क्या आपको पता है की फ्युचर्स और ऑप्शन में ट्रेडींग किस तरह से करना चाहिए – How To Trade in Future and Option in Hindi. अगर आपको पता नहीं है तो आप इस ब्लॉग को पूरा पढ़े.

फ्युचर्स और ऑप्शन में ट्रेडींग किस तरह से करना चाहिए – How To Trade in Future and Option in Hindi.

स्टॉक मार्केट में जिस तरह से किसी भी स्क्रिप्ट में ट्रेडींग करने के लिए ऑर्डर दिया जाता है, उसी तरह से फ्युचर्स और ऑप्शन में ट्रेडींग करने के लिए ऑर्डर दिया जाता है।

परंतु फ्युचर्स और ऑप्शन के ट्रेडींग में आरंभीक मार्जिन की निश्चित रकम पहले जमा करनी पडती है और बाद में हम ऑर्डर दे सकते है। यह रकम स्टॉक एक्सचेंज के मेंबर के पास जमा करनी पड़ती है।

व्यक्तिगत शेअर्स के फ्युचर्स में सामान्यरूप से शेअर्स के वर्तमान बाजार भाव की २० प्रतिशत रकम आरंभीक मार्जिन के लिहाज से जमा करनी पड़ती है। इंडेक्स फ्युचर्स में आरंभीक मार्जिन के लिहाज से इंडेक्स के वर्तमान बाजार भाव की १० प्रतिशत रकम जमा करनी पडती है।

ट्रेडींग के लिए पसंद किए स्क्रिप्ट या इंडेक्स के लॉट साईज को भी निवेशक को ध्यान में रखना चाहिए।

उदाहरण देकर बताना हो तो रिलायन्स फ्युचर्स के कॉन्ट्रॅक्ट के लॉट का साईज १५० का है और रिलायन्स के फ्युचर्स का वर्तमान भाव रू.२६०० होगा तो ऐसे केस में उसके १५० के लॉट की किमत (२६०० x १५०) रू. ३,९०,००० होती है।

इस स्थिति में २० प्रतिशत के हिसाब से निवेशक को मार्जिन मनी के रूप में रू. ७८,००० जमा करने पडते है।

मार्क टू मार्केट सेटलमेन्ट के लिए निवेशक के पास कम से कम अन्य २० – २५ प्रतिशत रकम होना जरूरी है।

फ्युचर्स की यह पोजिशन को उसी दिन सेटल नहीं किया तो इस स्थिति में मार्क टू मार्केट की रकम चुकाने के लिए इन रूपयों की जरूरत होती है।

फ्युचर्स में व्यवहार करते समय एक बात हमेशा ध्यान में रखे की सौदा करने के तुरंत बाद आपके स्टॉप लॉस और टार्गेट प्राईज की सुचना आपने ब्रोकर को दिजिए।

अगर अप लिए हुए फ्युचर्स का मार्केट भाव आपकी खरीदी हुई किमत से उपर जा रहा हो तो वैसी स्थिति में अप स्टॉप लॉस को भी आप ऊपर ले जाए।

उदाहरण देकर बताना हो तो रिलायन्स के फ्युचर्स आपने रू. २७०० के भाव पर खरीदा और उस पर २६५० का स्टॉप लॉस लगाया।

आपका टार्गेट प्राईज २७९० से २८०० है। फ्युचर्स का भाव बढकर रू. २७७० तक पहुचता है। इस स्थिति में आपको स्टॉप लॉस बदल कर रू. २७२० कर देना चाहिए।

आपने स्टॉप लॉस बदलने पर दिन में उसके बाद के भाग में अथवा दुसरे दिन उसका भाव बढकर रू. २७९० हुआ तो स्टॉप लॉस बदल कर २७४० पर ले जाईए।

इस तरह से व्यवहार करते रहे तो बाजार एकदम गिरकर निचे आने के समय भी आपको थोडा फायदा मिलने का मौका मिलता है।

