क्या आपको पता है की टेक्नीकल अनालिसिस और स्विंग ट्रेडिंग – Technical Analysis and Swing Trading in Hindi अगर आपको पता नहीं है तो आप इस ब्लॉग को पूरा पढ़े.

टेक्नीकल अनालिसिस और स्विंग ट्रेडिंग – Technical Analysis and Swing Trading in Hindi

Table of Contents

शेअर बाजार के तीन महत्वपूर्ण सवाल (Three Important Questions in Stock Market):

जब हमें शेअर बाज़ार में निवेश या ट्रेडिंग करना होता है, तब हर एक निवेशक या ट्रेडर के तीन महत्वपूर्ण सवाल होते है और वह उनका जवाब ढुड़ने का प्रयास भी करते है। वह सवाल –

  • शेअर्स की खरीदी कब करनी चाहिए?
  • शेअर्स कब तक होल्ड करने चाहिए?
  • शेअर्स की बिक्री कब करनी चाहिए?

जिन्हे टेक्नीकल अनालिसिस का ज्ञान होता है वह लोग इन सवालों के जवाब बहुत ही सरलता से जान लेते है।

स्विंग ट्रेडिंग में हमें कम कालावधी की समय सीमा में ट्रेडिंग करना चाहिए। स्विंग ट्रेडिंग करने की इच्छा रखनेवाले ट्रेडर को पहले टेक्नीकल अनालिसिस का ज्ञान हासिल करना चाहिए क्योंकि, स्विंग ट्रेडिंग में सफलता का पहला आधार निश्चित समय में सौदा दाखील करने की कला है

जो टेक्नीकल अनालिसिस में माहीर होने के बाद ही किया जा सकता है। जिस समय सीमा में उन्हें यह ट्रेडिंग करना है उसमें उन्हें निश्चित कालावधी में बाज़ार में दाखील होने की कला में माहीर होना बहुत ही जरूरी होता है।

इसके लिए वह विविध चार्टिंग सॉफ्टवेअर में टेक्नीकल अनालिसिस के विविध टुल्स की मद्द लें सकते है। एक बार उन्होंने टेक्नीकल अनालिसिस के विविध टुल्स में कौशल हासिल कर लिया तो फिर ऊपर दिए सवालों के जवाब वह बहुत ही आसानी से दें सकते है।

एक बात हम सबको हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए वह यह कि, कोई भी विषय में सतर्कतापूर्वक परिणाम निरंतर परिश्रम के बाद ही मिलता है। एक ट्रेडर ऐसे उच्च गुणवत्ता का सटीक परिणाम तभी ले सकता है जब वह बाज़ार में हमेशा सक्रिय स्थिति में होता है।

उच्च गुणवत्ता का सटीकता से परिणाम समय के साथ सुधरते जाता है। इस प्रकार की कुशलता आप कितनी शिघ्रता से हासिल कर सकते है उसका आधार आपके व्यक्तिगत ग्रहण क्षमता पर होता है।

इस लिए आपको अपना लक्ष्य अपने कौशल को बढ़ाने पर रखना चाहिए, ना की वह शिघ्र कैसे हासिल किया जाए इस पर होना चाहिए।

अगर आप अनुशासन और नियमों का दृढ़ता से पालन करते है, तो आप कम गलतीयाँ करोगे और आगे चलकर आपका ज्यादातर ट्रेडिंग सटीकता से हो सकेगा और यही आपका लक्ष्य होना चाहिए। आप गलती करते हो तो यह कोई बड़ी बात नहीं। पर वही गलती दोबारा हो यह बात मान्य नहीं।

अधिक टुल्स और सूचों का उपयोग बहुत ही अच्छा परिणाम दें सकते है क्या ?

