शेअर बाजार के शब्दों का संक्षिप्त में वर्णन – Stock Market Terminology.

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बाय बॅक (Buy Back) क्या होता है?

बाय बॅक (Buy Back) करने के लिए कंपनी को सेबी (SEBI) से अनुमती लेनी पड़ती है और उनका हिस्सा तय करना पड़ता है।

कंपनी स्क्रिप्ट का भाव तय करके शेअर होल्डर (Share Holder) को बाय बॅक (Buy Back) की और कंपनी अपने शेअर किस भाव से वापिस खरीदने वाली है वह कीमत दी होती है।

होल्डर (Holder) की इच्छा हो तो वह तय किए भाव से कंपनी को शेअर फिर से बेच सकता है। इससे बाज़ार में शेअर के फ्री फ्लोट की संख्या कम होती है।

बुक क्लोजर और रेकॉर्ड डेट (Book Closure and Record Date) क्या होता है?

कंपनी बुक क्लोजर (Book Closure) में कंपनी के रेकॉर्ड में किसके नाम पर कितने शेअर है इसकी जानकारी मिलती है।

जब कंपनी राईट ईश्यु (Right Issue), डिविडेन्ट (Dividend) और बोनस (Bonus) डिक्लेअर करती है तब उनकी जरूरत होती है।

जब कंपनी बोनस (Bonus), डिविडेन्ट (Dividend) अथवा राईट ईश्य (Right Issue) का विज्ञापन करती है

तब साथ ही उनकी रेकॉर्ड डेट (Record Date) भी जाहिर करती है और उस दरम्यान कंपनी बुक्स बंद रखती है।

उसे बुक क्लोजर (Book Closure) कहते है। सभी रेकॉर्ड की जानेवाली तारीखों को रेकॉर्ड डेट (Record Date) कहते है।

नो डिलिवरी समय (No-delivery Period) क्या होता है?

जब कंपनी बुक क्लोजर और रेकॉर्ड डेट (Book Closure and Record Date) जाहिर करती है उस वक्त हमें उस स्क्रिप्ट की डिलेवरी नहीं मिलती।

उस समय हम शेअर का व्यवहार कर सकते है। बुक क्लोजर और रेकॉर्ड डेट (Book Closure and Record Date) खत्म होने के बाद लिए हुए शेअर की डिलेवरी हमें मिलती है।

इस कालावधी में कंपनी से जो फायदा मिलता है वह सिर्फ उन्हें ही मिलता है जिनके नाम उस समय कंपनी की बुक में रेकार्ड होते है

एक्स डेट (Ex-Date) क्या होता है?

नो डिलिवरी डेट (No-delivery Period) के पहलेवाले दिन को एक्स डेट (Ex-Date) कहते है।

एक्स डेट (Ex-Date) के दिन और बाद के दिन शेअर धारक ने शेअर का व्यवहार किया तो उसे कंपनी से मिलनेवाला बोनस (Bonus), राईटस शेअर का फायदा नहीं मिल सकता।

डिविडेन्ड (Dividend) क्या होता है?

शेअर में पूंजी का निवेश (Invest) करने से पहले निवेशक (Investors) का यह मुख्य लक्ष्य होता है कि उसकी पूंजी सुरक्षित होनी चाहिए।

शेअर खरीदने वाले सामान्यत: देखते है कि उस कंपनी का कामकाज कैसा है? वह हमें समय समय पर डिविडेन्ड (Dividend) दे सकती है या नहीं? शेअर धारक को कितना डिविडेन्ड (Dividend) (फायदे का हिस्सा) देना है? यह कंपनी के व्यवस्थापक तय करते है और यह ठराव शेअर धारक की मिटींग में पास किया जाता है।

डिविडेन्ड (Dividend) कंपनी को होनेवाले फायदे में से अथवा कंपनी के रिजर्व फंड से दिया जाता है।

सर्किट ब्रेकर (Circuit Breaker) क्या होता है?

