स्टॉक मार्केट के बड़ी गिरावटें – Stock Market Crashes in Hindi.

हर देश की अर्थव्यवस्था चक्रीय होती है। और इन्हीं चक्रों (साइकल्स) के आधार पर शेयर बाजार में कभी तेजी तो कभी मंदी का दौर आता है।

हालाँकि हर देश में शेयर बाजार में आनेवाली तेजी या मंदी वहाँ की घरेलू अर्थव्यवस्था पर निर्भर करती है लेकिन अब वैश्विक हो चके शेयर बाजार पर दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था का भी प्रभाव पड़ता है।

उदाहरण के लिए, 2008 में अमेरिका की अर्थव्यवस्था में उत्पन्न हुए सबप्राइम संकट ने न सिर्फ अमेरिका के शेयर बाजार, बल्कि पूरे विश्व के शेयर बाजारों को प्रभावित किया।

इसलिए यह कहा जाए कि शेयर बाजार का तेजी व मंदी, दोनों के साथ नाता उतना ही पुराना है, जितना शेयर बाजार खुद पुराना है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

मार्केट में गिरावटें नियमित अंतराल के बाद आती हैं और फिर दुबारा कुछ समय बाद शेयर बाजार में रौनक भी लौट आती है।

हालाँकि भारतीय शेयर बाजार में पूर्व में भी अचानक कई बड़ी गिरावटें देखी गई | हैं, लेकिन उनका प्रमुख कारण शेयर बाजार में लगातार घोटाले रहे।

उदाहरण के लिए, | हर्षद मेहता घोटाला एवं केतन पारिख घोटाला आदि। इसलिए ज्यादातर लोगों को लगता है कि अचानक जो गिरावट आती है, उसका संबंध घोटाले से होता है, लेकिन बाजार में गिरावट (मार्केट क्रेश) का कारण सिर्फ घोटाले से नहीं है।

कुछ गिरावटें तो ऐसी हैं जिनसे शेयर बाजारों के उबरने में वर्षों लग गए। आइए, हम भारतीय और विदेशी शेयर बाजारों की कुछ बड़ी गिरावटों के इतिहास पर नजर डालते हैं

1. सन् 1929 का क्रेश और ग्रेट डिप्रेशन (मंदी)।

इतिहास के पन्नों में सन् 1929 की गिरावट (क्रेश) अब तक की सबसे बड़ी गिरावट के रूप में दर्ज है। यह गिरावट इतनी भयंकर थी कि इसने धीरे-धीरे मंदी का रूप ले लिया और इससे उबरने में दशकों का समय लगा।

सन् 1929 का क्रेश इस बात का उदाहरण है कि परिस्थितियाँ कैसे बदलती हैं और किस तरह घबराहट का माहौल न सिर्फ शेयर बाजार के निवेशकों को, अपितु सभी को अपने घेरे में ले लेता है।

सन् 1929 में हुए क्रेश के ‘लहरीय-प्रभाव’ ने इक्विटी निवेशकों के साथ-साथ अमेरिका के हर व्यक्ति को अपनी गिरफ्त में ले लिया था। अमेरिका जैसे विकसित देश में बुल और बीयर मार्केट का बारी-बारी से आना, अमेरिकी निवेशकों के लिए आम बात थी।

मुख्य तौर पर यह 7 से 10 सालों तक बुल (तेजी का) फेज चलता है और उसके बाद 8 से 10 साल तक बीयर फेज (मंदी का दौर) चलता है।

सन् 1929 से पहले तक भी अपटेंड ही चल रहा था, क्योंकि 1920 में अर्थव्यवस्था को तेजी देनेवाले कई कारक थे जैसे औद्योगीकरण तकनीक का विकास, रेडियो, ऑटोमोबाइल और हवाई यात्रा के सुनहरे दौर ने अर्थव्यवस्था को बहुत फायदा पहुंचाया।

मंदी की शुरुआत का कारण – Reason for the Beginning of the Recession

किसी भी अर्थव्यवस्था में आनेवाली मंदी (डिप्रेशन) के दौर के कई स्वतंत्र कारक होते हैं, जो समय विशेष में सम्मिलित प्रभाव डालते हैं।

सन् 1929 की मंदी के प्रमुख कारकों में तत्कालीन अर्थव्यवस्था की ढाँचागत कमजोरी तथा उस समय की कुछ विशेष घटनाओं को जिम्मेदार माना जाता है।

इन विशेष घटनाओं में बड़े बैंकों का डूबना, इससे शेयर मार्केट का धराशायी होना तथा ब्रिटेन की सरकार का गोल्ड स्टैंडर्ड (स्वर्ण मानक) पर पुनः लौटना शामिल माना गया। मंदी की शुरुआत होने पर माँग-आपूर्ति का संतुलन तेजी से गड़बड़ाने लगता है।

इस बिगड़ते संतुलन में अविश्वास शामिल होकर संक्रमण की भाँति अर्थव्यवस्था के सदस्य देशों में फैल जाता है। ऐसी अवस्था में उपभोक्ता के उपभोग (कंजंप्शन) में गिरावट आती है, जो कि स्थिति को और बिगाड़ देती है।

मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था के समर्थक इस मंदी के लिए सरकारी नीति तथा निर्णयों को जिम्मेदार ठहराते हैं तथा सरकारी नियंत्रणवाली अर्थव्यवस्था के समर्थक मक्त बाजार अर्थव्यवस्था के ढाँचे को।

