शेयर बाजार से जुड़े अर्थव्यवस्था के महत्त्वपूर्ण पहलू – Important Aspects of the Stock Market Economy in Hindi.

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साधारण तौर पर शेयर बाजार देश की अर्थव्यवस्था का परिचय देता है। शेयर बाजार की मजबूती देश की अच्छी आर्थिक स्थिति का तथा शेयर बाजार की कमजोरी देश की अपेक्षाकृत खराब आर्थिक स्थिति का द्योतक होता है।

रिजर्व बैंक द्वारा जारी की गई ब्याज दरों का प्रभाव भी शेयर बाजार के ट्रेंड पर पड़ता है। बाजार में पूँजी की माँग बढ़ने पर रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरें बढ़ा दी जाती हैं।

इससे शेयर बाजार में गिरावट दर्ज होती है। इसके विपरीत, ब्याज दरों में कमी शेयर बाजार में उछाल का कारण बनती है, क्योंकि ब्याज दरें कम करके सरकार रिजर्व बैंक के जरिए डिमांड को पैदा करती है।

इससे बाजार में आवश्यक तरलता आ जाती है और पैसों का प्रवाह निर्बाध गति से होने लगता है। लोगों के पास पैसा आता है और वे खर्च व निवेश करने लगते हैं।

इससे सभी सेक्टर्स में उछाल आता है, जो शेयर बाजार में तेजी के रूप में परिलक्षित होने लगता है। लेकिन धीरे-धीरे जब माँग आपूर्ति से ज्यादा होने लगती है तो महँगाई बढ़ने लगती है; और जब मुद्रास्फीति की बढ़ी दर लोगों का दैनिक जीवन प्रभावित करने लगती है

तो सरकार पुनः रिजर्व बैंक के जरिए ब्याज दरों को बढ़ा देती है और अन्य आवश्यक उपाय करती है। सरकार विकास दर (ग्रोथ रेट) को आगे ले जाने के लिए निरंतर प्रयास करती है।

यह विकास दर कई बातों पर निर्भर करती है, जैसे सकल राष्ट्रीय उत्पादन, सकल घरेलू उत्पाद, मुद्रास्फीति, मॉनीटरी पॉलिसी आदि।यदि ये सब घटक सकारात्मक रुख लिये होते हैं

तो यह अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाते हैं तथा जिसका प्रभाव हमें शेयर बाजार में दिखाई देता है और यदि अर्थव्यवस्था के ये घटक पटरी पर न हों तो आर्थिक विकास दर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और इससे शेयर बाजार भी बुरी तरह प्रभावित होता है।

चूँकि उपर्युक्त सभी बातों का शेयर बाजार से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष संबंध है, इसलिए एक निवेशक के लिए जरूरी है कि वह अर्थशास्त्र की कुछ बहुत जरूरी बातों को समझे, ताकि समय-समय पर वह निवेश संबंधी सही निर्णय ले सके।

जरूरी है आर्थिक विकास का आकलन (इकोनॉमिक ग्रोथ)

किसी भी सरकार की आर्थिक नीतियों का मूल उद्देश्य गरीबी का निवारण तथा देशवासियों के जीवन स्तर में सुधार लाना होता है।

यह उद्देश्य तेज आर्थिक विकास करके हासिल किया जा सकता है। आर्थिक विकास की गणना विभिन्न कालों में अर्थव्यवस्था द्वारा किए गए कुल उत्पादन की तुलना करके मालूम की जाती है।

चूंकि विभिन्न पदार्थों तथा विभिन्न सेवाओं, जो कि अर्थव्यवस्था द्वारा उत्पादित होती हैं, की सीधी तुलना नहीं की जा सकती है, अतः सभी उत्पादों को विभिन्न कीमत प्रदान कर कुल उत्पादन की कीमत प्राप्त की जाती है।

बाजार की अर्थव्यवस्था में विभिन्न उत्पादों की कीमत उनके बाजार मूल्य से प्रदर्शित होती है। आर्थिक विकास की सही गणना के लिए कुल राष्ट्रीय आय को एक ‘बेस पीरियड’ (भूतकाल के किसी वर्ष) की कीमतों के आधार पर आँका जाता है।

इस विधि, जिसे इंडेक्स नंबर विधि भी कहा जाता है, में विभिन्न पदार्थों तथा सेवाओं का मल्य उस बेस पीरियड की कीमतों के आधार पर आँका जाता है।

इस प्रकार इसे ‘रियल पोडक्ट इकोनॉमी’ (वास्तविक उत्पादन अर्थव्यवस्था) भी कहा जाता है। इस रियल मोटर इकोनॉमी में किसी वर्ष विशेष के कुल उत्पादन को ‘सकल राष्ट्रीय उत्पादन’ या ‘ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट’ (GNP) कहा जाता है।

एक अन्य गणना ‘सकल घरेलू उत्पाद’ या ‘ग्रॉस डॉमेस्टिक प्रोडक्ट’ (GDP) भी है।

सकल राष्ट्रीय उत्पाद (ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट GNP)

राष्ट्र के कुल उत्पादन की गणना उसके कुल उत्पादों के मूल्य (वैल्यू) के योग अथवा उन उत्पादों के निर्माण में खर्च की गई कीमत (कॉस्ट) के कुल योग से की जाती है।

