क्या आपको पता है की फन्डामेन्टल अ‍ॅनालिसीस क्या है और कैसे करें? – Fundamental Analysis in Hindi अगर आपको पता नहीं है तो आप इस ब्लॉग को पूरा पढ़े.

फन्डामेन्टल अ‍ॅनालिसीस क्या है और कैसे करें? – Fundamental Analysis in Hindi

Table of Contents

सिस्टमेटिक अ‍ॅनालिसीस (Systematic Analysis in Hindi):

हमें नीचे दिए गए मुद्दो का ठिक तरह से विश्लेषण करना जरूरी है। फंडामेंटल अ‍ॅनालिसीस को तीन विभाग में बाँटा गया है। पहला इंन्डस्ट्रीयल अ‍ॅनालिसीस, दुसरा कॉर्पोरेट अ‍ॅनालिसीस और तीसरा फायनानशियल अ‍ॅनालिसीस।

इंडस्ट्रीयल अ‍ॅनालिसीस (Industrial Analysis in Hindi):

जो कंपनीयाँ एक ही अथवा एक जैसे प्रोडक्ट बनाती है, वो सभी एक ही सेक्टर में आती है। एक ही सेक्टर में आनेवाली कंपनीयों को अपना उत्पादन खर्च उत्पन्न की संख्या उससे होनेवाला फायदा, इन सब का तालमेल उसी सेक्टर के दुसरी कंपनीयों से करना जरूरी है।

किसी सेक्टर में उद्योग करने से पहले हमें प्रथम उस सेक्टर में सरकार के मनसुबे कैसे है, उस उद्योग का भविष्य अच्छा है या नहीं, यह देखना जरूरी है। इसे इंडस्ट्रीयल अ‍ॅनालिसीस अर्थात कंपनी का ठिक से विश्लेषण करना कहते है।

उदा. रूपए के डिवॅल्युएशन से एक्सपोर्ट कंपनी को बहुत फायदा होता है। अपनी वस्तुए विदेश में बहुत सस्ती होती है और उससे एक्सपोर्ट कंपनी का धंदा बढ़ता है, इसलिए वो मुनाफे में जाती है।

कॉर्पोरेट अ‍ॅनालिसीस (Corporate Analysis in Hindi):

आप जब कॉर्पोरेट अ‍ॅनालिसीस करते है तब उसमें आगे दी हुई बाते आती है।

पिछले वर्ष कंपनी का कामकाज कैसा था।

चालू वर्ष में कामकाज कैसे चल रहा है और भविष्य में कंपनी की कोई विकास की योजना है, तो उस योजना का खर्च कितना है इत्यादि।

अपने प्रतिस्पर्धी कंपनी का काम और मुनाफा कमाने की क्षमता और अपने कंपनी का काम और मुनाफे का तालमेल करना चाहिए।

व्यवस्थापक का कंपनी का व्यवस्थापन करने की क्षमता ठिक है या नहीं यह देखना चाहिए। इस विश्लेषण को कॉर्पोरेट अ‍ॅनालिसीस कहते है।

फायनानशियल अ‍ॅनालिसीस (Financial Analysis in Hindi):

किसी कंपनी का कामकाज अच्छा है या नहीं और उनके शेअर का भाव बढ़ेगा या नहीं यह जानने के लिए हमें कंपनी का आर्थिक विश्लेषण अर्थात फायनानशियल अॅनालिसिस करना पड़ता है। उसके लिए हमें कंपनी के वित्तीय मापदंडों (फायनानशियल पॅरामिटर्स) को देखाना पड़ता है।

इनमें शेअर डीड, हर इक्विटी शेअर के ऊपर का फायदा, इक्विटी शेअर का प्रमाण इन सब का अध्ययन करना पड़ता है। इससे हमें भविष्य में उन शेअर का भाव बढ़ेगा या नहीं इसका अंदाजा आ सकता है।

इसे फायनानशियल अ‍ॅनालिसीस कहते है। उसके लिए हमें कंपनी के फायनानशियल स्टेटमेंट जैसे कि बॅलेन्स शिट (Balance Sheet), प्रॉफिट अॅन्ड लॉस अकाऊंट (Profit and Loss Account) और कंपनी का वार्षिक अहवाल (Annual Report) देखना चाहिए।

