डेरिवेटिव्ह मार्केट का परिचय – Introduction to Derivatives Market in Hindi

युरोप में सत्रहवीं सदी में कृषी उत्पादन पर व्यवहार करनेवाले ट्रेडर्स फ्यूचर्स और फॉरवर्ड के कॉन्ट्रॅक्ट करते थे।

पहले के समय में यह सौदा करने का सिस्टीम वर्तमान के जैसा आधुनिक नही था। परिणाम स्वरूप ट्रेडिंग सिस्टम बिच बिच में पूरी तरह ठप्प हो जाती थी।

कालावधी अनुसार १८४८ में शिकागो के व्यापारियों के एक समूहने शिकागो बोर्ड ऑफ ट्रेड (सी-बोट) की रचना की थी।

खरीददार को और विक्रेता को लेन देन करने के लिए एक मध्यस्थ केंद्र मिले यह सी-बोट की स्थापना करने के पिछे का मुख्य हेतू था।

इस स्थान पर आकर खरीददार और विक्रेता फॉरवर्ड में व्यवहार कर सके ऐसी उनकी गिनती थी। १८६५ में सी-बोट को एक कदम आगे जाकर एक्सचेंज में ट्रेडिंग हो सके ऐसे डेरिवेटिव्हस के कॉन्टॅक्ट का अमेरिका में लिस्टींग किया।

इस कॉन्ट्रॅक्ट को फ्युचर्स कॉन्टॅक्ट के नाम से जाना जाता था। सी-बोट के ही एक शाखा में गिने गए शिकागो बटर अॅन्ड एग बोर्ड को १९१९ में फ्युचर्स में ट्रेडिंग करने के लिए मान्यता दी गई।

कालावधी के जाते उसे शिकागो मर्चन्टाईल एक्सचेंज (सी.एम.ई) का नाम दिया गया। सी-बोट और सी.एम.ई आज भी विश्व के दो बड़े से बडे सुयोजित फ्युचर्स एक्सचेंज माने जाते है।

कन्सास सिटी बोर्ड ऑफ ट्रेड में सब से प्रथम इन्डेक्स फ्यूचर के कॉन्ट्रैक्ट का ट्रेडिंग हुआ था। फिलहाल का विश्व का सब से लोक प्रिय स्टॉक इन्डेक्स फ्युचर्स कॉन्ट्रैक्ट एस अॅन्ड पी ५०० इन्डेक्स पर आधारीत है।

उसका ट्रेडिंग शिकागो मर्चन्टाईल एक्सचेंज में होता है। ८० के शतक के मध्य में फायनानशिअल फ्युचर्स, डेरिवेटिव्हस का सब से बड़ा सक्रिय डेरिवेटिव्हस इन्स्टूमेंट बना था। कमोडिटी फ्युचर्स के व्यवहार के वॉल्यूम से अधिक वॉल्यूम डेरिवेटिव्हस के व्यवहार में निर्मित होता था।

उनमें से तीन सबसे अधिक लोकप्रिय कॉन्ट्रॅक्ट याने की इन्डेक्स फ्युचर्स, फ्युचर्स ऑन टी-बिल्स और युरो डॉलर फ्युचर्स का ट्रेडिंग आज भी होता है।

सितंबर १९८४ में शिकागो मर्चन्टाईल एक्सचेंज (सी.एम.ई) और सिंगापूर मोनेटरी एक्सचेंज (साईमेन्फस), इन दोनो एक्सचेंज ने उनमें इलेक्ट्रॉनीक लिंक की।

इस वजह से लोगो को दोनो एक्सचेन्ज के फ्युचर्स कॉन्ट्रॅक्ट में चोबीस घंटे ट्रेडिंग करने की सविता मिलती थी।

भारतीय डेरिवेटिव्ह मार्केट (Derivatives Market in India):

१९९० के दशक के मध्य तक इक्वीटी स्टॉक में लेन देन होता था। यह लेन देन दो अलग अलग कॅटेगरी में होता था।

  1. स्पॉट का व्यवहार
  2. कॅरी फॉरवर्ड का व्यवहार (बदला)

समय के चलते दिसंबर १९९३ में बदला सिस्टम रद्द किया गया। तब बाजार का वॉल्यूम बहुत कम हुआ था क्योंकि स्पॉट व्यवहार के सिस्टम में बहुत बडे प्रमाण में नकद रूपयों की जरूरत होती थी। दुसरे शब्दो में कहना हो तो नकद की कमी महसूस होती थी।

ऐसे बाजार के वॉल्यूम में कमी होने से वह बढाने केलिए वैकल्पिक ट्रेडिंग व्यवस्था की जरूरत पड़ती थी।

यह सिस्टम दाखिल करने केलिए सिक्योरिटिज अॅन्ड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया ने १८ नवम्बर १९९६ को डॉ. एल.सी.गुप्ता की अध्यक्षता में २४ सभासदो की समिती की रचना की।

