शेयर बाजार टिप्स – Share Market Tips in Hindi

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शेयर बाजार धन-लाभ कमाकर आपका बेड़ा पार भी करा सकता है तो आपकी गाढ़ी कमाई को निगलकर आपका बेड़ा डुबो भी सकता है।

यदि किसी निवेशक को यह बात भली-भाँति समझ में आ जाए कि शेयर बाजार के कुछ नियम और मंत्र होते हैं, जिन पर यदि चला जाए तो शेयर बाजार में आपका बेड़ा आसानी से पार हो सकता है।

सबसे पहले तो आप यह बात गाँठ बाँध लीजिए कि सामान्य स्थिति में शेयरों में निवेश भी अन्य कारोबार की तरह ही होता है, जहाँ सफलता के लिए धैर्य, परिश्रम और लगन की आवश्यकता होती है।

हमें सफल निवेश के लिए कुछ जरूरी बातों पर ध्यान देना जरूरी है। हो सकता है कि कुछ बातें आपको परस्पर विरोधी लगें; लेकिन इससे आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि शेयर बाजार की स्थिति हमेशा बदलती रहती है।

अत: बाजार की बदलती स्थितियों के अनुसार अलग-अलग नीति का प्रयोग करना आवश्यक हो जाता है और निवेशक को इस बात का पूरा अधिकार है कि वह अपनी जरूरत तथा अपने विवेक से सही नीति का चयन करे।

लेकिन फिर भी, कुछ नियम ऐसे हैं, जिनका पालन करना फायदेमंद साबित हो सकता है।

टिप्स पर नहीं, विवेक के आधार पर निर्णय लें (Make Decisions Based on Discretion, Not Tips)

शेयर बाजार में टिप्स की टिप-टिप बारिश की बूंदों की तरह गिरती है। निवेशक को ब्रोकर के द्वारा तथा अपने आस-पास के लोगों से टिप्स थोक मात्रा में बिलकुल मुफ्त मिलती हैं।

इन टिप्स में सलाहों का पुलिंदा होता है कि अमुक शेयर खरीद लो, दो महीने में इसकी कीमत दो गुनी मिल जाएगी या इस शेयर को बेच दो, क्योंकि यह कंपनी दिवालिया होने वाली है आदि बाजार की भाषा में इसे ‘टिप्स’ कहा जाता है।

दरअसल,ऑपरेटर और सटोरिए भारी मात्रा में ‘टिप्स कल्चर’ को फैलाते हैं, जिससे बाजार में अफवाहों पर आधारित जानकारी फैलती है।

इसलिए निवेशकों को बाजार में फैली अफवाहों-जो उसे ‘टिप्स’ के रूप में मिलती हैं से सावधान रहना चाहिए। चूँकि टिप्स का कोई ठोस आधार नहीं होता है, इसलिए यदि निवेशक टिप्स के आधार पर निवेश करता है तो ऐसे सौदे में जोखिम कहीं ज्यादा होती है।

बाजार में जब तेजी का दौर होता है, तब बाजार में ‘टिप्स कल्चर’ इतनी तेजी से विकसित हो जाता है कि बहुत से निवेशक टिप्स के प्रलोभन में आकर निवेश कर बैठते हैं, और जब उनकी मेहनत की कमाई से खरीदे गए शेयर कुछ समय बाद तेजी से नीचे गिरते हैं तो सिवाय पश्चात्ताप के वे कुछ नहीं कर पाते।

इसलिए यदि शेयर बाजार में सफल होना है तो आस-पास से मिली टिप्स पर ध्यान न दें। यदि आपको ब्रोकर व अन्य साथियों द्वारा यह सूचना मिले कि अमुक शेयर में लगातार तेजी दिखाई दे रही है

इसलिए इसे खरीद लेना चाहिए तो आप उस टिप्स को सुनें और उस पर विचार करें कि कहीं ये शेयर सिर्फ इसलिए तो नहीं चल रहा, क्योंकि बाजार में तेजी है या वास्तव में कंपनी द्वारा कुछ सकारात्मक घोषणाएँ हुई हैं।

कई बार ऐसा भी पाया गया है कि ऑपरेटर्स व सटोरिए निजी स्वार्थों के लिए किसी शेयर-विशेष के भाव कृत्रिम रूप से बढ़ा देते हैं, और ऐसा वे खुद खरीदारी करके करते हैं, ताकि उनके कथन की पुष्टि हो जाए।

ऐसी स्थिति में कई बार नए निवेशक के साथ अनुभवी भी इस जाल में फँस जाते हैं; क्योंकि इस कृत्रिम खरीद के दौरान रोजाना अमुक शेयर के भाव बढ़ते जाते हैं, जिससे नए लोगों का भी ऐसे शेयर में विश्वास बढ़ने लगता है।