जबकि वस्तुस्थिति यह होती है कि दोनों पक्षों के कई कारक मिलकर मंदी का माहौल बनाते हैं।

सन् 1929 की मंदी अचानक नहीं आई। पहले जो सूचकांक डाउ जोंस 60 अंक पर था, वह सन् 1929 आते-आते 400 अंक तक पहुँच गया।

लाखों लोगों को लखपति होते देख हर कोई इस तेजी का फायदा उठाने के लिए अपना सबकुछ बेचकर नकदी को शेयर बाजार में लगाने लगा।

उस समय मार्जिन का उपयोग इतना बढ़ गया कि बाजार में (सट्टेबाजी) स्पेकूलेशन बढ़ने लगा और इसको कंट्रोल करने के लिए

उस समय फेडरल रिजर्व ने अंधाधुंध बढ़ रहे शेयर बाजार में थोड़ी रुकावट लाकर उसे संतुलित करने के लिहाज से कई बार ब्याज दरों में बढ़ोतरी की ऐसा नहीं है कि सन् 1928 में लोगों को संकेत नहीं मिले कि अर्थव्यवस्था का सुनहरा बुलबुला फूटने वाला है

लेकिन किसी ने भी उस ‘बुल दौर’ (तेजी के दौर) के मोहवश उन संकेतों की तरफ ध्यान नहीं दिया; हालाँकि बहुत बड़ी गिरावट आने से पहले कई छोटी-छोटी गिरावटें आईं।

सबसे पहला क्रेश मार्च 1929 में आया। उस समय शेयरों की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव आया और सितंबर आते-आते यह स्पष्ट हो गया कि शेयर बाजार मंदी के दौर में प्रविष्ट हो गया है।

उस वर्ष नवंबर में डाउ जोंस, जो कभी 400 के स्तर पर पहुँच गया था, गिरकर 145 पर गया।

इससे कई लोगों की नौकरियाँ चली गईं और जिन्होंने अपना सबकुछ दाँव पर लगाकर शेयर बाजार में पैसा लगाया था, वे सड़क पर आ गए। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि अमेरिका की आधी आबादी से ज्यादा लोग गरीबी रेखा के नीचे आ गए।

वे लोग, जो शेयर बाजार की माया से लखपति बने थे, भिखारी बन गए। पूरे विश्व पर इस मंदी का असर होने लगा और सन् 1933 तक वैश्विक मंदी ने दस्तक दे दी।

मंदी का यह दौर एक दशक से ज्यादा चला। आखिर सन् 1941 में विश्वयुद्ध की घोषणा के बाद धीरे-धीरे अर्थव्यवस्था मंदी से उबरने में कामयाब हुई।

युद्ध की तैयारियों ने अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर ला दिया। सन् 1929 की मंदी से यह सबक मिला कि किस तरह अर्थव्यवस्था कुलाँचे मारते-मारते गोते भी लगा सकती है!

सन् 1973 का ऑयल शॉक – Oil Shock of 1973

तेल उत्पादकों द्वारा तेल की कीमतों को चौगुना करने से सन् 1973 में बड़ी गिरावट दर्ज हुई। 17 अक्तूबर, 1973 को तेल उत्पादक देशों ने घोषणा कर दी कि वे अमेरिका को शिपिंग ऑयल देना रोक देंगे और ऐसा ही जापान व पश्चिमी यूरोप के साथ भी उन्होंने किया।

यद्यपि ऐसा वे अमेरिका द्वारा इजराइल की सहायता के विरोधस्वरूप कर रहे थे। तेल की कीमतों के बढ़ने से महँगाई में जबरदस्त बढ़ोतरी हो गई और चारों ओर हाहाकार मच गया।

बाद में तेल की कीमतों में स्थायित्व आया, लेकिन सन् 1981 में जब ईरान और इराक में युद्ध शुरू हुआ तो एक बार फिर तेल की कीमतें बढ़ गईं, जो युद्ध के बाद धीरे-धीरे नीचे आईं।

इस ऑयल शॉक ने एक बात पुख्ता कर दी कि जब भी तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आता है तो वह अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी होता है।

सन् 1987 का क्रेश – Crash of 1987

यह ऐसा दौर था, जब शेयर बाजार में प्रोग्राम ट्रेडिंग चलती थी। प्रोग्राम ट्रेडिंग ऐसा तरीका था जिसमें विभिन्न शेयर बाजारों में किसी इक्विटी की कीमतों के मामूली अंतर को लेकर उत्पन्न हुई ‘ऑर्बिट्रेज’ (हुंडी कारोबार) स्थितियों का फायदा उठाया जाता था।

शेयर बाजारों की कार्यप्रणाली कंप्यूटरीकृत होने के चलते कुछ ही मिनटों के अंतर पर ऑर्बिट्रेज स्थितियों का फायदा लिया जा सकता था। और इसी के चलते 19 अक्तूबर, 1987 को पूरे विश्व के बाजारों में जबरदस्त गिरावट दर्ज हुई।

डाउ जोंस ने तो 500 अंकों का गोता लगाया। शुरुआत बड़ी गिरावट से हुई और बाद में वह मंदी (डिप्रेशन) में परिवर्तित हो गई।

लोगों ने इस अचानक आए क्रेश का जिम्मेदार ‘प्रोग्राम ट्रेडिंग’ को और बाजार के अधिमूल्यन’ (ओवरवैल्यूशन) को माना। दो साल में एस. ऐंड पी. (S&P) 500 का प्राइस अर्निंग रेशियो 10 से उछलकर 19 हो गया।

