जानिए हिंदी में Initial Public Offering (IPO) Related Information. आपको इस Blog में IPO से जुडी सारी जानकारी मिल जाएगी।

Initial Public Offering (IPO) Related Information (आई.पी.ओ. संबंधित जानकारी)

IPO (आई.पी.ओ.) में निवेश करने के लिए हमें प्रथम उसके कार्य प्रणाली की जानकारी होना जरूरी है। नीचे IPO (आई.पी.ओ.) शिक्षा लेने के लिए आवश्यक जानकारी दी है।

Board of Directors (कंपनी के व्यवस्थापक) :-

Board of Directors (बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स) की संरचना IPO (आई.पी.ओ.) समझने के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की रचना एक IPO (आई.पी.ओ.) को समझने के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

कंपनी का बोर्ड उसके अंतर्गत डायरेक्टर्स और बाहर के स्वतंत्र डायरेक्टर्स मिलकर बनते है। अंतर्गत डायरेक्टर कंपनी के मैनेजमेंट, शेअर धारक, वेन्चर कॅपिटालिस्ट, वेन्डर और मित्र परिजनों में से कोई भी हो सकते है।

बाहरी डायरेक्टर का कंपनी से कोई भी अर्थव्यवहार या आपसी संबंध नहीं होते। वो अपने व्यापार के अच्छे अनुभव, व्यावसायिक निर्णय और प्रतिष्ठा के कारण इस पदवी पर होते है।

बाहरी डायरेक्टर्स के पास कंपनी के शेअर हो सकते है पर वो कंपनी के बड़े शेअर धारक नहीं होते।

निवेशकों को ऐसी कंपनी की ओर अधिक आकर्षित होना चाहिए जहाँ बाहरी बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की संख्या अधिक होती है।

आमतौर पर ऐसा देखा गया है कि कंपनी जब IPO (आई.पी.ओ.) लती है तभी बाहरी डायरेक्टर की नियुक्ती करती है।

Market Design (मार्केट की रचना) :-

Primary Market (प्रायमरी मार्केट) की रचना से संबंधित प्रावधान, कंपनीज Act १९५६ में दर्ज किए है।

शेयर जारी करना (Issue), शेयर का आबंटन करना (Allotment और शेयर की लिस्टिंग करना यह काम Primary Market (प्रायमरी मार्केट) करता है।

इसके अलावा, SEBI DIP Guidlines (सेबी के डि.आय.पी. दिशानिर्देश) के अंतर्गत डिस्क्लोजर्स के मानदंडों के तहत कंपनी के Issuer (इश्युअर), Promoter (संस्थापक), Management (संचालक) आदि को कंपनी के व्यापार की संभावनाएं, Risk Factors (जोखिम के कारण) आदि की स्पष्ट जानकारी देना और मार्केट में प्रवेश करने की उनकी योग्यता है या नहीं इसकी जानकारी देना जरूरी है।

Eligibility Norms (कंपनी की योग्यता के मानदंड) :-

कंपनी जो Public Issue (पब्लिक इश्यु) द्वारा शेयर जारी करना चाहती है उसे योग्य मर्चट बैंकर द्वारा सेबी के पास Issue (इश्यु) का उद्देश पत्रिका (प्रॉस्पेक्टस) जमा कराना पड़ता है।

कंपनी को यह महत्वपूर्ण कार्य, रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी (ROC) के पास इश्यु का उद्देश पत्रिका (प्रॉस्पेक्टस) जमा कराने के कम से कम २१ दिन पहले, करना पड़ता है।

अनलिस्टेड कंपनी, Equity Share (इक्विटी शेयर) अथवा अन्य सिक्योरिटी जिनका फिर से Equity Share (इक्विटी शेयर) में रूपांतर हो सकता है,

उन्हें स्थिर कीमत पर अथवा Book Building (बुक बिल्डिंग) के माध्यम से प्रस्ताव मूल्य Offer Price (ऑफर प्राइस) पर जारी कर सकते है। परंतु उसके लिए उन्हें आगे दी गई शर्ते पूरी करनी होगी।

१. कंपनी के शेअर जारी (issue) करने के पाँच वर्ष पूर्व के पहले दो वर्ष की (Preceding) कंपनी की कुल कीमत (Net Worth) कम से कम रू. १ करोड़ होनी चाहिए और उन्ही पाँच वर्ष में से बाकी के किसी एक वर्ष में भी कंपनी की कुल कीमत रू. १ करोड़ से कम नहीं होनी चाहिए।