सर्किट ब्रेकर (Circuit Breaker) को सर्किट फिल्टर अथवा प्राईज बॅन्ड भी कहते है। प्राईज उन स्टॉक मार्केट (Stock Market) में एक दिन में समय समय पर होनेवाले उतार चढ़ाव की कम से कम और ज्यादा से ज्यादा मर्यादा तय करता है।

वह हमेशा २, ५,१० और २० प्रतिशत तक होते है।स्टॉक एक्सचेंज प्राईज बॅन्ड (Stock Exchange Price Band) के प्रतिशत को निश्चित करती है।

वह समय समय पर बदलता है। कुछ समय बाहरी तत्वों के कारण शेअर बाजार में सेंसेक्स और निफ्टी एकदम नीचे उतरते है। उस समय मार्केट में डर की वजह से सब पर शेअर बेचने का दबाव आता है।

सभी का पैसा न जाए इसलिए कुछ समय के लिए बाज़ार बंद किया जाता है और कुछ समय बाद फिर से शुरू होने के बाद अगर बाज़ार में वह परिस्थिति वैसे ही रही तो बाज़ार फिर से बंद होकर दुसरे दिन चालू होता है।

रोलींग सेटलमेंट (Rolling Settlement) क्या होता है?

इस समय रोलींग सेटलमेंट (Rolling Settlement) T+2 के हिसाब से होता है, T याने जिस दिन व्यवहार होता है वह दिन।

उदा. सोमवार को व्यवहार किया तो बुधवार को उसकी रक्कम और सिक्सुरिटी उनके खाते में जमा होती है।

ऑफ मार्केट सेटलमेंट (Off-Market Settlement) क्या होता है?

ऑफ मार्केट सेटलमेंट (Off-Market Settlement) के अंतर्गत शेअर का लेन देन होता है

पर खरीदी बिक्री नहीं होती जैसे कि आपने आपके खाते के शेअर आपके परिवार के व्यक्ति के अथवा मित्र के खाते में ट्रान्सफर करते है।

इस व्यवहार में शेअर दलाल का अथवा स्टॉक एक्सचेंज का कोई अंतर्भाव नहीं होता। इस में सिर्फ शेअर का ट्रान्सफर होता है।

पे-इन और पे-आऊट (Pay-In and Pay-Out) क्या होता है?

पे-इन (Pay-In) इस दिन बेचे हुए शेअर की डिलिवरी एक्सचेंज को शेअर दलाल के जारिए होती है और शेअर खरिदनेवाली पार्टी, एक्सचेंज (Exchange) को दलाल के जरिए पेमेंट करते है।

पे-आऊट (Pay-Out) में खरिदे हुए शेअर की डिलिवरी एक्सचेंज खरिदनेवाली पार्टी को करता है, दलाल के जरिए बेचनेवाली पार्टी को बेचे हुए शेअर के पैसे दलाल के जरिए एक्सचेंज देता है।

ऑक्शन (Auction) क्या होता है?

पे-इन (Pay-In) इस दिन शेअर दलाल के जरिए एक्सचेंज को शेअर की डिलिवरी नहीं मिली तो एक्सचेंज दो दिन के बाद नीलामी में ऑक्शन (Auction) शेअर की खरिदी करता है और खरिदने वाली पार्टी को दलाल के जरिए देता है।

ऑक्शन से शेअर नहीं मिले तो? (Non-Availability of Shares in Auction):-

शेअर खरीदने वाले व्यक्ति को जब शेअर की डिलिवरी नहीं मिलती तब एक्सचेंज ऑक्शन में से माल लेकर उस पार्टी को देता है।

पर कभी कभी एक्सचेंज को भी माल नहीं मिलता, इसलिए एक्सचेंज उस माल का क्लोज आऊट देते है।

क्लोज आऊट याने बिक्री करनेवाली पार्टी को उसी भाव पर २० प्रतिशत अधिक लगाकर वह रक्कम शेअर खरिदने वाली पार्टी को देनी पड़ती है।

शॉर्ट डिलेवरी (Short Delivery) क्या होता है?

