शेयर बाज़ार का मूल ज्ञान – Share Market Basics in Hindi

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शेयर बाजार में निवेश करने से पहले आपको (शेयर बाज़ार का मूल ज्ञान – Share Market Basics in Hindi) होना बहुत जरुरी है

आर्थिक बाज़ार क्या है? – What is Financial Markets in Hindi

आर्थिक बाज़ार लोगों को शेअर्स, बॉन्ड आदि में निवेश करने की सुविधा देते है। आर्थिक बाज़ार को प्रमुख रूप से दो प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है। वह है नकद बाज़ार (मनी मार्केट) और पूंजी बाज़ार (कॅपिटल मार्केट)।

नकद बाज़ार – मनी मार्केट क्या है? – What is Money Market in Hindi

मनी मार्केट प्रमुख रूप से डेब्ट सिक्युरिटी, जैसे कि ट्रेजरी बिल आदि के साथ संबंधित होता है। उसमें कम समयवाले डेब्ट ईन्स्ट्रमेन्ट का ट्रेडिंग होता है।

कॅपिटल मार्केट/शेयर बाज़ार क्या है? (Capital Market/Share Market)

कॅपिटल मार्केट में शेअर्स और दीर्घ समयवाले डेब्ट ईन्स्ट्रमेन्ट का ट्रेडिंग होता है। उसमें डेब्ट और शेअर्स ईन दोनों का ट्रेडिंग किया जाता है।

कॅपिटल मार्केट को और भी दो प्रकार के बाज़ार में विभाजीत किया जा सकता है।

  • प्राईमरी मार्केट
  • सेकेन्डरी मार्केट

प्राईमरी मार्केट में कंपनी स्वयं के शेअर्स लोगों को निवेश करने के लिए पहली बार ऑफर करती है। यह एक ऐसा माध्यम है कि जिसकी मदद से

औद्योगिक क्षेत्र की संस्थाए या कंपनियों उनकी योजनाओं के विस्तार के लिए जरूरी रकम जमा करते है। सेकेन्डरी मार्केट में लिस्ट हुए शेअर्स का ट्रेडिंग किया जाता है।

इसके द्वारा लोगों को एक ऐसा प्लॅटफॉर्म मिलता है जहा पर वह शेअर्स, डेब्ट, डिबेन्चर आदि का लेन-देन करके ट्रेडिंग कर सकते है।

आज की औद्योगिक संस्थाओं के लिए यह एक ऊत्तम मिडियम बना है। जरूरी रकम जमा करने और निवेशकों को अच्छी और फायदेमंद कंपनियों में निवेश करने का मौका मिलता है।

भारत में बहुत से क्षेत्रीय शेअर बाज़ारों के एक्सचेन्ज उपलब्ध है जिनमें कंपनियों के शेअर्स का ट्रेडिंग किया जाता है। पर ईनमें बताने लायक प्रमुख दो ही एक्सचेन्ज है, जिनमें ज्यादातर शेअर्स का अच्छे व्हॉल्युम के साथ ट्रेडिंग होता है।

बॉम्बे स्टॉक एक्सचेन्ज – बी.एस.ई (Bombay Stock Exchange – B.S.E):

  • यह सिर्फ भारत का ही नहीं बल्कि संपूर्ण एशिया का सबसे पुराना स्टॉक एक्सचेन्ज है।
  • भारत का यह पहला सरकारी अनुमती वाला एक्सचेन्ज है।
  • बी.एस.ई. में बोल्ट के आधार पर शेअर्स का ऑनलाईन ट्रेडिंग किया जाता है।
  • बी.एस.ई. ने भारत में ४०० से भी अधिक शहरों में अपनी सेवा शुरू की है।

नेशनल स्टॉक एक्सचेन्ज – एन.एस.ई (National Stock Exchange – N.S.E):

  • नेशनल स्टॉक एक्सचेन्ज (एन.एस.ई.) में अप्रेल १९९४ से होलसेल डेब्ट मार्केट में ट्रेडिंग शुरू हुआ और जून १९९४ में कॅपिटल मार्केट यानेकी शेअर्स का ट्रेडिंग शुरू हुआ।
  • तब से आजतक वह एक अच्छे व्हॉल्यूमवाला एक्सचेन्ज बना है।
  • उसने एनएससीसीएल (NSCCL) की रचना की है जो क्लीअरींग और सेटलमेन्ट का कार्य करती है।
  • एन.एस.ई. भारत में उसके टर्मिनल का अच्छा खासा नेटवर्क है।
  • एन.एस.ई. इंटरनेट पर भी ट्रेडिंग की सुविधा दी जाती है।

नोट (Note):

ब्रोकर को एक्सचेन्ज का सभासद होना पड़ता है, जिस से निवेशक उनकी मदद से बाज़ार में ट्रेडिंग कर सकते है। फिलहाल दोनों बाज़ार में ट्रेडिंग का समय सुबह ९:०० से दोपहर ३:३० के बिच का है।

शेअर बाज़ार में ईन्डेक्स क्या है? – What is Index in Hindi

(एन.एस.ई.) और (बी.एस.ई.) में लिस्ट हुई हाई लिक्वीडीटी (नगद) वाली कंपनियों के आधार पर उसकी रचना की जाती है।

वहा प्रमुख रूप से दो ईन्डेक्स की चर्चा की जाती है सेन्सेक्स और निफ्टी के सेक्टर पर आधारित कई और भी ईन्डेक्स उपलब्ध है।

सेन्सेक्स क्या है?What is Sensex in Hindi

बी.एस.ई. पर आधारित ईन्डेक्स को “सेन्सेक्स’ कहा जाता है। उसकी रचना सन १९८५ में हुई और उसकी गिणती मार्केट कॅपिटलायजेशन वेटेड तरीके से हुई।

बी.एस.ई. में विविध क्षेत्र पर प्रभुत्ववाले “३०” कंपनियों का समावेष किया गया है। बी.एस.ई. का सून १९७८-७९ बेस वर्ष माना जाता है। भारतीय अर्थतंत्र की स्थिति का चित्रण करने के लिए उसे बहुत ही महत्वपूर्ण समझा जाता है।