कंपनी का वार्षिक अहवाल (Annual Report of a Company):

कंपनी का वार्षिक अहवाल, हरसाल कंपनी के व्यवस्थापको द्वारा प्रकाशित किया जाता है।

इसमें कंपनी के असेट (Assets), लायबिलिटी (Liability), रेवेन्यू (Revenue), खर्च, कमाई, बीते वर्ष के दौरान कंपनी के कामकाज की प्रगति कैसी थी, कंपनी का मुनाफा कमाने की क्षमता कैसे थी, इत्यादि की जानकारी मिलती है। साथ ही शेअर धारको को मिलनेवाले डिविडन्ड इत्यादि का पता चलता है।

किसी कंपनी को अगर एक उद्योग में घाटा हुआ तो उसका कारण कंपनी को उस वर्ष के वार्षिक अहवाल में देना पड़ता है।

साथ ही भविष्य में कंपनी के कामकाज को सुधारने के लिए, मुनाफा कमाने की क्षमता बढ़ाने के लिए कंपनी ने कौनसे उपाय किए है इसकी भी जानकारी अहवाल में देनी पड़ती है।

हर निवेशक को कंपनी का हिसाब वर्ष पूरा होने के बाद छह महिने के अंदर वार्षिक अहवाल दिया जाता है। कंपनी का अहवाल कंपनी की पूरी जानकारी देने का साधन है।

हर निवेशक को कंपनी का वार्षिक अहवाल पढ़ना चाहिए और उनमें के नीचे दिए मुद्दे ध्यान में रखने चाहिए।

डायरेक्टर का रिपोर्ट और चेअरमन की स्टेटमेंट जिसमें वर्तमान और भविष्य के कामकाज की जानकारी मिलती है।

  • कंपनी का परफॉरमन्स कैसा था।
  • ऑडिटर्स का रिपोर्ट देखना चाहिए।
  • प्रॉफिट अॅन्ड लॉस अकाऊंन्ट देखिए।
  • बॅलेन्स शीट और उसके साथ के नोट्स देखना चाहिए।

कंपनी की बॅलेन्स शीट (Balance Sheet of a Company):

बॅलेन्स शीट कंपनी की फायनानशियल स्थिति (Financial Position) दर्शाती है और कंपनीज अॅक्ट १९५६ के तहत कंपनी का अकाऊन्ट फार्म अथवा रिपोर्ट फार्म नीचे दर्शाया गया है इस तरह होना चाहिए।

Balance Sheet: Account Form:

Liabilities Assets
Share Capital Fixed Assets
Reserves and Surplus Investments
Secured loans Current Assets, loans & advances
Unsecured loans Miscellaneous expenditure
Current liabilities & provisions

Balance Sheet: Report Form

I. Sources of Funds

1. Shareholders’ Funds

  • (a) Share Capital
  • (b) Reserves & surplus

2. Loan Funds

  • (a) Secured loans
  • (b) Unsecured loans

II. Application of Funds

1. Fixed Assets

2. Investments

3. Current Assets, loans and advances

  • Less: Current liabilities and provisions
  • Net Current Assets

4. Miscellaneous expenditure and losses

जिम्मेदारी (Liabilities):

जिम्मेदारी याने आसान शब्दों में कंपनी को कितने पैसे चुकाने है वह नीचे दिया है।

  • शेअर कॅपीटल (Share Capital)
  • रीजर्व और सरप्लस (Reserve & Surplus)
  • सिक्योर्ड लोन्स (Secured Loans)
  • अनसिक्योर्ड लोन्स (Unsecured Loans)
  • करन्ट लाईबीलीटीज (Current Liabilities)

शेअर कॅपीटल (Share Capital):

शेअर कॅपीटल के मुख्य दो प्रकार है। इक्विटी कॅपीटल और प्रेफरेन्शियल कॅपीटल। इक्विटी कॅपीटल में मुख्यत: संस्थापक का निवेश होता है। साथ ही इक्विटी शेअर धारको का भी निवेश होता है। वह कंपनी के मालिक होते है

इस कॅपीटल पर स्थिर डिविडन्ड नहीं मिलता। प्रेफरेन्शियल शेअर कॅपीटल पर स्थिर डिविडन्ड मिलता है।