इस वृद्धि के साथ अर्निंग अपना तालमेल नहीं बिठा पाई और लोग यह मानने लगे कि बाजार ओवरवैल्यड (शेयरों की कीमतों का अत्यधिक बढ़ जाना) हो गया है और यदि गिरावट आती है तो इससे बाजार को सही व संतुलित (करेक्ट) होने का मौका मिलेगा।

लेकिन इस दौरान ही विश्व में चल रही उठा-पटक ने भी इस गिरावट में अपना योगदान किया। अन्य देशों की मुद्राओं की तुलना में डॉलर की कीमत घटने लगी।

सन् 1985 के बाद ब्याज दरें लगातार बढ़ने लगी और अमेरिका का बजटीय घाटा बढ़ने लगा।

बाजार में पैसों की उपलब्धता इतनी कम हो गई कि लोगों के लिए शेयर बेचना तक मुश्किल हो गया। तरलता (लिक्विडिटी) की कमी इस कदर हो गई कि लोगों को यह स्थिति सन् 1929 में आए क्रेश से पहले आई स्थिति की तरह लगने लगी।

सन् 1987 में आए क्रेश के लिए कोई एक कारण जिम्मेदार नहीं था, बल्कि हर घटना का अपना प्रभाव था। लेकिन इस मंदी के दौर से अमेरिका की अर्थव्यवस्था जल्द ही उबर गई, क्योंकि यह सन् 1929 के मंदीवाले दौर जितनी भयंकर व व्यापक नहीं थी।

अमेरिका की अर्थव्यवस्था फिर से उसी तरह सुनहरे दौर में लौट गई, जिस तरह सन् 1920 में विकास के रास्ते पर चलकर आगे बढ़ी थी। सभी तरफ ‘अपवर्ड मूवमेंट’ दिखाई देना लगा और शेयरों की कीमतें एक बार फिर आसमान छूने लगीं।

भारत में उदारीकरण के बाद की पहली बड़ी गिरावट – First Major Decline After Liberalization in India

सन् 1991 के पहले भारतीय बाजार कई तरह की पाबंदियों से इस तरह घिरा था कि अर्थव्यवस्था में एक तरह का ठहराव-सा आने लगा था।

आबादी बढ़ती जा रही थी और इतनी बड़ी आबादी के लिए रोजगार मुहैया करवाने और उसे उपभोग के लिए जरूरी चीजें मुहैया करवाने के लिए एक ऐसे माध्यम की आवश्यकता महसूस होने लगी थी, जिसके द्वारा इन आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके।

लेकिन लाइसेंस राज और सरकारी पाबंदियाँ इतनी थीं कि लोग चाहकर भी अपना उत्पादन नहीं बढ़ा पाते थे।

औद्योगिकीकरण एवं घरेलू उद्योग भी इन पाबंदियों के चलते अपना उचित विकास नहीं कर पा रहे थे।

सरकार के पास इतना धन नहीं था कि वह बढ़ रही आबादी के लिए बिना निजी भागीदारी के ढाँचागत सुविधाएं मुहैया करवा पाए।

इन सब परेशानियों से निकलने के लिए तत्कालीन पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार के तत्त्वावधान में वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने तेजी के साथ आर्थिक सुधारों को लागू करना शुरू किया।

आर्थिक सुधारों के परिणामस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था को खोल दिया गया। उदारीकरण का दौर शुरू होते ही उसका प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर दिखाई देने लगा।

भारतीय शेयर बाजार का तो उदारीकरण ने पूरा स्वरूप ही बदलकर रख दिया। इधर सरकार उदारीकरण को लागू करने की प्रक्रिया में लगी थी, उधर शेयर बाजार में इसका प्रभाव ‘बुल रन’ (तेजी) के रूप में दिखाई देने लगा।

इंडेक्स रिकॉर्ड कायम कर रहा था और बाजार लगातार कुलाँचे भरते हुए ऊपर की ओर अपनी स्थिति कायम करने में सफल होने लगा।

लेकिन यह ‘बुल रन’ कुछ ही व्यक्तियों के हाथों की कठपुतली साबित हुआ। उस समय अकेले हर्षद मेहता, जिसे ‘बिग बुल’ के नाम से जाना जाता था, के पास इतने शेयर आ गए कि वह स्टॉक मार्केट पर राज करने लगा।

उस समय यह कहा जाता था कि ‘बिग बुल’ जिस शेयर को छू देता है, वह सोना हो जाता है। जाहिर है, इसका फायदा हर्षद मेहता ने खूब उठाया।

उसने बिना फंडामेंटलवाली कंपनियों-और कुछ तो उसमें से फर्जी तक थीं-के शेयरों को नाटकीय रूप से खूब ऊपर उठाया। लोगों ने रातोरात पैसा बनाने के लिए ऐसे शेयरों में खूब पैसा लगाया।

लोग कंपनियों के वैल्यूएशन (सही मूल्य-निर्धारण) बिना और बिना किसी रिसर्च के शेयर खरीद रहे थे।

बाद में जब इस बात का खुलासा हआ कि हर्षद मेहता ने कई बैंकों से साँठ-गाँठ करके अनैतिक रूप से धन प्राप्त किया और उसे शेयर बाजार में झोंककर बाजार में सट्टेबाजी को बढ़ावा दिया था।