इस समिती को भारतीय डेरिवेटिव्हस के ट्रेडिंग पर नियंत्रण रखने के लिए योग्य रचना विकसीत करने का कार्य सौपा गया था।

१७ मार्च १९९८ को इस समिती ने अपनी रिपोर्ट पेश की। उस रिपोर्ट में भारतीय शेअर बाजार में डेरिवेटिव्हस के सौदे दाखिल करने से पूर्व उन पर कई शर्ते लागू करने की सुचना समिती ने दी थी।

इस समिती ने किए सुचना में डेरिवेटिव्हस को सिक्योरिटी की तरह जाहिर करके देने के विषय का समावेष था। उसके लिए सिक्योरिटिस के लेन देन में लागू होनेवाले नियम डेरिवेटिव्हस के व्यवहार को भी लागू किए जा सकते है।

उसी तरह भारतीय डेरिवेटीव्ह मार्केट में व्यवहार करते समय पैदा होनेवाले जोखिम को नियंत्रण में रखने केलिए कौनसी कार्यवाही करनी चाहिए इस पर भी मशवरा दे सके इसके लिए सेबी ने जून १९९८ में प्रो. जे.आर.वर्मा की अध्यक्षता में एक समिती की रचना की।

अक्तूबर १९९८ में फिर से किए गए रिपोर्ट में मार्जिन सिस्टम का अमल किस तरिके से किया जाए, आरंभीक मार्जिन किस तरह से चार्ज करनी चाहिए, ब्रोकर का नेटवर्थ कैसे निश्चित करना चाहिए, डिपोजिट की जरूरत कितने प्रमाण में है और व्यवहार हो रहे हो तब पूरे कार्य का नियमन किस तरह से करना चाहिए, इस विषय में मार्गदर्शन दिया गया था।

ऑप्शन के प्रतिबंध निकाल लेना (Withdrawal of Prohibition on Options):

१९६९ में कानून में सुधारणा करके सिक्योरिटीज ऑप्शन पर प्रतिबंध लागू किया गया था। उसके बाद सिक्योरिटीज कॉन्ट्रॅक्ट रेग्युलेशन अॅक्ट १९५६ के अंतर्गत ऑप्शन पर लागू किए प्रतिबंध १९९५ में हटा दिए गए।

भारत में डेरिवेटिव्हस व्यवहार का आरंभ (Arrival of Derivatives Trading in India):

दिसंबर १९९९ में सिक्योरिटीज कॉन्ट्रॅक्ट रेग्युलेशन अॅक्ट में सुधारणा करके सिक्योरिटीज के कार्यक्षेत्र में डेरिवेटिव्हस का समावेष किया गया। उसी के साथ डेरिवेटिव्हस के व्यवहार का नियमन करने के लिए समग्र रचना भी विकसीत की गई।

सिर्फ सरकार द्वारा मान्य एक्सचेंज में ही डेरिवेटिव्हस के कॉन्ट्रैक्ट का ट्रेडिंग होने पर उसे कानूनन माना जाएगा ऐसी स्पष्टता भी उसी के साथ कर दी गई।

इस पद्धती से सिर्फ ओव्हर द काऊन्टर डेरिवेटिव्हस का व्यापार करना लगभग अति आवश्यक बन गया था।

सिक्योरिटीज फॉरवर्ड ट्रेडिंग पर प्रतिबंध डालने वाले कानून के तीन दशक पुराने नोटिफिकेशन को भी मार्च २००० में सरकार ने रद्द किया था।

मई २००० में सेबी ने डेरिवेटिव्हस का व्यवहार करने की छूट दी। उसके बाद जून २००० में भारत में डेरिवेटिव्हस के व्यवहार का आरंभ हुआ था। सेबी ने मात्र दो ही शेअर बाजार में उनका व्यवहार करने की छूट दी।

सेबी की मान्यता मिले हए एन.एस.ई और बी.एस.ई में डेरिवेटिव्ह कॉन्ट्रॅक्ट का व्यवहार और उनके सेटलमेंट का कामकाज चालू हुआ था। उसी के साथ उसके क्लिअरिंग हाउस कॉर्पोरेशन का कामकाज भी शुरू हुआ था।

आरंभ में सेबी ने एस अॅन्ड पी सी.एन.एक्स और बी.एस.ई ३० सेन्सेक्स पर आधारीत इन्डेक्स फ्युचर्स के कॉन्ट्रैक्ट का व्यवहार करने की छूट दी थी।

समय के जाते इन दोनो इन्डेक्स पर आधारीत ऑप्शन्स में ट्रेडिंग करने की अनुमती भी मिली थी।उसी तरह व्यक्तिगत सिक्योरिटीज के ऑप्शन का ट्रेडिंग करने की मंजूरी भी मिली।