रिजर्व और सरप्लस (Reserve & Surplus):

रिजर्व और सरप्लस इसमें कंपनी को होनेवाला फायदा ट्रान्सफर किया जाता है। कंपनी के शेअर धारको को डिविडन्ड और ब्याज देने के बाद बचा हुआ फायदा रिजर्व और सरप्लस के खाते में ट्रान्सफर किया जाता है और फिर उन पैसों से कंपनी को भविष्य में होनेवाले खर्च चलाने पड़ते है।

सिक्योर्ड लोन्स (Secured Loans):

सामान्यत: कंपनी डिबेंचर के माध्यम से अथवा फायनानशियल इन्स्टीटयुशन, बैक से कर्ज लेती है। इसके लिए कंपनी को संपार्श्विक सुरक्षा (Collateral Security) देनी पड़ती है। उसे सिक्योर्ड लोन्स कहते है।

अनसिवन्योर्ड लोन्स (Unsecured Loans):

जिस कर्ज पर कंपनी को संपार्श्विक सुरक्षा (Collateral Security) नहीं देनी पड़ती उसे अनसिक्योर्ड लोन्स कहते है। यह कर्ज फिक्स डिपॉजिट, प्रमोटर्स लोन, अ‍ॅडवान्स इंटरकॉर्पोरेट और बँक उपलब्ध कराते है।

करन्ट लायबिलीटीस और प्रोविजन (Current Liabilities and Provision):

इसमें सप्लायर्स, सर्विस प्रोवाईडर्स, अ‍ॅडवान्स पेमेंट, अनक्लेम्ड डिविडन्ड, टॅक्स इनका समावेश होता है। करन्ट लायबिलीटीस कंपनी को व्यवहार के एक साल में पूरी करनी पड़ती है।

कंपनी के अ‍ॅसेट (Assets):

कंपनी के अ‍ॅसेट यह कंपनी की प्रगतिशील क्षमता दिखानेवाला आईना है। आगे कंपनी के अ‍ॅसेट के प्रकार दिए है।

  • फिक्स अॅसेट्स (Fix Assets)
  • निवेश (Investment)
  • करन्ट अॅसेट्स, लोन अॅन्ड अॅडवान्सेस (Current Assets Loans & Advances)
  • मिसलीनियस एक्सपेंन्सेस और लॉसेस (Miscellinious, expenditure & Losses)

फिवस अॅसेट्स (Fixed Assets):

कंपनी के उत्पादन की जगह, मशीनरी, इत्यादि में जो निवेश किया जाता है उसे अचल सम्पत्ति (फिक्स अॅसेट्स) कहते है। वह कई वर्षों के लिए स्थिर होता है। उस निवेश का दुसरे व्यवहार के लिए उपयोग नहीं होता।

निवेश (Investment):

यह निवेश बहुत सी कंपनीयाँ करती है। जैसे कि गव्हरमेंट बाँड, इन्फ्रास्ट्रक्चर बाँड, बैक फिक्स डिपोजिट, इनका उपयोग कंपनी को कोलेटरल सिक्योरिटी लेने के लिए होता है।

करन्ट अॅसेट्स लोन अॅन्ड अॅडवान्सेस (Current Assets Loans & Advances):

इसमें नकद रूपए और कंपनी के ऐसे साधनों का समावेश होता है। जिनका कंपनी के उद्योग के एक वर्ष में नकद रूपयों में बदला जाता है। उदा. बैंक बॅलेन्स, डेटर (जिन्होने कंपनी से उधार पैसे लिए है), इनवेन्टरीज लोन और अॅडवान्स आदि।

मिसलीनियस एक्सपेंन्सेस और लॉसेस (Miscellinious, Expenditure & Losses):

जब कंपनी को घाटा होता है। तब कंपनी की इक्विटी अमाऊंट कम होती है। परंतु कंपनी के नियमोनुसार अगर कंपनी को घाटा हुआ तो वह शेअर कॅपीटल में से नहीं लेना चाहिए।

इसलिए शेअर का कुछ हिस्सा बॅलेन्स शीट के दाई ओर में मिसलीनियस एक्सपेंन्सेस के रूप में रखा जाता है और कंपनी को हुआ घाटा बॅलेन्स शीट के बाई ओर लिखा जाता है।

