निवेश के लोकप्रिय विकल्प – Popular Investment Options in Hindi.

क्या हो निवेश का सही तरीका? (What Should be the Right Method of Investment)

पनी मेहनत की कमाई में से पाई-पाई जोड़कर जमा की गई पूँजी को निवेश करते वक्त अकसर निवेशक के दिमाग में यह सवाल सबसे पहले कौंधता है कि निवेश का कौन सा ऐसा विकल्प है

जहाँ मैं अपना पैसा निवेश करूँ? निवेश कर लेने के बाद यदि निवेशक को उचित रिटर्न नहीं मिलता है

तो उसके मन में हमेशा यह सवाल बना रहता है कि क्यों मेरा निवेश बेहतर फायदा नहीं दे पा रहा है ? ऐसी स्थिति में निवेशक के पास दो ही रास्ते होते हैं

पहला, वह उस निवेश से निकल जाए; दूसरा, वह उस निवेश में घाटा खाने के बावजद बना रहे। लेकिन ये दोनों ही रास्ते निवेशक के लिए सही नहीं हैं।

तो सवाल यह खडा होता है कि आखिर किया क्या जाए, ताकि ऐसी स्थिति पैदा ही न होने पाए? इसके लिए जरूरी है कि हर निवेशक निवेश से पहले अपनी निवेश की जरूरत, उद्देश्य और अपनी जोखिम लेने की प्रवृत्ति का विश्लेषण करे, इसके बाद ही निवेश के बारे में सोचे।

आइए, जानते हैं निवेश से पहले की प्रक्रिया को।

समझें निवेश की प्रक्रिया को – Understand the Investment Process

निवेश करने की प्रक्रिया बहुत ही सरल है। दरअसल निवेश करते वक्त मुख्य रूप से तीन चीजों की आवश्यकता होती है योजना (प्लानिंग), धैर्य और समय की।

यदि इन्हें सही तरीके से कर लिया जाए तो निवेश आपके लिए कभी सिरदर्द नहीं बनेगा।

अब जब आप निवेश के किसी एक माध्यम में निवेश करने का निर्णय ले चुके हैं तो निम्नलिखित बातों पर गौर करें

  • आपका लक्ष्य क्या है?
  • लक्ष्य को प्राप्त करने का अनुमानत: समय’ (टाइम फ्रेम) क्या है?

यदि आपका लक्ष्य भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए निवेश करने का है तो जाहिर है, निवेश के लिए आपका ‘टाइम फ्रेम’ ज्यादा होगा।

महत्त्वपूर्ण यह है कि आप अपने निवेश का फायदा कितने समय बाद लेना चाहते हैं और उसके लिए बेहतर चुनाव कौन सा हो सकता है, जो आपके लक्ष्य को पूरा करे।

उदाहरण के लिए, यदि आपका लक्ष्य कार या कोई छोटी-मोटी संपत्ति खरीदना है तो जाहिर है, यह शॉर्ट टर्म लक्ष्य है।

इसी तरह बच्चों को अच्छी शिक्षा उपलब्ध करवाना मीडियम टर्म लक्ष्य है तो रिटायरमेंट प्लानिंग आपका लांग टर्म लक्ष्य है।

चूंकि यदि लक्ष्य शॉर्ट टर्म, मीडियम टर्म या लांग टर्म है तो उसे प्राप्त करने के लिए निवेश के विभिन्न तरीकों में से उस तरीके का चयन करना होगा, जो आपके निवेश के लक्ष्य को पूरा कर सके।

अब यदि शेयरों में निवेश की बात करें तो शेयरों में निवेश काफी जोखिम भरा होगा। यदि निवेशक शॉर्ट टर्म (अल्प अवधि) को ध्यान में रखकर निवेश किया जाए।

शेयरों में निवेश कर यदि आप अपनी पूँजी को बढ़ाना चाहते हैं तो इसके लिए आपको लांग टर्म (लंबी अवधि) के लिए निवेश करना होगा।

अपनी वित्तीय स्थिति पर गौर करें – Check Your Financial Situation

आपकी वित्तीय स्थिति ही तय करेगी कि आपके लिए निवेश का कौन सा तरीका सबसे बेहतर है।

आप कितना पैसा नियमित तौर पर बचा सकते हैं और कितने लंबे समय तक ऐसा कर सकते हैं। यदि इसकी फौरी तौर पर गणना कर ली जाए तो निवेश करना काफी आसान हो जाएगा।