अगर अप लिए हुए फ्युचर्स का मार्केट भाव आपकी खरीदी किमत से निचे जा रहा हो तो वैसी स्थिति में आप अपने स्टॉप लॉस को मत बदलिए।

स्टॉप लॉस बदला तो इस स्क्रिप्ट में खडी की पोजिशन निकाल देना कठिन होता है और नुकसान मात्र बढता जाता है।

उदाहरण देकर बताना हो तो आपने रिलायन्स का फ्युचर्स रू. २७०० की किमत पर खरीदा। आपने रू.२६५० पर स्टॉप लॉस लगाया और आपका टार्गेट प्राईज २७९० से २८०० है।

अब रिलायन्स के फ्युचर्स का भाव गिरकर अगर रू.२६७५ या रू.२६६० हो गया तो अपने स्टॉप लॉस का भाव मत बदलिए।

रिलायन्स के फ्युचर्स का भाव गिरकर अगर रू.२६५० के स्तर पर आया तो तब आप फ्युचर्स का कॉन्ट्रॅक्ट बंद करके उसमें से बाहर निकल जाइए।

अफरा तफरी के बाजार में एकदम छोटा स्टॉप लॉस नही लगाना चाहिए क्योंकि आप जिस क्षण फ्युचर्स का कॉन्ट्रैक्ट खरीदते है, उस वक्त बाजार में बडी अफरातफरी शुरू होती है।

वहा से बाजार किसी भी क्षण निचे आ सकता है और फिर से सुधर कर कुछ ही मिनीटो में उपर भी जा सकता है।इस तरह के बाजार में आपका स्टॉप लॉस थोडा बडा रखिए।

आप कितना नुकसान सह सकते है, उसकी गिनती करके स्टॉप लॉस बडा रखिए। एक बार आपका ऑर्डर कन्फर्म हुआ की तुरंत स्टॉप लॉस का कदम उठाईए। उसी के साथ आपका टार्गेट क्या है यह भी निश्चित किजिए।

अफरातफरी के बाजार में आपके टार्गेट के अनुसार भाव मिनीट में भी आ सकता है और फिर तुरंत निचे आ सकता है।

इसीलिए आपको स्टॉप लॉस और टार्गेट दोनो निश्चित करना बहुत जरूरी है। एक बार खरीदे हुए स्क्रिप्ट बेचने के बाद स्टॉप लॉस निकाल दिजिए। सामान्यरूप से फ्युचर्स के मार्केट में कम वॉल्युम वाले स्क्रिप्ट में सौदा करना टाल दिजिए।

फ्युचर्स और ऑप्शन में नॅशनल स्टॉक एक्सचेंज में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज की तुलना में बहुत वॉल्युम देखने को मिलता है। इसीलिए फ्युचर्स और ऑप्शन के ट्रेडींग के लिए एन.एस.ई को पसंद करना अधिक अच्छा है।

फ्युचर्स और ऑप्शन की सभी स्क्रिप्ट के लॉट साईज की जानकारी आपके ध्यान में होनी चाहिए। जिससे आप स्टॉप लॉस और टार्गेट प्राईज की गिनती तत्काल कर सकते है।

समय के नियमित अंतराल पर लॉट साईज में फेरफार किया जाता है और साथ ही फ्युचर्स और ऑप्शन में नए नए स्क्रिप्ट का भी समावेष किया जाता है।

ऑप्शन में ट्रेडींग किस तरह से करना चाहिए – How to Trade in Options in Hindi.

