शेयर बाजार की शब्दावली – Share Market Terminology in Hindi.

शेयर बाजार में कई शब्द प्रचलित हैं, जो बाजार, शेयर, कंपनी, स्टॉक इत्यादि की स्थिति के बारे में जानकारी देते हैं।

ये शब्द तकनीकी तथा पारंपरिक भी हो सकते हैं। निवेशक के लिए इस शब्दावली की जानकारी रुचिकर तथा आवश्यक है, जैसे-बुल्स, बेयर्स, ए.डी.आर./ जी.डी.आर., एनालिस्ट, एक्स एंड कम डेट्स, वॉल्यूम, आर्बीट्रेज, हेजिंग, पेनी स्टॉक आदि।

पेनी स्टॉक (Penny Stock)

ये वे शेयर्स होते हैं, जिनकी बाजार कीमत उनकी फेस वैल्यू से भी नीचे होती है। यद्यपि शेयर बाजार में इनकी नियमित ट्रेडिंग होती रहती है।

इन शेयरों की ट्रेडिंग के साथ स्पेकुलेशन (सट्टेबाजी) जुड़ा रहता है। इन शेयरों की कीमत में थोड़ी सी वृद्धि भी बहुत बड़ा प्रतिशत लाभ (हाई रिटर्न) देती है।

ये शेयर बड़े जोखिमवाले शेयर होते हैं तथा विपरीत परिस्थितियों में औंधे मुँह भी गिरते हैं और निवेशक को नुकसान पहुंचाते हैं।

ए.डी.आर./जी.डी.आर (ADR / GDR)

ये विदेशी स्टॉक एक्सचेंज में उपलब्ध सिक्यूरिटीज होती हैं, जिनके माध्यम से विदेशी निवेशक भारतीय कंपनियों के शेयर बिना भारतीय बाजार में उतरे खरीद सकते हैं। किसी बैंक के माध्यम से ए.डी.आर./जी.डी.आर. का कारोबार किया जाता है।

भारत की किसी डिपॉजिटरी में विदेशी निवेशक द्वारा खरीदे गए शेयर दर्ज रहते .. हैं। किसी एक ए.डी.आर. द्वारा निश्चित संख्या में शेयर खरीदे जा सकते हैं। इसे ‘स्पेसिफिक रेशियो’ कहते हैं।

ए.डी.आर./जी.डी.आर. द्वारा ट्रांजेक्शन का तरीका लगभग वैसा ही है, जैसा विदेशी निवेशकों द्वारा उनके एक्सचेंज में किया जाता है। इसलिए विदेशी निवेशक इस तरीके से निवेश का रास्ता पसंद करते हैं।

भारतीय कंपनियों को भी इस तरीके से विदेशी एक्सचेंज में सूचीबद्ध होने का मौका मिलता है। ए.डी.आर./जी.डी.आर. धारक जब चाहे, ए.डी.आर./जी.डी.आर. को कंपनी के वास्तविक शेयरों में परिवर्तित कर सकता है।

ए.डी.आर. अमेरिका के स्टॉक एक्सचेंज में प्रचलित है, वहीं जी.डी.आर. दूसरे विदेशी एक्सचेंज, जैसे लक्जमबर्ग इत्यादि के एक्सचेंजों में प्रचलित है।

ऐट पार (At Par)

किसी शेयर को उसी कीमत पर जारी करना या बेचना, जो उस शेयर के शेयर प्रमाण-पत्र पर अंकित हो।

ऐट प्रीमियम (At Premium)

शेयर प्रमाण-पत्र पर अंकित मूल्य की तुलना में अधिक मूल्य – पर शेयर को जारी करना या बेचना।

उच्च व निम्न (High and Low)

पिछले 52 सप्ताह की अवधि में प्रत्येक शेयर का अधिकतम और न्यूनतम मूल्य।

कॉल मनी (Call Money)

कोई भी शेयर जारी करते समय शेयर मूल्य का एक भाग शेयर आवेदनकर्ता से आवेदन-पत्र के साथ कंपनी ले लेती है।

शेष भाग शेयरधारकों से आगामी निश्चित तिथि तक किस्तों में माँगा जाता है। इसे ‘कॉल मनी’ कहते हैं।

मेगा इश्यू (Mega Issue)

किसी कंपनी द्वारा बहुत बड़ी संख्या में जारी किए गए शेयर या ऋण-पत्र, जिनका मूल्य कई सौ करोड़ रुपए हो।

लिमिटेड कंपनी (Limited Company)

ऐसी कंपनी, जिसका स्वामित्व अंशदाताओं के बीच बँटा हुआ हो और प्रत्येक अंशदाता का उत्तरदायित्व उसके अंश तक ही सीमित होता हो।

स्वीट शेयर (Sweet Share)

‘स्वीट इक्विटी शेयर’ उन्हें कहते हैं, जिसे कंपनी के कर्मचारियों या किसी अन्य को रियायती मूल्य पर आवंटित किए जाते हैं।

शेयर बाजारों पर निगरानी रखनेवाली संस्था ने विशेष श्रेणी के स्वीट शेयरों के लिए तीन वर्ष का ‘लॉक-इन पीरियड’ निर्धारित किया है।