बाज़ार में अनेक टेक्नीकल टुल्स और सूचक उपलब्ध है परंतु आपको यह जानना जरूरी है कि टेक्नीकल अॅनालिसिस में निश्चित संख्या में कुछ सूचकों का समूह बनाकर उनका उपयोग किया जाए तो आपको उसका उत्तम परिणाम मिलता है।

जब टेक्नीकल अॅनालिसिस में उत्तम परिणाम लेने की बात आती है तब ध्यान में रखना चाहिए कि अधिक संख्या में सूचकों का उपयोग करने पर उसका यह अर्थ नहीं होता कि आपको फायदा भी अधिक ही होगा।

ऐसा करते समय संभव है कि आप दुविधा में पड़ जाए और इतने सारे सूचकों में मिलनेवाले संकेतों के आधार पर कौनसा कदम उठाना चाहिए यह समझ न पाए।

बाज़ार में स्थापित एक ही दिशा में होनेवाली चाल जब रिवर्स होती है तब ऐसा होने के पूर्व संकेत टेक्नीकल अनालिसिस की मद्द से मिलते है

अगर हमने बारीकी से चार्ट पर नज़र रखी तो दिर्घ कालावधी के स्थापित ट्रेन्ड में रिवर्सल के संकेत मिलने पर हम उन शेअर्स को उनकी ऐतिहासिक तेजी का अंत होने से पहले ही उनके महत्तम भाव के नजदीक बेचकर अतिरिक्त मुनाफा कमा के बाहर निकल सकते है।

दिर्घ कालावधी की सायकल के भितर एक कम कालावधी की सायकल तैयार होते हुए नज़र आती है। कम कालावधी में स्थापित चाल रिवर्स होने का संकेत मिलता है

तब खरीदी करके खड़े रहने की तुलना में आप अपने पोर्टफोलिओ के शेअर्स को बेचकर प्रतिशतता की दृष्टी से अधिक मुनाफा कमा सकते है।

किसी शेअर्स का भाव ५ वर्ष की कालावधी में १०० रूपए से बढ़कर १००० रूपए तक हो सकता है। पर वह ज्यादातर सीधी लाईन में नहीं बढ़ता।

इस दिर्घ कालावधी के दरम्यान कईबार कम कालावधी में भाव गिरते हुए नज़र आता जिसे अंग्रेजी में करेक्शन कहते है।

टेक्नीकल अनालिसिस की मद्द से आपको जब शेअर्स के भाव में कम कालावधी में ऐसा करेक्शन दिखाई देता है तब उस शेअर्स की बिक्री करते रहना चाहिए। फिर नीचे की तरफ बॉटम तैयार होने पर और ट्रेन्ड रिवर्सल होने पर उस शेअर्स की फिर से खरीदी करनी चाहिए।

खरीदी करके ५ वर्ष के उतार-चढ़ाव की कालावधी में राह देखते बैठने के बजाए उसमें मिलनेवाले मौके का फायदा लेकर खरीदी बिक्री करते रह तो प्रतिशतता की दृष्टी से बहुत ही अच्छी कमाई हो सकती है।

टेक्नीकल अनालिसिस की उपयोगिता की शंका और उस विषय का सत्य :

कई लोग टेक्नीकल अनालिसिस की उपयोगिता को शक की नज़र से देखते है। जो लोग ऐसा दावा करते है कि टेक्नीकल अनालिसिस कछ काम का नहीं।

उन लोगों की बुद्धीमत्ता हमेशा तैयार चिजें हासिल करने की होती है और फिर वह ऐसे तैयार चिजों के पिछे दौड़ने लगते है जो हमेशा काम नहीं आती।

बाज़ार में ऐसे भी लोग है जो तैयार एक्सप्लोरेशन को बेचते है और ऐसा दावा करते है कि उनके चार्टीग सॉफ्टवेअर का उपयोग करके आप नोट छापने की शुरूआत कर सकते है।

परंतु जब वैसा नहीं होता तब उसका दोष लोग टेक्नीकल अनालिसिस को देते है क्योंकि वह इस बात को नहीं समझ सकते कि ऐसे एक्सप्लोरेशन की बिक्री करनेवाले यह नहीं बताते।

वास्तव में कोई भी एक सूचक किसी भी एक निश्चित टाईम फ्रेम पर निर्भर होकर लगातार सफल परिणाम नहीं दें सकता।

इसलिए इस सच को आपको समझा दिया है ताकी आप ऐसे सफेद कॉलर वाले ठगों से सावधान रहें। दुसरों पर निर्भर होने के बजाए आप जरूरी अभ्यास के लिए आवश्यक समय देकर स्वयं को उसमें माहीर बनाने में ही होशियारी है।

