क्या आपको पता है की म्यूच्यूअल फंड के प्रकार – Types of Mutual Funds in Hindi अगर आपको पता नहीं है तो आप इस ब्लॉग को पूरा पढ़े.

म्यूच्यूअल फंड के प्रकार – Types of Mutual Funds in Hindi

ओपन एंडेड फंड – Open Ended Mutual Fund in Hindi

जैसा कि नाम से ही विदित है, ओपन एंडेड स्कीम की निर्धारित समयावधि नहीं होती है। सालो साल यह स्कीम चलती रहती है, जब तक कि फंड स्वयं रेग्यूलेशन के अंतर्गत स्कीम को हटा देने या खत्म कर देने का निर्णय नहीं कर लेता।

आजकल बाजार में प्रायः सभी म्यूचुअल फंड की ओपन एंडेड स्कीमें उपलब्ध हैं। इस स्कीम में निवेशक को यह सुविधा मिलती है कि वह किसी भी समय उस स्कीम में निवेश कर सकता है।

प्रत्येक ओपन एंडेड स्कीम जब बाजार में पहली बार लॉञ्च की जाती है, तब उसका न्यू फंड ऑफर (NFO) बाजार में आता है, जिसमें निवेश करने के लिए ‘इनीशियल ऑफर पीरियड’ निर्धारित होता है।

उस समय यदि निवेशक उस फंड में निवेश करता है तो उसे फेस वैल्यू के आधार पर यूनिट्स मिलती हैं, जो इनीशियल ऑफर पीरियड में 10 रुपए प्रति यूनिट होती है।

यदि निवेशक बाजार में फंड के सूचीबद्ध होने के बाद निवेश करता है तो उसे यूनिट की नेट एसेट वैल्यू पर निवेश करना होता है।

इसलिए ओपन एंडेड स्कीम की ‘एन.ए.वी.’ को रोजाना घोषित किया जाता है, ताकि निवेशक निवेश का निर्णय ले सके। इसे इस उदाहरण से समझ सकते है

जैसे ‘रिलायंस ग्रोथ फंड‘ की ओपन एंडेड स्कीम जब बाजार में लॉञ्च हुई थी, तब 10 रुपए प्रति यूनिट के आधार पर निवेशक को प्राप्त हुई, अगर कुछ ही वर्षों में यदि इस फंड की एन.ए.वी. 85 रुपए हो जाती है तो नए निवेशक को प्रति यूनिट 85 रुपए देकर इसकी यूनिट्स खरीदनी होंगी।

इस स्कीम का सबसे नकारात्मक पहलू यह है कि जब कभी बाजार में नकारात्मक आर्थिक खबरें आती हैं और बाजार गिरता है, निवेशक अपनी यूनिट्स को बेच (रीडिम) देते हैं।

इस तरह बड़े पैमाने पर हुए रिडेप्शन से फंड मैनेजर्स को अपने निवेश से धन निकालना पड़ता है, ताकि निवेशकों को भुगतान किया जा सके।

इससे लंबी अवधि के निवेशकों को भी नुकसान होता है। इसी तरह फंड मैनेजर को उस समय भी परेशानियों से दो-चार होना पड़ता है,

जब अच्छी आर्थिक खबरों से बाजार ऊपर चढ़ने लगता है और फंड की एन.ए.वी. ऊपर जाती देख निवेशकों द्वारा यूनिट्स की खरीदारी में अचानक वृद्धि हो जाती है। ऐसे में फंड मैनेजर को निवेशकों की पूँजी ऊँचे भावोंवाले बाजार में लगानी पड़ती है।

क्लोज एंडेड म्यूच्यूअल फंड – Close Ended Mutual Fund in Hindi

क्लोज एंडेड स्कीम की निश्चित अवधि होती है। यह क्लोज एंडेड फंड कितनी अवधि के लिए है, इसका जिक्र उस फंड के इनीशियल ऑफर के समय कर दिया जाता है।

हालाँकि ऐसा भी होता है कि फंड अपनी अवधि में परिवर्तन कर दे; लेकिन इसके लिए उसे निवेशकों की सहमति तथा नियमों के आधार पर पूरी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।

