क्या आपको पता है की प्रायमरी मार्केट क्या है? – Primary Market in Hindi अगर आपको पता नहीं है तो आप इस ब्लॉग को पूरा पढ़े.

प्रायमरी मार्केट क्या है? – Primary Market in Hindi

प्रायमरी मार्केट एक ऐसा स्थान है, जहाँ पर इनिशिअल पब्लिक ऑफर (आई.पी.ओ) के माध्यम से नई सिक्योरिटीज की बिक्री की जाती है।

दुसरे शब्दों में कहना हो तो प्रायमरी मार्केट नए सिक्योरिटीज की बिक्री के लिए मार्ग उपलब्ध कराता है। राज्य और केंद्र सरकार की कंपनीयों और कुछ प्रायव्हेट कंपनीयों के जरिए नई सिक्योरिटी इश्यु की जाती है।

इस बाज़ार में नई सिक्योरिटीज, सरकारी बॉन्ड्स, कॉर्पोरेट बॉन्ड्स, आदि का वितरण होता है और इसके जरिए कंपनीयों को पूंजी जुटाने का अवसर मिलता है।

वर्तमान की गतिशील और प्रगतिशील अर्थव्यवस्था में देश का आर्थिक विकास शीघ्रता से करने के लिए शेअर बाज़ार को जरूरी प्रोत्साहन देना आवश्यक है और शेअर बाज़ार को अॅक्टीव रखने के लिए नई सिक्योरिटीज का आना जरूरी है। वह इस प्रायमरी मार्केट के जरिए आ सकते है।

शेअर की मूल कीमत (Face Value of a Share):

फेस वैल्यू यानी अंकित मूल्य, शेअर की वास्तविक या मूल कीमत होती है।

मान लीजिए कि एक नई कंपनी अथवा पुरानी प्रस्थापित कंपनी का आगामी वितरण २ करोड़ रूपयों का है और उसके एक शेअर की मूल कीमत रू.१० है, तो उस हिसाब से कंपनी के २ करोड़ के शेअर कॅपीटल का २० लाख शेअर्स में वितरण होगा।

यह २० लाख शेअर्स प्रमोटर और जनता के पास होते है। वह फेस वैल्यू जनता को आई.पी.ओ द्वारा बताई जाती है।

आज के जमाने में दर्शनी कीमत सामान्यत: रू. १, ५ या १० रहती है। मगर इससे पूर्व दर्शनी कीमत साधारणत: रू.१०० तक रहती थी।

प्रीमियम और डिसकाउन्ट (Premium & Discount):

प्रायमरी मार्केट में जब कॉर्पोरेट कंपनीयाँ फेस वैल्यू से अधिक भाव पर सिक्योरिटीज इश्यु करते है तो उसे प्रीमियम भाव पर सिक्योरिटीज इश्यु करना कहते है और जब कॉर्पोरेट कंपनीयाँ फेस वैल्यू से कम भाव पर सिक्योरिटीज इश्यु करते है तो उसे डिसकाउन्ट भाव पर सिक्योरिटीज इश्यु करना कहते है।

कंपनी जनता में शेअर वन्यो वितरीत करती है (Why do Companies need to Issue Shares to the Public):

सामान्यरूप से प्रमोटर्स, प्राईवेट लिमिटेड कंपनी बनाकर कामकाज चालू करके बैक और फाईनानशियल कंपनी से पैसा उधार लेते है। अगर उनका कामकाज बढ़ता है तो उन्हें ज्यादा लागत की जरूरत पड़ती है तब वह सेबी की अनुमती लेकर आई.पी.ओ द्वारा जनता से पूंजी जमा करते है।

विविध प्रकार के वितरण (Different kinds of Issues):

  1. इनिशियल पब्लिक ऑफर (आई.पी.ओ)
  2. लिस्टेड कंपनी का पब्लिक इश्यु
  3. राईट इश्यु
  4. प्रेफन्शीयल इश्यु

१. इनिशियल पब्लिक ऑफर (Initial Public Offer):