इसलिए महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर आपको एक सफल स्विंग ट्रेडर बनना हो तो टेक्नीकल अॅनालिसिस का ज्ञान बहुत ही महत्वपूर्ण है और बात जब स्विंग ट्रेडिंग के लिए अनुकूल शेअर्स ढुंढ़ने की होती है तब भी आपको टेक्नीकल अॅनालिसिस का आधार लेना जरूरी है।

इसलिए स्विंग ट्रेडिंग शुरू करने से पहले टेक्नीकल अनालिसिस की कला में कौशल हासिल करना जरूरी होता है।

टेक्नीकल अनालिसिस की मद्द से ऐसे स्विंग ट्रेडिंग की स्ट्रॅटेजी का निर्माण करना संभव है जो सुनिश्चित करता है कि किसी भी हालात में हमारी पूँजी का संरक्षण होगा।

आपको यह सुनिश्चित करना होगा की मुनाफा इस तरह से बुक होना चाहिए कि आप अतिरिक्त मुनाफा निकालकर लें सकें जो आप ट्रेलिंग स्टॉप लॉस की मद्द से कर सकते है।

टार्गेट आधारित और समय आधारित मुनाफा बुक करने की तकनीक जरूरी है, क्योंकि आपको एक निश्चित कालावधी में तुरंत ट्रेडिंग कर सकते है।

यहाँ टेक्नीकल अनालिसिस पर मैं संक्षिप्त में चर्चा करने वाला हूँ। जिससे आपको समझ आएगा कि कौनसे और कैसे टेक्नीकल अनालिसिस के टुल्स के आधार पर स्विंग ट्रेडिंग में कौशल हासिल करना होता है।

सपोर्ट और रेजिस्टन्स (Support & Resistence):

जब किसी शेअर्स का भाव उसके चार्ट पर एक निश्चित स्तर पर गिरकर अटकते हए नजर आता है और उस स्तर पर फिर से सुधारता हुआ र आता है तो वह स्तर सपोर्ट का स्तर बनता है।

जब किसी शेअर्स का भाव किसी निश्चित स्तर को कई बार पार करने का कोशिश करने पर भी उस स्तर को पार नहीं कर सकता और वहाँ से ही गिरता हुआ नज़र आता है तो वह स्तर उसके रेजिस्टन्स का स्तर बनता है।

ध्यान से चार्ट का अवलोकन किया जाए तो ऐसे सपोर्ट के और रेजिस्टन्स के स्तर को अंकित किया जा सकता है। जितनी अधिक बार किसी स्तर से भाव घुमता है उतना उस स्तर का महत्व बढ़ता है।

सामान्य रूप से स्विंग ट्रेडर सपोर्ट के नजदीक खरीदी करते है और रेजिस्टन्स के नजदीक बिक्री करते है। ऐसे सपोर्ट पर खरीदी करके ट्रेडिंग करो की जिस सपोर्ट के स्तर से रेजिस्टन्स दूर होगा, जिससे ऊपर की दिशा में आपको अच्छा मार्जिन मिल सकता है। उसी तरह से ऐसे रेजिस्टन्स के स्तर से बिक्री

करो की जिस स्तर पर से सपोर्ट दूर होगा, जिससे नीचे की दिशा में आपको अच्छा मार्जिन मिल सकता है।

स्टॉप-लॉस (Stop Loss):

एक बार आपने कोई भी ट्रेडिंग किया और वह आपकी गिनती के अनुसार चाल नहीं दर्शाता हो, तो आपको स्टॉप लॉस का उपयोग करना जरूरी होता है।

जिससे आपको होनेवाले नुकसान को आप एक सीमित रेंज में बांध सकते है। ऐसा करने से एक बात सुनिश्चित होती है कि कईबार घाटे का ट्रेडिंग होने पर भी आपकी पूँजी में बड़ी गिरावट कभी नहीं होती।

ट्रेलिंग-स्टॉप (Trailling Stop):

आपके ट्रेडिंग में जब आप फायदे में होते है तब आपका उद्देश संपूर्ण नहीं पर ज्यादातर मुनाफा निकाल लेना यह होना चाहिए।