इसका मतलब यह है कि तीन वर्ष से पहले इन्हें किसी अन्य को बेचा नहीं जा सकता। यह भी समान्य शेयरों की तरह शेयर बाजार में सूचीबद्ध होते हैं।

तेजड़िया और मंदड़िया (Bulls and Bears)

यह स्टॉक एक्सचेंज के शब्द हैं। जो व्यक्ति स्टॉक की कीमतों को बढ़ाना चाहता है, वह ‘तेजड़िया’ कहलाता है और जो व्यक्ति स्टॉक की कीमतें गिरने की आशा करके किसी वस्तु को भविष्य में देने का वायदा करके बेचता है, वह ‘मंदड़िया’ कहलाता है।

ब्रिज लोन (Bridge Loan)

कंपनियाँ आमतौर पर विस्तार के लिए पूँजी जुटाने हेतु शेयर तथा डिबेंचर जारी करती हैं। लेकिन इस पूरी कार्य-प्रणाली में तीन माह से भी अधिक का समय लग जाता है।

इसलिए इस दौरान अपना काम जारी रखने के लिए कंपनियाँ बैंकों से निश्चित अवधि के लिए ऋण प्राप्त कर लेती हैं। इस प्रकार के ऋणों को ‘ब्रिज लोन’ कहते हैं।

लिवाली और बिकवाली (Buying and Selling)

शेयरों की बड़ी मात्रा में खरीदारी ‘लिवाली’ कहलाती है और बड़ी संख्या में शेयरों को बेचना ‘बिकवाली’ कहलाता है।

ब्लूचिप्स कंपनियाँ (Bluechips Companies)

ऐसी प्रमुख लोकप्रिय कंपनियों के शेयर, जो पिछले कई वर्षों से लगातार उन्नति कर रहे हों, आगे बढ़ रहे हों तथा भविष्य में भी इनमें और विकास की बहुत संभावना हो, ऐसी कंपनियाँ ‘ब्लूचिप्स कंपनियाँ’ तथा ऐसे शेयर ‘ब्लूचिप शेयर’ कहलाते हैं।

बाजार पूँजीकरण (Market Capitalization)

किसी कंपनी के द्वारा जारी किए गए कुल शेयरों की बाजार में कीमत उस कंपनी का ‘बाजार पूँजीकरण’ कहलाता है।

उदाहरण के लिए, किसी कंपनी के मार्केट में 10 लाख शेयर हैं तथा बाजार में प्रति शेयर कीमत 1,000 हजार रुपए है तो उस कंपनी का बाजार पूँजीकरण (मार्केट कैपिटलाइजेशन) 100 करोड़ रुपए होगा।

बाजार पूँजीकरण के आधार पर कंपनियों को तीन श्रेणी में बाँटा गया है

  • स्मॉल कैप-वे कंपनियाँ, जिनका मार्केट कैप (बाजार पूँजीकरण) 100 करोड़ से कम हो, वे ‘स्मॉल कैप कंपनियाँ’ कहलाती हैं।
  • मिड कैप-वे कंपनियाँ, जिनका मार्केट कैप (बाजार पूँजीकरण) 100 करोड़ से 1,000 करोड़ के बीच हो, वे ‘मिड कैप कंपनियाँ’ कहलाती हैं।
  • लार्ज कैप-वे कंपनियाँ, जिनका मार्केट कैप (बाजार पूँजीकरण)1,000 करोड़ से ज्यादा हो, वे कंपनियाँ ‘लार्ज कैप’ की श्रेणी में आती हैं।

वार्षिक-रिपोर्ट (Annual Report)

प्रत्येक कंपनी की कानूनी रूप से वार्षिक रिपोर्ट बनाकर एकाउंटिंग ईयर (लेखा-वर्ष) के अंत में तैयार की जाती है।

इसमें कंपनी के डायरेक्टरों, कंपनी की गतिविधियों के बारे में वार्षिक रिव्यू, कंपनी के वित्तीय परिणाम, आगामी प्रस्ताव, ऑडिट रिपोर्ट, बैलेंस शीट, लाभ-हानि का लेखा-जोखा इत्यादि समाहित होता है।

बायबैक (Buyback)

किसी कंपनी द्वारा जब अपने ही शेयरों को दोबारा खरीदने का । निर्णय लिया जाता है तो उसे ‘बायबैक’ कहा जाता है।

इस निर्णय के पीछे का मकसद होता है कंपनी द्वारा बाजार में उपलब्ध उसके शेयरों की संख्या को घटाना। इस प्रक्रिया में प्रति शेयर लाभ में इजाफा होता है और बैलेंस शीट भी बेहतर होती है।

कंपनी जिस टेंडर ऑफर या खुले बाजार के द्वारा बायबैक के माध्यम से शेयर वापस खरीदती है

उसमें टेंडर ऑफर बायबैक की कीमत ओपन मॉर्केट में शेयर के दाम से ज्यादा होती है? और जिस निवेशक के पास उस कंपनी के शेयर होते हैं, वह बायबैक के समय चाहे तो फायदा ले सकता है।

।। धन्यवाद ।।

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