शेयरों में एक साथ पैसा लगाकर उसने उन शेयरों की बाजार में नाटकीय डिमांड पैदा की और उन्हें निश्चित ऊँचाई तक पहुँचाकर तुरंत बिकवाली शुरू कर देता था। इससे वे लोग डूब गए जिन्होंने ऐसे शेयरों में ऊँचे भावों पर खरीदी की थी।

जब इस घोटाले का खुलासा हुआ, तब ऐसा क्रेश आया कि बाजार अपने निचले स्तर पर चला गया। निवेशकों की होल्डिंग (शेयर्स) मात्र कागज का एक टुकड़ा भर रह गई। यह घोटाला भारतीय शेयर बाजार की पहली सबसे बड़ा मंदी का कारण है

सेंटिमेंट्स इतने खराब हो गए कि लोगों का फिर से शेयर बाजार में विश्वास पैदा होने में कई वर्षों का समय लग गया।

सन् 1997 का एशियाई वित्तीय संकट – Asian Financial Crisis of 1997

एशियाई देशों में वित्तीय संकट का दौर जुलाई 1997 से प्रारंभ हुआ और इसका कारण बना थाईलैंड द्वारा अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करना।

उस समय तक थाईलैंड भारी विदेशी कर्ज से दबकर बुरी तरह दिवालिया हो चुका था। इस संकट का फैलाव दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों तथा जापान में भी हुआ।

इस कारण मुद्रास्फीति बढ़ी, शेयर मार्केट गिरे तथा निजी कर्ज का आकार भी बढ़ा। इस वित्तीय संकट को तथा इसके प्रभाव को खुले तौर पर स्वीकार किया गया, परंतु इसके कारणों तथा निवारण के बारे में स्वाभाविक मतभेद रहा।

इंडोनेशिया, द. कोरिया तथा थाईलैंड इससे सर्वाधिक प्रभावित रहे; जबकि हांगकांग, मलेशिया, लाओस, फिलिपींस भी इस संकट की मार से बच नहीं सके।

चीन, भारत, ताइवान, सिंगापुर जैसे कुछ देश इस वित्तीय संकट से सबसे कम प्रभावित हुए। फिर भी माँग में कमी तथा अविश्वास के माहौल का असर इन देशों में भी महसूस किया गया।

इस वित्तीय संकट से घायल देशों की अर्थव्यवस्था में एक बात गौर करने लायक यह थी कि इन देशों की अर्थव्यवस्था में – विदेशी कर्ज तथा सकल घरेलू उत्पाद का अनुपात 100 प्रतिशत से 180 प्रतिशत तक था।

फूटा डॉट कॉम का बुलबुला-2001

वर्ष 1995 तक इंटरनेट का इस्तेमाल करनेवालों की तादाद में काफी बढ़ोतरी हो गई थी और शेयर बाजार में कारोबार का एक नया ऑनलाइन कंप्यूटरीकृत मार्केट लोगों के बीच तेजी से लोकप्रिय होने लगा।

इनोमेशन टेक्नोलॉजी (आई.टी.) के इस युग में नई पीढ़ी के निवेशक इंटरनेट को बिजनेस का चेहरा काफी हद तक बदल डालने का एक माध्यम समझने लगे।

लोगों के रहन-सहन और जीने के तरीके में जब तेजी से परिवर्तन आते दिखा तो डॉट कॉम ने क्रेज का रूप धर लिया। वर्चुअल वर्ल्ड द्वारा धन कमाने का मंत्र लोगों को इतना रास आने लगा कि हर कोई फिजिकल से इस वर्चुअल वर्ल्ड में प्रवेश कर मालामाल होने की जुगत करने लगा।

हालाँकि ऐसा भी नहीं था कि आई.टी. सिर्फ एक बुलबुला ही था, बल्कि सही मायनों में इंटरनेट ने वाकई में उद्योगों के साथ-साथ सभी सेक्टरों में व्यापार करने का तरीका ही बदल डाला।

हर सेक्टर, भले ही वह बैंकिंग हो या रिटेल या कि ऑटोमोबाइल, सभी जगह कंप्यूटरीकृत कारोबार से न सिर्फ समय की बचत हुई, बल्कि खर्च में भी काफी कटौती हुई।

लेकिन डॉट कॉम की शुरुआत के वक्त जैसे-जैसे उसके प्रभाव आने शुरू हुए, लोगों ने अनुमान लगाया कि भविष्य में बिजनेस करने का यह एकदम नया तरीका बहुत लाभ (प्रॉफिट) देगा। और इसके चलते निवेशक इन शेयरों पर टूट पड़े।

जिससे हर स्टॉक अपने सही व तार्किक मूल्य से कई गुना ज्यादा बढ़ गया।जिन कंपनियों को इंटरनेट से फायदा होने वाला था

उन कंपनियों के शेयरों तथा आई.टी. सेक्टर की कंपनियों के शेयरों की तरफ लोग इस कदर टूट पड़े कि इन कंपनियों का किताबों में कोई प्रॉफिट दर्ज नहीं होने के बावजूद इनका वैल्यूएशन (मूल्य-निर्धारण) आकाश छूने लगा।

पूरे विश्व के शेयर बाजारों में यह ट्रेंड देखा गया और इन डॉट कॉम व इंटरनेट कंपनियों का वैल्यूएशन लगातार बढ़ने लगा।

