान्टीटी में ही ट्रेडिंग कीजिए और बाजार की चाल समझने का प्रयास कीजिए।

हम आशा करते है की हमारी ये डेरिवटिव्हज में डे ट्रेडिंग कैसे करे ? – Day Trading In Derivatives in Hindi ब्लॉग पोस्ट आपको पसंद आयी होगी अगर आपको शेयर मार्किट से जुड़ा कोई भी सवाल है तो आप कृपया कमेंट में जरूर पूछे।

।। धन्यवाद ।।

Important Links:-

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2 Comments

दिन की शुरूआत कैसे करें - How To Start Intraday Trader Day In Hindi · January 25, 2021 at 7:44 pm

[…] डेरिवटिव्हज में डे ट्रेडिंग कैसे करे ?… […]

स्विंग ट्रेडिंग क्या है? - What Is Swing Trading In Hindi · March 4, 2021 at 3:35 pm

[…] डेरिवटिव्हज में डे ट्रेडिंग कैसे करे ?… […]

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