  1. फ्युचर्स के समान ही ऑप्शन में ट्रेडींग होता है।
  2. ऑप्शन के कॉन्ट्रॅक्ट तीन महीने की सीरीज में उपलब्ध होते है।
  3. भारत में ऑप्शन ट्रेडींग का व्यवहार बहुत सीमित है। साथ ही अपने यहाँ अमेरिकी शैली के ऑप्शन का ट्रेडींग होता है जिसका प्रीमियम जैसे जैसे एक्सपायरी की तारीख पास आती है वैसे वैसे घटता जाता है।
  4. जिस स्क्रिप्ट या इंडेक्स के ऑप्शन में वॉल्यूम अधिक हो वैसे ऑप्शन में ही ट्रेडींग करे।
  5. ट्रेडींग के लिए ऑप्शन का चुनाव जितना महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण सही स्ट्राईक प्राईज का चुनाव करना भी है।
  6. आप ऑप्शन का उपयोग फ्युचर्स की आपकी पोजीशन का हेजिंग करने के लिए भी उपयोग कर सकते है।

ओपन इन्ट्रेस्ट पर नजर रखना जरूरी – Important to Monitor Open Interest in Hindi.

ट्रेडींग के हर दिन के अंत में ओपन इन्ट्रेस्ट की संख्या में होनेवाले बदलाव पर नजर रखना बहुत जरूरी होता है। उस से दिन के दरम्यान हुए व्यवहार का निर्देश मिलता है और ट्रेन्ड या ट्रेन्ड रिवर्स होने का अंदाजा भी लगाया जा सकता है।

ट्रेडींग दिन के अंत में ओपन इन्ट्रेस्ट में किसी भी प्रकार की बढत हुई तो वह ऐसा संकेत देता है कि बाजार में नकद का प्रवाह है। परिणामस्वरूप ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि बाजार का वर्तमान ट्रेंड (तेजी, मंदी, साइडवेज़ टेंड) जारी रहेगा।

ट्रेडींग दिन के अंत में ओपन इन्ट्रेस्ट में किसी भी प्रकार की गिरावट हुई तो वह ऐसा संकेत देता है कि बाजार में से नकद का प्रवाह बाहर जा रहा है अथार्त लोग अपनी पोसिशन निकाल रहे है।

परिणामस्वरूप ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि बाजार का वर्तमान ट्रेंड समाप्ति की तरफ बढ़ रहा है।

फ्युचस मार्केट में लेन देन करने वाले खिलाडीयों के लिए हर दिन ओपन इन्ट्रेस्ट की पोजिशन जानना बहुत जरूरी है। इससे उन्हें बाजार में आने वाले बढे परीवर्तन का पहले से अंदेशा मिलता है।

बाजार के वर्तमान भाव का ट्रेन्ड और ओपन इन्ट्रेस्ट के संबंध की जानकारी का सारांश निचे दिखाया गया है।

भाव का ट्रेन्ड ओपन इन्ट्रेस्ट अर्थघटन
बढता हुआ भाव बढता है मार्केट सशक्त होता है
बढता हुआ भाव घटता है मार्केट अशक्त बनते जाता है
बढता हुआ भाव बढता है मार्केट अशक्त होता है
बढता हुआ भाव घटता है मार्केट सशक्त बनते जाता है ।

ऑर्डर के प्रकार – Types of Orders in Hindi.

सिस्टम में ऑर्डर देते वक्त निवेशक को लचिलापन उपलब्ध करके देने के लिए परिस्थिति के अनुसार उन्हें उनके ऑर्डर में फेरफार करने का मौका दिया जाता है।

डेरिवेटिव्ह के प्रोडक्ट में निचे की तरह ऑर्डर देने की सुविधा मिलती है। नकद मार्केट में दिए जानेवाले ऑर्डर की तरह कई विशेषताएँ इस ऑर्डर में भी है।

लिमीट ऑर्डर – Limit Order in Hindi.

सामान्यत: खरीदी या बिक्री के यह ऑर्डर के लिए प्राईज लिमीट दी जाती है। ऑर्डर के अमल में न आए हुए हिस्से का मॅचिंग न हुआ अथवा वह ऑर्डर देने के बाद उसका मॅचिंग होने के लिए निश्चित की गई कालावधी तक उसका मॅचिंग न मिला तो वह ऑर्डर पेंडींग रहता है।

मार्केट ऑर्डर – Market Order in Hindi.