२. कंपनीज अॅक्ट १९५६ धारा २०५ के अंतर्गत कंपनी का डिस्ट्रीब्युटेबल प्रॉफिट (Distributable Profit) ट्रॅक रेकॉर्ड पिछले पाँच वर्षों में से कम से कम ३ वर्ष का होना चाहिए।

३. कंपनी की इश्यु साईज (Issue Size) कंपनी की कुल कीमत (Net Worth से ५ गुना से अधिक नहीं होनी चाहिए।

कंपनी के संस्थापकों का योगदान (Contribution Of Promoters) :-

अनलिस्टेड कंपनी के Public Issue (पब्लिक ईश्यु) के Promoters (व्यवस्थापकों) का जो योगदान होता है, (Contribution) और जब शेयर की बिक्री की जाती है,

तब व्यवस्थापको का जो Share Holding (शेअर होल्डिंग) होता है वह पोस्ट इश्यु पूंजी से कम नहीं होनी चाहिए।

Lock – In Period (लॉक इन पीरियड) :-

कंपनी ने जनता में Share Issue (शेयर ईश्यु) करने के बाद Promoter (व्यवस्थापक) का न्यूनतम निर्धारित योगदान कम से कम ३ वर्षों के लिए लॉक इन हो जाता है।

अगर Promoter (व्यवस्थापक) का योगदान जरूरत से ज्यादा हुआ तो वह अधिक योगदान १ वर्ष के लिए लॉक इन होता है।

जो सिक्योरिटीज का अलॉटमेंट फर्म अलॉटमेंट के आधार पर होते है वह भी १ वर्ष के लिए लॉक इन होता है।

Book Building Process (बुक बिल्डिंग प्रोसेस) :-

Book Building (बुक बिल्डिंग) यह सिक्योरिटीज का वितरण करने की एक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के माध्यम से कोई कंपनी अपने शेयर का प्रस्ताव मूल्य तय करती है।

इस प्रक्रिया में जब शेयर बेचे जाते है तो निवेशकों से अलग-अलग कीमतों बिड (बोली) मांगी जाती है। यह Bid Price Band (बिड प्राईज बेन्ड) में किसी भी कीमत पर लगाई जाती है।

Issue (इश्यू) की अंतिम तारीख के बाद ही Offer Price (ऑफर प्राइस) सुनिश्चित होता है। इसमें डश्य खल रहन तक हर दिन माग के बारे में ऑनलाइन जानकारी जा सकती है। उसस हा पता चलता है कि Issue (इश्यू) की कीमत चाहिए।

Bankers to Issue (ईश्य जारी करने वाले बैंकर) :-

IPO (आई.पी.ओ). के निवेदन पत्रों को एकत्रीत करने का काम करती है और नीचे दिए गए काम भी वह बैक करती है।

१. पूछताछ करके आवेदन पत्र और उनके पेमेन्ट का स्विकार करना।

२. जिन निवेदकों को Allotment (अलॉटमेंट) नहीं मिलता अथवा अपूर्ण अलॉटमेंट (Part allotment) मिलता है उन्हें उनके पैसे वापस करना।

३. Dividend (डिविडंड) का पेमेंट करना।

४. शेडयुल बैंक को पूरे भारत में जहाँ उनकी शाखाएँ पेमेंट स्विकारती है उनकी लिस्ट, रोजाना आवेदन पत्र (Daily Application) और उन्होनें किए हुए पेमेंट की जानकारी का रीपोट कंपनी को देना पड़ता है।

Registrar to Issue (रजिस्ट्रार टू इश्यु) :-

यह सामान्यत: कंपनी की तरफ से नीचे दिए गए काम करते है।

१. अर्जदार और उनके पैसों का अकाऊंट संभालना।

२. वितरण के अगामी कार्यभार को अदयावत करना और उनकी सूची बनाना।

३. वितरण मिले हुए लोगों को उसका पत्र भेजना।

४. नियुक्त बैंक को तैयार की हुई रक्कम की वापसी का ऑर्डर भेजना।

Lead Merchant Banker (लीड मर्चेट बैंकर) :-

कंपनी को उनका कर्तव्य निभाने में मर्चेट बैंकर की बहुत मद्द मिलती है।

वह सावधानी से देखते है कि ऑफर डॉक्युमेंट सेबी के गाईड लाईन जैसा है या नहीं। उसी तरह शेअर की डिमांड कम पड़ गई तो वह खुद की पूंजी उसकी पूर्ति के लिए लगाते है।