निफ्टिी क्या है? – What is Nifty in Hindi

एन.एस.ई. पर आधारित ईन्डेक्स को “निफ्टी’ कहा जाता है। एन.एस.ई. में २२ विविध क्षेत्रों में प्रभुत्ववाली “५०” कंपनियों का समावेष किया गया है।

उसकी रचना बी.एस.ई. से कुछ अलग है। सेन्सेक्स में फ्लोटिंग कॅपिटलायजेशन के आधार पर ईन्डेक्स की गणना की जाती है।

जिससे निफ्टी से एक कदम पिछे है और उसकी गणना उसमें के ५० शेअर्स के संपूर्ण कॅपिटलायजेशन से की जाती है।

उसकी रचना स्न १९९५ में हुई और उसका बेस स्तर १००० का माना जाता है। उसका उपयोग विविध कार्य जैसे कि फंड पोर्टफोलिओ, ईन्डेक्स पर आधारित डेरिवेटिव्हज और ईन्डेक्स फंड के बेन्च मार्किंग के लिए किया जाता है।

सेबी – सिक्योरिटीज अॅन्ड एक्सचेन्ज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI – Securities and Exchange Board of India):

  • सेबी की रचना अप्रेल १२, १९९२ में हुई। वह प्रमुखरूप से केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण की भूमिका निभाती है।
  • उसका मुख्य हेतू और कार्य नीचे की तरह है।
  • उसकी मूलभूत जिम्मेदारी निवेशकों के हितों का रक्षण करना यह है और बाज़ार में जरूरी कानून और नियमों का पालन हो रहा है या नहीं यह देखना है।
  • शेअर बाज़ार की प्रगती और उसके नियमों का पालन।
  • फ्युचर और ऑप्शन के बाज़ार का नियमन करना।
  • पोर्टफोलीओ मॅनेजमेन्ट के लिए जरूरी मार्गदर्शन करना।
  • शेअर बाज़ार और अन्य बाज़ार के साथ जुड़े हुए मध्यस्थ लोगों का मार्गदर्शन करना।
  • शेअर ट्रान्सफर एजन्ट और रजिस्ट्रार ईन्हे मार्गदर्शक सूचनाएं देना।
  • आयपीओ, म्युच्युअल फंड और डेब्ट ईन्स्टुमेन्ट के लिए योग्य सूचनाएं देना।
  • कंपनी टेकओवर के लिए जरूरी मार्गदर्शन करना।
  • ईन्साईडर ट्रेडिंग के लिए मार्गदर्शन करना।
  • औद्योगिक संस्थाओं के लिए आवश्यक आचार संहिता का पालन करना।
  • निवेशक ने यदी कोई फिर्याद की हो तो सेबी के समक्ष वह अपनी फिर्याद लिखित स्वरूप में पेश कर सकते।
  • इंटरनेट पर भी शिकायत की जा सकती है।
  • सेबी के वेबसाईट की लिंक है – http://www.sebi.gov.in

शेअर बाज़ार में कमाई करने के लिए उपलब्ध विकल्प – Options to Make Money in Share Market.

  • निवेश (डिलीवरी पर ट्रेडिंग)।
  • स्पेक्युलेशन (ईन्ट्राडे और डेरिवेटिव्ह पोजिशन)।
  • हेजिंग और आर्बिट्रेज।
  • मार्जिन फंडिंग।
  • डिविडन्ड की आय।

शेयर बाजार में निवेश कैसे करे? – How to Investment in Share Market in Hindi

जो लोग कुछ दिन या महिने या कुछ वर्ष शेअर्स वैसे ही रखने के लिए तैयार होते है उन्हे यह डिलीवरी लेनी पड़ती है। शेअर दलाल के पास से शेअर खरीदन के बाद वह शेअर उनके डिमेट अकाऊंन्ट में जमा होत है।

अब वह ईलेक्ट्रॉनिक स्वरूप में होते है और आपको उनका मासिक स्टेटमेन्ट या त्रैमासिक जो आपने निश्चत किया है उस प्रकार से मिलता है।

आपको अपने खाते में बचे बॅलेन्स शेअर्स की जानकारी दी जाती है। यह विकल्प उन लोगों के लिए होता है जिन्हें स्वयं के पास कितनी रकम है उसके प्रमाण में अच्छे शेअर्स खरीदकर रखने होते है।

आगे समझ सके उस तरह से डिलिवरी लेना नहीं भूलना चाहिए। हम कोई बीज बोते है और उसकी अच्छी देखभाल की तो आगे चलकर अच्छा फल मिलता है। ठिक वैसे ही शेअर्स के विषय में भी होता है।

जिस तरह से पेड़ पर लगे फल का उपयोग ठिक समय पर नहीं किया तो वो सड़ जाता है उसी तरह से हमें डिलीवरी में से मिलनेवाले फायदे को ठिक समय पर जमा कर लेना सिखना चाहिए।

डिलीवरी लिए हुए शेअर्स का योग्य ट्रेडिंग हुआ तो दिर्घ समय में अच्छा फायदा मिलने की संभावना होती है। जो माल घर में पड़ा है उसका ज्यादा फायदा लेने के लिए बी.टी.एस.टी. और एस.टी.बी.टी. का उपयोग किया जा सकता है।

शेयर बाजार में स्पेक्युलेशन क्या है? – What is Speculation in Share Market in Hindi

स्पेक्युलेशन इंट्राडे या डेरिवेटिव्ह पोजिशन लेकर किया जा सकता है।

डे ट्रेडिंग – इंट्राडे क्या है? – (Day Trading – Intraday)

इंट्राडे ट्रेडिंग में किसी भी दिन शेअर्स की लेन-देन करके फायदा या नुकसान बुक किया जाता है। उसमें डिलीवरी नहीं ली जाती।