जब एक अनलिस्टेड कंपनी पहले खुले आम शेअर बेचने के लिए लाती है, उसे आई.पी.ओ (IPO) कहते है। प्रायमरी मार्केट में शेअर का वितरण करने के लिए सेबी की अनुमती लेना आवश्यक है।

२. लिस्टेड कंपनी का पब्लिक इश्यु (Public Issue By Listed Company):

जिस कंपनी के कामकाज का विस्तार बढ़ता है, और विकास के लिए ज्यादा पूंजी की जरूरत होती है, तब सेबी की अनुमती लेकर वह कंपनी जनता में शेअर्स का वितरण कर सकती है।

३. राईट इश्यु (Right Issue):

जब जब लिस्टेड कंपनियों को अपने कारोबारी विस्तार या नए प्रोजेक्ट्स के लिए अतिरिक्त पूंजी जुटाने की जरूरत पड़ती है तब वो राईट इश्यु के माध्यम से अपने शेअरधारकों को अतिरिक्त इक्विटी शेअर जारी करती हैं। यह राइट शेअर, शेअरधारकों के पास मौजूद इक्विटी शेअर्स के अनुपात में जारी किए जाते हैं।

कंपनी के व्यवस्थापक हर शेअर होल्डर को नोटीस भेजते है। यह नोटीस भेजने के बाद १५ दिन का समय शेअर होल्डर को दिया जाता है जिसमे उन्हें शेअर लेना है या नहीं यह तय करना पड़ता है।

जब राइट शेअर अंकित मूल्य पर जारी किए जाते हैं, तो उन्हें ‘राइट शेअर एट पार’ कहा जाता है। लेकिन यदि शेअर अधिक मूल्य पर जारी किए जाते हैं, तो उन्हें ‘प्रीमियम’ पर जारी राइट शेअर कहा जाता है।

शेअर के अंकित मूल्य से अधिक जो भी राशि शेअर के लिए ली जाती है उसे प्रीमियम कहा जाता है। अधिकतर कंपनियाँ अपने राइट शेअर वर्तमान बाज़ार मूल्य से कम मूल्य पर जारी करती है जिससे कि शेअर धारक खुशी-खुशी राइट शेअर ले लें।

४. प्रेफरनशियल इश्यु (Preferential Issue):

प्रेफरनशियल शेअर धारक इक्विटी शेअर धारक से अधिक सुरक्षित होते हैं क्योंकि अगर कंपनी दिवालिया होने के कगार पर हो, तो इस प्रकार के धारकों को पूंजी चुकाने के मामले में साधारण शेअर धारक के मुकाबले अधिक प्राथमिकता दी जाती है।

प्रेफरनशियल शेअर धारकों को हर साल पूर्व निर्धारित दर से डिविडेंड दिया जाता है। प्रेफरनशियल शेअर धारकों को डिविडेंड का भुगतान इक्विटी शेअर धारकों से पहले किया जाता है।

यह शेअर सिर्फ लिस्टेड कंपनी कंपनियाँ वितरीत कर सकती है। किसी कंपनी को अपनी पूंजी बढ़ानी है तो वह प्रेफरनशियल इश्यु की सहायता लेती है। प्रेफरनशियल इश्यु द्वारा पैसे जल्दी जमा होते है।

कंपनियाँ ऐसे प्रेफरनशियल शेअर सिर्फ प्रमोटर और अपने मित्रों इत्यादि को देते है। कभी कभी कंपनी को डर होता है कि कही उनकी कंपनी हथियाली न जाए तब वो सेबी से अनुमती लेकर प्रेफरनशियल शेअर इश्यु करते है।

साधारण जनता के वितरण का आगामी इश्यु (Normal Public Issue and Book Building Process):

साधारण जनता के वितरण के आगामी इश्यु के शेअर की बिक्री साधारण हिसाब से होती है, और इस इश्यु में भाव पहले से ही तय होता है।

जब वितरण के आगामी इश्यु द्वारा आने वाले इश्यु में कंपनी फ्लोअर प्राईज अथवा बैंक प्राईज देती है। इस इश्यु में निवेशक को की हुई खरीदी का भाव पता नहीं होता सिर्फ भाव का अंदाजा पता होता है।