इस प्रकार सकल राष्ट्रीय उत्पाद की गणना दो विभिन्न तरीकों से की जा सकती है। जी.एन.पी. की गणना में राष्ट्र की कुल खपत, कुल निवेश, सरकारी खरीद, सेवाओं तथा निर्यात का मूल्य रुपए की मुद्रा में आँका जाता है।

चूँकि सकल राष्ट्रीय उत्पाद की अभिव्यक्ति रुपए की मुद्रा की इकाई में की जाती है, अतः किसी वर्ष के सकल राष्ट्रीय उत्पाद को रुपए में आए अवमूल्यन से संशोधित

करना चाहिए। इस प्रकार प्राप्त संशोधित सकल राष्ट्रीय उत्पाद उस वर्ष का वास्तविक ‘ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट’ (GNP) होता है।

रुपए के अवमूल्यन का आकलन आधिकारिक तौर पर बेस इंडेक्स के दृष्टिकोण से किया जाता है। भारत में 1981 को ‘बेस ईयर’ या ‘आधार वर्ष’ माना गया है तथा इस वर्ष का प्राइस इंडेक्स मूल्य सूचकांक 100 निर्धारित किया गया है।

वर्तमान में किसी वर्ष की तुलना इस आधार वर्ष के प्राइस इंडेक्स से की जाती है तथा उसी प्रकार महँगाई के चलते रुपए की खरीदी करने की क्षमता में गिरावट को आँककर रुपए का क्रय मूल्य निकाला जाता है।

इस क्रय मूल्य को इकाई बनाकर किसी वर्ष का सकल राष्ट्रीय उत्पाद निकाला जाए तो वह उस वर्ष का वास्तविक ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट’ या ‘रियल जी.एन.पी.’ कहलाता है।

सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP) का महत्त्व

सकल राष्ट्रीय उत्पाद (ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट) के आँकड़ों का महत्त्व इसकी कुछ सीमाओं के बावजूद हमारे देश के संदर्भ में प्रतिवर्ष बढ़ रहा है।

इन आँकड़ों का उपयोग बड़े उद्योगों द्वारा किए गए उत्पादन एवं उनकी आय को अभिव्यक्त करने में तथा विभिन्न सेक्टर्स के मध्य फंक्शनल ट्रांजेक्शन को व्यक्त करने में होता है।

विभिन्न बिजनेस ग्रुप व सरकार इन आँकड़ों की सहायता से तात्कालिक आर्थिक स्थितियों का जटिल विश्लेषण करते हैं तथा इस विश्लेषण के आधार पर नीतियों व रणनीतियों में आवश्यक बदलाव लाकर भविष्य के लक्ष्य निर्धारित करते हैं।

किसी भी सरकार के लिए ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट के आँकड़े उस सरकार द्वारा अपनाए गए आर्थिक मॉडल तथा वित्तीय नीतियों की सफलता-असफलता के परिचायक होते हैं।

हमारे देश में सरकारों द्वारा अपनाई गई पंचवर्षीय योजनाओं की विवेचना व विश्लेषण इन्हीं ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट के आँकड़ों के आधार पर होती है।

सकल घरेलू उत्पाद (ग्रॉस डॉमेस्टिक प्रोडक्ट GDP).

देश के किसी क्षेत्र विशेष में एक वर्ष के समय में पैदा किए गए सभी अंतिम उत्पाद तथा सेवाओं की रुपए की मुद्रा में अभिव्यक्ति उस क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद’ (GDP) कहलाता है।

देश की सभी क्षेत्रीय इकाइयों के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) को जोड़कर देश की ‘कुल जी.डी.पी.’ निकाली जाती है।

नेट नेशनल प्रोडक्ट (NNP)

ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट से राष्ट्रीय खपत घटाने पर नेट नेशनल प्रोडक्ट का आँकड़ा प्राप्त होता है। किसी देश के विकास को आँकने का यह ज्यादा विश्वसनीय आँकड़ा है।

प्रति व्यक्ति आय (पर केपिटा इनकम)

किसी देश के बढ़ते ग्रॉस डॉमेस्टिक प्रोडक्ट के आँकड़े, ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट के आँकड़े या नेट नेशनल प्रोडक्ट के आँकड़े उस देश की विकास की स्थिति को दरशाते हैं, परंतु इन्हें उस देश की जनता के जीवन-स्तर में आए बदलाव का सीधा सूचक नहीं माना जा सकता।

मोटे तौर पर हम अपने देश को ‘टेस्ट केस’ मानकर देख सकते हैं कि गत दशकों में भारत द्वारा किए गए विकास के बावजूद देश की आम जनता के जीवन-स्तर में अपेक्षित बदलाव नहीं आया है।

अतः सकल राष्ट्रीय आय को देश की जनसंख्या से विभाजित करने पर जो प्रति व्यक्ति आय का आँकड़ा प्राप्त होता है, वह देश की जनता के जीवन-स्तर में आए सुधार का सूचक हो सकता है।

यदि किसी देश के ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट (जी.डी.पी.) आँकड़े, नेट नेशनल प्रॉडक्ट (NNP) आँकड़ों में वृद्धि के साथ प्रति व्यक्ति आय में भी वृद्धि दर्ज हो, तब यह स्थिति उस देश की जनता के जीवन-स्तर में वृद्धि की सूचक होती है।

मुद्रास्फीति (इन्फ्लेशन)

मुद्रास्फीति से तात्पर्य है-उपभोक्ता वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतों में वृद्धि। जब उपभोक्ता वस्तुओं तथा प्रदान की जानेवाली सेवाओं की कीमतों में व्यापक व स्थायी तौर पर वृद्धि होती है