ऐसे में निवेशकों द्वारा जब भारी पैमाने पर ऊँचे दाम पर खरीद होने लगती है तो जिन लोगों ने इस कृत्रिम तेजी का जाल बुना था, वे लोग अपने कम भाव पर खरीदे गए शेयर ऊँचे भाव पर इन नए निवेशकों को बेचते जाते हैं।

एक स्थिति ऐसी आती है, जब शेयरों का भाव बढ़ना बंद हो जाता है और ऊँचे भाव पर शेयर बाजार के खिलाड़ी शेयर खरीदना बंद कर देते हैं और फिर बिकवाली के दबाव में भाव गिरने शुरू हो जाते हैं।

‘पंप एंड डंप’ की इस रणनीति में मुश्किल में वे निवेशक पड़ जाते हैं, जिन्होंने ऊँचे भाव में शेयर खरीदे थे।

ऐसी स्थिति में वे या तो घाटे में शेयर बेचकर इस तंत्र का शिकार बनते हैं या फिर इस आशा में ऐसे शेयर को सँजोकर रखते हैं कि शायद कभी उसका भाव ऊँचा आ जाए।

लेकिन ज्यादातर देखा गया है कि ऐसे गुमनाम शेयर वापस कभी ऊपर नहीं आते और बाद में ऐसी स्थिति आती है कि उन्हें रद्दी की टोकरी में फेंक देना पड़ता है। इसलिए ‘टिप्स’ सुनिए जरूर, लेकिन निर्णय अपने विवेक से ही कीजिए।

निवेश का नजरिया हो दीर्घकालीन (Long-term investment approach)

प्रतिदिन या प्रति सप्ताह बदलनेवाले शेयरों के भाव अफवाहों, गलत जानकारी, ग्लोबल कारकों, सरकारी उठा-पटक या कंपनी के बारे में उड़ाई गई गलत खबरों से भी प्रभावित हो जाते हैं; क्योंकि खबरों पर होनेवाली जनता की प्रतिक्रिया का शेयरों की कीमत पर भी खासा प्रभाव पड़ता है।

यदि आपने दीर्घकालीन नजरिए (लॉन्ग टर्म) के आधार पर शेयर खरीदे हैं तो धीरे-धीरे शेयर का भाव उसके सही मूल्य को दरशाने लगता है। अतः जब आप निवेश करें, तब दीर्घकालीन आँकड़ों को ही ध्यान में रखें।

यदि आपने लंबे समय के लिए विविधतापूर्ण निवेश किया है तो नुकसान का खतरा कम हो जाता है। इसके अलावा, यदि आप अपने निवेश को लंबे समय तक बनाए रखते हैं तो मूलधन में हुई वृद्धि पर लगनेवाले कर में भी अच्छी-खासी राहत मिलती है।

अगर यह कहा जाए कि दीर्घकालीन निवेश बाजार के उतार-चढ़ाव का इलाज है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। विश्व के मशहूर निवेशक वारेन बफेट तो यहाँ तक कहते हैं कि ‘एक निवेशक की जिंदगी में 20-30 ट्रेड काफी होते हैं।

लेकिन जिस तरह से भारत के शेयर बाजार में निरंतर तेजी दर्ज हो रही है, ऐसे में बहुत से नए निवेशक भी बाजार से जुड़ रहे हैं, और इस तेजी का लाभ जल्द-से-जल्द उठाने के लिए डे-ट्रेडिंग की फिसलन भरी राह पर भी चलने से नहीं चूक रहे हैं।

लेकिन ऐसे लोगों का अल्पकालीन नजरिया एक दिन का होता है और वे दिन भर निरंतर खरीद-बिक्री करते हैं, जो विशुद्ध रूप से सट्टा है।

हालाँकि बहुत से निवेशक ‘स्टॉप लॉस’ की सहायता से खरीद-बिक्री कर सफल भी होते हैं; लेकिन ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम होती है।

यदि शेयर बाजार में निवेश के लिए आपका ‘दीर्घकालीन नजरिया’ नहीं है तो शेयर बाजार में सफल होना मुश्किल है, क्योंकि ‘शॉर्ट टर्म नजरिया’ लालच के भाव को जगाता है, जो असफलता को लेकर आता है।

यदि आपका नजरिया दीर्घकालीन है तो आप किसी भी समय अच्छे फंडामेंटलवाली कंपनियों के शेयर खरीदकर बाजार में निवेश कर सकते हैं।

बाजार कितना भी ऊपर हो, भले ही आपको इस वजह से महँगे शेयर मिले हों, लेकिन लंबी अवधि तक आप यदि इन्हें होल्ड करके रखेंगे तो आपको जरूर लाभ होगा। कम में खरीदें, ऊँचे में बेचें और मुनाफा वसूली करते रहें।

