इस Blog में आपको Securities क्या है और Securities के प्रकार कितने है (Types of Securities) की जानकारी हिंदी में मिल जाएगी।

Securities (प्रतिभूतियाँ) क्या हैं?

शेयर, शेयर के स्टॉक्स, शेयर सर्टिफिकेट, सरकारी, अर्द्ध-सरकारी व गैर-सरकारी बांड्स, डिबेंचर, म्यूचुअल फंड की यूनिट्स इत्यादि ऐसी कोई भी रसीद जिसका आर्थिक मूल्य होता है, वह सिक्यूरिटी

Securities (प्रतिभूति) कहलाता है। इसके अलावा ऐसा कोई भी दस्तावेज, जो सरकार के द्वारा प्रतिभूति के रूप में अनुमोदित हो।

कुछ Securities (सिक्यूरिटीज), जिनमें आप Invest (इनवेस्ट) कर सकते हैं-शेयर, सरकारी प्रतिभूतियाँ (गवर्नमेंट सिक्यूरिटीज), डेरिवेटिव प्रोडक्ट, म्यूचुअल फंड की यूनिटस इत्यादि।

सिक्योरिटीज कॉन्ट्रॅक्ट रेग्युलेशन Act १९५६ में सिक्योरिटीज’ को परिभाषित किया गया है। इस में शेअर्स, बाँड, स्क्रिप्ट अथवा उसी तरह की किसी भी कंपनी अथवा कॉर्पोरेट संस्था या सरकार द्वारा इश्यु किए और बाज़ार में बेचे जा सके ऐसे अन्य सिक्योरिटीज का समावेश किया जाता है।

Types of Securities (Securities के प्रकार कितने है) :-

  1. Shares (शेअर्स)
  2. Government Securities (सरकारी सिक्योरिटी)
  3. Derivative Products (डेरिवेटिव्हज प्रोडक्ट)
  4. Mutual fund Units (म्युच्युअल फंड युनिट)

Shares (शेअर्स) :-

वित्तीय भाषा में, अंश अथवा शेअर का अर्थ किसी कम्पनी में भाग या हिस्सा होता है। एक कंपनी के कुल मालिकी (ownership) को लाखों करोड़ों टुकड़ों में बाँट दिया जाता है।

मालिकी का हर एक टुकड़ा एक शेअर होता है। यह शेअर जिसके नाम पर होते है उन्हे Share Holder (शेअर होल्डर) कहा जाता है।

वह कंपनी के भागिदार है ऐसा हम कहते है। जिसके पास जितने ज्यादा शेअर होंगे, कंपनी में उसकी हिस्सेदारी उतनी ही ज्यादा होगी।

कंपनी के Share Holder (शेअर होल्डर) को मतदान करने का अधिकार होता है। हम इनिशियल पब्लिक ऑफर (आई.पी.ओ) अथवा शेअर बाज़ार (स्टॉक एक्सचेंज) से शेअर्स खरीद सकते हैं।

कुछ साल पहले तक जब हम शेअर्स खरीदते थे तब हमें शेअर सर्टीफिकेट अपने नाम पर मिलते थे।

मगर आज के कम्प्युटर युग में फिजीकल सर्टीफिकेट| के बदले शेअर्स सिधे डिमेट (DEMAT) खाते में जमा होते है। अगले पाठ में हम Demat (डिमेट) पर चर्चा करेंगे।

हमें Share (शेअर), Equity (इक्विटी) अथवा Stock (स्टॉक) यह तीनों अलग अलग संज्ञा लगती है पर यह सब एक ही है।

कंपनी Share (शेअर) का लागत के प्रमाण के अनुसार वितरण करती है। समझ लीजिए की एक कंपनी को दो करोड़ रूपयों की Equity (इक्विटी) लागत जमा करनी है।

उनके एक Equity Share (इक्विटी शेअर) की दर्शनी किंमत (Face Value) दस रूपए है। इसके अनुसार लागत के २० लाख हिस्से किए जाते है।

कुल Shares (शेअर्स) के कुछ प्रतिशत शेअर व्यवस्थापक खरीद लेते है और बाकी Shares Retail Investors (शेअर्स खुदरा निवेशक), Financial Institutions (फायनानशियल इन्स्टीटयुशन), आदि को खरीदने देते है।

इस तरह जैसे पहले बताया गया है, Share Holder (शेअर होल्डर) कंपनी में भागिदार होते है और उन्हें सब फायदे मिलते है।

इसी प्रकार कोई भी करार पास करना हो तो कंपनी के उच्च अधिकारीओं के बराबर उनको भी अपना अभिप्राय देने का हक होता है।

दुसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि सभी मामलों में कंपनी को मंजूरी लेने के लिए बहुमत चाहिए।

अगर Share Holder (शेअर होल्डर) खुद वोट देने के लिए नहीं जा सका तो वह खुद का वोट प्रॉक्सी (Proxy) द्वारा भेज सकते है।

Government Securities (सरकारी सिक्योरिटी) :-

यदि आप जोखिम लेने से डरते हैं और सुरक्षा आपकी प्राथमिकता है तो आपके लिए सरकारी प्रतिभूतियाँ Government Securities (सरकारी प्रतिभूतियाँ) में निवेश का विकल्प बेहतर है