तो इसे अर्थशास्त्र की भाषा में ‘मुद्रास्फीति (महँगाई) का बढ़ना’ कहते हैं।किसी एक कमोडिटी की कीमत में वृद्धि को मुद्रास्फीति का कारण नहीं माना जा सकता

क्योंकि ऐसा उस कमोडिटी के उत्पादन, वितरण अथवा माँग-आपूर्ति के असंतुलन के कारण अस्थायी तौर पर भी हो सकता है।

विभिन्न वस्तुओं के मध्य इनके मूल्य में सापेक्ष परिवर्तन को मुद्रास्फीति नहीं कहा जा सकता है।

एक आदर्श अर्थव्यवस्था के अंतर्गत बाजार में उपलब्ध विनिमय की जा सकनेवाली उपभोक्ता वस्तुओं तथा प्रदान की जा सकनेवाली सेवाओं की मात्रा तथा बाजार में प्रचलित मुद्रा में एक संतुलन होता है; परंतु व्यवहार में ऐसा नहीं है

क्योंकि वस्तुओं तथा सेवाओं की मात्रा, उनकी माँग-आपूर्ति घटती-बढ़ती रहती है तथा बाजार में प्रचलित मुद्रा भी अपने परिमाण में बदलती रहती है।

आधुनिक अर्थव्यवस्था की संरचना कुछ ऐसी है कि इस संतुलन को प्रभावित करनेवाली प्रत्येक घटना मुद्रास्फीति को बढ़ानेवाला कारण साबित होती है।

मुद्रास्फीति का आकलन

किसी अवधि (एक माह, एक वर्ष या एक दशक) के दौरान मुद्रास्फीति को मापने के लिए हजारों-हजार उपभोक्ता वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतों में इस अवधि के दौरान आए परिवर्तन का औसत निकाला जाता है।

ऐसी गणना करना आसान नहीं है तथा ऐसी कोई गणना दोष-रहित भी नहीं हो सकती। मुद्रास्फीति के आकलन के लिए सरकारी एजेंसियाँ ‘प्राइस इंडेक्स’ को आधार बनाती हैं।

इस प्राइस इंडेक्स में विभिन्न कमोडिटियों, वस्तुओं को इनके महत्त्व के आधार पर ‘वेटेज’ दिया जाता है।उपभोक्ता बजट अथवा जी.एन.पी. (ग्रास नेशनल प्रॉडक्ट) में जिन कमोडिटी का महत्त्व ज्यादा होता है, उन्हें अधिक वेटेज दिया जाता है।

इस प्रकार किसी अवधि के दौरान विभिन्न समय पर प्राइस इंडेक्स की गणना की जाती है तथा प्राइस इंडेक्स में हुई वृद्धि के आधार पर मुद्रास्फीति का आकलन किया जाता है।

यद्यपि औसत आधार पर की गई गणना की यह विधि दोष-रहित नहीं है, फिर भी इस विधि से बड़े परिवर्तन भाँपे जा सकते हैं।

प्राइस इंडेक्स का उपयोग कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि की गणना के लिए भी किया जाता है, जिससे मुद्रास्फीति के प्रभाव को कम किया जा सके।

हमारे देश (अथवा किसी अन्य विकासशील अर्थव्यवस्थावाले देश) के संदर्भ में मुद्रास्फीति के चक्र का अध्ययन रोचक है। सरकार अपनी भूमिका में इसे नियंत्रित रखना चाहती है,परंतु उसके कार्य तथा नीतियाँ अकसर मुद्रास्फीति को बढ़ाते हैं।

हमारे देश अथवा किसी अन्य विकासशील देश की सरकार स्वयं में एक बड़ी उपभोक्ता होती है। जब सरकार ज्यादा खरीदी करती है

तो जनता के लिए उपलब्धता उस अनुपात में कम हो जाती है। आम जनता के लिए उपलब्धता की यह कमी माँग बढ़ाती है तथा बढ़ी हुई यह माँग कीमतों में वृद्धि या मुद्रास्फीति का कारण बनती है।

सरकार को अपनी खरीदी के लिए जो धन चाहिए। वह टैक्स लगाकर अथवा उधार लेकर पूरी करती है।

चूँकि इन दोनों तरीकों की एक सीमा है, अतः सरकार तीसरा आसान तरीका अपनाती है, जिसमें वह सेंट्रल बैंक द्वारा (केंद्रीय बैंक-रिजर्व बैंक) करेंसी नोट प्रिंट करके अपने रेवेन्यू तथा खर्च के अंतर को पाटती है। यह अंतर सरकारी बजट में घाटे के रूप में दरशाया जाता है।

अतिरिक्त करेंसी जारी होने के कारण बाजार में मुद्रा की तरलता (लिक्विडिटी) जितनी भी बढ़ती है, वह मुद्रास्फीति को बढ़ाने का कारक साबित होती है।

अकसर राष्ट्रीय उत्पादन में वृद्धि उस अनुपात में ही होती है, जिस अनुपात में सरकारी खर्च बढ़ता है।

इस प्रकार यह कार्यशैली ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट को कम तथा मुद्रास्फीति इनफ्लेशन को ज्यादा बढ़ाती है।

इस बढ़ते इनफ्लेशन के कारण सरकार को निश्चित अंतराल पर अपने कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि करनी पड़ती है, जिससे बाजार में पुनः मुद्रा की तरलता बढ़ती है तथा सरकारी घाटा बढ़ता है।