कम में खरीदें, ऊँचे में बेचें (Buy Low Sell High)

शेयर बाजार में सफल होने के सुपर हिट फॉर्मूलों में से यह फॉर्मूला सबसे ज्यादा दमदार है।

लेकिन पढ़ने और सुनने में यह जितना आसान नजर आता है, उतना है नहीं; क्योंकि तार्किक रूप से हिट यह फॉर्मूला निवेशक के लिए अमल में लाना खासा मुश्किल होता है।

इसकी वजह यह है कि यह आदमी के स्वभाव से बिलकुल मेल नहीं खाता।

जब सेंसेक्स (सूचकांक) अपने शबाब पर होता है, तब चारों ओर एक ऐसा सकारात्मक वातावरण छा जाता है कि सभी तरफ सेंसेक्स के और आगे जाने की तथा इस तेजी के लिए विभिन्न कारकों के बारे में बढ़-चढ़कर बातें होने लगती हैं।

लिहाजा, निवेशकों को लगता है कि वे भी इस तेजी का हिस्सा बनकर लाभ कमा सकते हैं और ऐसे में वे शेयरों की ऊँचे भाव पर लिवाली कर लेते हैं।

दरअसल होता यह है कि जब तेजी का दौर होता है, तब प्राय: अच्छी कंपनियों के शेयरों में अप्रत्याशित तेजी दर्ज की जाती है और वे शेयर ओवरवैल्यूड हो जाते हैं।

निवेशक तेजी में इन ओवरवैल्यूड शेयरों को खरीद लेते हैं, जो इस हिट फॉर्मूला (जिसके अनुसार सस्ते में खरीदना चाहिए) के एकदम विपरीत है।

जब तेजी का दौर थमता है, शेयरों की कीमतें घटने लगती हैं, तब बाजार में अफरा-तफरी मच जाती है। शेयरों की कीमतें घटती देख तब लोग बिकवाली करने लगते हैं।

ऐसा निवेशक इस डर से करते हैं कि कहीं शेयर की कीमत इतनी नीचे न चली जाए कि उन्हें बरबाद होना पड़े ! जाहिर है, ऐसे में निवेश के हिट फॉर्मूले (ऊँचे में बेचें) के एकदम विपरीत निवेशक का व्यवहार होता है।

ऊँची कीमत में शेयर खरीदकर कम कीमत पर बेचना-यह गलत चक्र तब तक चलता रहता है, जब तक कि निवेशक इसमें से निकलने की पूरे मन से कोशिश नहीं करता।

इस गलत चक्र का अनुसरण सन् 2008 में बहुत से निवेशकों ने किया। कई निवेशकों ने सेंसेक्स के 20,000 के आँकड़े को पार करता देख भारी मात्रा में शेयरों में पैसा लगाया और ऊँचे मूल्य पर शेयर खरीदे।

लेकिन 21 जनवरी, 2008 से सेंसेक्स में आई अभूतपूर्व गिरावट से ऐसे निवेशकों के पाँव के नीचे से जमीन सरक गई। 20 व 21 हजार पर पहुँचे सेंसेक्स के समय जिन निवेशकों ने आनन-फानन में जल्दी पैसा कमा लेने के लिहाज से बाजार में पैसा लगाया

उन्हें बाजार में आई मंदी से सेंसेक्स के वापस 10,000 से नीचे पहुँच जाने पर कैसा महसूस हुआ होगा, यह समझा जा सकता है।

चिंताजनक स्थिति तो तब पैदा हो जाती है, जब ऐसे निवेशक बाजार में तेजी आने का बेसब्री से इंतजार करते हैं और जब उनके खरीद मूल्य से ऊपर उन्हें 2030 प्रतिशत का लाभ दिखाई देता है

तब भी वे इस लालच में शेयर नहीं बेचते कि शायद उन्हें उस शेयर से 100 प्रतिशत फायदा हो जाए! आशा का यह गुब्बारा फिर उस समय अचानक फूट जाता है, जब बाजार में किन्हीं कारणों से दुबारा मंदी का दौर शुरू होता है।

इसलिए एक निवेशक के लिए जरूरी है कि वह शेयर बाजार की प्रकृति को समझे और थोड़े-थोड़े अंतराल पर मुनाफा वसूली करता रहे; क्योंकि शेयर बाजार में यह कहा जाता है कि बाजार का उच्चतम स्तर तथा न्यूनतम स्तर कोई नहीं आँक सकता।

बेहतर है कि जब आपको हैंडसम रिटर्न मिल रहा है तो आप कुल शेयर में से उतने शेयर बेच दें, जिससे आपको इतना रिटर्न मिल जाए कि आपका शेयर को खरीदने में हुआ खर्च निकल आए।