आपने किसी कंपनी के १०० शेअर खरीदे है। समझ लीजिए आपको ७० शेअर की डिलेवरी (Delivery) मिली और बाकी के शेअर की डिलेवरी (Delivery) नहीं मिली तो उस न मिले हुए ३० शेअर्स की डिलेवरी को शॉर्ट डिलेवरी (Short Delivery) कहते है।

इस समय एक्सचेंज ऑक्शन मार्केट में से उन ३० शेअर्स की खरीदी करता है और चार दिन के बाद उस पार्टी को डिलेवरी देता है।

किसी समय एक्सचेंज को भी ऑक्शन मार्केट में शेअर नहीं मिलते तब उन ३० शेअर्स का क्लोज आऊट होता है।

बॅड डिलेवरी (Bad Delivery) क्या होता है?

बॅड डिलेवरी (Bad Delivery) यह शब्द पहले बहुत प्रसिद्ध था। जब भौतिक शेअर का समय था। अब सिर्फ 7 ग्रुप की कुछ कंपनीयाँ फिजिकल शेअर में काम करती है और उनमें कभी कुछ कठिनाई आई तो बॅड डिलेवरी (Bad Delivery) शब्द का उपयोग होता है।

कभी कभी ट्रान्सफर डिड का पेपर खराब हुआ तो, वो ठिक से पढ़ न सके, ओवर रायटींग हुई तो, हस्ताक्षर में कुछ गलती हुई तो ऐसे वक्त होने वाली शेअर की डिलेवरी को बॅड डिलेवरी (Bad Delivery) कहते है।

आज के जमाने में सभी व्यवहार डिमेट में होते है। इसलिए बँड डिलेवरी (Bad Delivery) होने की संभावना बहुत कम होती है।

पोर्टफोलिओ (Portfolio) क्या होता है?

हमारे किए हए अलग अलग निवेश एकसाथ करके हम एक पेपर पर उसकी लिस्ट बनाते है। इस लिस्ट को पोर्टफोलिओ (Portfolio) कहते है।

हमारा एक ही लक्ष्य होता है कि कम से कम धोखे में अधिक से अधिक मुनाफा मिलेगा ऐसा निवेश करना चाहिए।

इसके लिए ठिक तरह से बॅड डिलेवरी (Bad Delivery) बनाना चाहिए तभी अपना लक्ष्य पूरा होगा। समय समय पर पोर्टफोलिओ (Portfolio) में जरूरी बदलाव करना आवश्यक है।

आपके पोर्टफोलिओ (Portfolio) में सिर्फ फायनानशिअल निवेश जैसे कि शेअर, डिबेंचर्स, फिक्स डिपॉजिट, म्युच्युअल फंड के युनिट इत्यादि का अंतर्भाव होता है।

डायवरसिफिकेशन (Diversification) क्या होता है?

डायवरसिफिकेशन (Diversification) याने एक प्रकार का रिस्क मैनेजमेंट। जिनमें विविध प्रकार के निवेश से अगर किसी एक निवेश में नुकसान हआ तो परे पोर्टफोलीओ पर उसका असर नहीं पड़ता।

इसलिए डायवरसिफिकेशन (Diversification) जोखीम कम करने का साधन है।

हम अपने पोर्टफोलिओ (Portfolio) में से विविध प्रकार के निवेश में अपने पैसे लगाए और अगर उसमें से किसी एक निवेश से आपको नुकसान हुआ तो भी पोर्टफोलिओ (Portfolio) के ॲवरेज में ज्यादा अंतर नहीं पड़ता है।

उदा. अगर आपके पास १,००,००० रूपयों की पूंजी है। उसमें से २०,००० हमने स्टॉक मार्केट में निवेश किए, २०००० फिक्स डिपॉजिट में, २०,००० म्युच्युअल फंड में, २०,००० का सोना खरीदा और बचे हुए २०,००० पोस्ट ऑफिस में निवेश किए।

इसमें आपको स्टॉक मार्केट में ५,००० का नुकसान हुआ और बाकी के निवेश से कुछ फायदा हुआ तो उससे आपके पोर्टफोलिओ (Portfolio) में कुछ ज्यादा अंतर नहीं आएगा।

इसलिए डायवरसिफिकेशन (Diversification) याने खतरे की गुंजाइश कम करना होता है।

नोटः यह उदाहरण आपको डायवरसिफिकेशन (Diversification) क्या है यह ठिक तरह से समझ आना चाहिए इसलिए बताया गया है, जरूरी नहीं की आप वैसा ही व्यवहार करे।

कॉन्ट्रेक्ट नोट (Contract Note) क्या होता है?