इन कंपनियों के जब इनीशियल पब्लिक ऑफर बाजार में उतरे तो लोगों ने बढ़-चढ़कर निवेश किया और जब वे शेयर सूचीबद्ध हुए तो निवेशकों ने करोड़ों कमाए।

इतना ही नहीं, इन कंपनियों के कर्मचारियों को जो स्टॉक ऑप्शन उपलब्ध हुए थे (जिनके अंतर्गत उन्हें शेयर खरीदने का अधिकार मिलता है), उन्होंने भी उनकी ऊँची कीमतें पाईं और लखपति हो गए।

डॉट कॉम के इस युग ने लोगों के सोचने के तरीके और विभिन्न मुद्दों से डील करने के तरीके में जबरदस्त परिवर्तन पैदा किया।

लोगों को काम करने की आजादी मिली। कभी भी, कहीं से भी इंटरनेट द्वारा एक-दूसरे से जुड़कर काम करने की स्वतंत्रता ने बिजनेस में क्रांति का काम किया।

पूरे विश्व के शेयर बाजार में इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (सूचना तकनीकी) और डॉट कॉम स्टॉक्स में जबरदस्त ‘बुल रन’ दिखाई दिया।

ऐसा निरंतर बिना अवरोध के चलता रहा, जो वास्तविकता से अलग था। लेकिन जल्दी ही दृश्य हकीकत में बदलकर धरातल पर आ गया; क्योंकि शेयरों का इतना ऊँचा वैल्यूएशन कंपनी को होनेवाले लाभ से कहीं भी मेल नहीं खा रहा था।

इसलिए शेयर बाजार क्रेश होने पर विश्व भर में निवेशकों के कई अरब डॉलर धुआँ हो गए। कई ऊँची उड़ान भरनेवाले शेयरों में तो 90 प्रतिशत तक गिरावट आँकी गई। आज भी नेसडेक का सूचकांक उस स्तर के आसपास कहीं नहीं है

जहाँ इंटरनेट बूम के दौर में दिखलाई देता था। भारतीय बाजारों में उस बूम के दौरान जिन टेक्नोलॉजी फंड की बाढ़-सी आ गई थी, बूम का फायदा उठाने के लिए लॉञ्च हुए ये टेक्नोलॉजी फंड क्रेश के समय अपनी फेस वेल्यू से भी नीचे चले गए और उन्हें वापस ऊपर उठने में कई साल लगे।

भारतीय शेयर बाजार पर डॉट कॉम क्रेश के साथ-साथ ‘केपी स्टॉक’ क्रेश के कारण दोतरफा मार पड़ी।दरअसल, जब डॉट कॉम का जलवा अपना जोर पकड़े था

उस समय भारतीय शेयर बाजार पर केतन पारेख नामक शेयर दलाल ने बैंकों से भारी मात्रा में धन जुटाकर शेयर बाजार में लगाया और कुछ स्टॉक्स की कीमतों को तो आसमान पर पहुँचा दिया।

उस बुल रन’ में इन स्टॉक्स को केपीस्टॉक्स’ कहा जाता था। लेकिन जब तक मामला प्रकाश में आया तो एक तरफ डॉट कॉम का बुलबुला फूटने के आसार और दूसरी ओर केपी स्टॉक्स की हकीकत ने सूचकांक को एक बार फिर मंदी की गिरफ्त में धकेल दिया।

हालाँकि वर्ष 2003 आते-आते बाजार एक बार फिर सुधार पर आया।यह संकट इस बात का उदाहरण है कि कैसे एक अच्छी स्थिति में चल रहे शेयर बाजार को सट्टेबाजी की गतिविधियाँ (स्पेक्यूलेटिव एक्टिविटी) बुरी स्थिति में लाकर पटक सकती हैं।

वर्ष 2004 की गिरावट – Fall of Year 2004

भारतीय शेयर बाजार के लिए वर्ष 2004 की गिरावट कई मायनों में पिछली गिरावटों से काफी अलग थी।

वर्ष 2004 से पहले तक भारतीय शेयर बाजार के निवेशकों ने सेंसेक्स को अचानक गोते लगाते तभी देखा था जब कोई घोटाला प्रकाश में आए या फिर वैश्विक मंदी का असर होने से ऐसा हो।

लेकिन 17 मई, 2004 को आई गिरावट का कारण आम चुनाव का अप्रत्याशित परिणाम रहा। सन् 2004 में आम चुनाव के दौरान ऐसा माहौल बनता दिखा, जिसमें सत्ताधारी एन.डी.ए. सरकार का एक बार फिर आम चुनाव में जीतकर सत्ता पर काबिज होना पक्का लगने लगा।

भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों से बने एन.डी.ए. ने प्रचार के दौरान इस बात की जोरदार घोषणा की थी कि वे सुधारों की प्रक्रिया को जारी रखेंगे और पहले से आक्रामक रूप से सुधारों की प्रक्रिया शुरू कर चुके

एन.डी.ए. के ‘इंडिया शाइनिंग’ के नारे ने बाजार की पूँजीवादी ताकतों को ‘फीलगुड’ का अहसास करवाया और बाजार में तेजी दिखाई देने लगी।

लेकिन चार चरणों में हुई वोटिंग और एग्जिट पोल के नतीजों ने जता दिया कि एन.डी.ए. का जादू नहीं चलेगा।