ऐसा कर आप अपनी लगाई गई पूँजी को वापस पा लेते हैं और सुरक्षित स्थिति में बचे हुए शेयरों को दीर्घ अवधि में और अच्छा रिटर्न पाने की आस में रख सकते हैं।

उदाहरण के लिए, यदि किसी निवेशक ने वालचंद इंडस्ट्री के 40 शेयर 1,400 रुपए प्रति शेयर मूल्य के हिसाब से खरीदे।

यदि छह महीने में शेयर की कीमत 3,000 रुपए प्रति शेयर हो जाती है तो ऐसी स्थिति में बेहतर यह होगा कि निवेशक 20 शेयर बेचकर 60,000 रुपए प्राप्त कर ले।

इससे एक तो उसको 40 शेयर खरीदने में लगी 56,000 रुपए की पूँजी वापस प्राप्त हो जाएगी तथा 4,000 रुपए अतिरिक्त भी प्राप्त हो जाएँगे। अब निवेशक सुरक्षित होकर उस शेयर के और ऊपर जाने का इंतजार कर सकता है। इसलिए मुनाफा वसूली (प्रॉफिट बुक) करना जरूरी है।

दरअसल, शेयरों की उच्चतम स्तर पर बिकवाली (सेलिंग) और न्यूनतम स्तर पर लिवाली (बाइंग) करना नामुमकिन है।

इसलिए बाजार विश्लेषकों का भी कहना है कि शेयरों की ठीक-ठीक कीमत मिलने पर थोड़ी सी प्रॉफिट बुकिंग की जानी चाहिए। मुनाफा वसूली करते वक्त इस बात का जरूर ध्यान रखना चाहिए कि यदि लिवाली के एक साल के भीतर बिकवाली की जाती है

तो निवेशक को अल्पकालिक पूँजीगत लाभ कर (शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन टैक्स) देना होता है। इसके प्रॉफिट की गणना करते वक्त निवेशक को सिक्युरिटी ट्रांजेक्शन टैक्स (एस.टी.टी.) का भी ध्यान रखना चाहिए।

भीड़ का अनुसरण कभी न करें (Never ollow the crowd)

विश्व-प्रसिद्ध निवेशक वारेन बफे का मानना है कि “जब भीड़ निवेश (इनवेस्ट) करे तो बाजार से दूरी बना लेनी चाहिए और जब लोग मार्केट से दूरी बना लें, तब एक समझदार निवेशक को अच्छी कंपनियों में निवेश करना चाहिए।

” बफे की कही इस बात को निवेशक यदि ‘गुरुमंत्र’ समझकर प्रयोग में लाए तो वह एक सफल निवेशक बन सकता है। बफे की इस बात को रिलायंस पॉवर के इश्यू (पब्लिक) से समझा जा सकता है।

जब रिलायंस पॉवर का इश्यू बाजार में आ गया तो इस तरफ निवेशकों का इतना झुकाव हुआ कि ये इश्यू कई गुना भरा गया। परंतु उसके बाद बाजार का सेंटीमेंट अन्य कारणों से खराब होने के कारण इसका भाव डिस्काउंट में आ गया।

जिन लोगों ने पॉवर के इश्यू पर टूट पड़ी भीड़ को देखकर कहीं से उधार पैसा लेकर यह सोचकर निवेश किया होगा कि इश्यू ऊँचे दाम पर सूचीबद्ध (लिस्टेड) होगा और वे तुरंत पैसा बना लेंगे, उन्हें जबरदस्त झटका लगा होगा।

हालांकि बाद में कंपनी के प्रमोटर अनिल अंबानी ने बोनस शेयर जारी करके निवेशकों को हुए नुकसान की भरपाई करने की कोशिश की।

परंतु ऐसे प्रमोटर बाजार में बहुत कम हैं और रिलायंस पॉवर को तो बाजार विश्लेषकों ने अच्छी फंडामेंटलवाली कंपनी बताया था।

लेकिन ऐसा देखा गया है कि बाजार की तेजी का लाभ उठाने के लिए तेजी के दौर में अनेक इनीशियल पब्लिक ऑफर (आई.पी.ओ.) बाजार में आते हैं और निवेशक ऊँचे प्रीमियम के लालच में बिना कंपनियों का फंडामेंटल जाने भीड़ को देखकर निवेश कर देते हैं।

उस दौरान यदि बाजार में अस्थिरता (वोलेटिलिटी) का दौर जारी रहे तो प्रीमियम तो दूर, इश्यू सूचीबद्ध होने के बाद कुछ कंपनियों के शेयर की कीमत उनके प्राइस बैंड की आधी या एक-चौथाई हो जाती है।