बॅलेन्स शीट का उदाहरण (Example of Balance Sheet):

Balance Sheet - Fundamental Analysis in Hindi

कंपनी का प्रॉफिट अॅन्ड लॉस अकाऊंन्ट (Profit & Loss Account of a Company):

प्रॉफिट अॅन्ड लॉस अकाऊंन्ट कंपनी की नफा शक्ति दर्शाता है। जिसमें खर्चे और कमाई दिखाई जाती है। उस पर से कंपनी को कितना फायदा हुआ अथवा कितना घाटा हुआ यह हमें समझ आता है।

सामान्यतः हमारे देश में अकाऊन्टींग कालावधी अप्रैल से मार्च (April/March) है। लगभग अधिक से अधिक कंपनियाँ उनके अनऑडिटेड बॅलेंस शीट हर तीन महिने में प्रकाशित करते है और वार्षिक बॅलेंस शीट ऑडिट करके प्रकाशित करते है।

प्रोफिट और लॉस अकाऊंन्ट में नीचे की बातों का समावेश होता है:

  • नेट बिक्री (Net Sales)
  • बेचे गए माल की कीमत (Cost of Goods Sold)
  • ग्रॉस प्रॉफिट (Gross Profit)
  • ऑपरेटिंग खर्च (Operating Expenses)
  • ऑपरेटिंग नफा (Operating Profit)
  • नॉन ऑपरेटिंग सरप्लस / डेफिसिट (Non Operating Surplus/Deficit)
  • ब्याज और टॅक्स के पूर्व का फायदा (Profit before Interest and Tax)
  • ब्याज (Interest)
  • टॅक्स के पूर्व का फायदा (Profit before Tax)
  • टॅक्स (Tax)
  • टॅक्स के बाद का फायदा (Profit after Tax)
  • डिविडन्ड (Dividend)
  • रीटेन्ड अरनींग्स (Retained Earnings)

नेट बिक्री (Net Sale):

नेट बिक्री याने कंपनी ने किए हुए माल की बिक्री से जो कीमत आती है। उसमें से सेल्स इनवर्ड और एक्ससाईज डयुटी निकालकर बची हुई रक्कम। एक्ससाईज डयुटी याने कि कंपनी के उत्पन्न की बिक्री से सरकार को दी जानेवाली रक्कम।

बेचे गए माल की कीमत (Cost of Goods Sold):

यह अकाऊन्टींग कालावधी के दौरान बेची गई वस्तुओं के निर्माण के लिए खर्च की गई कुल राशि है। इसमें कच्चे माल की लागत, श्रम लागत और कारखाना चलाने के लिए अन्य लागत शामिल हैं।

ग्रॉस प्रॉफिट (Gross Profit):

ग्रॉस प्रॉफिट याने नेट बिक्री और उत्पादन के ऊपर के खर्च के बीच का फर्क होता है।

ऑपरेटींग खर्च (Operating Expenses):

इसमें जनरल अॅडमिनीस्ट्रेशन खर्च, बिक्री और डिस्ट्रीबुशन खर्च और मूल्यह्रास (Depreciation) का समावेश होता है।

ऑपरेटींग प्रॉफिट (Operating Profit):

ऑपरेटींग प्रॉफिट याने ग्रॉस प्रॉफिट और ऑपरेटींग खर्च में का फर्क।

नॉन ऑपरेटींग सरप्लस (Non Operating Surplus/Deficit):

कंपनी के हमेशा के व्यवहार से जो नफा मिलता है, उसे ऑपरेटींग सरप्लस कहते है और जो नफा कंपनी के दुसरे व्यवहार से मिलता है उसे नॉन ऑपरेटींग सरप्लस कहते है।

ब्याज और टॅक्स के पहले का मुनाफा (Profit before Income & Tax):

ऑपरेटींग प्रॉफिट और नॉन ऑपरेटींग प्रॉफिट को एकसाथ करके ब्याज और टॅक्स के पहले का मुनाफा मिलता है।

ब्याज (Interest):