आप इस बात पर भी गौर करें कि आप पर कितने लोग निर्भर हैं। शॉर्ट टर्म लक्ष्यों को पाने के लिए यदि ज्यादा जोखिम लेकर आक्रामक निवेश-योजना में निवेश करते हैं

तो पहले इमरजेंसी फंड, समुचित इंश्योरेंस और भविष्य को ध्यान में रखकर रिटायरमेंट योजना पर समुचित धन लगाकर ही ऐसा करें, वरना आप परेशानी में पड़ सकते हैं।

जोखिम लेने की क्षमता – Risk Appetite

निवेश से पहले यह निर्णय कर लें कि आप में जोखिम लेने की कितनी क्षमता है। कहीं ऐसा न हो कि शेयरों में निवेश करने के बाद शेयर की गिरती कीमत आपकी रातों की नींद ही उड़ा दे।

आप में यदि जोखिम लेने की क्षमता है, तभी आप जोखिम से जुड़ी निवेश योजनाएँ–जैसे शेयर, म्युचुअल फंड और यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान में निवेश करें। वरना

बेहतर है कि फिजिकल असेट, जैसे- प्रॉपर्टी, सोना या बैंक में सावधि जमा, पोस्ट ऑफिस इंश्योरेंस व पब्लिक प्रोविडेंड फंड, सरकारी प्रतिभूतियों और डिबेंचर में निवेश करें।

यदि आप बिलकुल भी जोखिम नहीं लेना चाहते हैं तो शेयर बाजार आपके लिए नहीं है।

यदि थोड़ा जोखिम लेने के लिए तैयार हैं तो अपनी बचत का 70 प्रतिशत फिक्स्ड रिटर्न (जैसे बैंक में सावधि जमा पर तयशुदा ब्याज मिलता है) में निवेश करें और बाकी का इक्विटी में निवेश करें।

एक बार आपने अपना लक्ष्य निश्चित कर लिया, उसके लिए ‘टाइम फ्रेम’ निर्धारित कर लिया, वित्तीय स्थिति का विश्लेषण कर लिया और जोखिम लेने की क्षमता को भी जान लिया

तो आप स्वयं इस बात का निर्णय ले सकते हैं कि आपको विभिन्न असेट क्लास, जैसे इक्विटी (शेयर), डेब्ट (गारंटीशुदा रिटर्न देनेवाले विकल्प) और अन्य प्रकार, जैसे सोना व रियल एस्टेट में से किसमें, कितना निवेश करना है।

निवेश द्वारा महँगाई की दर से ज्यादा रिटर्न मिले, यह जरूरी – It is Necessary to get Higher Returns than Inflation by Investment

निर्धारित ‘टाइम फ्रेम’ में निवेश का सबसे अच्छा ऑप्शन तलाशते वक्त आपका मुख्य उद्देश्य यह होता है कि बचत को जहाँ निवेश किया जा रहा है, वहाँ से सबसे ज्यादा रिटर्न मिले।

लेकिन पूँजी के डूब जाने का खतरा और भय के चलते ज्यादातर निवेशक सिर्फ फिक्स्ड रिटर्न इंस्ट्रमेंट (गारंटीशुदा रिटर्न देनेवाले निवेश के प्रकार) में ही निवेश करना उचित समझते हैं।

हालाँकि ऐसे इस्ट्रमेंट निवेशक को निश्चिंतता प्रदान करते हैं, लेकिन यह भी सही है कि यहाँ आपके निवेश की ग्रोथ सीमित हो जाती है।

कई बार तो ऐसे निवेश से मिलनेवाला रिटर्न महँगाई की दर से भी कम होता है। उस पर बैंक डिपॉजिट, आर.बी.आई. बांड और छोटी बचत के अन्य तरीकों से मिलनेवाले रिटर्न पर जो टैक्स लगता है, उससे रिटर्न का प्रतिशत और भी कम हो जाता है।

इसलिए रिटर्न का प्रतिशत निकालते वक्त हमेशा यह देखें कि महँगाई की दर | कितनी है। उदाहरण के लिए, महँगाई की दर 10.5 प्रतिशत है और बैंक में सावधि जमा