चुनाव परिणाम में एन.डी.ए. पिछड़ गया और कांग्रेस सबसे पड़ी पार्टी के रूप में उभरकर सामने आई।

कांग्रेस लेफ्ट पार्टियों के सहयोग से सत्ता पर काबिज हो गई। चूँकि बाजार में सुधार प्रक्रिया (मार्केट रिफॉर्म) को लेकर लेफ्ट पार्टियों का रुझान उतना सकारात्मक नहीं था, इसलिए यह चिंता घर करने लगी कि इससे अर्थव्यवस्था की सुधार प्रक्रिया (रिफॉर्म) पर प्रभाव पड़ेगा।

तब मार्केट एक ट्रेडिंग सेशन के दौरान 800 अंक तक गिरकर बंद हुआ। वह पहला ऐसा समय इतिहास में दर्ज हुआ, जब बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में सेंसेक्स के तेजी के साथ गिर जाने के बाद सर्किट फिल्टर लगाकर कुछ समय के लिए ट्रेडिंग रोक दी गई।

चारों ओर हाहाकार मच गया; लेकिन थोड़ा खरीदी आधार (बाइंग सपोर्ट) मिलने के बाद बाजार कुछ सँभला।

लेकिन बाजार बंद होने तक यह 565 अंक तक गिरकर बंद हुआ। 11 प्रतिशत तक गिरे बाजार को उबरने में समय लगा, लेकिन जैसे ही यह खबर आई कि आर्थिक सुधारों के प्रणेता डॉ. मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री बन रहे हैं तो स्टॉक्स में रिकवरी दिखाई देने लगी।

वर्ष 2008 की वैश्विक वित्तीय मंदी – 2008 Global Financial Meltdown

वर्ष 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट 1929 के ‘ग्रेट डिप्रेशन’ के बाद का सबसे बड़ा वित्तीय संकट आँका जा रहा है।

सितंबर 2008 में अमेरिका में वित्तीय संस्थाओं की विफलता व विलयन से यह मंदी स्पष्ट तौर पर दृष्टिगोचर हुई तथा इसे स्वीकार किया गया।

इस मंदी के निहित कारणों की चर्चा कई महीने पहले वैश्विक बाजार में होने लगी थी। अमेरिकी वित्तीय संस्थानों की विफलता ने तेजी से इसे वैश्विक संकट में बदल दिया, जिससे कई यूरोपीय बैंक लड़खड़ा गए।

विश्व के शेयर बाजार धराशायी होने लगे तथा इक्विटी व कमोडिटी की ‘मार्केट वैल्यू’ में बड़ी गिरावट दर्ज हुई। इस वित्तीय संकट से लिक्विडिटी (तरलता) की समस्या आ खड़ी हुई।

अमेरिकी तथा यूरोपीय वित्तीय संस्थानों ने सुरक्षात्मक रुख अपनाकर उधारी पर पाबंदी लगाई, जिससे बाजार में तरलता (पूँजी का प्रवाह) का संकट और बढ़ गया।

विश्व के राजनेताओं और केंद्रीय बैंक के डायरेक्टरों ने सम्मिलित प्रयास कर इसके भय को कम करने की कोशिश की, लेकिन अक्तूबर माह तक पूँजी के संकट ने निवेशकों को अपने स्रोतों को मजबूत करेंसी की तरफ-जैसे येन, डॉलर, स्विस फ्रेंक इत्यादि की तरफ-स्थानांतरित करना शुरू कर दिया।

इससे उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएँ, जिनमें भारत भी शामिल है, इस मंदी के दायरे में आ गईं। दरअसल, इस वैश्विक वित्तीय मंदी की जड़ें ‘सबप्राइम मॉर्टगेज क्राइसिस’ में निहित हैं।

सन् 2008 के प्रारंभ में ही वैश्विक अर्थव्यवस्था में संकट के ल ण दिखने लगे थे। इन कारणों में तेल की बढ़ती हुई कीमतें, इसके कारण खाद्य पदार्थों की बढ़ती हुई कीमतें तथा वैश्विक मुद्रास्फीति शामिल हैं।

अमेरिका के बड़े मॉर्टगेज लैंडर्स (गिरवी रखकर उधार देनेवाले संस्थान) जैसे लेहमन ब्रदर्स, इंडी मेक बैंक, मेरिल लिंच तथा ए.आई.जी. इत्यादि में वित्तीय संकट (क्रेडिट क्राइसिस) होने से वैश्विक आर्थिक संकट को पहली बार स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया।

इसके चलते बेरोजगारी बढ़ी तथा नौकरियों में कटौतियाँ भी तेजी से होने लगीं।’सब प्राइम मॉर्टगेज क्राइसिस’ ऐसा वित्तीय संकट है, जिसमें बैंकिंग व्यवस्था तथा वित्तीय संस्थानों की विश्व स्तर पर तरलता संकुचित हो जाती है। ऐसा मॉर्टगेज कंपनियों की असफलता के चलते होता है।

मॉर्टगेज कंपनियाँ, निवेश कंपनियाँ, फर्म तथा सरकार समर्थित वित्तीय संस्थान, जिन्होंने सब प्राइम मॉर्टगेज में बड़ा निवेश किया हो, उनकी असफलता के कारण सब प्राइम मॉर्टगेज क्राइसिस होता है।

यद्यपि इस संकट की जड़ें वर्ष 1992-93 से शुरू हो जाती हैं, लेकिन 2007-08 तक आते-आते यह संकट स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होने लगता है।