How to Apply for IPO (आई.पी.ओ. के लिए निवेदन कैसे किया जाए) :-

प्रथम आपके पास Pan Card (पॅन कार्ड) होना आवश्यक है। वह Demat Account (डिमेट अकाऊंट) चालू करने के लिए जरूरी है। Demat Account (डिमेट अकाऊंट) चालू करने के बाद आप IPO (आई.पी.ओ.) के लिए अर्जी कर सकते है,

जो हमें शेयर दलाल के पास से या बैक में से अथवा शेयर बाज़ार में मिलता है। उसमें आवश्यक जानकारी दर्ज करके पेमेंट और निवेदन जो बैंक स्विकारती है उसके पास जमा किया जाता है।

IPO (आई.पी.ओ.) भरने के पहले कंपनी की जानकारी कैसे ली जाए और कौनसी बाते ध्यान में रखनी चाहिए वह आगे दी है।

Points to be checked before Investing in IPO (आई.पी.ओ. में निवेश करने से पूर्व ध्यान में रखनी लायक बाते) :-

IPO (आई.पी.ओ.) के लिए निवेदन करते समय नीचे दिए हुए बातों का ध्यान से। अध्ययन कीजिए।

१. कंपनी का व्यवस्थापन कैसा है, वह योग्य है या नहीं, कंपनी कब शुरू हुई अथवा कब शुरू होने वाली है, इसकी जानकारी लीजिए।

२. कंपनी के परियोजनाए, जमिन, मशिनरी, कच्चा माल, बिक्री की व्यवस्था पर ध्यान दीजिए।

३. कंपनी की कुल पूंजी कितनी है और कंपनी उसमें वृद्धी करनेवाली है या नहीं इसकी पूछताछ कीजिए। इसमें संस्थापक के फायनानशियल इन्स्टिीटयुशन और जनता इन सबका योगदान कितना है यह देखना जरूरी

४. कंपनी के टेक्नीकल कोलॅबोरेशन है क्या यह जान लीजिए।

५. सरकार ने आयकर, बिक्री कर, एक्ससाईज डयुटी इनमें कंपनी को कुछ छूट दी है या नहीं यह जान लेना चाहिए।

६. बिक्री का व्यवस्थापन और माल की माँग देश में ही है या विदेश में भी है यह देखना।

ऊपरी मददों का लक्ष्यपूर्वक अध्ययन करने के बाद कंपनी में अर्जी करने पर कोई कठिनाई नहीं होती।

If the Issue is not Fully Paid (कंपनी के शेअर वितरण को योग्य प्रतिसाद नहीं मिला तो) :-

अगर आई.पी.ओ. को पर्याप्त प्रतिसाद नहीं मिला तो बंटवारा (Allotment) शुरू नहीं किया जाता।

सेबी के नियमोनुसार ९०% अमाऊंट की व्यवस्था IPO (आई.पी.ओ.) बंद होने के बाद ६० दिनों के अंदर Promoters (संस्थापकों) को करनी चाहिए। अगर संस्थापक उतने दिनों में यह व्यवस्था नहीं कर सके तो

अगले १० दिनों में IPO (आई.पी.ओ.) को निकालने वाली कंपनी को १५% ब्याज से निवेदकों को उनका पैसा लौटाना पड़ता है।

Surplus Application Money (ज्यादा अर्ज भुगतान) :-

कंपनी को अगर वितरण के लिए मिले हए निवेदन उसने दर्ज किए निवेदनों से ज्यादा जमा हुए तो कंपनी को उन ज्यादा जमा हुए पैसों को आठ दिन के अंदर संबंधित निवेदकों को लौटाना पड़ता है।

अगर इस काम में Promoters (प्रमोटरों) द्वारा विलंब हुआ तो कंपनी को Refund (रिफंड) के साथ १५% ब्याज का भुगतान संबंधित निवेदकों को करना पड़ता है।

।। धन्यवाद् ।।

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श्रेणी: Share Market

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