पर आपको 10.5 प्रतिशत रिटर्न मिल रहा है तो इसका मतलब आपको कोई फायदा नहीं हो रहा है।

इसलिए बेहतर है कि आप अपनी रिस्क प्रोफाइल (जोखिा लेने की क्षमता), टाइम हॉरिजन (निर्धारित समय), निवेश के उद्देश्य और टैक्स संबंधी पहलुओं पर विचार करने के बाद उस जगह निवेश करें, जो महँगाई दर को पछाड़ने वाला रिटर्न दे सके।

आपके लिए जो बेहतर है वही बेहतर निवेश है – What is Better for You is Better Investment

कई निवेशक अपने निवेश संबंधी निर्णय लोगों की सलाह पर और बाजार की भेड-चाल को देखकर कहते हैं।

इतना ही नहीं, वे दूसरों की सलाह पर अपना असेट अलोकेशन’ (निवेश को विभिन्न विकल्पों में बाँटने का अनुपात) भी बदल डालते हैं।

यदि आपको बाजार का उतार-चढ़ाव समझ में न आए तो बेहतर है कि आप प्रोफेशनल एडवाइजर से सलाह लें, ताकि वह आपकी जरूरतों को समझकर ऐसा हल दे सके, जो आपके निवेश के उद्देश्यों को पूरा कर सके।

लेकिन इसके साथ भी उतना ही जरूरी है कि आप अपना पोर्टफोलियो स्वयं जाँचें और अपने एडवाइजर से लगातार प्रश्न करते रहें।

यदि किसी विशेष योजना में लगातार बने रहने के लिए आपका एडवाइजर कहता है और आपको निवेशित धन लगातार डूबता दिखे तो पूछिए कि ऐसा वह क्यों कह रहा है?

खरीदने व बेचने की सलाह जब भी एडवाइजर से मिले, आप उससे उसका कारण जरूर जानें। कभी भी यह सोचकर निवेश में देरी नहीं करनी चाहिए कि कहीं गलत चुनाव आपको ले न डूबे

क्योंकि निवेश लंबी व सतत चलनेवाली प्रक्रिया है। और लंबे समय तक यदि लगातार निवेश किया जाए तो व्यक्ति अच्छी-खासी पूँजी बना सकता है एवं अस्थिरता से भी बच सकता है।

असेट अलोकेशन का महत्त्व (Importance of Asset Allocation)

बहुत से निवेशकों को यह लगता है कि उच्च रिटर्न पाना बिना ज्यादा जोखिम लिये नामुमकिन है। हालाँकि यह सही है, लेकिन यदि समुचित असेट अलोकेशन को ‘टूल’ के तौर पर इस्तेमाल किया जाए तो न्यूनतम जोखिम में अधिकतम रिटर्न पाया जा सकता है।

इसे क्रिकेट की भाषा में समझें तो सही असेट अलोकेशन क्रिकेट टीम के चयन की तरह है। जैसे टीम का सही चयन जीत का महत्त्वपूर्ण कारक बनता है

उसी तरह सही असेट अलोकेशन वेल्थ गेम को जीतने में महत्त्वपूर्ण कारक बनता है। दरअसल असेट अलोकेशन एक ऐसी प्रक्रिया है

जिसमें आप यह निर्णय लेते हैं कि पूँजी (वेल्थ) को विभिन्न असेट क्लास और सेक्टर्स में कितना व किस तरह बाँटा जाए।

हाँ, यह पहले से अनुमान लगाना जरा मुश्किल होता है कि कौन सी असेट कैटेगरी निश्चित समय के बाद आपको कितना फायदा देगी।

लेकिन इस तरकीब को समझ लिया जाए तो निवेश को सफल बनाया जा सकता है।

परिभाषा (Definition)

असेट अलोकेशन का मतलब है-अपने पैसों (मनी) को निवेश की विभिन्न श्रेणियों जैसे-शेयर, बांड व नकदी आदि में निवेश कर विविधता का फायदा उठाना; और इसी विविधता (डायवर्सिफिकेशन) से न सिर्फ जोखिम को कम करने में सहायता मिलती है,

अपितु रिटर्न को बढ़ाने में भी मदद मिलती है। आपके वित्तीय लक्ष्यआपकी उम्र, जीवन-शैली और पारिवारिक जिम्मेदारियों पर निर्भर करते हैं।