इसका मुख्य हेतू दैनिक उतार-चढ़ाव का फायदा लेना होता है और यह कालावधी एक दिन के लिए ही सीमित हो तो उसे इंट्राडे कहा जाता है। सही अभ्यास और इंट्राडे चार्ट की मदद से ट्रेडिंग की गई तो फायदेमंद हो सकता है। बाकी कैसे भी आडधाड लेन-देन किया तो वह जुगार होता है।

इंट्राडे ट्रेडिंग में फायदा या नुकसान बाज़ार बंद होने से पहले ही बुक किया जाता है। नुकसान होता हो तो उस से बचने के लिए गिनती बिना डिलीवरी लेने की भूल नहीं करनी चाहिए। इस गलती के विषय में आगे विस्तार से चर्चा की है।

इंट्राडे नुकसान से बचने की गिनती से डिलीवरी कभी भी नहीं लेनी चाहिए। पर दुर्भाग्य यह है कि ज्यादातर लोग नुकसान होने पर उस से बचा जा सके इस विचार से डिलीवरी लेते है।

जो किसी भी हालत में फायदेमंद नहीं है। अपने पास के शेअर्स वैसे ही जमाकर रखना शक्य न हो तो आपको होनेवाला नुकसान बढ़ने की संभावना होती है।

डेरिवेटिव्ह स्पेक्युलेशन क्या है? – What is Derivatives Speculation in Hindi

डेरिवेटिव्ह एक ऐसा आर्थिक साधन है जो विविध आर्थिक साधन जैसे कि ईन्डिकेटर, ईन्डेक्स, कमोडिटी आदि के साथ जुड़ा हुआ है और जिससे विविध ईन्स्ट्रुमेन्ट का विविध बाज़ार में ट्रेडिंग हो सकता है।

उसका मूल्य उसके मुख्य अन्डरलाईंग ईन्स्टमेन्ट के भाव पर से निकाला जाता है प्रमुखरूप से दो प्रकार के डेरिवेटिव्हस होते है: फ्युचर्स और ऑप्शन्स।

फ्युचर क्या है? – What is Futures in Hindi

फ्यूचर का ट्रेडिंग दो पक्षों के बिच के समझौते से होता है या वह जो भी माल भविष्य के किसी एक निश्चित समय एक निश्चित भाव से खरीदा जाता है।

फ्युचर्स का कॉन्ट्रैक्ट विशिष्ट प्रकार के फॉरवर्ड कॉन्ट्रॅक्ट होता है, जिसमें फ्युचर्स कॉन्ट्रॅक्ट एक्सचेन्ज में ट्रेडिंग होने पर स्टॅन्डर्ड कॉन्ट्रॅक्ट कहके गिना जाता है।

फ्युचर की परिभाषा (Futures Terminology):

  • लॉट साईज (Lot Size)

हर फ्युचर्स कॉन्ट्रॅक्ट की एक निश्चित लॉट साईज होती है।

उदा. रिलायन्स की लॉट साईज फिलहाल ३०० है। इसका अर्थ यह होता है कि आप रिलायन्स का एक लॉट लेते है तो आपने रिलायन्स के ३०० शेअर्स खरीद लिए ऐसा होता है। किसी भी समय तीन महिनों के कॉन्ट्रॅक्ट ट्रेडिंग के लिए उपलब्ध होते है।

उदा. चालू महिना जनवरी हो तो जनवरी, फरवरी और मार्च ऐसे तीन महिनों के फ्युचर ट्रेडिंग के लिए उपलब्ध होते थे।

  • एक्सपायरी (Expiry):

हर फ्युचर्स का लॉट हर महिने के आखरी गुरूवार को एक्सपायर होता है। इसलिए अगर इस दिन से पहले ट्रेडिंग बराबर (स्क्वे अर ऑफ) नहीं किया तो उनका ट्रेडिंग बाज़ार बंद होने से पहले अपने आप ही स्क्वेअर ऑफ हो जाता है।

  • मार्जिन (Margins):

फ्युचर्स की खरीदारी करने के लिए शुरूआत में मार्जिन देना पड़ता है। सामान्य बाज़ार में इस मार्जिन का प्रमाण १० से २५% होता है। साथ ही अफरातफरी के बाज़ार में मार्जिन का प्रमाण बढ़ भी सकता है।

  • मार्क-टु-मार्केट (Mark to Market):

एकबार आपने फ्युचर्स की खरीदारी करने के बाद आपके खरीदी भाव और बंद भाव के बिच के फर्क की मदद से मार्क-टु-मार्केट की गिनती की जाती है। यह फर्क सकारात्मक हुआ तो वह आपके खाते में जमा हो जाता है।

अगर वह फर्क नकारात्मक हुआ तो उस फर्क की रकम आपको दुसरे दिन भरनी पड़ती है। पोजिशन स्क्वे अर ऑफ होने के बाद अगर आपके खरीदी और बंद भाव के बिच का फर्क सकारात्मक हुआ तो आपको मार्जिन और फायदे की रकम मिलती है।

पर यह फर्क नकारात्मक हुआ और आप समय के अनुसार मार्क-टुमार्केट की रकम की पूर्ती की तो आपको सिर्फ मार्जिन बाद में मिलता है।

अगर आप मार्क-टु-मार्केट की पूर्ती करने में असफल हुए तो आपके नुकसान की रकम आपके मार्जिन की रकम में से ली जाती है और बाकी की रकम आपको दी जाती है।

  • फ्युचर कॉन्ट्रॅक्ट (Futures Contract):

आजकल ज्यादातर शेअर्स, कमोडिटी और ईन्डेक्स में फ्युचर का ट्रेडिंग किया जा सकता है।

  • फ्युचर प्रीमीयम में (Future in Premium):

फ्युचर स्पॉट भाव के ऊपर हो तो फ्युचर प्रीमियम में है ऐसा कहा जाता है।

  • फ्युचर डिस्काऊंन्ट में (Future in Discount):

फ्युचर स्पॉट भाव के नीचे हो तो वह डिस्काऊंन्ट में है ऐसा कहा जाता है। तेजी के समय ज्यादातर फ्युचर प्रीमियम में हो सकते है और मंदी के समय में वह स्पॉट भाव के डिस्काऊंन्ट में हो सकते है।