क्लोज एंडेड स्कीम में निवेशक तभी निवेश कर सकता है, जब उसका इनीशियल ऑफर पीरियड या उसके न्यू फंड ऑफर (NFO) बाजार में उपलब्ध हों। एक बार ऑफर पीरियड की समयावधि (जो काफी लंबी होती है) बीत जाने के बाद निवेशक उस फंड में निवेश नहीं कर सकते।

वे निवेश को ऑफर पीरियड में निवेश करते हैं, उसे लंबी अवधि तक रखते हैं, इसलिए फंड मैनेजर निवेशकों की राशि को बहुत बेहतर तरीके से संचालित करता है।

लेकिन सेबी की गाइड लाइन के अनुसार, “निवेशकों की सुविधा के लिए एग्जिट रूट भी इस स्कीम में उपलब्ध होता है।” यानी यदि निवेशक को पैसे की आवश्यकता है तो वह फंड से बाहर आ सकता है, जिसके लिए उसे एग्जिट लोड चुकाना होता है।

क्लोज एंडेड फंड की नेट एसेट वैल्यू (एन.ए.वी.) साप्ताहिक तौर पर प्रदर्शित की जाती है। यह स्कीम सेक्टर आधारित स्टॉक्स में ज्यादा फायदा देती है।

जैसे फंड हाउस की एसेट और मैनेजमेंट कंपनी को लगता है कि कोई खास इंडस्ट्री या सेक्टर अभी अपने प्रारंभिक दौर में है,

लेकिन आगे इसमें ग्रोथ जारी रहेगी तो वह उस इंडस्ट्री की ग्रोथ का लाभ लेने के लिए क्लोज एडेड स्कीम बाजार में लॉञ्च करता है, ताकि जब इंडस्ट्री परिपक्व हो जाए, तब तक फंड की अवधि भी पूरी हो जाए।

क्लोज एंडेड फंड प्रायः तीन से पाँच साल की अवधि के लॉक-इन पीरियड में उपलब्ध होते हैं।

निवेश के उद्देश्यों के आधार पर – Depending on the investment objectives :-

ग्रोथ फंड/इक्विटी म्यूचुअल फंड – Growth Fund / Equity Mutual Funds in Hindi

ग्रोथ फंड निवेश के दूसरे विकल्पों की तुलना में बहुत अच्छा रिटर्न देते हैं। अब चूँकि सबसे ज्यादा रिटर्न इस फंड से मिलता है तो सबसे ज्यादा जोखिम (रिस्क) भी इसके साथ जुड़ा होता है।

शेयर बाजार में ऐसा कहा जाता है कि ‘जितना ज्यादा रिस्क उतना ज्यादा रिटर्न’। चूँकि यह फंड पूरी तरह से इक्विटी (शेयर बाजार) से जुड़ा हुआ है,

इसलिए ग्रोथ फंड में पूँजी का एक बड़ा हिस्सा इक्विटी में निवेशित किया जाता है और लंबी अवधि में इससे पूँजी लाभ (कैपिटल एप्रिसिएशन) प्राप्त होता है।

चूँकि फंड का एक बड़ा हिस्सा स्टॉक मार्केट से जुड़ा होता है, इसलिए जब शेयर बाजार चढ़ता है, तब ग्रोथ फंड द्वारा दिया गया औसत रिटर्न काफी अच्छा होता है। यही कारण है कि ग्रोथ फंड छोटे निवेशकों को बहुत आकर्षित करता है।

ग्रोथ फंड से मिलनेवाला रिटर्न (लाभ) काफी अस्थिर होता है, क्योंकि इन पर शेयर बाजार के प्रदर्शन का सीधा असर पड़ता है। ऐसे में यदि आप ग्रोथ फंड से पैसा कमाना चाहते हैं तो आपका पैसा लगाने व निकालने के सही समय का चुनाव महत्त्वपूर्ण है।