लंबी अवधि में यह पुनः मुद्रास्फीति को बढ़ानेवाला कारक साबित होता है। सरकार मुद्रास्फीति को नियंत्रण में करने के लिए उत्पादन पर जोर देती है। तथा मौद्रिक तथा क्रेडिट पॉलिसियों में ढील देने की नीति अपनाती है।

यद्यपि इन नीतियों से उत्पादन को सहायता मिलती है, परंतु इससे ब्याज दरों के कम होने के कारण लोगों में लोन लेने की प्रवृत्ति बढ़ती है। यह पुन: तरलता और माँग को बढ़ा देता है।

चूँकि सरकार द्वारा उत्पादन को बढ़ाने के लिए क्रेडिट पॉलिसियों में दी गई छूट का असर बाजार में मौद्रिक तरलता के रूप में पहले परिलक्षित होता है, जबकि बढ़े हुए उत्पादन का असर कुछ समय पश्चात् मालूम होता है।

अतः समय का यह अंतराल मुद्रास्फीति को बढ़ानेवाला साबित होता है। जब सरकार यह महसूस करती है कि बाजार में मुद्रा की तरलता ने मुद्रास्फीति को बढ़ा रखा है, तब वह क्रेडिट पॉलिसी में कठोरता लाकर ब्याज दरों को बढ़ाने की कोशिश करती है।

परंतु इसका विपरीत असर उत्पादक इकाइयों पर भी पड़ता है। उत्पादक इकाइयाँ इसका असर अपने उत्पाद की कीमत बढ़ाकर दूर करने का प्रयास करती हैं।

पुन: उत्पाद की कीमत बढ़ने के कारण मुद्रास्फीति बढ़ती है। विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था में जहाँ सरकारों का खर्च उसके द्वारा अर्जित किए गए रेवेन्यू से अधिक होता है, वह इस चक्र से प्रभावित होती रहती हैं।

इसके विपरीत, विकसित देशों की अर्थव्यवस्था में अकसर सरकार का खर्च उसके द्वारा अर्जित किए गए रेवेन्यू (राजस्व) से कहीं कम होता है (क्योंकि ऐसे देश बड़े निर्यातक होते हैं) तथा इन विकसित देशों की अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत होती है

कि उत्पादन में वृद्धि करने की नीतियों के तहत किए गए क्रेडिट पॉलिसी में बदलाव के कारण बाजार में उत्पन्न तरलता को झेला जा सकता है या इस तरलता को अन्य दिशा दी जा सकती है सरल भाषा में मुद्रास्फीति का असर रुपए की क्रय-शक्ति में गिरावट है।

उदाहरण के तौर पर, किसी मध्य वर्गीय परिवार के राशन का खर्च सन् 2005 में 3,000 रुपए था तो 2008 में इतने ही रुपयों में वह उतनी वस्तुएँ उस मात्रा नहीं खरीद सकता

जितनी मात्रा में वह 2005 में खरीद सकता था। सरकार निश्चित समय अंतराल पर मुद्रास्फीति की दर की घोषणा करती है।

उदाहरण के तौर पर, किसी समय यदि मुद्रास्फीति की दर 7 प्रतिशत है तो इसका अर्थ यह है कि एक वर्ष पहले उपभोक्ता जो वस्तु या सेवा 100 रुपए में हासिल कर सकता था, उसकी कीमत अब 107 रुपए है।

मॉनीटरी पॉलिसी (मौद्रिक नीति)

सरकार की इस आर्थिक नीति का उद्देश्य देश की आर्थिक व वित्तीय स्थितियों में सुधार लाकर मुद्रास्फीति को घटाना, दीर्घकालीन उत्पादन में वृद्धि तथा दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय व्यापार को मजबूत बनाना होता है।

केंद्र सरकार ‘मॉनीटरी पॉलिसी’ को रिजर्व बैंक (केंद्रीय बैंक) के माध्यम से लागू करती है। रिजर्व बैंक सरकार की मॉनीटरी पॉलिसी को इस प्रकार से लागू करता है

जिससे बैंकों की लेंडिंग (उधार देना) एवं इन्वेस्टमेंट (निवेश) ग्राहक के लिहाज से बढ़े तथा बैंक व्यापारिक खर्च इस प्रकार से करें, जिससे मुद्रास्फीति को बढ़ाए बिना आर्थिक विकास को मदद मिल सके।

सरकार की मॉनीटरी पॉलिसी में रोजगार के स्तर, उत्पादन के आकार एवं मुद्रास्फीति की दर को प्रभावित करने की क्षमता होती है तथा इस प्रकार यह आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करने के लिए महत्त्वपूर्ण औजार है।मॉनीटरी पॉलिसी के तीन महत्त्वपूर्ण इंस्ट्रमेंट हैं

1.ओपन मार्केट ऑपरेशंस- इसके तहत बैंक सरकारी प्रतिभूतियों को खरीदते तथा बेचते हैं। इस प्रकार कोई बैंक अपने रिजर्व के आकार में परिवर्तन लाता है।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया समय-समय पर सरकारी ट्रेजरी बिलों (शॉर्ट टर्म बांड) तथा लांग टर्म सरकारी बांड खरीदकर बैंकिंग सिस्टम में रिजर्व को बढ़ावा देता है अथवा इन सरकारी प्रतिभूतियों को बेचकर मॉनीटरी पॉलिसी में कसाव लाता है।