फ्युचर में ट्रेडिंग कब करे? – When to Trade in Futures in Hindi

अगर आपकी गिनती है कि रिलायन्स ईस महिने में रू. १०० से ऊपर जा सकता है और आपको उसका फायदा लेना हो तो उसके १०० या १५० शेअर्स खरीदने की गिनती कर सकते है।

साधारणरूप से यह फायदा लेने के लिए आपको रिलायन्स के शेअर्स की डिलीवरी लेनी होगी। अब अगर रिलायन्स का भाव रू. १५०० होगा और आपने १५० शेअर्स खरीदे हो तो आपको रू. २.२४ लाख देकर डिलीवरी लेनी होगी।

हम ऐसा समझ लेते है कि रिलायन्स का एक लॉट १५० का है और मार्जिन १०% भरना है तो यह पोजिशन लेने के लिए आपको रू. २२,५०० का निवेश करना होगा।

अब अगर रिलायन्स आपकी सोच की तरह रू. १०० से बढ़ा तो आपको रू. १५,००० का फायदा होता है। प्रतिशत की दृष्टी से देखा जाए तो प्रारंभिक निवेश पर आपको ७% फायदा मिला ऐसा कहा जा सकता है।

अगर आप डिलीवरी लेते हो तो आपको रू. २,२५००० के निवेश पर रू. १५,००० का फायदा होता।इसलिए कहा जाता है कि फ्युचर के ट्रेडिंग में हमें अधिक फायदा मिलने की संभावना होती है।

नोट (Note)

आपको फ्युचर के ट्रेडिंग में अमर्यादित फायदा और अमर्यादित नुकसान दोनों हो सकता है। इसके लिए फ्युचर का ट्रेडिंग निश्चित स्टॉपलॉस के साथ ही करना चाहिए।

फ्युचर की खरीदी कौन कर सकते है? – Who can trade in Futures in Hindi

यह एक गलतफहमी है कि जो लोग जोखिम उठा सकते है उन लोगों को ही फ्युचर का ट्रेडिंग करना चाहिए और अन्य लोगों को उस से दूर रहना चाहिए। यहाँ पर बात सिर्फ जोखिम की नहीं, पर दुसरे कई परिबल होते है जिन्हें समझना जरूरी है।

यह जोखिम भरा विकल्प आवश्य है, क्योंकि घाटा होने की संभावना बेहिसाब होती है। फ्युचर में एक निश्चित समय के लिए पोजिशन लेनी है। पर इस समय में हाथ में पर्याप्त मार्जिन और मार्क-टु-मार्केट मार्जिन होनेवाले लोगों को घटा सहना पड़ता है।

इसके लिए सभी परिबलों को ध्यान में लेकर ही आवश्यक मार्जिन और मार्क-टु-मार्केट की रकम हाथ में रखकर ही ट्रेडिंग करनी चाहिए।

फ्युचर के बाज़ार में किसे प्रवेश नहीं करना चाहिए? – Who Should not Trade in Futures in Hindi

जिनके पास आवश्यक मार्क-ट-मार्केट मार्जिन की रकम नहीं होती उन्हान फ्यूचर के बाज़ार में प्रवेश नहीं करना चाहिए। ऐसे ज्यादातर लोगों को नुकसान ही सहना पड़ता है और कईबार यह नुकसान बहुत ही बड़ा हो सकता है।

जिन लोगों में अनुशासन नहीं है, गिनतीपूर्वक ट्रेडिंग करने की आदत नहीं है और नियमों का पालन करने की आदत नहीं है ऐसे लोगों को फ्युचर के बाज़ार से दूर ही रहना चाहिए।

हर किसी को स्टॉपलॉस और ट्रेलिंग स्टॉपलॉस के तरीके के अनुसार चलना पड़ता है जिस से वह अच्छी कमाई कर सकते है। जिन्हें इसकी जानकारी और आदत नहीं होती उन्हे फ्युचर के बाज़ार से दूर रहना चाहिए।

शेअर बाज़ार के निष्णात जानकार सच कहते है कि फ्युचर सामुहिक आर्थिक बरबादी का एक साधन है।

यह एक सत्य है कि ज्यादातर लोग ऐसे ईन्स्ट्रमेन्ट का ट्रेडिंग करने के लिए अनुभवी नहीं होते और अधूरी जानकारी होने के कारण वह नुकसान के बड़े गढ्ढे में गिरते हुए नज़र आते है

जिससे आपकी सपूर्ण पूंजी आप गवाँ सकते है ऐसा नहीं पर अधिकतम नुकसान मात्र आपको होता है। जिस से स्वयं की कमाई बेचने की नौबत भी आप पर आ सकती है।

इसलिए पहले से ही एक निष्णात निवेशक और ट्रेडर इन दोनों से फ्युचर के बाज़ार की जानकारी कर लिजिए। यह भी एक वास्तविकता है कि जिन्होने आवश्यक कला हासिल की है वह फ्युचर का ट्रेडिंग करके अच्छी कमाई करते है।

ऑप्शन्स क़्या है? – What is Options in Hindi

कॉल खरीदनेवाले को कोई भी माल (शेअर्स) का किसी भी समय पर निश्चित किए भाव से खरीदने का बंधन मुक्त अधिकार देता है। जब तेजी होती है तब कॉल की खरीदी की जाती है।

पुट खरीदनेवाले को किई भी माल (शेअर्स) की किसी भी समय पर निश्चित किए भाव से बेचने का बंधनमुक्त अधिकार देता है। बाज़ार में मंदी होती है तब पुट की खरीदी की जाती है।

ऑप्शन की परिभाषा (Options Terminology):