कॉन्ट्रेक्ट नोट (Contract Note) याने एक दिन में खरीदे हए अथवा बेचे हुए शेअर का लिखित सबूत। इस नोट में शेअर कब लिए, कितनी कीमत पर लिए, कौनसे समय में लिए, साथ ही दलाली की कीमत इन सब की जानकारी होती है।

इस पर कंपनी के अधिकृत व्यक्ति (Authorize person) का हस्ताक्षर होता है। इन की दो प्रतियाँ होती है, एक कॉपी निवेशक अपने पास रखता है और दूसरी कॉपी पढ़कर स्वाक्षरी करके ट्रेडिंग मेंबर को देते है।

अगर कभी शेअर धारक और दलाल में विवाद हुआ तो इस कॉन्ट्रॅक्ट नोट (Contract Note) से निर्णय होता है। इसलिए यह बहुत महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

कॉन्ट्रेक्ट नोट में आगे दी हुई जानकारी होना जरूरी है (Details Required to be mentioned on Contract Note):-

स्टॉक एक्सचेंज के बताए हुए कॉन्ट्रेक्ट फॉर्म में नीचे दी हुई जानकारी होना आवश्यक है।

  1. दलाल का नाम, पता, सेबी का रजिस्ट्रेशन नंबर, टेलिफोन नंबर इत्यादि।
  2. पार्टनर्स अथवा प्रोपराईटर्स, डायरेक्टर्स का नाम और दुसरे अधिकृत ___व्यक्तिों का नाम।
  3. एक्सचेंज ने दिया हुआ कोड नंबर।
  4. कॉन्ट्रॅक्ट नंबर, कॉन्ट्रॅक्ट तारीख, सेटलमेंट नंबर, स्क्रिप्ट लेने का समय __और ऑर्डर नंबर।
  5. निवेशक का नाम और कोड नंबर।
  6. स्क्रिप्ट के नाम, बिक्री अथवा खरीदी का भाव, संख्या, दलाली का भाव, सर्विस टॅक्स सिक्योरिटीज ट्रान्जाक्शन टॅक्स और दुसरे खर्चे।
  7. कॉन्ट्रेक्ट नोट पर शेअर दलाल का हस्ताक्षर अथवा अधिकृत व्यक्तिों का हस्ताक्षर होना चाहिए।

जब निवेशक को बिल मिलता है तब उसके ऊपर पूरी जानकारी होनी चाहिए।

बाज़ार का रुख (Market Trend):-

मार्केट में सामान्य रूप से तीन प्रकार के रुख (Trend) होते है। बुल ट्रेन्ड (Bull Market), बेअर ट्रेन्ड (Bear Market), साईडव्हे ट्रेन्ड (Sideways Market)

बुल मार्केट (Bull Market) क्या होता है?

बुल मार्केट (Bull Market) में शेअर बाज़ार में शेअर का भाव लगातार बढ़ता जाता है। इंडेक्स में भी बड़ी बढ़ोतरी होती है। यह बढ़ोतरी लगातार और दिर्घ समय अर्थात महिनों तक चलती है।

एक तरफा बुल ट्रेन्ड के समय बाज़ार में ट्रेडर्स, निवेशक, दलाल इत्यादि सभी लोगों में आनंद का वातावरण होता है। क्योंकि अधिक से अधिक व्यक्ति बाज़ार से पैसा कमाते है।

इस समय दलालों के साथ काम करनेवालों की आमदनी बढ़ती है, भत्ता बढ़ता है। बुल ट्रेन्ड (Bull Trend) में रोजगार बढ़ता है जैसे कि टेक्सटाईल रेडीमेड गारमेंट, ज्वेलरी, हिरे इस सभी दुकानदारों का धंदा बहुत तेजी से होता है।

बेअर मार्केट (Bear Market) क्या होता है?