सन् 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट का महत्त्वपूर्ण कारक ‘सब प्राइम मॉर्टगेज संकट’ को माना गया। सब प्राइम मॉर्टगेज संकट हाउसिंग सेक्टर में कीमतों की गिरावट तथा उससे जुड़ी मॉर्टगेज देनदारियाँ असफल होने एवं मॉर्टगेज सौदों को फॉरक्लोज करने (रोक देने) से शुरू हुआ।

सब प्राइम मॉर्टगेज तथा एडजेस्टेबल रेट मॉर्टगेज ऋण ‘हाई रिस्क’ श्रेणीवाले ऋण होते हैं, जिनकी पूरी कार्य-प्रणाली ऋण जारी करने से लेकर ऋण चुकता होने तक काफी संवेदनशील होती है।

अमेरिका में उत्पादकता तथा उपभोक्तावाद को बढ़ावा देने की नीति के चलते सबप्राइम मॉर्टगेज ऋणों की शुरुआत हुई।

हाउसिंग सेक्टर के वित्तीय क्षेत्र में प्रचलित ऋणों की दर उपभोक्ताओं को भारी पड़ रही थी, अतः इसके चलते हाउसिंग सेक्टर में अपेक्षाकृत वृद्धि दर्ज नहीं की जा रही थी।

इस सेक्टर में वृद्धि करने की नीति के तहत ऋणों की दरों को कम किया गया, जिससे उपभोक्ताओं को लुभाया जा सके तथा ऋण जारी करने की शर्तों को भी आसान बनाया गया। इसकी भरपाई ऋण चुकता करने की शर्तों को कठोर बनाकर की गई।

इस प्रणाली की शुरुआत अमेरिका में 1992-93 से प्रारंभ हुई। ऋण जारी करने में बड़े वित्तीय संस्थान, बैंकर्स तथा इंश्योरेंस कंपनियाँ शामिल थीं।

एक बार यह प्रणाली चल निकलने पर अमेरिकी वित्तीय बाजार में पूँजी का प्रवाह तेजी से बढ़ा। लेकिन इस प्रवाह की दिशा पर किसी प्रकार का नियंत्रण करने की कोशिश नहीं की गई।

सभी वित्तीय संस्थानों, बैंकर्स, इंश्यारेंस कंपनियों या कोई अन्य व्यापारिक प्रतिष्ठान का सबसे पहला तथा प्रमुख उद्देश्य लाभ कमाना होता है तथा अर्जित लाभ की नैतिकता पर अधिकतर ध्यान नहीं दिया जाता है।

ऐसा हम भारत में भी सन् 1992, 1997, 2002 के शेयर बाजार के संकट के दौरान देख चुके हैं ।

अमेरिकी वित्तीय बाजार में तेजी से बढ़े पूँजी के प्रवाह में उस पूँजी का उपयोग हाउसिंग सेक्टर के इतर अन्य उपभोक्ता क्षेत्रों में भी किया गया।

जबकि वह पूँजी हाउसिंग सेक्टर के लिए सब प्राइम मॉर्टगेज ऋणों के लिए जारी की गई थी।

अमेरिका के वित्तीय बाजार पर नजर रखनेवाले कई आर्थिक विशेषज्ञों ने इस स्थिति की तरफ समय-समय पर ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की; परंतु लाभ कमाने का सपना आँखों में लिये संस्थानों ने इस बात को अनसुना किया।

सब प्राइम मॉर्टगेज की शुरुआत (1993) होने पर वित्तीय संस्थानों ने बड़े-बड़े डेब्ट (ऋण-पत्र) जारी किए।

ऐसे ऋण-पत्र समय-समय पर लगातार जारी किए जाते रहे। इन ऋणपत्रों को लेकर कई तरह के स्ट्रक्चर्ड ब्रांड और अन्य फाइनेंशियल टूल बनाए गए तथा उनकी ट्रेडिंग अमेरिकी व वैश्विक वित्तीय बाजार में होने लगी।

जबकि इन स्ट्रक्चर्ड ब्रांड तथा फाइनेंशियल टूल्स की अंतर्निहित क्वालिटी (जो कि हाउसिंग सेक्टर से जुड़ी थी) पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।

इन फाइनेंशियल टूल्स में मॉर्टगेज आधारित सिक्यूरिटी (मॉर्टगेज बेक्ड सिक्यूरिटीज MBS) प्रमुख थी।

इन मॉर्टगेज बेक्ड सिक्यूरिटीज का मूल्य मॉर्टगेज के पैमेंट हाउसिंग की कीमतों पर निर्भर करता था। इन मॉर्टगेज बेक्ड सिक्यूरिटीज के जरिए विश्व के बड़े वित्तीय संस्थानों तथा निवेशकों ने अमेरिका के हाउसिंग मार्केट में निवेश किया।

कई बड़े बैंकों तथा वित्तीय संस्थानों ने बाजार से ऋण लेकर लाभ कमाने की नीयत से इन मॉर्टगेज बेक्ड सिक्यूरिटीज में भारी निवेश किया।

सब प्रारंभ मॉर्टगेज ऋणों तथा एडजेस्टेबल रेट मॉर्टगेज ऋणों के असफल होने से उत्पन्न वित्तीय संकट में इन बैंकों तथा वित्तीय संस्थानों को भारी नुकसान हुआ, जो जुलाई 2008 तक 435 बिलियन यू.एस. डॉलर तक आँका गया।