  • अमेरिकन ऑप्शन (American Option): इस ऑप्शन को एक्सपायरी से पहले किसी भी समय पर एक्सरसाईज किया जा सकता है।
  • युरोपियन ऑप्शन (European Option): इस ऑप्शन को उसके एक्सपायरी पर ही एक्सरसाईज किया जा सकता है।
  • स्ट्राईक प्राईज/एक्सरसाईज भाव (Strike Price / Exercise Price): इस भाव पर ऑप्शन को एक्सरसाईज किया जाता है।
  • एक्सपायरेशन डेट (Expiration Date): इस तारीख को ऑप्शन एक्सपायर होता है।
  • एक्सरसाईज डेट (Exercise Date): इस तारीख को ऑप्शन धारक द्वारा ऑप्शन को एक्सरसाईज किया जाता है।
  • ऑप्शन प्रीमियम (Option Premium): ऑप्शन खरीदनेवाला ऑप्शन बेचनेवाले के पास से जिस भाव पर खरीदी करता है उसे ऑप्शन प्रीमियम कहा जाता है।

ऑप्शन की खरीदी और फ्यूचर की खरीदी इन दोनों में यह फर्क है कि ऑप्शन खरीदनेवाले का नुकसान मर्यादित होता है और फायदा अमर्यादित होता है।

पर फ्युचर में इसके विपरीत होता है। इसलिए जिन्हें कम जोखिम लेकर ट्रेडिंग करना है वह ऑप्शन खरीद कर ट्रेडिंग कर सकते है।

उदाहरण (Example):

समझ लिजिए की किसी को रिलायन्स में रू. 2,050 के भाव से तेजी दिखती है और उसका टार्गेट रू. 2100 पर जाने की संभावना लगती है। वह व्यक्ति अॅट-द-मनी कॉल खरीद सकते है।

इसका अर्थ ऐसा होता है कि वह रू. 2,050 के स्ट्राईक भाव से कॉल खरीदते है उस समय उस पर जो प्रीमियम है वह भी भरते है, जो रू. ७५ है ऐसा समझ लीजिए। अब अगर भाव सच में रू. 2100 के ऊपर गया तो प्रीमियम के भाव में जल्दी ही बढ़त होती है।

इसका आधार यह है कि आपने महिने के किस समयकाल में पोजिशन ली है। साथ ही भाव में बढ़त होने के लिए कितने दिन लगते है इस पर निर्धारीत होता है।

ऑप्शन का समीकरण जटिल होता है जिसमें समय के घटाव को भी गिनती में लिया जाता है। जिसके आधार पर प्रीमियम के भाव में कितनी बढ़त होगी इसकी गिनती की जा सकती है।

उदा. समय का परिबल यह प्रीमियम के भाव पर विपरीत परिणाम करता है। अगर तय किए समय में रिलायन्स के भाव में बढ़त नहीं हुई तो उस समय में प्रीमियम का भाव गिरने लगता है।

अगर रिलायन्स के भाव में गिरावट नहीं हुई और जैसे के तैसा रहने लगा तो भी प्रीमियम का भाव गिरने लगता है।

इसलिए हर किसी को ऑप्शन के विषय में गिनतीपूर्वक ट्रेडिंग करने की कला और अनुभव होना आवश्यक है। नुकसान होने की संभावना भरे हुए प्रीमियम तक ही सीमित होता है।

उदा. आपने रू. ७५ का प्रीमियम भरा है और ३०० का लॉट लिया है तो रू. २२,५०० होते है। अगर रिलायन्स रू. २०० गिरकर बंद हुआ तो ऑप्शन संपूर्ण मूल्य गवाँकर एक्सपायर होता है और अधिकतम नुकसान रू. २२,५०० होता है।

अगर आपने रिलायन्स का फ्युचर खरीदा होता तो आपको होनेवाला नुकसान रू. ५०,००० होता है। पर ऑप्शन के विषय में अधिकतम नुकसान यह जितना प्रीमियम भरा है उतना ही होता है।

परंतु मर्यादित नुकसान ही होगा ऐसा मानकर लोग गिनती किए बिना ही ऑप्शन का ट्रेडिंग करते हुए नज़र आते है और ज्यादातर लोग स्वयं प्रीमियम की रकम गवाँकर बैठते है। नुकसान ज्यादा हो या मर्यादित, वह आखिर नुकसान ही होता है।

इसलिए आपका हेतू ऐसा होना चाहिए कि जो भी पोजिशन ले वह फायदा होने की गिनती से ही लेनी चाहिए। साथ ही इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि मर्यादित नुकसान होगा इसलिए चिंता करने की कोई जरूरत नहीं।

ऑप्शन के फायदे – Advantages of Options in Hindi

  • अधिक लिवरेज और कम रकम का निवेश करने की जरूरत होती है।
  • शुरूआत में अधिकतम नुकसान कितना होगा इसकी जानकारी होना।
  • ऑप्शन के खरीदारी में ज्यादा मुनाफा और मर्यादित जोखिम होता है।
  • स्वयं का पोर्टफोलीओ ऑप्शन की मदद से सुरक्षित रख सकते है।

स्विंग ट्रेडिंग क्या है? – What Swing Trading in Hindi

स्विंग ट्रेडिंग में डिलीवरी लेकर कम समयवाले रेसिस्टन्स और सपोर्ट को ध्यान में रखकर ट्रेडिंग करना पड़ता है।

उदा. दिर्घ समयवाला ट्रेन्ड नीचे होने पर भी पुलबॅक दर्शानेवाले शेअर्स में कम समय के लिए याने की २-४ दिनों में बढ़त की जो संभावना होती है उससे डिलीवरी लेकर बढ़ते हुए रेसिस्टन्स के नजदीक मुनाफा बुक किया जा सकता है।

शेअर्स की चाल में कम समय में ऐसा स्विंग आया हुआ नज़र आता है। जिसका फायदा लिया जा सकता है।

नोट (Note):

जो लोग शेअर बाज़ार के नियमित संपर्क में है और भाव देखने की सुविधा उनके पास होती है उनको ही ईन्ट्राडे अथवा स्विंग ट्रेडिंग करने का प्रयास करना चाहिए।

जो हमेशा घुमते रहते है या बाहर होते है और उनके पास भाव देखने की सुविधा उपलब्ध नहीं है उनको इस प्रकार की पोजिशन लेने से दूर रहना चाहिए।