बुक बिल्डींग प्रोसेस में निवेशक फ्रोल प्राईज अथवा उनके ऊपर बोली लगा सकते है। शेअर का भाव बुक बिल्डींग प्रोसेस पूरा होने के बाद तय होता है।

बुक बिल्डींग प्रोसेस में निवेश किए शेअर की डिमांड की (बोली) जानकारी हररोज मिलती है। साधारण पब्लिक इश्यु में इश्यु की तारीख समाप्त होने पर थोड़े दिन बाद डिमांड की जानकारी मिलती है।

इश्यु प्राईज (Issue Price):

जब कंपनी द्वारा शेअर वितरीत होते है, उस भाव को इश्यु प्राईज कहते है। लिस्ट होने पर उनका भाव उतनाही रहता है या कम होता है, उसे बाज़ार भाव कहते है।

कट ऑफ प्राईज (Cut of Price):

बुक बिल्डींग प्रोसेस में कंपनी जब इश्यु लाती है, तब उन्हें प्रोसपेक्ट में बेन्ड देना पड़ता है, इसीलिए इश्यु की कम से कम प्राईज और ज्यादा से ज्यादा प्राईज होने को प्राईज बेन्ड कहते है। उनमें जो भावा तय होता है उसे कट ऑफ प्राईज कहते है।

दुसरे शब्दों में उसे इश्यु प्राईज प्रमोटर और लिड मॅनेजर कहते है। बुक बिल्डींग प्रोसेस होने के बाद निवेश की मांग (Demand) तय करते है।

फ्लोर प्राईज या लघुत्तम भाव (Floor Price) :

बुक बिल्डींग प्रोसेस में निवेशक कम से कम भाव में जो बोली लगाते है उसे फ्लोर प्राईज कहते है।

प्राईज बेन्ड (Price Band):

प्रोसपेक्टस में फ्लोर प्राईज को या ज्यादा से ज्यादा बोली के भाव को प्राईज बेन्ड कहते है। निवेशक उनके प्राईज बेन्ड में ही बोली लगा सकते है। इसमें ऊपर और नीचे के भाव में ज्यादा से ज्यादा २०% का फासला हो सकता है।

प्रोसपेक्टस (Prospectus):

जब कोई कंपनी बाज़ार में इश्यु लाती है, तो उसे जनता में एक प्रोसपेक्टस जारी करना होता है। यह एक प्रकार का कानूनी दस्तावेज होता है जो सेबी द्वारा मंजूर किया होता है।

  • प्रोसपेक्टस में कंपनी के बारे में जरूरी जानकारी दी जाती है।
  • संस्थापक की पूरी जानकारी प्रोसपेक्टस में दी जाती है।
  • कंपनी जिस वस्तु का उत्पादन करती है उसकी भविष्य में भारतीय बाज़ार में अथवा विदेशी बाज़ार में होने वाली बिक्री की जानकारी।
  • कंपनी के कच्चे माल की प्राप्ती, भौगोलिक विस्तार, बिजली वैसे ही वर्तमान उत्पादन शक्ति और भविष्य के उत्पादन की जानकारी दी जाती है।
  • सरकारी आयकर विभाग से उद्योग को किस तरह छूट मिलती है इसकी जानकारी मिलती है।
  • वर्तमान का विदेशी सहयोग अथवा भविष्य के विदेशी सहयोग की संभावना इत्यादि की जानकारी दी जाती है।

ऊपर के मसले को देखकर कंपनी के सुक्ष्म जानकारी का अभ्यास करके कंपनी उत्पादन क्षेत्र कैसे चलाता है, यह देखते है। साधारणरूप से सभी कंपनीयाँ प्रोसपेक्टस में कंपनी की अच्छी प्रतिभा दिखाती है। हमें अवलोकन करके उस कंपनी के शेअर खरीदने चाहिए।

प्रोस्सपेक्टस में गलत अथवा झूटी जानकारी दी तो वह कानूनन जूर्म होता है। और अगर प्रमोटर ने अदालत के सामने गलत जानकारी दी तो उस पर जनता मुकदमा चला सकती है।

शेअर का बटवारा अथवा उनके वापसी की (Refund) जानकारी किस CRE Mit Flig (How to know about Allotment of Shares or Refund):