यह कंपनी को होनेवाला खर्च है। यह ब्याज कंपनी को टर्म लोन, डिबेंचर पब्लिक डिपॉजिट और वर्किंग कॅपीटल अॅडवान्स पर देना पड़ता है।

टॅक्स (Tax):

यह टॅक्स कंपनी के फायदे पर लागू होता है।

प्रोफिट आफ्टर टॅक्स (Profit after Tax):

कंपनी के फायदे से टॅक्स घटाकर बचे हुए फायदे को प्रॉफिट आफ्टर टॅक्स कहते है।

डिविडन्ड (Dividend):

शेअर धारक को मिलनेवाले फायदे के हिस्से को डिविडन्ड कहते है।

रीटेन्ड अरनींग्स (Retained Earnings):

प्रॉफिट आफ्टर टॅक्स और डिविडन्ड के फर्क को रीटेन्ड अरनींग्स कहते है।

किसी भी कंपनी के लिए उसका प्रोफिट और लॉस अकाऊंन्ट शेअर धारक को दिया जानेवाला महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

इसलिए हर कंपनी प्रोफिट और लॉस अकाऊंन्ट ठिकतरह से बनाने के लिए अधिक से अधिक ध्यान देती है। हमें किसी कंपनी के प्रोफिट और लॉस अकाऊंन्ट देखते समय आगे दी गई बाते ध्यान में रखनी चाहिए –

  • कंपनी के पिछले साल के (साथ ही चालू वर्ष में) बिक्री में कुछ बढ़त हुई है क्या। साथ ही कंपनी के फायदे में (ऑपरेटींग ग्रॉस और नेट) कुछ बढ़त हुई है या नहीं।कंपनी का व्यवस्थापन ठिक से है या नहीं।
  • कंपनी के फायदे के साथ ही दुसरी कमाई भी चेक करनी चाहिए। यहाँ पर कंपनी हमें गलत जानकारी दे सकती है। दुसरी कमाई डिविडन्ड लोन और अॅडवान्स के ब्याज से मिलता है तो वह योग्य है। अगर वह कमाई जमीन अथवा अॅसेट बेचकर मिलती है तो वह योग्य नहीं।
  • खर्च के हिसाब पर ध्यान रखना चाहिए। खर्च जैसे, कच्चे माल पर होनेवाला खर्च, वेतन खर्च, बिक्री खर्च आदि। यहाँ यह खर्च बिक्री से अधिक तो नहीं हुआ, इसका ध्यान रखना जरूरी है। अगर खर्च बिक्री से कम है तो कंपनी का व्यवहार अच्छा है ऐसा समझना चाहिए।
  • कंपनी को खुद के मुख्य व्यवसाय में से फायदा मिलता है या नहीं इसकी पूछताछ करनी चाहिए। अगर वैसा है तो कंपनी अच्छे ढंग से कार्य कर रही है ऐसा समझना चाहिए।
  • कंपनी का खर्च, ब्याज खर्च और कंपनी में होने वाली मूल्यह्रास की पूछताछ करनी चाहिए। अगर मूल्यह्रास का खर्च असामान्य तरह से बढ़ा तो समझिए की कंपनी के अ‍ॅसेट में बढ़ोतरी हुई है। जो भविष्य की दृष्टी से अच्छा है। मगर अधिक ब्याज, खर्च कंपनी के लिए अच्छा नहीं होता क्योंकि ऊधारी में होने वाली बढ़त जल्दी से कम नहीं होती।
  • हर शेअर से कंपनी की होने वाली कमाई और प्रमाण की गिनती करनी चाहिए। अगर पूरे वर्ष में परिणाम चाहिए तो शेअर की कीमत दुगनी करनी चाहिए।

प्रॉफिट और लॉस अकाऊट का उदाहरण (Example of Profit & Loss Account):

Profit and Loss account - Fundamental Analysis in Hindi

रेशियों अ‍ॅनालिसीस (Ratio Analysis):

सिर्फ प्रॉफिट और लॉस अकाऊंट, बॅलेन्स शीट से हमें किसी भी कंपनी की सही परिस्थिति नहीं समझ सकते।

मगर उसके मूल्यांकन और जिम्मेदारी से किए गए निरीक्षण से उस कंपनी के व्यवहार की अंदाजीत जानकारी मिलती है। जिस तरीके से इस अंक का निरीक्षण होता है। उसे रेशियो अॅनालिसिस कहते है।