हमने देखा भी है कि एक के बाद एक कई कंपनियों ने अपने पब्लिक इश्यू भारी-भरकम प्राइस बैंड के साथ बाजार में उतारे और जिन निवेशकों ने बिना कंपनी का फंडामेंटल जाने निवेश किया, वे बाद में बुरी तरह पछताए।

भावनाओं से नहीं, विवेक से करें शेयर कारोबार (Do Stock Trading With Discretion, Not With Feelings)

लालच और भय मन की दो ऐसी अवस्थाएँ हैं, जिनसे शेयर निवेशक पूरी तरह ओत-प्रोत रहते हैं। इतना ही नहीं, भावनाएँ तो खुदरा निवेशकों के मन पर राज करती हैं।

यही कारण है कि बाजार चढ़ता है तो एक आम निवेशक लोभ व लालच के कारण बिकवाली (सेलिंग) नहीं करता है; क्योंकि उसे लगता है कि शायद शेयरों की कीमत और बढ़ेगी, और इस तरह बिकवाली का मौका वह खो देता है।

इसी तरह भय या डर की भावना निवेशक में इस कदर व्याप्त रहती है कि जैसे ही बाजार गिरता है, वह भय के कारण अपने शेयरों को कम दाम में बेच देता है।

लालच और भय जैसी भावनाओं के चलते भी कई बार शेयर बाजार में इतने उतार-चढ़ाव देखे जाते हैं, जिसे बाजार की भाषा में ‘मार्केट सेंटिमेंट्स’ कहा जाता है।

इसलिए जरूरी है कि इन भावनाओं पर काबू पाएँ और जब बाजार में तेजी अपने उच्चतम शिखर पर पहुँच गई हो और चारों ओर तेजी की प्रामाणिकता पर सवाल उठने शुरू हो गए हों तो समझ लीजिए कि आपका शेयरों को बेचकर प्रॉफिट बुक (लाभप्राप्ति) करने का समय आ गया है।

यदि उस समय आपने विवेक से काम नहीं लिया और समय पर बिकवाली नहीं की तो आप स्वयं अपनी सफलता को असफलता में बदल डालेंगे।

यह सच है कि शेयर बाजार में निवेश दीर्घावधि के लिए करना चाहिए, लेकिन यदि मध्यावधि या अल्पावधि में लाभ नजर आए तो शेयरों को बेचकर मुनाफा वसूली (प्रॉफिट बुक) कर लेनी चाहिए।

वरना जनवरी 2008 के तीसरे सप्ताह में जिस तरह लाखों निवेशकों का जो हश्र हुआ, वैसा आपका भी हो सकता है।

जनवरी 2008 के तीसरे सप्ताह में जब बाजार 5,000 पॉइंट टूटा, तब लाखों निवेशक मुनाफे से घाटे में चले गए।

इसलिए शेयर बाजार में प्रॉफिट बुक करते रहें; क्योंकि जो निवेशक मुनाफा कमाने के उद्देश्य से योजनाबद्ध तरीके से नियमित निवेश करते हैं, उन्हें निश्चित तौर पर सफलता मिलती है।

यही कारण है कि जानकारी और विश्लेषण से किए गए निवेश में नुकसान की संभावना कम होती है। अतः कोई भी निर्णय लेने से पहले भावनाओं से नहीं बल्कि उससे जुड़े आँकड़ों का अध्ययन कर अपने विवेक से निर्णय लें।

जाँच-परखकर करें निवेश, न कि देखा-देखी (Invest By Examining, Not Seen)

निवेश करना भी एक कला है। यदि आपको यह कला समझ में नहीं आती है तो किसी पेशेवर की सलाह लें और इस दौरान अपनी समझ विकसित करने के लिए भी प्रयासरत रहें।

यदि आप किसी कंपनी के फंडामेंटल जाँचे-परखे बिना रातोरात लखपति बनने की इच्छा के साथ शेयरों का सौदा करेंगे तो आपको रातोरात लाखों गँवाने की तैयारी भी रखनी पड़ेगी।

आप सिर्फ दूसरों को देखकर यह भ्रम पाल लें कि आपके दोस्त ने शेयर बाजार से पैसा कमाया है तो आप भी कमा लेंगे, ऐसी मान्यता और आशा झूठी प्रमाणित होती है।

शेयर बाजार में निवेश अलग-अलग व्यक्तियों को अलग-अलग परिणाम देता है। जब बाजार में निरंतर तेजी का माहौल होता है

तो जिन निवेशकों ने बाजार में निवेश नहीं किया होता है, वे यह सोचकर दु:खी होने लगते हैं कि लोग कमाकर ले गए और हम सोचते ही रह गए; और इस सोच के साथ बाजार में छलाँग लगा बैठते हैं।