मार्केट में चलने वाले उच्च भाव पर खरीदी या बिक्री के लिए ऑर्डर सबमिट करने को मार्केट ऑर्डर कहते है। मार्केट ऑर्डर के दो प्रकार है।

  • पार्शिअल फिल रेस्ट किल (पीएफ) (Partial Fill Rest Kill – PF):

उपलब्ध क्वान्टीटी का ऑर्डर अमल में लाईए और बाकी के अमल न किए ऑर्डर को जाने दिजिए।

  • पार्शिअल फिल रेस्ट कन्वर्ट (पीसी) (Partial Fill Rest Convert -PC):

उपलब्ध क्वान्टीटी का ऑर्डर अमल में लाईए और बाकी के अमल में न आए हुए हिस्से के ऑर्डर का बाजार में जिस भाव पर ट्रेडींग हो रहा हो उस भाव पर लिमीट ऑर्डर में बदल लिजिए।

स्टॉप लॉस ऑर्डर – Stop Loss Order in Hindi.

मार्केट में ट्रेडींग निश्चित किए भाव पर जब हो तब स्टॉप लॉस ऑर्डर लिमीट ऑर्डर बनता है।

सभी ऑर्डर में निचे दिए लक्षण होने जरूरी है। (All Orders shall have the following Attributes):

  • ऑर्डर का प्रकार (लिमीट / मार्केट पीएफ / मार्केट पीसी / स्टॉप लॉस)
  • असेट का कोड, प्रोडक्ट के प्रकार, दी गई मुद्दत, कॉल / पुट और स्ट्राईक प्राईज
  • खरीदी या बिक्री का निर्देश
  • ऑर्डर की क्वान्टीटी
  • किमत
  • क्लाईन्ट का प्रकार (स्वयं । संस्था / सामान्य)
  • क्लाईन्ट का कोड

प्रोटेक्शन पॉईन्ट – Protection Point in Hindi.

मार्केट ऑर्डर में और स्टॉप लॉस ऑर्डर में ठिक तरह से यह जानकारी दी जाती है। उसमें उसकी व्हॅल्यू भी एन्टर करनी पडती है। सही व्हॅल्यू का और सही प्राईज बॅन्ड का उसमें निर्देश होना चाहिए।

टच लाईन प्राईज अथवा ट्रिगर प्राईज का उसमें निर्देश होना चाहिए। इस किमत के अंदर ही अनुक्रम से मार्केट ऑर्डर या स्टॉप लॉस ऑर्डर का ट्रेडींग किया जा सकता है।

प्राईज बॅन्ड – Price Bands in Hindi.

फ्युचर्स और ऑप्शन के कॉन्ट्रॅक्ट के लिए न्युनतम और अधिकतम भाव की कोई भी रेंज नही होती। पर गलती से गलत भाव पर दिए गए ऑर्डर की एन्ट्री ना हो इसके लिए डेरिवेटिव्ह सेगमेंट में कृत्रिम (डमी) प्राईज बॅन्ड दाखिल किया जाता है।

जिन शेअर्स का फ्युचर्स और ऑप्शन मार्केट में ट्रेडींग होता है उन शेअर्स के लिए कँश मार्केट में कोई भी प्राईज बॅन्ड नहीं होता।

साथ ही जिन शेअर्स का फ्युचर्स और ऑप्शन मार्केट में ट्रेडींग नहीं होता पर वे इंडेक्स में शामिल हो जिसका फ्युचर्स और ऑप्शन मार्केट में ट्रेडींग होता है तो उन शेअर्स के लिए भी कँश मार्केट में कोई भी प्राईज बॅन्ड नहीं होता।

पर उसके लिए एक शर्त है की उस इंडेक्स का फ्युचर्स और ऑप्शन के बाजार में औसतन रोज के २० कॉन्ट्रैक्ट से ज्यादा का ट्रेडींग होना चाहिए और पिछले महीने में काम से काम दस दिनों में उसका ट्रेडींग हुआ हो।

मार्किट वाइड पोजिशन लिमीट – Market Wide Position Limits in Hindi.