इस रेश्यो का तीन विभागों में वर्गीकरण किया गया है।

  • लिक्वीडीटी रेशियो (Liquidity Ratio)
  • लीवरेज/कॅपीटल स्ट्रक्चर रेशियो (Leverage/Capital Structure Ratio)
  • लाभदायकता का रेशियो (Profitability Ratio)

लिक्वीडीटी रेशियो (Liquidity Ratios):

लिक्वीडीटी अर्थात कंपनी की शॉर्ट टर्म में याने एक वर्ष से कम समय में आर्थिक जिम्मेदारी पूरी करने की क्षमता। नीचे के रेशियों कंपनी की प्रवाहिता दर्शाते है।

  • करन्ट रेशियो Current Ratio
  • अॅसीड टेस्ट रेशियो Acid – Test Ratio
  • टर्नओवर रेशियो Turnover Ratio

यह रेशियो करन्ट अ‍ॅसेट और करन्ट लायबिलीटी पर आधारित होता है।

करन्ट रेशियो = करन्ट अ‍ॅसेट / करन्ट लायबिलीटी

Current Ratio = Current Assets / Current Liabilities

करन्ट रेशियो याने कंपनी के करन्ट अॅसेट में से करन्ट लायबिलीटी निभाने की क्षमता का मापदंड है। अगर करन्ट रेशियो अधिक होगा तो उस कंपनी के पास लायबिलीटी निभाने के लिए अधिक रक्कम उपलब्ध होती है।

अॅसिड टेस्ट रेशियो = क्विक अ‍ॅसेट / करन्ट लायबिलीटी

Acid-test Ratio = Quick Assets / Current Liabilities

क्वीक अ‍ॅसेट अर्थात करन्ट अ‍ॅसेट में से इनवेन्टरीज और प्रीपेड खर्च निकालकर बचा हुआ अ‍ॅसेट होता है। अॅसिड टेस्ट रेशियो याने करन्ट लायबिलीटीज पूरी करने के लिए करन्ट अ‍ॅसेट का जलद गती से नकद रूपयों में रूपांतर करने की क्षमता का मापदंड करना।

टर्नओवर रेशियो का अर्थ कंपनी अधिक से अधिक समय में कितने करन्ट अ‍ॅसेट का नकद रूपयों में रूपांतर करती है अथवा कंपनी अ‍ॅसेट कितने योग्य प्रकार से उपयोग करती है।

इनवेन्टरी टर्नओवर रेशियो = कॉस्ट ऑफ गुड्स सोल्ड / ॲवरेज इन्वन्टरी

Inventory Turnover Ratio = Cost of Goods Sold / Average Inventory

यहाँ कॉस्ट ऑफ गुड्स सोल्ड याने बिक्री घटाकर ग्रॉस प्रॉफिट होता है। ॲवरेज इनवेन्टरी याने ओपनिंग और क्लोजिंग इनवेन्टरी में का आसान ॲवरेज। इस रेशियो के कारण हमें कंपनी के इनवेन्टरी के व्यवस्थापन की जानकारी मिलती है।

डेटर्स टर्नओवर रेशियो = नेट क्रेडिट सेल / ॲवरेज अकाऊंट्स रिसिवेबल

Debtors Turnover Ratio = Net Credit Sales / Average Account Receivable

इस रेशियो से कंपनी ने उधारी के पैसे कितनी जल्दी वसूल किए इसका अंदाजा मिलता है। अगर डेटर्स का टर्नओवर अधिक होगा तो कंपनी की क्रेडीट मॅनेजमेंट अच्छी होती है।

ॲवरेज कलेक्शन पिरीयड = ॲवरेज डेटर्स / ॲवरेज डेली क्रेडिट सेल

Average Collection Period = Average Debtors / Average Daily Credit Sale

इस रेशियो से कंपनी कितने दिनों के लिए उधार देती है यह पता चलता है।

फिक्स अ‍ॅसेट टर्नओवर रेशियो = नेट सेल्स / नेट फिक्स अ‍ॅसेट

Fixed Asset Turnover Ratio = Net Sales / Net Fixed Assets

इस रेशियो से हमें फिक्स असेट में निवेश की गई पूंजी के कितने प्रमाण में बिक्री हुई है इसका पता चलता है।