जल्दबाजी में ऐसे निवेशक न तो कंपनी के प्रबंधन को देख पाते हैं और न ही उनका पिछला रिकॉर्ड। जाहिर है, ऐसे निवेश के साथ जोखिम का अनुपात भी काफी बड़ा होता है।

यदि आप जुआरी की तरह जुआ समझकर निवेश करेंगे तो शेयर बाजार भी आपको जुआरी ही बनाएगा; परंतु यदि आप ‘सिस्टेमिटक इनवेस्टमेंट’ समझकर निवेश करेंगे तो आप एक सफल निवेशक बनेंगे।

बाजार के विशेषज्ञ तो अकसर इस बात पर आश्चर्य प्रकट करते हैं कि लोग 50-100 रुपए की चीज खरीदने बाजार में जाते हैं, तब तो उनका भाव, क्वालिटी और अन्य कई चीजें देखते हैं, लेकिन हजारों रुपए के शेयर लेते वक्त अपने आँख-कान बंद कर निवेश कैसे कर देते हैं ?

यदि लाभदायक निवेश करना है तो इन बातों पर ध्यान दें

  • केवल सूचीबद्ध शेयर ही खरीदें।
  • केवल सक्रिय शेयर ही खरीदें।
  • बहुत कम शेयर होल्डरोंवाली कंपनी में निवेश न करें।
  • कंपनी का प्रबंधन देखें।
  • कंपनी के कामकाज की विविधता तथा उसके विकास की संभावनाओं पर गौर करें।
  • कंपनी के वित्तीय हालात की जाँच-पड़ताल करें और वित्तीय जाँच-पड़ताल के लिए विभिन्न मापदंडों जैसे प्रति शेयर बुक वैल्यू, रिजर्व, लाभ पुनर्निवेश, प्रति शेयर आमदनी, पी/ई अनुपात, यील्ड, आर.ओ.सी.ई. व पी/ई अनुपात आदि कसौटियों पर विभिन्न कंपनियों को कसकर निवेश संबंधी निर्णय लें।

(इन सभी वित्तीय मापदंडों को किस प्रकार समझा जाए, यह विस्तार से आगामी अध्याय में बताया गया है।)

निवेश में समय का महत्त्व (Importance of Time Abroad)

निवेश में समय का बहुत महत्त्व है। शेयर खरीदने या शेयर बेचने के लिए यदि सही समय की नब्ज को आपने पकड़ लिया तो समझिए, आपको निवेश से अच्छी आमदनी होगी।

हालाँकि समय की नब्ज पकड़ना एक कला है, और यह कला अनुभव से आती है। पर हम आपको कुछ सुझाव दे सकते हैं

  • यदि शेयर का दाम बुरी तरह गिर गया है तो उसके तुरंत बाद उसे न बेचें।
  • शेयर के भाव का गिरना, उसे खरीदने का संकेत देता है।
  • अगर आप किसी मजबूत फंडामेंटलवाली कंपनी के शेयर खरीदना चाहते हैं, लेकिन उसके भाव आपको ज्यादा लग रहे हैं तो आप तब तक सही भाव की ताक में बैठे रहें, जब तक कि निवेशकों की भीड़ का उत्साह उस शेयर के प्रति ठंडा नहीं पड़ जाता।
  • कंपनियों की वार्षिक व अर्धवार्षिक रिपोर्ट पर नजर रखें और कंपनियों द्वारा नई योजनाओं की घोषणा की खबर संचार माध्यमों द्वारा जानने के बाद यदि आपकी रुचि है तो उस शेयर को उसी दिन खरीद लें। इन जानकारियों से शेयरों की खरीदारी का दबाव बनता है और आपके द्वारा खरीदने से पहले शेयर की कीमत में वृद्धि हो जाती है।
  • यदि किसी शेयर में अचानक उछाल आए तो उसे खरीदने मत दौडिए; क्योंकि यह देखा गया है कि इस तरह अचानक भाव चढ़ने के बाद दुबारा 20 प्रतिशत से 25 प्रतिशत तक कीमतें नीचे गिर जाती हैं। यदि आप इस समय शेयर खरीदें तो आपको मुनाफा होगा।

तेजी व मंदी दोनों का लाभ उठाएँ (Take Advantage of Both The Boom And Fall)

ऐसा माना जाता है कि न तो तेजी लंबे समय तक टिकती है और न ही मंदी का माहौल बहुत लंबे समय तक चलता है।

तेजी के बाद मंदी और मंदी के बाद फिर तेजीये चक्र हर बाजार की नियति है तो शेयर बाजार इससे अछूता कैसे रह सकता है? इसलिए यदि निवेशक भी इस चक्र के अनुसार अपनी निवेश-नीति बनाए तो वह सफल हो सकता है।