हर ट्रेडींग दिन के अंत में एक्सचेंज के अधिकारी यह जाँच करते है कि फ्युचर्स और ऑप्शन के बाजार में कोई भी स्क्रिप्ट या इंडेक्स में मार्किट वाइड ओपन इन्ट्रेस्ट मार्किट वाइड पोजिशन लिमीट के ९५ प्रतिशत से अधिक है या नही।

मार्किट वाइड पोजिशन लिमीट के ९५ प्रतिशत से अधिक ओपन इन्टरेस्ट हो तो एक्सचेंज हर क्लायन्ट / टी.एम के उस स्क्रिप्ट या इंडेक्स में के हर किसी दिन के ओपन पोजिशन को दर्ज करते है

और दुसरे दिन से क्लायन्ट / टी.एम को उनकी पोजिशन ऑफसेट करने के लिए या घटाने के लिए सिर्फ ट्रेडींग करने की छूट देते है।

मार्किट वाइड पोजिशन लिमीट के ८० प्रतिशत या उससे निचे के स्तर पर आने के बाद ही स्क्रिप्ट या इंडेक्स में नॉर्मल ट्रेडींग शुरू करना होता है।

मार्किट वाइड पोजिशन लिमीट के ६० प्रतिशत से अधिक ओपन इन्टरेस्ट होने पर ट्रेडींग सिस्टम बाजार के खिलाडियों को अलर्ट करेगा ऐसी व्यवस्था सिस्टम में की गई है। इस प्रकार के अलर्ट फिलहाल दस मिनीटों के इन्टरवल के दरम्यान दिए जाते है।

जब बाजार में मार्किट वाइड पोजिशन लिमीट के तहत कोई भी स्क्रिप्ट या इंडेक्स में नई पोजिशन लेने पर प्रतिबंध हो, तब अगर कोई क्लाईन्ट या टी.एम नई पोजिशन खड़ी करता है तो उसे खड़ी की गई पोजिशन पर पेनल्टी (जुर्माना) चुकाना पड़ता है।

यह पेनल्टी की रकम खड़ी की गई पोजिशन के कुल मुल्य के एक प्रतिशत रकम की होती है। पेनल्टी की रकम कम से कम रू. ५००० और अधिक से अधिक रू. एक लाख तक हो सकती है।

पेनल्टी वसूलने के लिए और पोजिशन की कुल मुल्य निश्चित करने के लिए कॉन्ट्रैक्ट के अंतर्गत आने वाले असेट के उस दिन के बंद भाव का उपयोग किया जाता है।

इसके लिए ट्रेडींग मेम्बर या क्लायन्ट से संबंधित क्लिअरींग मेम्बर से टी + 1 के हिसाब से पेनल्टी ली जाती है। पे इन के साथ ही यह पेनल्टी भी रिकवर की जाती है। दिन के आखिर में क्लिअरींग मेम्बर को पेनल्टी की रकम की जानकारी दी जाती है।

नोट :

फ्युचर्स में नो ट्रेड पिरीयड में आपने गलती से फ्युचर्स की खरीदी या बिक्रि की हो तो ऐसे वक्त आपको उस पोजिशन को उसी दिन ऑफसेट करना पडता है।

याने की आपने वह पोजिशन खरीदा हो तो उस दिन के दरम्यान ही उसे बेचिए अथवा आपने वह बेचि हो तो उस दिन के दरम्यान ही वह खरीदी कीजिए।

आप इस तरह से पोजिशन को उसी दिन ऑफसेट करते हो तो आपको उपर की तरह पेनल्टी नही भरनी पडती।

हम आशा करते है की हमारी ये फ्युचर्स और ऑप्शन में ट्रेडींग किस तरह से करना चाहिए – How To Trade in Future and Option in Hindi. ब्लॉग पोस्ट आपको पसंद आयी होगी अगर आपको शेयर मार्किट से जुड़ा कोई भी सवाल है तो आप कृपया कमेंट में जरूर पूछे।

।। धन्यवाद ।।

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श्रेणी: Share Market

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