सेबी गाइड लाइन के तहत शेअर का बटवारा इश्यु की गई तारीख पर बंद होने के बाद १५ दिनों में होना चाहिए और उसकी रक्कम डीमेट खाते में जमा होनी चाहिए। बटवारा न होने पर उनकी १५ दिनों में इश्यु न होने का मुआवजा निवेशक को मिलना चाहिए।

शेयर की लिस्टींग (Listing of Shares):

आई.पी.ओ आने पर उसकी लिस्टींग तारीख विज्ञापन द्वारा प्रसिद्ध होती है। आई.पी.ओ जब कंपनी इश्य करती है तब स्टॉक मार्केट के जरीए जिस दिन से उसका बाज़ार में लेन देन शुरू होता है उसे लिस्टिंग कहते है।

उस दिन से कंपनी प्रायमरी मार्केट से सेकंडरी मार्केट में प्रवेश करती है। उस कंपनी के स्क्रिप्ट के भाव मार्केट की जरूरत के अनुसार और साथ ही बाहरी घटकों के परिणाम से कम ज्यादा होते है।

शेअर्स की लिस्टींग करने का समय बंधन (Time Period for Listing of Shares):

साधारण रूप से बुक बिल्डींग प्रोसेस अथवा साधारण तरीके का ईश्य बंद होने की तारीख के दो सप्ताह के अंदर शेअर का लिस्टींग होना चाहिए।

फोरेन कॅपिटल ईश्युअन्स (Foreign Capital Issuance):

भारतीय कंपनियों को दो मुख्य संसाधनों के माध्यम से विदेशी पूंजी जुटाने की अनुमति सरकार ने दी है।

कंपनी फॉरेन करन्सी में कनव्हरटेबल बॉन्ड ईश्यु (Convertable Bond Issue) कर सकती है जिसे यूरो ईश्यु (Euro Issue) कहते है। कंपनी साधारण शेअर डिपॉजिटरी द्वारा ईश्यु कर सकती है, जैसे कि अमेरिकन डिपॉजिटरी रिसिप्ट (ओ.डी.आर) और ग्लोबल डिपॉजिटरी रिसिप्ट (जी.डी.आर)।

ओ.डी.आर (ADR):

सामान्य रूप से शेअर फिजिकल सर्टिफीकेट में ही दर्शाए जाते है और वह निवेश करनेवाले के हक का सबूत होता है। उन्हें अमेरिकन डिपॉजिटरी शेअर्स (ओ.डी.एस) कहते है। यह ओ.डी.एस यूएस डॉलर में होते है और वह साधारणत: कस्टोडियन बैंक में जमा होते है।

उन्हें कंपनी के कॉर्पोरेट और इकोनॉमिक्स राइट उपलब्ध होते है। यह सब शर्ते ओ.डी.आर सर्टिफीकेट में दर्शाई जाती है।

हम आशा करते है की हमारी ये (प्रायमरी मार्केट क्या है? – Primary Market in Hindi) ब्लॉग पोस्ट आपको पसंद आयी होगी अगर आपको शेयर मार्किट से जुड़ा कोई भी सवाल है तो आप कृपया कमेंट में जरूर पूछे।

।। धन्यवाद ।।

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5 टिप्पणियाँ

Kishor Mehere · अप्रैल 9, 2021 पर 1:10 अपराह्न

Nice post

सेकंडरी मार्केट क्या है? - Secondary Market In Hindi · मार्च 9, 2021 पर 4:22 अपराह्न

[…] प्रायमरी मार्केट क्या है? – Primary Market in Hindi […]

डेब्ट इनवेस्टमेंट क्या है? - Debt Investment In Hindi · मार्च 10, 2021 पर 3:16 अपराह्न

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फन्डामेन्टल अ‍ॅनालिसीस क्या है और कैसे करें? - Fundamental Analysis In Hindi · मार्च 12, 2021 पर 4:43 अपराह्न

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मनी मार्केट और कॅपिटल मार्केट क्या होता है? - Money Market And Capital Market In Hindi · अप्रैल 15, 2021 पर 9:56 अपराह्न

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