क्योंकि संपत्ति के इस वर्ग में आपको तरलता liquidity (लिक्विडिटी) का लाभ और अच्छा रिटर्न भी मिलता है।

जानिए Government Securities (सरकारी प्रतिभूतियाँ) में Invest (निवेश) संबंधी जानकारी।

Invest (निवेश) का तरीका-जिस तरह Share Market (शेयर बाजार) में Invest (निवेश) के लिए Demat Account (डीमैट खाता) जरूरी है

वैसे ही इन Securities (प्रतिभूतियों) में निवेश करने के लिए भी यह आवश्यक है। अलबत्ता आपको सरकारी प्रतिभूतियों को खरीदने व बेचने के लिए अलग से डी-मैट खाते की जरूरत नहीं होती।

Government Securities (सरकारी प्रतिभूतियाँ) Primary Market (प्राथमिक बाजार) या Secondary Market (सेकंडरी मार्केट) से खरीद सकते हैं।

Secondary Market (सेकंडरी मार्केट) में आप बैंकों, डीलरों या ब्रोकरों द्वारा भी इन्हें खरीद सकते हैं। यदि फंड के जरिए सरकारी प्रतिभूति में Invest (निवेश) करना चाहते हैं

तो गिल्ट फंड के द्वारा ऐसा किया जा सकता है; क्योंकि गिल्ट फंड में निवेशकों का पैसा सरकारी प्रतिभूतियों में ही निवेशित किया जाता है।

Government Securities (सरकारी प्रतिभूतियाँ) ‘जी-सेक’ और ‘सॉवरेन डेट’ के नाम से भी प्रचलित हैं।

इन्हें निश्चित आय Fixed income (फिक्स्ड इनकम) वाले विकल्पों में सुरक्षित माना जाता है, क्योंकि इसकी गारंटी सरकारी देती है।

Investors (निवेशक) बाजार से जुड़ी ब्याज दरों पर कभी भी इस Invest (निवेश) में प्रवेश कर सकता है और बाहर निकल सकता है।

एक तो इसमें रिटर्न के स्रोत पर कर-कटौती नहीं की जाती, दूसरा 80-एल के तहत भी इसमें कर-लाभ का प्रावधान है। Investors (निवेशक) बैंक से कर्ज लेते वक्त ‘जी-सेक’ को गिरवी भी रख सकता है।

जी-सेक’ बॉण्ड की तरह ही होता है।

जिस तरह सभी Bond Secondary Market (बॉण्ड सेकंडरी मार्केट) में इनकी कीमत परिपक्वता Maturity (मैच्योरिटी) की अवधि और मौजूदा ब्याज दरों पर आधारित हैं, ठीक वैसा ही इनके साथ भी है।

इसलिए Investors (निवेशक) अपनी नकदी की जरूरत के अनुसार परिपक्व होनेवाली Securities (प्रतिभूतियों) में Invest (निवेश) करें।

जी-सेक 3 महीने से लेकर 30 वर्ष की अवधि के लिए उपलब्ध होती है। यदि भारतीय रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कटौती व बढ़ोतरी करता है तो वह जी-सेक से मिलनेवाले रिटर्न को प्रभावित करती है।

Types Of Government Securities (सरकारी प्रतिभूतियों के प्रकार) :-

Zero Coupon Bond (जीरो कूपन बॉण्ड)-चूँकि इन पर ब्याज नहीं मिलता है, इसलिए यह फेस वैल्यू में बड़े डिस्काउंट पर जारी किए जाते हैं और निवेशक जब इसे भुनाना चाहे तो ‘एट पार’ (सम-मूल्य) पर इसे भुना सकता है।

Floating rate bond (फ्लोटिंग रेट बॉण्ड)-हालाँकि इनमें ब्याज दर में मामूली बदलाव हो सकता है, लेकिन इनकी न्यूनतम और अधिकतम ब्याज दर की सीमा तय होती है।

Dated securities (डेटेड सिक्योरिटीज)-इनमें भी निश्चित ब्याज दर और परिपक्वता की अवधि पहले से तय रहती है।

Capital Index Fund Bond (कैपिटल इंडेक्स फंड बॉण्ड)–यहाँ ब्याज की दर थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर निश्चित होती है।

Derivative Products (डेरिवेटिव्हज प्रोडक्ट) :-

Derivative ‘डेरिवेटिव’ सौदों का वह प्रकार है, जिनकी अपनी स्वतंत्र कीमत नहीं होती, अपितु इनकी कीमत इन सौदों के तहत Securities (सिक्यूरिटीज), Commodity (कॉमोडिटी), बुलियन (सोनाचाँदी),Currency (करेंसी) इत्यादि में निहित होती है।

Stock Exchange (स्टॉक एक्सचेंज) में दो प्रकार के Derivative Products (डेरिवेटिव प्रोडक्ट) की Treading (ट्रेडिंग) होती हैये हैं फ्यूचर एंड ऑप्शन।