जून २००१ में इन्डेक्स के ऑप्शन में ट्रेडिंग चालू हुआ था और जुलाई २००१ में व्यक्तिगत सिक्योरिटी में ऑप्शन का टेड्रींग शुरू हो गया था। नवबंर २००१ में व्यक्तिगत शेअर्स में फ्युचर्स का कॉन्ट्रैक्ट शुरू किया गया।

किसी भी एक्सचेंज शेअर बाजार के नियम और नियंत्रण के आधिन रहकर डेरिवेटिव्ह कॉन्ट्रॅक्ट में ट्रेडिंग और सेटलमेंट किया जाता था।

उसके क्लिअरिंग हाउस कॉर्पोरेशन को भी सेबी के जरिए मान्यता मिली थी। ऑफिशिअल गेझेट में उस तरह से नोटीफिकेशन भी तैयार किया गया था।

एन.एस.ई की ट्रेडिंग सिस्टम (Trading Mechanisms at NSE):

एन.एस.ई में फ्युचर्स और ऑप्शन में ट्रेडिंग करने के लिए तैयार की गई ट्रेडिंग सिस्टम एनईएटी एफ अॅन्ड ओ (नीट फ्युचर्स अॅन्ड ऑप्शन्स) कहके पहचानी जाती है।

इस सिस्टम में निफ्टी फ्युचर्स और ऑप्शन साथ ही स्टॉक फ्युचर्स और ऑप्शन का कामकाज राष्ट्रीय स्तर पर एक साथ कर सके इसके लिए पूरी तरह स्वयंसंचलित स्क्रीन पर आधारीत ट्रेडिंग सिस्टम की व्यवस्था की गई है।

इस पुरे कार्य के ऑनलाईन मोनिटरींग नियमन का सर्वेक्षण हो सके ऐसी यंत्रणा भी खडी कर दी गई है। यह सिस्टम अनामी ऑर्डर पर आधारीत मार्केट को सपोर्ट करने की क्षमता रखती है।

इस सिस्टम के ट्रेडिंग के कामकाज में संपूर्ण पारदर्शकता है। प्राइस टाईम प्राथमिकता के सख्ती के नियमों के अनुसार ही यह समग्र सिस्टम चलती है। नकद बाजार के विभाग में इक्विटी के होनेवाले व्यवहार जैसी ही यह सिस्टम है।

ट्रेडिंग मेंबर्स भी ऑर्डर की एन्ट्री करने के लिए ऑर्डर का मेचिंग करने के लिए और ऑर्डर देने के लिए ट्रेड के मॅनेजमेंट के कार्य को देख सकते है।

बी.एस.ई का ट्रेडिंग सिस्टम (Trading Mechanisms at BSE):

बी.एस.ई में डेरिवेटिव्ह का व्यवहार पूरी तरह स्वयंसंचलित स्क्रीन पर आधारीत ट्रेडिंग के प्लेटफॉर्म के जरिए होता है। इस सिस्टम को डेरिवेटिव्ह ट्रेडिंग अॅन्ड सेटलमेंट सिस्टम (डी.टी.एस.एस) के संक्षिप्त नाम से पहचाना जाता है।

डीटीएसएस का डीझाईन इस तरह से तैयार किया गया है कि बाजार में व्यवहार चालू होगा, उसी कालावधी में उसके सभासद व्यवहार कर सकते है।

साथ ही किसी भी सभासद द्वारा शेअर्स बेचने के लिए रखे गए हो तो उस कीमत से और उस संख्या में शेअर्स खरीदने के लिए तैयार सभासद से सौदे का मेचिंग भी यहा करके दिया जाता है।

डीटीएसएस की सिस्टम बाजार के व्यवहार में हिस्सा लेनेवाले उनके सभासद की तरह अलग अलग प्रकार के कई रिपोर्ट तैयार करने की क्षमता रखते है।

टर्नओवर (Turnover):

जुन २००० में इंडेक्स फ्युचर्स से डेरिवेटिव्हस ट्रेडिंग का आंरभ किया गया था। तब से अब तक एन.एस.ई के डेरिवेटिव्ह मार्केट में ट्रेडिंग व्हॉल्यूम में एक स्थिर वृद्धि देखी गई है।

फ़िलहाल एन.एस.ई के डेरिवेटिव्ह मार्केट के ट्रेडिंग का औसतन दैनिक कारोबार कुछ हजार करोड़ रुपए से अधिक है।

१९ अक्टूबर २००७ को एन.एस.ई के फ्युचर्स और ऑप्शन सेगमेंट में १,१०,५६४ करोड़ रुपए का कारोबार दर्ज किया और अपने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड दिए।

।। धन्यवाद ।।

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श्रेणी: Share Market

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फ्युचर्स का परीचय - Introduction To Futures In Hindi. · नवम्बर 29, 2020 पर 8:59 अपराह्न

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