ग्रोथ फंड में मंदी के समय या बाजार बहुत नीचे गिर जाने पर निवेश करना चाहिए। लेकिन यदि आपने लंबी अवधि के लिए निवेश किया है तो आपको औसत रिटर्न काफी अच्छा मिलेगा। हाँ, सभी ग्रोथ फंड समान तरीके से संचालित नहीं होते।

इनकम फंड – Income Fund :-

म्यूचुअल फंड की इनकम स्कीम में म्यूचुअल फंड की सभी स्कीम के मुकाबले सबसे कम जोखिम जुड़ा होता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इनकम फंड में निवेशकों के पैसे को शेयर बाजार में नहीं, बल्कि ऐसी सरकारी प्रतिभूतियों में निवेशित किया जाता है,

जहाँ से नियमित आय प्राप्त होती रहे । फंड द्वारा एकत्रित पूँजी का निवेश सरकारी प्रतिभूतियों (गवर्नमेंट सिक्यूरिटीज) तथा विभिन्न कंपनियों द्वारा जारी किए जानेवाले बांड में लगाया जाता है।

निवेशकों को यहाँ रिटर्न का प्रतिशत ग्रोथ फंड के मुकाबले काफी कम मिलता है, लेकिन यहाँ नियमित आमदनी रहती है। यह आय ब्याज दरों पर निर्भर करती है।

जब ब्याज दरों में बढ़ोतरी हो जाती है, तब पहले की ब्याज दरों पर जारी किए बांड से मिलनेवाली ब्याज दर कम आकर्षक हो जाती है। जब ब्याज दरें कम हो जाती हैं,

तब इन बांड से मिलनेवाली ब्याज दर काफी आकर्षक लगती है। लेकिन चूँकि ब्याज दरों में परिवर्तन काफी कम होता है,

इसलिए इनका रिटर्न भी लगातार एक जैसा बना रहता है। बहुत से इनकम फंड शेयर बाजार में भी निवेश करते हैं, लेकिन इक्विटी में इनका निवेश बहुत ही कम होता है।

इनकम फंड द्वारा इक्विटी शेयरों में निवेश करते समय उन शेयरों का चयन किया जाता है, जो अग्रणी कंपनियों के हों तथा जिनमें अस्थिरता बहुत कम हो और जो बहुत ज्यादा डिविडेंड देती हों।

इक्विटी में पूँजी का कितना प्रतिशत निवेश किया जाएगा, यह स्कीम के लॉञ्च के समय ही निर्धारित कर दिया जाता है।

संतुलित फंड – Balanced Fund / डायवर्सिफाई फंड – Diversify fund :-

इस फंड में इक्विटी के साथ बांड व प्रतिभूतियों में भी निवेश किया जाता है, लेकिन इस बात का ध्यान रखा जाता है कि दोनों में निवेश संतुलित हो।

इक्विटी व डेब्ट (बांड, सरकारी प्रतिभूतियाँ आदि) में कितना अनुपात है, इसका पता फंड के ऑफरपत्र से जाना जा सकता है।

यहाँ निवेश में विविधता (डायवर्सिफिकेशन) सबसे बेहतर रूप में पाई जाती है, इसलिए निवेशक की बाजार से जुड़ी जोखिम काफी कम हो पाती है।

कुल पूँजी का (पोर्टफोलियो की एसेट का) 50 से 65 प्रतिशत इक्विटी शेयर में निवेशित (इनवेस्टेड) किया जाता है। वहीं बचा हुआ डेब्ट (जैसे बांड व सरकारी प्रतिभूतियाँ) मार्केट में निवेशित किया जाता है।

मनी मार्केट फंड – Money Market Fund :-

इन्हें लिक्विड प्लान के नाम से भी जाना जाता है। जब ब्याज दरों में बहुत परिवर्तन आता है या यों कहें कि अस्थिरता का दौर चलता है, तब ये फंड सक्रिय हो जाते हैं।

इनका ज्यादातर निवेश उन फिक्स्ड इनकम इंस्ट्रमेंट (जहाँ से नियमित व पूर्व निर्धारित आय प्राप्त हो) में होता है, जो एक साल से भी कम अवधि के लिए जारी किए गए हों।