बेअर मार्केट (Bear Market) में शेअर बाज़ार में शेअर का भाव लगातार गिरता जाता है। इंडेक्स में भी बड़ी गिरावट होती है। यह गिरावट लगातार और दिर्घ समय अर्थात महिनों तक चलती है।

एक तरफा बेअर मार्केट (Bear Market) के समय बाज़ार में सभी निवेशक डर के मारे अपने शेअर बेचने लगते है। मार्केट में डर का माहौल होता है, हर कोई शेअर बेचकर मार्केट से बाहर निकलने के विचार में होता है।

इसलिए मार्केट का सेंटीमेंट सिर्फ मंदी का ही होता है। उस समय देश की अर्थव्यवस्था कमजोर होती है और कंपनी की आमदनी भी कम होती है।

इस समय कुछ लोग डिप्रेशन में जाते है और मार्केट का बहुत बड़ा वर्ग शेअर बाजार से पैसे निकालकर दुसरे जगह निवेश करता है।

मंदी अथवा बेअर मार्केट (Bear Market) अधिक समयतक चला तो दलाल वर्ग, वेतनवाले व्यक्ति को निकाल देते है अथवा ले ऑफ देते है।

शेअर बाजार की मंदी का परिणाम दसरे अलग अलग मार्केट पर भी होता है। हिंदी में एक अच्छी कहावत है “तेजी का बोलबाला और मंदी का मुह काला।”

साईडवेज मार्केट (Sideways Market) क्या होता है?

यह बहुत विचित्र ट्रेड है क्योंकि साईडवेज मार्केट (Sideways Market) में कुछ निवेशक पैसा नहीं कमा सकते। साईडवेज का अर्थ मार्केट छोटी रेंज में चलता है और इंडेक्स कुछ समय के लिए ऊपर जाता है और बाद में नीचे आता है।

आज के दिन का मार्केट, कल जो इंडेक्स पर बंद हुआ था उसी कीमत के थोड़ा बहत आगेपिछे कमज्यादा कीमत पर बंद होता है। इस समय निवेशक मार्केट से दूर रहना पसंद करते है।

करेक्शन (Correction) क्या होता है?

जब शेअर का भाव ऊपर जाता है फिर कुछ समय प्रत्याघात के रूप में करेक्शन मार्केट में बिक्री का माहौल तैयार होता है और वह कुछ दिन चलता है। उसे करेक्शन (Correction) कहते है।

करेक्शन (Correction) को दुसरे शब्दों में प्रोफिट बुकिंग भी कहते है। मार्केट में करेक्शन (Correction) का आना जरूरत है और वह नियमित अंतराल में आना चाहिए। करेक्शन (Correction) से स्क्रिप्ट का भाव समतल पर रहता है।

मार्केट को सशक्त रखने के लिए करेक्शन (Correction) की जरूरत होती है। मार्केट ऊपर जाते समय प्रोफिट बुकिंग आता है। मार्केट नीचे जाते समय नई खरीदी करनी चाहिए क्योंकि स्क्रिप्ट कम भाव में मिलती है।

क्रैश (Crash) क्या होता है?

कॅश (Crash) का मतलब मार्केट में शेअर के भाव एकदम नीचे जाना होता है।

वह सामान्यरूप से राजनीतिक उलटपलट, भूकंप, युद्ध आदि जैसे घटनाओं के कारण संपूर्ण मार्केट का सेन्टीमेंट एकदम से बदल जाता है और निवेशक सिर्फ बिक्री कीजिए (Sell, Sell, Sell) ऐसा ध्येय कायम रखते है।

इंडेक्स एकदम नीचे आता है और बहुत से स्क्रिप्ट पर लोअर सर्किट लगती है। इस समय निवेशक को कुछ समझ नहीं आता कि क्या करना है।

निवेशक (Investors) सिर्फ एक ही विचार करता है कि शेअर की तुरंत बिक्री करके कुछ पैसे बचाए।

।। धन्यवाद् ।।

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श्रेणी: Share Market

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