यदि तेजी के समय शेयरों को बेचा जाए और मंदी के समय खरीदा जाए तो निवेशक इस चक्र का फायदा उठा सकते हैं।

लेकिन होता है इसका एकदम उलटातेजी के दौरान जब शेयर बाजार में उछाल आता है और ज्यादातर शेयरों के दाम चढ़ने लगते हैं, तब निवेशक शेयर खरीदते हैं और जब मंदी का दौर आता है

तब उनके पास कम कीमतों पर अच्छी कंपनियों के शेयर खरीदने के लिए पैसे ही नहीं होते; क्योंकि उन्होंने ऊँचे भावों में शेयर खरीदकर पैसों को फँसा दिया होता है।

ऐसे में दोनों ही अवस्था का लाभ निवेशक नहीं उठा पाता। इसलिए बेहतर है कि आप अर्थव्यवस्था के नियम को भली-भाँति समझ लें।

तेजी का मतलब यह है कि अर्थव्यवस्था में उसकी क्षमता से अधिक कार्य हो रहा है। जाहिर है, उसे सामान्य स्तर पर जाने के लिए मंदी का आना जरूरी है।

अधिकतम दाम की प्रतीक्षा न करें (Do Not Wait for The Maximum Price)

ज्यादातर निवेशक इसी कोशिश में रहते हैं कि वे उस समय शेयर बेचें, जब शेयर अधिकतम स्तर पर हो, ताकि उन्हें ज्यादा-से-ज्यादा मुनाफा हो।

लेकिन निन्यानवें के फेर में पड़कर निवेशक सिर्फ अपने फायदे का कागजी प्रतिशत ही निकालते रह जाते हैं; क्योंकि यह पाया गया है कि शेयरों के दाम अधिकतम स्तर पर पहुँचने के बाद अचानक काफी गिर जाते हैं।

इसलिए अधिकतम कीमत पाने की प्रतीक्षा न करें। जैसे ही पर्याप्त – मुनाफा हो, शेयर बेच दें।

रोजाना अपने शेयरों के नफे-नुकसान की गणना न करें (Do Not Calculate The Daily Loss of Your Shares)

हमारे देश में शेयरों में निवेश को लेकर मानसिकता काफी भिन्न है। लोगों को लगता है कि यदि शेयरों में पैसा निवेश किया है तो तुरंत दोगुना हो जाएगा।

ऐसी अपेक्षाएँ रखनेवाले निवेशक निवेश के बाद प्रायः रोजाना उस शेयर की कीमत में हुई घट-बढ़ को देखकर दुःखी व सुखी होते रहते हैं।

कई बार ऐसा होता है कि कई महीनों तक कुछ शेयर बाजार में चलते ही नहीं हैं, क्योंकि ऐसा सेक्टर में आई नकारात्मक खबर या सरकारी घोषणा के परिणामस्वरूप होता है।

ऐसे में वे रिटेल निवेशक, जो रोजाना अपने शेयरों की कीमतों को देखते हैं, वे महीनों तक शेयर की यथावत् स्थिति को देखकर तनाव से गुजरते हैं।

ऐसे निवेशकों के लिए आर्थिक सलाहकारों की सलाह है कि जब सावधि जमा (फिक्स्ड डिपॉजिट), पी.पी.एफ. (पब्लिक प्रोविडेंट फंड) आदि में निवेश कर निवेशक रोजाना बैंक जाकर यह नहीं पूछता कि उसके निवेश में कितनी वृद्धि हुई है

तो शेयर खरीदने के दूसरे ही दिन से भाव जानने और उसके आधार पर कितना कमाया या कितना गँवाया, यह जानने की इतनी उत्सुकता क्यों होती है? बेहतर तो यह होगा कि उसी तरह धैर्य रखें, जिस तरह अन्य जगह निवेश करते वक्त आप रखते हैं।

निवेशक क्या करें और क्या न करें (What To Do And What Not To Do)

क्या करें (What To Do)