चूँकि यहाँ निवेशक कुछ दिनों के लिए अपनी पूँजी को निवेशित कर सकता है, इसलिए इस फंड को कम अवधि (शॉर्ट टर्म) के लिए पैसा लगाने का बेहतर माध्यम माना जाता है।

गिल्ट फंड – Gilt Funds :-

यहाँ जोखिम शून्य होता है, क्योंकि सिर्फ केंद्रीय व राज्य सरकार द्वारा जारी प्रतिभूतियों या रिजर्व बैंक अधिकृत दूसरे इंस्ट्रमेंट में ही पूँजी का निवेश किया जाता है।

चूँकि यहाँ जोखिम शून्य है और कर-मुक्त आय है तथा जब चाहें तब नकदी प्राप्त की जा सकती है, इसलिए इसका रिटर्न (लाभ) भी इनकम फंड की तुलना में काफी कम होता है।

सेक्टर फंड – Sector Fund :-

यहाँ फंड का उद्देश्य है-पूँजी को शेयर बाजार में निवेश कर लाभ प्राप्त करना। लेकिन यहाँ फंड मैनेजर की रणनीति अलग होती है;

क्योंकि यहाँ सिर्फ किसी एक सेक्टर की विभिन्न कंपनियों के शेयरों में निवेश किया जाता है और चूँकि यहाँ ग्रोथ फंड की तरह विविधता (डायवर्सिफिकेशन) नहीं है,

इसलिए यहाँ जोखिम भी ज्यादा है। हाँ, यह सही है कि निवेशक के उस विशेष सेक्टर की विभिन्न कंपनियों में धन निवेश की विविधता मिल सकती है।

इंडेक्स फंड – Index Funds :-

इनका उद्देश्य होता है बाजार के प्रदर्शन के साथ चलना। यहाँ अनुभवी फंड मैनेजरों द्वारा शेयरों का चयन नहीं किया जाता है, बल्कि बाजार में इंडेक्स (जैसे सेंसेक्स व निफ्टी) में निवेश किया जाता है

अर्थात् सेंसेक्स, जिसमें बी.एस.ई. की अग्रणी 30 कंपनियाँ शामिल हैं और निफ्टी, जिसमें एन.एस.ई. की अग्रणी 50 कंपनियाँ शामिल हैं, में निवेश किया जाता है।

फंड में निवेश करने के विकल्प – Options to invest in the funds :-

जब आप किसी म्यूचुअल फंड की स्कीम में निवेश करते हैं, तब आपको हर फंड में निवेश करने के लिए तीन विकल्प दिए जाते हैं। इनका चयन निवेशक अपनी वित्तीय जरूरतों को ध्यान में रखकर कर सकता है

1.ग्रोथ ऑप्शन – Growth Option :– ग्रोथ ऑप्शन यदि आपने चुना है तो आपके फंड की यूनिट्स का मूल्य समय के साथ बढ़ता जाएगा और जब आप इसे बेचना चाहेंगे, तब आपको यूनिट की बाजार में चल रही कीमत के हिसाब से पैसा मिल जाएगा।

2.डिविडेंड ऑप्शन – Dividend Option :– डिविडेंड ऑप्शन में फंड की स्कीम से होनेवाले लाभ को फंड मैनेजर डिविडेंड के रूप में समय-समय पर निवेशकों को देते रहते हैं। यह ऑप्शन उन निवेशकों के लिए ठीक है, जिन्हें समय-समय पर पैसों की जरूरत होती है।

3.डिविडेंड रिइनवेस्टमेंट ऑप्शन – Dividend Reinvestment Option :- इस ऑप्शन के तहत निवेशक को डिविडेंड तो मिलता है, लेकिन नकदी के रूप में नहीं मिलता है, बल्कि उस डिविडेंड से मिले लाभ को वापस यूनिट्स खरीदने में निवेश कर दिया जाता है। इससे निवेशक की यूनिट्स की संख्या बढ़ती रहती है।