2. डिस्काउंट रेट पॉलिसी-इसके द्वारा रिजर्व बैंक डिस्काउंट रेट’ या वह ब्याज दर निर्धारित करता है, जिस पर सदस्य बैंक रिजर्व बैंक से उधार ले सकते हैं। जब कभी कमर्शियल बैंकों को रिजर्व की कमी महसूस होती है

तो वे केंद्रीय बैंक से डिस्काउंट रेट पर उधार ले सकते हैं। रिजर्व बैंक अन्य बैंकों द्वारा लिये गए उधार और बाजार में चल रही आर्थिक गतिविधियों जैसे मुद्रास्फीति, उत्पादन का आकार, विकास दर आदि पर नजर रखता है

तथा अपने आकलन के अनुसार सदस्य बैंकों द्वारा ली गई उधारी को प्रोत्साहित – करने अथवा निरुत्साहित करने की नीति से डिस्काउंट रेट में कमी या वृद्धि करता है।

3. रिजर्व रिक्वायरमेंट पॉलिसी- इसके तहत सदस्य बैंकों तथा वित्तीय संस्थानों द्वारा रिजर्व बैंक के पास किए जानेवाले डिपॉजिट का अनुपात नियंत्रित किया जाता है।

बैंकों को अपना कार्य सुचारु रूप से करने के लिए उनके डिपॉजिट का 1 प्रतिशत हिस्सा रिजर्व के रूप में रखना पर्याप्त होता है। परंतु सरकार रिजर्व बैंक के माध्यम से बैंकों तथा बाजार में मौद्रिक प्रसार पर अपना नियंत्रण बनाए रखना आवश्यक समझती है।

यह कार्य केंद्रीय बैंक (रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया) की ‘रिजर्व रिक्वायरमेंट पॉलिसी के तहत किया जाता है।

सामान्यतः भारत में एस.एल.आर. या वैधानिक तरलता अनुपात (स्ट्रिटुअरी लिक्विडिटी रेशियो) 25 प्रतिशत के आस-पास तय किया गया है।

अर्थात् सभी सदस्य बैंक उनके द्वारा किए गए कुल डिपॉजिट का 25 प्रतिशत केंद्रीय बैंक के पास फिक्स रखेंगे।

इस रिजर्व पर केंद्रीय बैंक सदस्य बैंकों को कोई ब्याज नहीं चुकाता। इस एस.एल.आर. (SLR) के माध्यम से रिजर्व बैंक मुद्रा बाजार में मुद्रा के प्रसार पर नियंत्रण रखता है।

इस एसएलआर में परिवर्तन लाकर केंद्रीय बैंक मुद्रा बाजार में आवश्यकतानुसार तरलता (लिक्विडिटी या धन की उपलब्धता) में परिवर्तन लाकर मुद्रास्फीति (महँगाई) पर नियंत्रण रखता है तथा उत्पादकता को प्रोत्साहन देता है।

सरकार केंद्रीय बैंक के माध्यम से मौद्रिक नीति लागू करके अपने दीर्घकालिक लक्ष्य निर्धारित करती है।

जब कभी सरकार अपने दीर्घकालिक लक्ष्यों में परिवर्तन लाना चाहती है अथवा उन्हीं लक्ष्यों को कायम रखते हुए बाजार की स्थितियों में बदलाव लाना आवश्यक समझती है

तब वह इन तीन औजारों के माध्यम से मुद्रा बाजार की स्थिति में बदलाव लाकर उद्देश्य हासिल करती है।

फिस्कल पोलिसी (वित्तीय नीतियाँ)

‘फिस्कल पॉलिसी’ द्वारा सरकार अपने खर्च तथा कर अर्जित करने की क्रिया को निर्धारित करती है। आधुनिक आर्थिक व्यवस्था में जहाँ बाजार की शक्तियों की भूमिका अधिक होती है (खुली बाजार व्यवस्था)

वहाँ सरकार बाजार एवं वित्तीय सिस्टम पर नजर रखने के लिए, प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने के लिए, उत्पादकता पर जोर देने के लिए तथा किन्हीं कमजोर तबकों को सहारा देने के लिए वैधानिक ढाँचा तैयार करती है।

इस वैद्यानिक ढाँचे के माध्यम से सरकार अपनी ‘फिस्कल पॉलिसी’ को इस प्रकार लागू करना चाहती है, जिससे सतत आर्थिक विकास हो।

सरकारी फिस्कल पॉलिसी के दो महत्त्वपूर्ण औजार-सरकार द्वारा किया जानेवाला खर्च एवं सरकार द्वारा अर्जित किए जानेवाले कर (टैक्स) हैं। इन दो औजारों के माध्यम से सरकार ‘माइक्रोइकोनॉमिक लक्ष्य हासिल करती है।

बिजनेस साइकिल

बिजनेस की स्थितियाँ कभी एक जैसी नहीं रहतीं। वे कारक, जो आर्थिक प्रगति में सहायक होते हैं, एक अवधि के पश्चात् आर्थिक विकास का तंत्र इन कारकों के प्रति रेस्सिटिव (प्रतिरोधात्मक) हो जाता है।

इस स्थिति से बचने के लिए समय-समय पर इन कारकों में बदलाव लाए जाते हैं। फिर आर्थिक फैलाव के बाद मंदी का दौर भी आता है।

इस दौर में जी.एन.पी., रोजगार के स्तर तथा वास्तविक आय में गिरावट दर्ज होती है। बढ़ती हुई मुद्रास्फीति तथा कम होते लाभ के चलते कर्मचारियों की छंटनी होने लगती है