शेयर बाजार में बी.टी.एस.टी. क्या है? – What is B.T.S.T in Hindi

“बाय टुडे – सेल टुमारो”, याने की आज शेअर्स की खरीदी कीजिए और दुसरे दिन बेच दीजिए। अगर आपकी गिनती है कि आनेवाले समय में बाज़ार या कोई शेअर ऊपर ही खुलेगा तब बी.टी.एस.टी. ट्रेडिंग करने का प्रयास कीजिए।

आपके पास किसी कंपनी के १०० शेअर्स है और किसी भी दिन बाज़ार अच्छे अंको से बंद हुआ और दुसरे दिन भी बाज़ार अच्छा खुलने के आसार हो तो उतनी ही संख्या में और शेअर्स खरीदके दुसरे दिन बेच सकते है।

दुसरे दिन शेअर्स का भाव अपेक्षा की तरह ऊपर खुला तो जो अधिक शेअर्स आपने खरीदे है वह बेच दीजिए। ऐसा करने का कारण यह है कि जिस संख्या में खाते में शेअर्स जमा थे वह वैसे ही रहते है और जो ज्यादा शेअर्स है उन पर फायदा मिलता है।

खाते में शेअर्स न हो तो?

अनेक ब्रोकर खाते में शेअर्स न होने पर भी बी.टी.एस.टी. करने देते है। इसमें लोग शेअर बाज़ार बंद होने से पहले अच्छे लगे वह और दुसरे दिन भी ऊपर खुलने की गिनतीवाले शेअर्स खाते में शेअर्स न होने पर भी बाज़ार बंद होने से पहले शेअर्स को खरीद के दुसरे दिन वह बेच सकते है।

आपका ब्रोकर अगर इस प्रकार की सुविधा देता हो तो उसकी पूर्ती करने के बाद ही इस प्रकार की पोजिशन लीजिए।

नोंद (Note):

बी.टी.एस.टी. तभी करना चाहिए जब दुसरे दिन पहले से ही आपके खाते में जमा मूल शेअर्स आपको बेचने नहीं होते। क्योंकि आपको जो ज्यादा शेअर्स बेचने होते है वह दुसरे दिन बेच दीजिए

इस से खाते में जो मूल शेअर्स होते है उनका पे-ईन पहले होता है और बाद में जो ज्यादा के शेअर्स खरीदे थे उनका पे-आऊट आपको बाद में मिलता है। इसलिए बी.टी.एस.टी. करने से पहले ही इस बात पर ध्यान दीजिए।

उदा. आपके पास किसी कंपनी के २५० शेअर्स है। वह आपको दुसरे दिन बेचने हो तो आपको उस दिन बी.टी.एस.टी. करने से दूर रहना चाहिए।

क्योंकि अगर आपने दुसरे २५० शेअर्स खरीदे तो आप दुसरे दिन सिर्फ २५० शेअर्स ही बेच सकते है, ५०० नहीं। इसलिए यह बात ध्यान में रखकर पहले गिनती करने के बाद ही पोजिशन लिजिए।

शेयर बाजार में एस.टी.बी.टी. क्या है? – What is S.T.B.T in Hindi

एस.टी.बी.टी. याने की “सेल-टुडे-बाय-टुमारो”। आज बेचिए और कल खरीदीए।

यह एक ऐसा विकल्प है कि जिसमें बाज़ार घट रहा हो और दुसरे दिन आपके पास शेअर्स है और आपको घाटा होगा ऐसा लगता हो तो उन्हे उस दिन बेचकर दुसरे दिन कम भावमें लेने की गिनती की जा सकती है।

उदा. आपके पास किसी कंपनी के ५०० शेअर्स है। आपने वह ५०० शेअर्स उसी दिन बेच दिए और दुसरे दिन आपके अनुसार गिरावट आने के बाद वह खरीदने से आपको मुनाफा होता है।

ऐसा तभी किया जा सकता है जब आई हुई गिरावट अल्प समय के लिए होती है। गिरावट आगे बढ़ने की संभावना हो तो वह बेच दीजिए।

उस वक्त एस.टी.बी.टी. नहीं करना चाहिए। ऐसा करने के लिए आपके पास पहले से ही अपने खाते में शेअर्स होना जरूरी है।

शेयर बाजार में आर्बिट्रेज क्या है? – What is Arbitrague in Hindi

यह एक ऐसा विकल्प है जिसमें जोखिम ना के समान है। इसमें किसी भी शेअर्स में दोनों एक्सचेन्ज में जो भाव होता है उसके बिच के फर्क का फायदा लिया जाता है।

जोखिम इतना नहीं होता कि आपको कोई गिनती या अनुमान निकालना पड़े। पर भाव में दिखनेवाले निश्चित फर्क का फायदा लेना होता है। पर सभी लोग ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि आर्बिट्रेज के लिए खाते में शेअर्स और हाथ में रूपए दोनों ही होने चाहिए।

कई लोग फला प्रतिशत के हिसाब से शेअर्स और रूपए आर्बिट्रेज के लिए देते है। इसके लिए जागरूकता और चपलता की आवश्यकता होती है। आर्बिट्रेज करने के लिए सतेज बुद्धी और ध्यान क्षमता होना जरूरी है।

नोट (Note):

इन सबके लिए एक उत्तम विकल्प है कि आवश्यक माल (शेअर्स) और रूपए हाथ में हो और टर्मिनल के सामने बैठने के लिए तैयार हो ऐसे लोग ही इसका अच्छा फायदा ले सकते है।

इसके लिए चील की तरह दृष्टी और चपलता होनी चाहिए और थोड़े ही अभ्यास के बाद इसमें महारत हासिल करना शक्य होता है। बाज़ार में आर्बिट्रेज पढ़ानेवाले क्लासेस भी है।

शेयर बाजार में हेजिंग क्या है? – What is Hedging in Hindi

बाज़ार जब गिरावट दर्शाता है तब अपने पोर्टफोलीओ में जमा शेअर्स के भाव में होनेवाली गिरावट के सामने सुरक्षा पाने के लिए ऑप्शन और फ्युचर जैसे विकल्पों की मदद से प्रतिकारक पोजिशन ली जाती है उसे हेजिंग कहा जाता है।