  • Future (फ्यूचर)
  • Option (ऑप्शन)

Mutual fund Units (म्युच्युअल फंड युनिट) :-

Mutual fund (म्युच्युअल फंड) एक ट्रस्ट है, यह ट्रस्ट चॅरिटी कमिशन ऑफ ट्रस्ट के पास रजिस्टर होती है। यह संस्था लोगों से रूपए जमा करके अलग अलग Securities (सिक्योरिटी) में उन रूपयों का Invest (निवेश) करते है।

Invest (निवेश) उस स्किम के उद्देश के जैसा होता है।

दुसरे शब्दों में कहा जाए तो Mutual (म्युच्युअल) मतलब सामान्य लोगों की लागत एकत्रित करना और उसका Invest (निवेश) करने का जरीया है।

Share/Equity/Stock (शेयर/इक्विटी/स्टॉक) :-

आप शेयर को इक्विटी कहें या स्टॉक-सभी का अर्थ एक ही है। शेयर किसी कंपनी में स्वामित्व की सबसे छोटी इकाई है।

उदाहरण के तौर पर, यदि किसी कंपनी ने कुल एक लाख शेयर जारी किए तथा किसी व्यक्ति के पास उनमें से एक हजार शेयर हैं तो वह व्यक्ति उस कंपनी में 1 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखता है।

दूसरे शब्दों में, यह व्यक्ति उस कंपनी में 1 प्रतिशत का हिस्सेदार है तथा इसी अनुपात में कंपनी के नफे या नुकसान का भी भागीदार होगा।

Debt Instrument (डेब्ट इन्सटुमेंट) :-

एक व्यक्ति दुसरे व्यक्ति से ऋण लेते है और वह समय पर ब्याज देने के लिए कुछ शर्ते रखते है। उन्हें Debt Instrument (डेब्ट इन्सटुमेंट) कहते है।

जब Central & State Government (सेंट्रल और स्टेट गव्हरमेंट) Market (मार्केट) में से ब्याज पर पैसा लेते है तब इंडियन Securities Market (सिक्योरिटीज मार्केट) की परिभाषा में उसे Bond (बॉन्ड) कहते है, और Private Corporate (प्राईवेट कॉरपोरेट) सेक्टर में उसे Debenture (डिबेंचर) कहते है।

इस डेब्ट इंस्ट्रमेंट के दस्तावेज में कर्ज की न्यूनतम इकाइयाँ, अवधि, ब्याज दर तथा पुनर्भुगतान का तरीका वर्णित होता है।

Debt v/s Equity (डेब्ट और शेअर के बीच का फर्क) :-

  • Debt Investors (डेब्ट निवेशक) को जो ब्याज मिलता है, वह Tax Deductable Expense (टेक्स डिडक्टेबल खर्चे) के अंतर्गत आता है और Share Holder (शेअर होल्डर) को जो Dividend (डिविडंड) मिलता है वह कंपनी का टेक्स भूगतान करने के बाद बचे हुए मुनाफे में से मिलता है।
  • Debt (डेब्ट) को समय का बंधन है पर Shares (शेअर्स) को समय का बंधन नहीं है।
  • Equity Investors (इक्विटी निवेशकों) के पास कंपनी के सभी कार्यों पर नियंत्रण रखने का अधिकार होता है पर Debt Investors (डेब्ट निवेशकों) के पास कंपनी के कार्यों पर नियंत्रण रखन का अधिकार नहीं होता है और वह कंपनी में निष्क्रिय भमिका निभाते है।
  • Debt Investors (डेब्ट निवेशकों) को Invest (निवेश) की हुई मुदल और ब्याज एक निर्धारीत समय के बाद वापस मिलती है। कंपनी की सभी जिम्मेदारियाँ और खर्च पूरे करने के बाद बची हुए रकम (कुल नफा) में से हर शेअर धारक को, कंपनी में उसकी प्रतिशत भागीदारी के अनुसार Dividend (डिविडंड) (लाभांश) मिलता है।

Debenture (डिबेंचर) :-

यह एक तरह का बांड होता है तथा इसे ‘उधारी की सबसे छोटी इकाई’ कहा जा सकता है।

Debenture (डिबेंचर) खरीदनेवाले को कंपनी एक निश्चित समय के लिए निश्चित ब्याज दर पर Debenture Certificate (डिबेंचर सर्टिफिकेट) जारी करती है।

इस निश्चित समयावधि के बाद Debenture holder (डिबेंचर धारक) को मूल धन ब्याज सहित प्राप्त होता है। इस अवधि के दौरान कंपनी के नफे-नुकसान से यह Debenture holder (डिबेंचर धारक) अप्रभावित रहता है।

Call/Put/Option/Bond (कॉल/पुट/ऑप्शन/बॉण्ड) :-

यहाँ Investors (निवेशक) के पास इस बात की आजादी होती है कि वह सरकार को Bond (बॉण्ड) बेच भी सकता है और वापस खरीद भी सकता है। इतना ही नहीं, खरीद या बिक्री रिडेपशन से पहले भी की जा सकती है।

।। धन्यवाद् ।।

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Categories: Share Market

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