और शेयर बाजार इससे प्रभावित होने लगता है। मंदी के दौर के पश्चात् रिकवरी प्रारंभ होती है। (शेयर बाजार में भी रिकवरी दिखाई देने लगती है)।

यह दौर भी तेज या धीमा हो सकता है। रिकवरी का दौर पुन: आर्थिक फैलाव के दौर में या फिर पुनः मंदी के दौर में बदल सकता है।

इस प्रकार जब आर्थिक गतिविधियों की गति तेज या मंदी पड़ती है, सरल भाषा में इसे ‘बिजनेस साइकिल’ कहा जाता है। यह साइकिल 2 साल से 10 साल तक फैली हो सकती है।

क्रेडिट पॉलिसी

केंद्रीय बैंक (भारतीय रिजर्व बैंक) सभी अन्य बैंकों के लिए नीति-नियम बनाता है तथा उनके लेन-देन पर नजर रखता है।

यदि बैंकों को नकदी (लिक्विडिटी) की कमी होती है तो उन्हें नकदी मुहैया भी करवाता है; और इन्हीं सब बातों का आकलन किया जाता है मौद्रिक नीति’ के तहत।

इसी मौद्रिक नीति को क्रेडिट पॉलिसी’ के नाम से भी जाना जाता है। क्रेडिट पॉलिसी की घोषणा साल में दो बार अप्रैल और अक्तूबर में की जाती है।

लेकिन अब हर तिमाही इसकी समीक्षा का प्रावधान कर दिया गया है। इस दौरान रिजर्व बैंक कोई भी नीतिगत फैसला ले सकता है।

अर्थव्यवस्था के कई पहलू बाजार में नकदी की उपलब्धता तथा महँगाई दर जैसे कई मुद्दे हैं जिन्हें इसी क्रेडिट पॉलिसी के जरिए साधा जाता है। हालात के मुताबिक केंद्रीय बैंक सी.आर.आर. (कैश रिजर्व रेशियो), रेपो रेट या अन्य रेटों में कमी या बढ़ोतरी कर सकता है।

क्रेडिट पॉलिसी बनाते वक्त रिजर्व बैंक यह देखता है कि बाजार में धन की उपलब्धता कितनी है। बैंकों के पास कितनी नकदी है और वे कितना कर्ज दे रहे हैं।

अगर बाजार में धन बढ़ता है या यों कहें कि तरलता (लिक्विडिटी) बढ़ जाती है तो वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं; क्योंकि पैसा उपलब्ध होने से एकाएक डिमांड बढ़ जाती है, जबकि सप्लाई उस अनुपात में नहीं बढ़ने से महँगाई बढ़ने लगती है।

इसके अलावा रिजर्व बैंक यह भी देखता है कि बैंक कितना कर्ज दे रहे हैं और कितनी वसूली कर रहे हैं।

अगर कर्ज देने के बाद बैंकों ने कर्ज को सही तरीके से नहीं वसूला तो वे दिवालिए हो जाएँगे, जैसा कि हमने वर्ष 2008 में अमेरिका के कई बैंकों को दिवालिया होते देखा।

अत: इन सभी मुद्दों पर बारीकी से विश्लेषण करने के बाद पॉलिसी बनाई जाती है कि आनेवाले समय में बैंकों को क्या रुख रखना है। और इसके लिए रेपो, रिवर्स रेपो और सी.आर.आर. में बदलाव किया जाता है।

रेपो रेट

बैंकों को अपने दैनिक कामकाज के लिए प्रायः ऐसी बड़ी रकम की जरूरत होती है जिनकी मियाद एक दिन से ज्यादा नहीं होती। इसके लिए बैंक जो विकल्प अपनाते हैं, उनमें सबसे ज्यादा सामान्य विकल्प है रिजर्व बैंक से रात भर के लिए (ओवरनाइट) कर्ज लेना।

इस कर्ज के लिए बैंकों को रिजर्व बैंक को जो ब्याज देना पड़ता है, उसे रेपो रेट’ कहते हैं।रेपो रेट कम होने से बैंकों के लिए रिजर्व बैंक से कर्ज लेना सस्ता हो जाता है और इसलिए बैंक ब्याज दरों में कमी कर देते हैं, ताकि ज्यादा-से-ज्यादा रकम कर्ज के तौर पर दी जा सके।

रेपो रेट में बढ़ोतरी का सीधा मतलब यह होता है कि बैंकों के लिए रिजर्व बैंक से रात भर के लिए कर्ज लेना महँगा हो जाएगा। साफ है कि बैंक दूसरों को कर्ज देने के लिए जो ब्याज दर तय करते हैं, उसे उन्हें बढ़ाना पड़ेगा।

रिवर्स रेपो रेट

नाम के मुताबिक रिवर्स रेपो रेट’ ‘रेपो रेट’ से उल्टा होता है। बैंकों के पास दिन भर के कामकाज के बाद जो रकम शेष बच जाती है, बैंक वह रकम अपने पास रखने के बजाय रिजर्व बैंक में रख सकते हैं

जिस पर उन्हें रिजर्व बैंक से ब्याज भी मिलता है। जिस दर पर वह ब्याज मिलता है, उसे ‘रिवर्स रेपो रेट’ कहते हैं। अगर रिजर्व बैंक को लगता है कि बाजार में बहुत ज्यादा नकदी है