यह एक प्रकार के ईन्शोरन्स के समान है। जो खराब माहौल में आपके पोर्टफोलीओ को सुरक्षित रखता है। हम माहौल को खराब होने से नहीं रोक सकते पर हेजिंग की मदद से हम इस परिस्थिति के नकारात्मक परिणाम को आवश्य कम कर सकते है।

नोट (Note):

हेजिंग से जिस प्रकार जोखिम कम होता है वैसे ही उसे समय के अनुसार सुलटाया नहीं गया तो होनेवाला फायदा भी अपने हाथ से निकलकर जा सकता है।

इसलिए ध्यान में रखना चाहिए कि हेजिंग पैसा कमाने का साधन नहीं है। अगर ठिक तरह से अमल हुआ तो उस शेअर्स में निवश की गई रकम को आप सुरक्षित रख सकते है।

कई अनुभवी पोर्टफोलीओ मॅनेजर हेजिंग का नियमित उपयोग करते हुए नज़र आते है। जिस से विपरीत परिस्थिति में उनका किया हुआ निवेश सुरक्षित होता है।

मार्जिन ट्रेडिंग क्या है? – What is Margin Trading in Hindi

यह एक ऐसा विकल्प है जिस में आपके खाते में जमा शेअर्स पर आपको ज्यादा मार्जिन मिलती है जिसकी मदद से आप ज्यादा शेअर्स की डिलीवरी लेकर काम कर सकते है।

फ्युचर और इसमें फर्क यह है कि फ्युचर में अमर्यादित नुकसान हो सकता है पर मार्जिन ट्रेडिंग से किए हुए व्यवहार में खाते में जितना माल है उतना ही नुकसान होने की संभावना होती है।

यह सुरक्षित विकल्प है ऐसा समझ ने की भूल मत कीजिए। अगर आपको फ्युचर जितना बड़ा नुकसान नहीं हुआ तो भी मार्जिन से जो अधिक के शेअर्स लिए होते है वह आपके निवेश को जल्दी ही साफ कर सकता है।

इसलिए ठिक समय पर स्टॉपलॉस और प्रॉफिट बुकिंग करना जरूरी है। अगर उपयोग कर सके तो कम रकम में अच्छी कमाई कराना इस से संभव हो सकता है।

नोट (Note):

शेअर बाज़ार में उपलब्ध विकल्प बुरे नहीं होते पर उन विकल्पों का ठिक तरह से उपयोग नहीं किया गया तो वह हानिकारक हो सकते है।

इसलिए आगे बढ़ने से पहले स्वयं की उम्र, आमदनी आदि परिबलों को समझ ने के बाद ही स्वयं योग्य विकल्प का चुनाव करके आगे बढ़ना चाहिए।

एक ही समय चारों दिशा में दौड़ने से कुछ भी हाथ नहीं लगता। स्वयं का हेतू स्पष्ट रखकर अनुकूल विकल्प के अनुसार चलने का प्रयास करना चाहिए।

डिविडन्ड के रूप में प्राप्त होने वाली आय (Income from Dividend):

बाज़ार में अच्छी कंपनी के शेअर्स में बहुत ही अच्छा डिविडन्ड मिलता है। जो वार्षिक योजना के भाव में बढ़ोतरी के साथ अपने निवेश को भी बढ़ाता है।

यह एक ऐसा विकल्प है जिसमें से लोगों को नियमित पूंजी मिल सके ऐसा आयोजन किया जाता है। ऐसे कई डिफेन्सिव शेअर्स है जिनमें दिर्घ समय में पूंजी में बढ़ोतरी होती ही है और साथ ही नियमित डिविडन्ड के रूप में रकम भी मिलती है।

वह लोग जो इस प्रकार का आयोजन करना चाहते है कि उन्हे दिर्घ समय वाले निवेश का लाभ तो मिलना ही चाहिए पर कम समय के लिए कमाई भी मिलनी चाहिए इसलिए लोग इस प्रकार का अच्छा डिविडन्ड देनेवाले शेअर्स अपने पोर्टफोलीओ में रखते है।

नोट (Note):

मैंने पहले ही बताया है और कई बार बताना चाहूंगा कि आपका स्वयं का ध्येय क्या है, हेतू क्या है वह पहले निश्चित कीजिए और उसके बाद ही । इस प्रकार के पोर्टफोलीओ का निर्माण कीजिए।

डिमेट क्या है? – What is Demat in Hindi

कुछ वर्षों पहले आपने किसी शेअर्स की डिलीवरी ली हो तो शेअर सर्टिफिकेट ट्रान्सफर फॉर्म साथ में मिलता था।

डिमेट तरीके में दाखिल होने के बाद अब शेअर्स ईलेक्ट्रॉनिक स्वरूप में आपके खाते में जमा होते है। उनका बॅलेन्स किसी भी समय जाना जा सकता है। अब सर्टिफिकेट नहीं दिया जाता।

डिमेट के फायदे (Advantages of Demat):

अब शेअर्स खरीदने के बाद डिलेवरी अपने नाम से तीन दिनों में मिलती है। शेअर्स डिमेट स्वरूप में मिलने के कारण बोगस सर्टिफिकेट का डर नहीं होता।

शेअर्स गूम हो जाने की भी चिंता नहीं होती। शेअर्स तुरंत ट्रान्सफर होते है इसलिए ज्यादा समय तक शेअर्स बेचने के लिए राह नहीं देखनी पड़ती।

जरूरत पड़ने पर तुरंत शेअर्स बेच सकते है। डिमेट तरीके में आने के बाद “लॉट सईज’ नहीं होती। किसी भी संख्या में शेअर्स खरीदे जा सकते है।

डिमेट खाता जरूरी क्यो है? – Why Demat Account is Important in Hindi

अब बाज़ार में शेअर्स का लेन-देन डिमेट स्वरूप में ही होती है। पुराने शेअर्स सर्टिफिकेट डिमेट नहीं हुए हो तो शेअर्स बेचे नहीं जा सकते।

शेअर बाज़ार में हर दिन काम करना हो तो अब सभी निवेशकों को डिमेट खाता खोलना जरूरी है।

डिमेट खाता कहा और किस प्रकार से खोलना चाहिए?