  • हमेशा सिक्यूरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड (सेबी) के द्वारा पंजीकृत वित्तीय बाजार संस्थाओं के साथ संबंध रखें।
  • अपने ब्रोकर से कॉण्ट्रेक्ट नोट लेना न भूलें, क्योंकि ट्रांजेक्शन पर एकाउंट स्टेटमेंट जरूर प्राप्त करें।
  • जिस दस्तावेज या कागजात को आप कंपनी को भेजनेवाले हैं, उसकी फोटोकॉपी अपने पास रखें।
  • शेयर खरीदने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि आपके पास समुचित धन है या नहीं।
  • निवेश के सभी दस्तावेज जैसे एप्लीकेशन फॉर्म, कॉण्ट्रेक्ट नोट, एक्नॉलेजमेंट स्लिप आदि की कॉपी हमेशा अपने पास रखें।
  • यदि किसी महत्त्वपूर्ण दस्तावेज को कहीं भेजना है तो उसके लिए रजिस्टर्ड पोस्ट का इस्तेमाल करें, ताकि डिलीवरी की सूचना आपको मिल जाए।
  • ब्रोकर/एजेंट/डिपॉजिटरी पार्टिसिपेंट को हमेशा स्पष्ट निर्देश दें।
  • यदि ब्रोकर के साथ हुए सौदे में आपको संदेह है तो एक्सचेंज की वेबसाइट पर उसकी वास्तविकता की पुष्टि करें।
  • कारोबारी निवेश नीतियाँ अपनाते समय जोखिम उठाने की क्षमता का खयाल रखें और यह जान लें कि शेयर बाजार में निवेश पर गारंटीशुदा रिटर्न नहीं मिलता है।

क्या न करें (What Not To Do)

  • ऐसे ब्रोकर/सब ब्रोकर या बिचौलिए के साथ कारोबार न करें, जो गैर-पंजीकृत हों।
  • टिप्स के आधार पर ट्रेडिंग न करें।
  • अपने डी-मैट रोजगार की रसीद बुक किसी को न दें और इंस्ट्रक्शन स्लिप को सँभालकर रखें।
  • अफवाहों के आधार पर ट्रेडिंग का निर्णय न लें।
  • गारंटीशुदा रिटर्न के वायदों के बहकावे में न आएँ।
  • पोस्टडेटेड चेक को भुगतान की गारंटी न मानें।
  • सही व अधिकृत व्यक्ति से सलाह लेने में न हिचकें।
  • निवेश करते समय आँख-कान खुले रखें।
  • कंपनियों की विज्ञापनबाजी के बहकावे में न आएँ।

भारत का प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी)(Securities and Exchange Board of India (SEBI)) 

प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सिक्यूरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड) का गठन निवेशकों के हित की रक्षा और भारत के सभी प्रतिभूति बाजारों (सिक्यूरिटी मार्केट) का संचालन व विकास करने के उद्देश्य से सन् 1992 में किया गया था।

सेबी के प्रमुख कार्यों में भारत के सभी स्टॉक एक्सचेंजों का नियंत्रण, कारोबार पर नियंत्रण, निवेशकों की शिकायतों का समाधान, वित्तीय बाजार संस्थाओं का पंजीकरण और निवेशकों को प्रशिक्षण देने आदि के कार्य शामिल हैं।

इस स्वाधीन संस्था का संचालन एक वैधानिक बोर्ड करता है, जिसमें छह सदस्य और एक चेयरमैन होता है। निवेशकों का शेयरों के कारोबार में विश्वास बना रहे, इस बात को सेबी पूरी तरह सुनिश्चित करता है।

निवेशकों की परेशानियाँ तथा उनका निराकरण (डिपार्टमेंट ऑफ इनवेस्टर सर्विसेज) – Investor problems and their solutions (Department of Investor Services)

डिपार्टमेंट ऑफ इनवेस्टर सर्विसेज (DIS) की स्थापना सन् 1986 में की गई थी। निवेशकों की सूचीबद्ध कंपनियों और एक्सचेंज के सदस्यों के प्रति शिकायतों व परेशानियों का निपटान एक्सचेंज द्वारा किया जाता है।

इसके अलावा एक्सचेंज सदस्यों और निवेशकों के बीच आर्बीट्रेशन प्रोसेस में भी सहायता करता है। दरअसल, शेयर बाजार का विकास तभी संभव है, जब निवेशक को शेयर बाजार में निवेश करना सुरक्षित लगे।

जब निवेशक को यह लगता है कि बाजार को संचालित करनेवाली संस्था के नियम व कायदे सभी के लिए समान हैं, भले ही वह एक छोटा सा निवेशक हो या बाजार का बड़ा खिलाड़ी

तो उसका भरोसा व विश्वास शेयर बाजार पर बना रहता है और वह बाजार में सक्रिय भागीदारी विश्वास के साथ करता है।

निवेशकों तथा गैर-सदस्यों के मध्य विवाद या असहमति से उत्पन्न होनेवाले मामलों के जल्दी निपटाने के उद्देश्य से एक्सचेंज ने आर्बीट्रेशन के लिए विधि-विधान तय किए हैं।

शेयर बाजार टिप्स – Share Market Tips in Hindi ये जानकारी आपको कैसे लगी निचे Comment में जरूर बताये।

।। धन्यवाद ।।

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श्रेणी: Share Market

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