लेकिन मौटे तौर पर यदि 3 मॉडल पोर्टफोलियो को आधार बनाया जाए तो आप स्वयं की अप्रोच के आधार पर पोर्टफोलियो का निर्माण कर सकते हैं।

1. आक्रामक पोर्टफोलियो – Aggressive Portfolio

इस पोर्टफोलियो को बनानेवाले निवेशक में ज्यादा जोखिम लेने की क्षमता होनी चाहिए, क्योंकि ग्रोथ पर जोर देनेवाले इस पोर्टफोलियो में निवेश के लिए उपलब्ध धन का 65 प्रतिशत स्टॉक्स में या इक्विटी म्यूचुअल फंड में, 25 प्रतिशत फिक्स्ड इनकम फंड के बांड में और 10 प्रतिशत को शॉर्ट टर्म मनी मार्केट फंड में या नकदी के रूप में रखे जाने का सुझाव होता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा पोर्टफोलियो उन निवेशकों के लिए है, जो लंबी अवधि को ध्यान में रखकर निवेश करते हैं।

यह पोर्टफोलियो शॉर्ट टर्म इमरजेंसी और मीडियम टर्म के लक्ष्य, जैसे घर बनाना आदि में सहायक हो सकता है, लेकिन मुख्य तौर पर यह लंबी अवधि के लक्ष्यों जैसे रिटायरमेंट आदि को पूरा करने में मददगार साबित होता है

  • 25 प्रतिशत बांड में निवेश
  • 10 प्रतिशत नकदी या शॉर्ट टर्म में निवेश
  • 65 प्रतिशत शेयर में निवेश

2. मॉडरेट पोर्टफोलियो (Moderate Portfolio)

  • 50 प्रतिशत बांड्स में निवेश
  • 30 प्रतिशत स्टॉक्स में निवेश
  • 20 प्रतिशत शॉर्ट टर्म में निवेश।

इस पोर्टफोलियो में ग्रोथ और स्थायित्व दोनों को संतुलित (बैलेंस) किया जाता है। यहाँ कुल निवेश का 50 प्रतिशत स्टॉक्स या इक्विटी में, 30 प्रतिशत पूँजी को बांड्स या फिक्स्ड इनकम फंड और 20 प्रतिशत शॉर्ट टर्म मनी फंड या नकदी योग्य रखा जाता है।

यह पोर्टफोलियो निवेशक को थोड़ी-बहुत सुरक्षा के साथ नियमित आय भी प्रदान करता है।

जहाँ इक्विटी घटक ग्रोथ के लिए पोटेंशियल प्रदान करता है, वहीं बांड्स और शॉर्ट टर्म इंस्ट्रमेंट शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव से बचाता है।

परंपरावादी पोर्टफोलियो (Conservative Portfolio)

इस पोर्टफोलियो के अनुसार, निवेशित धन का 25 प्रतिशत इक्विटी फंड या शेयरों में निवेश किया जाना चाहिए, 25 प्रतिशत मनी मार्केट फंड या नकदी समान योग्य स्थान पर निवेशित किया जाना चाहिए तथा 50 प्रतिशत बांड या फिक्स्ड इनकम फंड में निवेश किया जाना चाहिए।

ये पोर्टफोलियो उनके लिए है, जो बहुत कम जोखिम लेना चाहते हैं या उनके लिए है, जो सेवानिवृत्त हैं।

यहाँ 25 प्रतिशत शेयरों में किया गया निवेश महँगाई दर को पछाड़ने में मददगार साबित होता है।

  • 50 प्रतिशत बांड्स
  • 25 प्रतिशत स्टॉक्स (शेयर)
  • 25 प्रतिशत शॉर्ट टर्म।

उपरोक्त असेट अलोकेशन का मतलब यह नहीं है कि आप इस निर्धारण, या वर्गीकरण पर हमेशा बने रहें, बल्कि जरूरी है कि आप अपने पोर्टफोलियो को समयसमय पर बदलते रहें, ताकि आप अपने लक्ष्य को पा सकें।

आप पार्टफोलियो का पुनर्गठन करने के लिए फाइनेंशियल एडवाइजर (वित्त परामर्शदाता) की मदद भी ले सकते हैं।

।। धन्यवाद ।।

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3 Comments

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