इसके अलावा एक और लाभ यह है कि जैसे ही फंड के द्वारा डिविडेंड के रूप । में नकद लाभ निवेशकों को दे दिया जाता है, उस फंड की यूनिट की नेट एसेट वैल्यू कम हो जाती है। ज्यादातर जितना प्रतिशत डिविडेंड दिया जाता है, एन.ए.वो. उतनी ही नीचे आ जाती है।

चूँकि निवेश के इस विकल्प में डिविडेंड नकद रूप में नहीं होता है, इसलिए डिविडेंड में मिले नकद लाभ से निवेशक के लिए जो यूनिट खरीदी जाती हैं, तब आपको वह कम कीमत पर मिल जाती हैं।

डेब्ट फंड – Debt Funds :-

डेब्ट फंड में द्वितीयक बाजार (सेकंडरी मार्केट) के डेब्ट इंस्ट्रमेंट में निवेश किया जाता है। इसमें डिबेंचर ट्रेजरी, टी-बिल्स, कॉमर्शियल पेपर, कॉल मनी व अन्य मनी मार्केट इंस्ट्रमेंट शामिल होते हैं। डेब्ट फंड का निवेशकों की जरूरतों के हिसाब से वर्गीकरण किया गया है। जैसे

1. लिक्विड फंड – Liquid funds :- यह उन निवेशकों के लिए निवेश का बढ़िया विकल्प है, जो अपना पैसा कुछ महीनों के लिए ऐसे विकल्प में निवेश करना चाहते हैं,

जहाँ उन्हें बचत बैंक खाते के मुकाबले ज्यादा ब्याज मिले और जरूरत के समय वे पैसों को वापस नकदी में बदल सकें।इसलिए लिक्विड फंड में पोर्टफोलियो का काफी बड़ा भाग डेब्ट इंस्ट्रमेंट की शॉर्ट मैच्यूरिटी (जिनकी परिपक्वता अवधि कम हो) में निवेश किया जाता है।

जैसे-कॉल मनी और मनी मार्केट इंस्ट्रमेंट। चूँकि डेब्ट इंस्ट्रमेंट की परिपक्वता अवधिउदाहरण के लिए 10 दिन, 15 दिन, 1 महीना, 3 महीने आदि होती है।

इसलिए यह उन निवेशकों के लिए है, जिनके निवेश का लक्ष्यकाल तीन महीने तक की अवधि का हो। लिक्विड फंड में निवेश की गई पूँजी का बँटवारा इस प्रकार होता है

  • कॉल/मनी मार्केट इंस्ट्रमेंट-80-100 प्रतिशत, 
  • टी-बिल्स/ कॉमर्शियल पेपर-0-20 प्रतिशत, 
  • गिल्ट/बांड-0-20 प्रतिशत।

2.  शॉर्ट टर्म फंड – Short term fund :– ये फंड उन निवेशकों के लिए बेहतर विकल्प साबित होते हैं, जिनके निवेश का लक्ष्यकाल (इनवेस्टमेंट हॉरिजन) 3 महीने से ज्यादा का हो, लेकिन एक साल से कम का हो।

इसलिए ये फंड उन डेब्ट इंस्ट्रमेंट में निवेश करते हैं, जिनकी परिपक्वता अवधि निवेशक के निवेशकाल परिदृश्य से मिलती हो। शॉर्ट टर्म फंड में पूँजी का बँटवारा इस प्रकार होता है

  • कॉल/मनी मार्केट इंस्ट्रमेंट-0-20 प्रतिशत, 
  • टी-बिल्स/कॉमर्शियल पेपर-80-100 प्रतिशत, 
  • गिल्ट/बांड-0-20 प्रतिशत।

3. इनकम फंड – Income Fund :- यह फंड उन निवेशकों के लिए फंड में निवेश का बेहतर विकल्प है, जिनके निवेश का लक्ष्यकाल (इनवेस्टमेंट हॉरिजन) एक साल से अधिक हो।