सब प्राइम मॉर्टगेज ऋणों की शुरुआत के 15 वर्षों के पश्चात् जब इन ऋणों को चुकता करने का दौर शुरू हुआ, तब असलियत दिखने लगी।

सब प्राइम ऋणों की अवधि पूरी होने पर कर्ज लेनदारों की स्थिति इन ऋणों को चुकता करने की नहीं थी, क्योंकि उन्होंने ऋण पूँजी को अन्यत्र उपभोग कर लिया था। ऐसा होने पर लेनदार की मॉर्टगेज की गई संपत्ति (हाउसिंग यूनिट) को जब्त किया जाने लगा।

बड़े स्तर पर ऐसा होने से हाउसिंग सेक्टर की कीमतों में तेजी से गिरावट आई तथा मॉर्टगेज की गई संपत्ति की वास्तविक कीमत उसकी ऋण देते समय आँकी गई कीमत से कहीं ज्यादा कम हो गई।

इस स्थिति ने ऋण जारी करनेवाले संस्थानों को संकट में डाल दिया तथा हाउसिंग सेक्टर में भी अवरोध खड़ा हो गया। 10-15 वर्ष पहले अमेरिका के वित्तीय संस्थानों ने जो ऋण पत्र जारी किए थे तथा उन पर आधारित जो स्ट्रक्चर्ड बांड तथा फाइनेंशियल टूल्स बने थे, वे भी अधर में लटक गए।

इस संकट से उठी तरंगें वैश्विक वित्तीय बाजार तथा वैश्विक बैंकिंग सिस्टम तक पहुँचनी अवश्यंभावी थीं; क्योंकि मौजूदा दौर की ग्लोबल इकोनॉमी में वित्तीय खिलाड़ी एक-दूसरे से जुड़े हैं और अमेरिका इस खेल का सबसे बड़ा खिलाड़ी है।

साधारण आकलन से समझने की कोशिश की जाए तो सबप्राइम मॉर्टगेज ऋणों, एडजेस्टेबल रेट ऋणों से उत्पन्न ऋण पत्रों तथा इन पत्रों से बने स्ट्रक्चर्ड बांड तथा अन्य फाइनेंशियल टूल्स की ट्रेडिंग विश्व स्तर पर होती थी।

अतः इस संकट का वैश्विक प्रभाव होना अवश्यंभावी था। एक बार संकट शुरू होने पर सभी वित्तीय संस्थानों तथा बैंकर्स ने सुरक्षात्मक रुख अपनाना शुरू कर दिया

जिससे तरलता (लिक्विडिटी) में अचानक कमी आने लगी। तरलता की इस कमी के चलते वैश्विक पूँजी बाजार का रुख अपेक्षाकृत मजबूत मुद्राओं, जैसे डॉलर, येन, यूरो, पाउंड की तरफ झुक गया

जिससे अपेक्षाकृत कम मजबूत अर्थव्यवस्थावाले देशों में भी तरलता का संकट आ गया। इस वैश्विक वित्तीय संकट से न केवल पूँजी का प्रवाह रुका तथा कई बड़े वित्तीय संस्थान लगभग दिवालिया हुए, बल्कि सब तरफ अविश्वास का माहौल भी बना।

इस पूँजी संकट ने अर्थव्यवस्था की विकास दर पर भी प्रभाव डाला तथा कमोबेश सभी कंपनियाँ सुरक्षात्मक रुख अपनाने को मजबूर हुईं।

सरकारी स्तर इस स्थिति से निपटने के लिए कुछ प्रयास शुरू हुए (जैसे अमेरिकी सरकार ने अपने स्तर पर चुनिंदा वित्तीय संस्थानों को ‘आर्थिक समर्थन’ (बेल आउट पैकेज) देकर तथा उन्हें अतिरिक्त वित्तीय कमिटमेंट देकर सँभालने की कोशिश की)।

परंतु संकट के आकार तथा इसकी व्यापकता को देखते हुए ये प्रयास नाकाफी लगे। साथ ही सरकार ने इस संकट को भांपकर नीतियों में जो परिवर्तन किए. उसने ग्रोथ रेट पर भी ब्रेक लगा दिए।

वित्तीय संकट के चलते विश्व के बड़े बैंकों तथा वित्तीय संस्थानों को हुए नुकसान का असर विश्व के सभी शेयर बाजारों पर दिखाई देने लगा।

1 जनवरी से 11 अक्तूबर, 2008 तक अमेरिकी शेयर बाजारों के इक्विटी मार्केट के बाजार मूल्य में 8 ट्रिलियन डॉलर तक की गिरावट दर्ज की गई।

अन्य देशों के शेयर बाजारों में भी औसतन 40 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। भारत का शेयर बाजार सूचकांक भी इस असर से अछूता न रह सका तथा इसमें औसतन 50 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई।

वित्तीय संकट से उत्पन्न तरलता की कमी, इससे उत्पन्न वित्तीय संस्थानों का सुरक्षात्मक रुख, इस संकट को भांपकर सरकारी नीतियों में परिवर्तन, अविश्वास का माहौल, शेयर बाजारों का लुढ़कना

इस सबके सम्मिलित प्रभाव के रूप में ऊर्ध्वगामी दबाव बना तथा उपभोक्ता खर्च में गिरावट दिखने लगी। इन स्थितियों ने मंदी का संकट पैदा कर दिया।

।। धन्यवाद ।।

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