टोटल अ‍ॅसेट टर्नओवर रेशियो = नेट सेल्स / ॲवरेज टोटल अ‍ॅसेट

Total Asset Turnover Ratio = Net Sales / Average Total Assets

इसके द्वारा हमें पता चलता है कि कंपनी कितने उत्तम प्रकार से अ‍ॅसेट में निवेश करती है।

लीवरेज/कॅपीटल स्ट्रक्चर रेशियो (Leverage/Capital Structure Ratio):

यह रेशियो की मजबूती, उसकी उधारी चुकाने की क्षमता और ब्याज चुकाने की क्षमता पर आधारित है। इस रेशियो के दो प्रकार है। प्रथम यह रेशियो उधार लिए हुए पैसे और मालिक की खुद की पूंजी के संबंधों पर अवलंबीत है।

डेब्ट इक्विटी रेशियो = टोटल डेब्ट / टोटल इक्विटी

Debt -Equity Ratio = Total Debt / Total Equity

डेब्ट इक्विटी रेशियो याने कंपनी को फायनान्स करने के लिए कंपनी के क्रेडीटर और मालिक ने दी हुई पूंजी।

डेब्ट अ‍ॅसेट रेशियो = टोटल डेब्ट / टोटल अ‍ॅसेट

Debt Asset Ratio = Total Debt / Total Assets

टोटल डेब्ट याने कंपनी के दिर्घ समय के डेब्ट अधिक करन्ट लायबिलीटीज होती है। टोटल अ‍ॅसेट याने स्थिर पूंजी अधिक करन्ट लायबिलीटीज होती है।

इन्टरेस्ट कवरेज रेशियो = ब्याज और टॅक्स के पहले का फायदा / ब्याज

Interest Coverage Ratio = Earnings before Interest and Taxes / Interest

अगर इन्टरेस्ट कवरेज रेशियो अधिक होगा तो कंपनी की इन्टरेस्ट देने की क्षमता अच्छी है ऐसा समझना चाहिए। पैसा उधार देनेवाली, कंपनी की उधार चुकाने की क्षमता जानने के लिए इस रेशियो का उपयोग करते है।

प्रॉफिटेबिलिटी के रेशियो (Profitability Ratio):

कंपनी का मुनाफा/घाटा नीचे दिए रेशियो से गिना जाता है।

ग्रॉस प्रॉफिट रेशियो = ग्रॉस प्रॉफिट x 100 / नेट सेल्स

Gross Profit Ratio = Gross Profit x 100 / Net Sales

नेट प्रॉफिट रेशियो = नेट प्रॉफिट x 100 / नेट सेल्स

Net Profit Ratio = Net Profit x 100 / Net Sales

शेअर बाज़ार से संबंधित अनेक रेशियो है। जो शेअर धारक को शेअर से होने वाली कमाई का मापदंड करने में उपयोगी होती है।

प्रति शेअर आय (EPS) = फायदा / कुल शेअर्स की संख्या

Earnings per Share (EPS) = Net Profit available to Shareholders / Number of Ordinary Outstanding Shares

इस रेशियो से शेअर धारक को एक शेअर के पिछे होनेवाले फायदे का मापदंड कर सकते है। शेअर धारक को उपलब्ध होनेवाले फायदे को कुल शेअर की संख्या से भाग देकर एक शेअर के पिछे की कमाई का पता चलता है।

प्राईज अरनिंग रेशियो (P/E Ratio) = शेअर का बाज़ार भाव / शेअर पर की कमाई

Price – Earning Ratio (P/E Ratio) = Market Price per Share / EPS

इस रेशियो से हमें बाज़ार के इक्विटी शेअर की कीमत का पता चलता है।

हम आशा करते है की हमारी ये (फन्डामेन्टल अ‍ॅनालिसीस क्या है और कैसे करें? – Fundamental Analysis in Hindi) ब्लॉग पोस्ट आपको पसंद आयी होगी अगर आपको शेयर मार्किट से जुड़ा कोई भी सवाल है तो आप कृपया कमेंट में जरूर पूछे।

।। धन्यवाद ।।

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