डिमेट खाता सभी सरकारी और निजी बँक साथ ही शेअर दलाल के पास खोला जा सकता है।कई शेअर दलाल स्वयं ही “डिपोजिटरी पार्टिसिपेन्ट’ बनकर डिमेट खाता खोल देते है।

एनएसडिएल (NSDL) और सीडिएसएल (CDSL) ऐसे दो प्रकार के डिपोजिटरी पार्टिसिपेन्ट उसमें होते है। डिमेट खाता खोलने के लिए फॉर्म भरना पड़ता है। खाता खुलने के बाद खातेदार को “क्लायन्ट आय डी’ मिलता है। जिसे खाता नंबर कहा जा सकता है।

शेअर्स ऑटो पे – ईन सुविधा (Shares Auto Pay-In Facility):

आप अपने शेअर दलाल के पास भी डिमेट खाता खोल सकते है। कई लोगों को यह डर होता है कि उनके शेअर्स का दरूपयोग किया जाएगा। पर अब पहले जैसी स्थिति नहीं है और सिस्टम भी पारदर्शक बन गया है। इसलिए यह डर की कोई जरूरत नहीं।

अब सेबी बहुत ही सचेत है। इसलिए आपके शेअर्स का दुरूपयोग होगा इसकी कोई गुंजाईश नहीं होती। दुसरी बात यह है कि आजकल एक सुविधा है जिसे ऑटो पे-ईन कहा जाता है वह आपको अगर आपका डिमेट खाता आपके ब्रोकर के पास हो तभी मिल सकती है।

साधारणरूप से जब आप शेअर्स बेचते है तब आपके डिमेट के ट्रान्झाक्शन स्लीप के बुक में जरूरी जानकारी भरकर उस पर मोहर लगानी पड़ती है।

इसके बाद ही आपने बेचे हुए शेअर्स आपके डिमेट खाते में से बाहर आ सकते है। पर ऑटो पे-ईन सुविधा में आप जब शेअर्स बेचते है, उतनी ही संख्या में शेअर्स आपके डिमेट या पुल खाते में से सिधे बाज़ार में आ जाते है।

आजकल अपना जीवन भागदौड भरा है। इसलिए यह सुविधा अपने लिए लाभदायक होती है। एक तो आप शेअर्स ट्रान्सफर करने की चिंता से मुक्त होते है और कुछ कारणवर्श किसी समय शेअर्स ट्रान्सफर नहीं हुए तो ऑक्शन की संभावना से भी हमेशा के लिए मुक्ती मिलती है।

इसलिए मेरी यह सलाह है कि इस सुविधा का फायदा लेकर तनावमुक्त होने में ही समझदारी है।

रोलींग सेटलमेन्ट और सेटलमेन्ट सायकल (Rolling Settlement and Settlement Cycle):

आजकल बाज़ार में ‘रोलींग सेटलमेन्ट’ का उपयोग किया जाता है। जिसमें सेटलमेन्ट ‘टी+२’ योजना का उपयोग किया जाता है। यहाँ पर ‘टी’ याने पहलेवाला दिन होता है। ‘टी+१’ याने दुसरा दिन होता है और ‘टी+२’ याने तीसरा दिन होता है।

टी = पहला दिन (T = Trading Day):

इस दिन आप शेअर्स खरीदते है या बेचते है। जिनकी डिलीवरी लेनी या देनी होती है।

टी+१ = दुसरा दिन (T+1 = Second Day): इस दिन डिलीवरी का कन्फर्मेशन होता है। याने की पहले दिन हुए ट्रेडिंग का कन्फर्मेशन होता है। यह काम कस्टोडीयन करते है।

टी +२ = तीसरा दिन (T+2 = Third Day):

इस दिन कस्टोडीयन की गिनती के अनुसार शेअर्स और रकम का पे-ईन और पे-आऊट होता है। पहले पे-ईन होता है। जिसमें आपके शेअर्स दलाल के साथ हुए ट्रेडिंग के अनुसार बाज़ार में आते है और रकम का भुगतान किया जाता है।

इसके बाद पे-आऊट होता है। जिसमें बाज़ार के हर शेअर दलाल को शेअर्स और रकम का भुगतान किया जाता है।

नोट (Note):

रोलींग सेटलमेन्ट होने के बाद शेअर्स खरीदे हो तो उनकी डिलीवरी लेनी पड़ती है या फिर शाम को बेचकर उनका ट्रेडिंग करना पड़ता है। पर पहले जैसे सप्ताह तक रूकना नहीं पड़ता है।

अब लोगों ने स्वयं के शेअर्स बेचने के बाद उन्हें तुरंत पैसे मिल जाते है। इस से पहले आपको सप्ताह तक या फिर दस दिनों तक उसकी राह देखनी पड़ती थी।

हम आशा करते है की हमारी ये (शेयर बाज़ार का मूल ज्ञान – Share Market Basics in Hindi) ब्लॉग पोस्ट आपको पसंद आयी होगी अगर आपको शेयर मार्किट से जुड़ा कोई भी सवाल है तो आप कृपया कमेंट में जरूर पूछे।

।। धन्यवाद ।।

Important Links:-

Open Demat & Trading Account in Zerodha – https://zerodha.com/?c=NH6775

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3 टिप्पणियाँ

स्विंग ट्रेडिंग स्टेप बाय स्टेप - Swing Trading Step By Step In Hindi · फ़रवरी 18, 2021 पर 4:41 अपराह्न

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स्विंग ट्रेडिंग के नियम - Top 13 Golden Rules For Swing Trading In Hindi · फ़रवरी 20, 2021 पर 2:34 अपराह्न

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स्टॉप लॉस क्या है और क्यों है ज़रूरी - Stop Loss In Hindi · फ़रवरी 23, 2021 पर 8:50 अपराह्न

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