इसलिए यह फंड ऐसे डेब्ट इंस्ट्रमेंट में निवेश करेगा, जिनकी परिपक्वता अवधि एक साल से अधिक हो। जैसे गिल्ट और बांड। इनकम फंड पूँजी का बँटवारा इस प्रकार होता है

  • कॉल/मनी मार्केट इंस्ट्रमेंट-0-20 प्रतिशत, 
  • टी-बिल्स/सीजी-0-20 प्रतिशत,
  • गिल्ट/बांड-80-100 प्रतिशत।

4. गिल्ट फंड – Gilt fund :- गिल्ट फंड निवेशकों के लिए ठीक है, जो क्रेडिट रिस्क नहीं लेना चाहते और अपना निवेश सिर्फ उन्हीं इंस्ट्रमेंट में करना चाहते हैं, जो भारत सरकार द्वारा जारी किए जाएँ। निवेश के लिए गिल्ट फंड में पूँजी का बँटवारा इस प्रकार होता है

  • कॉल-0-20 प्रतिशत, 
  • टी-बिल्स-0-20 प्रतिशत, 
  • गिल्ट-80-100 प्रतिशत।

इक्विटी फंड – Equity fund :-

यह फंड उन निवेशकों के लिए सबसे मुफीद है, जो शेयर बाजार की जोखिम लेने के लिए तैयार हैं; क्योंकि इस म्यूचुअल फंड में इक्विटी और द्वितीयक बाजार में इक्विटी से संबंधित इंस्ट्रमेंट में निवेश किया जाता है।

इक्विटी फंड भी कई तरह के होते हैं, जिसे अलग-अलग निवेशकों की जरूरतों के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है

  1. डायवर्सिफाइड इक्विटी फंड – Diversified Equity Fund :- डायवर्सिफाइड इक्विटी फंड वह फंड होते हैं, जो द्वितीयक बाजार (सेकंडरी मार्केट) में उपलब्ध सभी प्रकार की इक्विटी में निवेश करते हैं।

जिन इक्विटी में फंड के लिए रिटर्न देने की सबसे ज्यादा माद्दा हो, उनका चुनाव फंड मैनेजर्स करते हैं । यहाँ किसी ऐसे सेक्टर में ज्यादा भी निवेश किया जा सकता है, जिसमें बढ़त की क्षमता (ग्रोथ पोटेंशियल) हो।

हालाँकि विभिन्न डायवर्सिफाइड इक्विटी फंड द्वारा बाजार पूँजीकरण के हिसाब से शेयरों के चयन के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है

  • लार्ज कैप डायवर्सिफाइड इक्विटी फंड – Large Cap Diversified Equity Fund :-निवेश के लिए इस फंड का बहुत बड़ा हिस्सा (तकरीबन 80 प्रतिशत) शेयर बाजार में सूचीबद्ध ‘लार्ज कैप’ स्टॉक्स में किया जाता है और बाकी हिस्सा दूसरे प्रकार के शेयरों में होता है।
  • मिड कैप फंड – Mid Cap Fund :- निवेश के लिए ये फंड अपने पोर्टफोलियो का बड़ा हिस्सा (तकरीबन 80 प्रतिशत) शेयर बाजार में सूचीबद्ध ‘मिड कैप स्टॉक्स’ में करते हैं और बाकी बचा हुआ दूसरे प्रकार के शेयरों में करते हैं।
  • फ्लैक्सी फंड – Flexi Fund :- लचीलापन इस फंड की विशेषता होती है। फ्लैक्सीबिलिटी (लचीलापन) के चलते इस फंड को लार्ज कैप, मिड कैप व स्मॉल कैप में से किसी में भी निवेश किया जा सकता है।यदि फंड मैनेजर को लगता है कि बाजार की स्थिति के अनुसार लार्ज कैप में निवेश करना ज्यादा फायदेमंद है तो पूँजी का बड़ा हिस्सा लार्ज कैप में निवेश कर दिया जाता है, और यदि फंड मैनेजर को लगता है कि शेयर बाजार में मिड कैप कंपनियों में उछाल के आसार हैं तो पूँजी का बड़ा हिस्सा मिड कैप में निवेशित किया जाता है।
  • मल्टी कैप फंड – Multi Cap Fund :- इस फंड में पूँजी को बाजार पूंजीकरण के हिसाब से बँटी हुई विभिन्न कंपनियों में पहले से निर्धारित सीमा के आधार पर निवेशित किया जाता है। फंड को लॉञ्च करते समय ही यह बता दिया जाता है कि लार्ज कैप, मिड कैप और स्मॉल कैप में कितना-कितना प्रतिशत निवेश किया जाएगा।

2. इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम (ई.एल.एस.एस.) – Equity Linked Saving Scheme :- इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम की कार्य-प्रणाली डायवर्सिफाइड इक्विटी फंड की तरह ही है, लेकिन इस स्कीम में टैक्स बेनिफिट का लाभ जुड़ा हुआ है;

क्योंकि इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम में किया गया निवेश आयकर की धारा 80(सी) के अंतर्गत जितने भी निवेश के विकल्प हैं, उनमें इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम में निवेश से न सिर्फ 1,00,000 (एक लाख) रुपए तक की छूट का प्रावधान है,

बल्कि शेयर बाजार से होनेवाला फायदा भी इससे जुड़ा है। चूंकि इसमें टैक्स बेनिफिट (कर-लाभ) जुड़ा हुआ है, इसलिए इसमें निवेश करने पर आपको अपना पैसा तीन साल तक वापस नहीं मिलता। यानी इस स्कीम में न्यूनतम तीन साल का लॉक-इन पीरियड है।

3. स्पेशियलिटी फंड – Specialty Funds /सेक्टर फंड – Sector Funds :- सेक्टर फंड या स्पेशिलयिटी फंड वे फंड हैं, जिनमें स्कीम के उद्देश्य और उन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए विशेष सेक्टर का चयन पूर्व निर्धारित व अच्छी तरह से परिभाषित होता है। इस स्कीम को बाजार में लाने का उद्देश्य यह होता है, ताकि एक विशेष सेक्टर की ग्रोथ का फायदा उठाने के लिए पूँजी उसी सेक्टर में निवेशित की जा सके।

उदाहरण के लिए:-

  • आई.टी. सेक्टर फंड – I.T. Sector Fund :- ये फंड सिर्फ इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (आई.टी.) सेक्टर से जुड़ी कंपनियों में निवेश करेंगे।
  • फार्मा फंड – Pharma Fund :- ये सिर्फ फार्मास्युटिकल सेक्टर से जुड़ी फार्मा कंपनियों में ही निवेश करेंगे।
  • फोकस – Focus :- ये सिर्फ उन 15 कंपनियों में निवेश करेंगे, जिनका बाजार पूँजीकरण बड़ा होगा।

4. इंडेक्स फंड – Index Funds :- ये इक्विटी फंड हैं, जो इंडेक्स का चयन करते हैं और उनमें निवेश करते हैं, जिनमें निफ्टी में शामिल 50 कंपनियों व सेंसेक्स को दरशाती 30 कंपनियों में निवेश किया जाता है।

हम आशा करते है की हमारी ये (म्यूच्यूअल फंड के प्रकार – Types of Mutual Funds in Hindi) ब्लॉग पोस्ट आपको पसंद आयी होगी अगर आपको शेयर मार्किट से जुड़ा कोई भी सवाल है तो आप कृपया कमेंट में जरूर पूछे।

।। धन्यवाद् ।।

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2 Comments

भारत के कमोडिटी एक्सचेंज - Commodity EXCHANGES IN INDIA. · October 20, 2020 at 11:00 pm

[…] TYPES OF MUTUAL FUNDS – OPEN ENDED MUTUAL FUND || CLOSE ENDED MUTUAL FUND. […]

20 शेयर बाजार में ट्रेडिंग के लिए गोल्डन नियम - (top 20 Golden Trading Rules In Stock Market For Beginners) · October 23, 2020 at 4:02 pm

[…] TYPES OF MUTUAL FUNDS – OPEN ENDED MUTUAL FUND || CLOSE ENDED MUTUAL FUND. […]

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