तो वह रिवर्स, रेपो रेट में बढ़ोतरी कर देता है, जिससे बैंक ज्यादा ब्याज कमाने के लिए अपना धन रिजर्व बैंक के पास रखने के लिए प्रोत्साहित होते हैं, और इस तरह उनके पास बाजार में उधार पैसा देने के लिए कम धन बचता है।

कैश रिजर्व रेशियो (CRR)

सभी बैंकों के लिए जरूरी होता है कि वे अपने कुल कैश रिजर्व का एक निश्चित हिस्सा रिजर्व बैंक के पास जमा रखें।

इसे ‘नकद आरक्षी अनुपात’ कहते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि अगर किसी भी मौके पर एक साथ बहुत बड़ी संख्या में जमाकर्ता अपना पैसा निकालने आ जाएँ तो बैंक डिफॉल्ट न कर सके।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया जब ब्याज दरों में बदलाव किए बिना बाजार से तरलता कम करना चाहता है तो वह सी.आर.आर. बढ़ा देता है।

उदाहरण के लिए मौद्रिक नीति की वार्षिक समीक्षा के बाद यदि सी.आर.आर. 8.25 प्रतिशत होता है तो इसका मतलब है कि बैंकों को अपने 100 रुपए के कैश रिजर्व पर 8.25 रुपए का रिजर्व रखना होगा।

इससे बैंकों के पास बाजार में कर्ज देने के लिए कम रकम बचेगी। लेकिन रेपो और रिवर्स रेपो दरों में कोई बदलाव नहीं किया जाता है तो ‘कॉस्ट ऑफ फंड’ पर कोई असर नहीं पड़ता।

रेपो और रिवर्स रेपो दरें रिजर्व बैंक के हाथ में नकदी की सप्लाई को तुरंत प्रभावित करनेवाले हथियार माने जाते हैं, जबकि सी.आर.आर. बाजार में नकदी की सप्लाई को प्रभावित करनेवाला हथियार माना जाता है।

एस.एल.आर. या वैधानिक तरलता अनुपात (SLR)

बैंकों के लिए यह जरूरी होता है कि वे हर दिन के अपने कारोबार के अंत में नकदी, सोना और गवर्नमेंट सिक्यूरिटीज में निवेश के रूप में एक खास रकम रिजर्व बैंक के पास रखें, जिसे वे किसी भी आपात देनदारी को पूरा करने में इस्तेमाल कर सकें।

यह रकम आमतौर पर बैंक की अगले एक महीने की तमाम देनदारियों और किसी भी समय आनेवाली आपात माँग के आधार पर तय की जाती है। आर.बी.आई. ने फिलहाल इसकी सीमा 24 प्रतिशत निश्चित रखी है।

आर.बी.आई. इसमें बढ़ोतरी व कटौती करता रहता है। जब रिजर्व बैंक एस.एल.आर. (SLR) में कटौती करता है तो इसका मतलब होता है कि होम लोन, कार लोन और व्यावसायिक लोन सस्ते हो जाएंगे।

यदि हम एस.एल.आर. और सी.आर.आर. में अंतर की बात करें तो असल में अर्थव्यवस्था में पूँजी के प्रवाह को बढ़ाने के दौरान बैंक कर्ज की मात्रा ज्यादा होने से रोकने के लिए एस.एल.आर. की व्यवस्था है

वहीं सी.आर.आर. के तहत बैंकों को अपने नकद जमा का एक निश्चित हिस्सा आर.बी.आई. में रखना होता है। जितना ज्यादा सी.आर.आर. होगा, बैंकों के पास ग्राहकों के लोन देने के लिए उतनी ही कम राशि होगी।

नॉन परफॉर्मिंग एसेट (NPA)

। ‘एन.पी.ए.’ यानी ‘नॉन परफॉर्मिंग एसेट’ का मतलब होता है, वह कर्ज जिसकी वसूली करने में बैंक तमाम कोशिशों के बावजूद नाकाम रहा हो। और जब बैंक यह मान लेता है कि उस रकम की वसूली नामुमकिन है

तो उसे ‘नॉन परफॉर्मिंग एसेट’ में डाल दिया जाता है। और यही कारण है कि बैलेंस शीट तैयार करते वक्त इसे जोड़ा नहीं जाता। वर्ष 2008 में आई आर.बी.आई. की रिपोर्ट के अनुसार, “फिलहाल सभी बैंकों का एन.पी.ए. एक लाख करोड़ से ज्यादा है।”

यही कारण है कि जब एन.पी.ए. बढ़ने लगता है तो बैंक लोन देने से ना-नुकुर करने लगते हैं, जिनके बारे में उन्हें संदेह होता है कि उनकी वसूली शायद न हो पाए।

हालाँकि बैंकों को यह भी अधिकार है कि कर्ज न देने की स्थिति में वे कर्जदार की संपत्ति की नीलामी कर सकते हैं तथा कर्जदार को नोटिस दे सकते हैं। लेकिन इस सबके बावजूद एन.पी.ए. में वृद्धि जारी है।

यही कारण है कि बैंक उन्हीं सेक्टरों और लोगों को लोन देने में रुचि दिखाते हैं, जिनका ट्रेक रिकॉर्ड अच्छा हो।

प्राइम लैंडिग रेट (PLR)

प्राइम लैंडिंग रेट का घटना या बढ़ना, कर्ज लेनेवालों के लिए बहुत मायने रखता है। यह बैंकों की ब्याज दरों का ‘बेंचमार्क’ है, जिसे ‘प्राइम लैंडिंग रेट’ कहा जाता है।

इस बुनियादी रेट के घटने या बढ़ने का मतलब है—सभी तरह के कर्ज या लोन महँगे या सस्ते हो जाना। अलग-अलग बैंकों का (पी.एल.आर.) अलग-अलग होता है और इसमें बैंक अपनी व्यापारिक नीति एवं वित्तीय हालात के मुताबिक पी.एल.आर. घटाते बढ़ाते हैं।

लेकिन यह बहुत हद तक आर.बी.आई. की क्रेडिट पॉलिसी पर निर्भर करता है। ऐसा देखा गया है कि जब आर.बी.आई. रेपो रेट में कटौती करता है

तो बैंक भी अपने पी.एल.आर. घटा देते हैं और उनकी ब्याज दरें कम हो जाती हैं। और यदि रेपी रेट बढ़ा दिया जाता है तो उन्हें अपनी दरें बढ़ानी भी पड़ती हैं।

मंदी के मायने

अर्थव्यवस्था में तेजी एवं मंदी का आना चक्रीय होता है और इसका प्रभाव शेयर बाजार पर बहुत जल्द दिखाई देने लगता है।

यदि यह कहा जाए कि शेयर बाजार अर्थव्यवस्था की तेजी या मंदी का आईना है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

‘रिसेशन’ या मंदी’ से तात्पर्य है किसी देश की अर्थव्यवस्था में आर्थिक गतिविधियों में ब्रेक या यों कहें, सुस्त पड़ जाना मंदी का संकेत कहलाता है। और जब ऐसा होता है, तब देश के सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) के ग्रोथ रेट में कमी आने लगती है।

चूंकि किसी भी देश को सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) में वृद्धि ही उस देश की इकोनॉमिक ग्रोथ में वृद्धि का द्योतक है; और जब दो-तीन तिमाहियों तक जी.डी.पी. की वृद्धि-दर में कमी दर्ज की जाती है

तो हम यह कह सकते हैं कि देश मंदी की तरफ बढ़ रहा है। इसका असर शेयर बाजार में निरंतर गिरावट के रूप में देखा जाता है।

विशेषज्ञ ऐसा मानते हैं कि तेज वृद्धि दर के बाद मंदी आती है, जो कि एक सामान्य कारोबारी-चक्र है। ऐसा माना जाता है कि 2 से 4 साल के बीच मंदी खत्म हो जाती है।

कुछ लोगों का मानना है कि जी.डी.पी. ही अर्थव्यवस्था का एकमात्र इंडिकेटर नहीं है, बल्कि रोजगार के मौके, औद्योगिक उत्पादन, वास्तविक आय और थोक व खुदरा बिक्री भी काफी मायने रखते हैं।

अमेरिका के ‘नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च’ की परिभाषा के अनुसार—’जब आर्थिक गतिविधियाँ शीर्ष पर पहुँचने के बाद घटने लगती हैं तो इस अवधि को मंदी या रिसेशन कहते हैं।”

इस परिभाषा के अनुसार जब जी.डी.पी. में 10 फीसदी से अधिक की गिरावट आती है तो इसे ‘इकोनॉमिक डिप्रेशन’ कहते हैं।

मंदी के कारण

हालाँकि मंदी का कारण घरेलू माँग (डिमांड) का कम होना है, लेकिन ग्लोबल हो चुकी अर्थव्यवस्था में यह कई अन्य कारणों पर निर्भर करती है।

जैसे भारत में सन् 2008 में मंदी की दस्तक का कारण अमेरिका की मंदी और उसका सबप्राइम संकट बना। विशेषज्ञ ऐसा मानते हैं कि जब उपभोक्ता अपने खर्च में कमी कर देते हैं

तो मंदी आती है और अर्थव्यवस्था में जब भरोसा कम होने लगता है तो लोग खराब समय के लिए पैसा बचाकर रखते हैं और इससे खर्च कम करने लगते हैं। जाहिर है, इससे माँग कम हो जाती है और इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है।

कंपनियाँ अपना उत्पादन कम करना शुरू कर देती हैं। उत्पादन कम होने से नौकरियों में भी कटौती होने लगती है और इससे बेरोजगारी फैलने लगती है तथा लोगों की खर्च करने की क्षमता स्थिर हो जाती है।

हाँ, यह सही है कि मंदी के जलजले को महज शेयर मार्केट के आईने में नहीं देखा जा सकता; क्योंकि भारत की कुल आबादी में सिर्फ 1.5 प्रतिशत लोग ही शेयर बाजार में सीधा निवेश करते हैं और इससे कुछ ज्यादा लोग म्युचुअल फंड में निवेश करते हैं।

यही कारण है कि ज्यादातर लोगों के लिए यह बात मायने नहीं रखती कि शेयर मार्केट में क्या हो रहा है। लेकिन यह सत्य है कि इकोनॉमी पर जब मंदी नामक सुनामी का असर होता है

तो मुश्किल दौर शुरू हो जाता है। इस दौरान इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन में जोरदार गिरावट होने लगती है

जो इस बात की ओर इशारा करती है कि बाजार और बिजनेस में सेंटिमेंट्स नकारात्मक होने लगे हैं और सुस्ती छाने लगी है। और जब इकोनॉमी पर ब्रेक लगता है तो आम लोगों के रोजगार, आमदनी व उनके लाइफस्टाइल पर असर पड़ने लगता है।

।। धन्यवाद ।।

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