अगर आप ट्रेलिंग स्टॉप के अनुसार चल रहे है तो एक बात सुनिश्चित कर सकते है कि चाहे जिस भी समय फायदा देने वाले ट्रेडिंग में से बाहर निकलना पसंद करो तो उस फायदे के ट्रेडिंग में से ज्यादातर फायदा निकालकर आप बाहर निकलोगे।

इस तकनीक का उपयोग किस तरह से करना चाहिए इस विषय पर मैंने इस पुस्तक के पाँचवें पाठ में अनेक उदाहरण देकर उसकी चर्चा की है।

ट्रेन्डलाईन का अभ्यास (Trend Line Study):

जब किसी शेअर्स का भाव बढ़ते हुए नज़र आता है तब वह उच्च बॉटम और अधिक उच्च टॉप बनाते हुए नज़र आता है। जब किसी शेअर्स का भाव गिरते हुए नज़र आता है तब वह निचला टॉप और अधिक निचला बॉटम बनाते हुए नज़र आता है।

जब ऐसे बिंदूओं को ऊपर के या नीचे की दिशा में एक लाईन में जोड़ा जाता है जो ऊपर या नीचे की दिशा में स्लोप (ढलान) में होती है तब एक ट्रेन्ड लाईन का निर्माण होता है। ऐसी ट्रेन्ड लाईन ट्रेन्ड रिवर्सल का संकेत देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

कई स्विंग ट्रेडर और दुसरे ट्रेडर को ऐसी झुटी समझ होती है कि जब कोई भी ट्रेन्ड लाईन हुँटती है उस स्तर पर तुरंत ट्रेन्ड रिवर्सल होता है, पर ऐसा हमेशा

नहीं होता। इसलिए वह इस प्रकार की झुटो समझ के कारण गलती कर बैठते है।

एक हकिकत हम सबको ध्यान में रखनी चाहिए, वह यह है कि जब कोई ट्रेन्ड लाईन नीचे या ऊपर की दिशा में टूटती है

तो ज्यादातर पहले से ही स्थापित ट्रेन्ड का अंत होने का संकेत मिलता है, साथ ही साथ यह संकेत भी मिलता है कि भाव स्थापित चाल के अनुसार फिर से बढ़ने या घटने से पहले कुछ समय तक कन्सॉलिडेशन में भी जा सकता है।

ऐसा बहुत ही कम नज़र आता है कि जब भाव किसी स्थापित ट्रेन्ड लाईन को तोड़ने के बाद तुरंत किसी नई ट्रेन्ड में आगे बढ़ने की शुरूआत करता है।

चार्ट पॅटर्न का महत्व (Importance of Chart Pattern):

चार्ट पॅटर्न के अभ्यास की मदद से आप शेअर्स के भाव में भविष्य में मिल सकने वाले भाव का प्रोजेक्शन कर सकते है

विविध मूविंग अँवरेज का क्रॉसओवर या क्रॉसडाऊन और मोमेन्टम सूचक जैसे कि आर.एस.आई. आर दुसरे सूचकों की मद्द से आपने निश्चित किए मापदंड के आधार पर ट्रिगर मिलते ही खरीदी और बिक्री कर सकते है। चार्ट का अभ्यास मल्टीपल टाईम फ्रेम को ध्यान में रखकर किया जाता है।

बाज़ार में विविध रिवर्सल पॅटर्न और कन्टीन्युएशन पॅटर्न निरीक्षण के लिए उपलब्ध है। संभव हो उतने पॅटर्न को सिखकर उन में माहीर होना चाहिए परंतु आपका ध्यान विविध लोकप्रिय चार्ट पॅटर्न पर ही केंद्रित करे, क्योंकि ऐसे पॅटर्न कई चार्ट में अनेक बार बनते हुए नज़र आते है।

कभी कबार ही बननेवाले निश्चित पॅटर्न को पहचानना फायदेमंद जरूर होता है परंतु आपको ऐसे पॅटर्न पर लक्ष्य केंद्रित करना फायदेमंद होता है जो बाज़ार में नियमितरूप से बनते हुए नज़र आते है।

मैंने इस विषय पर इस किताब में अधिक गहराई से नहीं लिखा है, क्योंकि इस किताब का ध्येय आपको टेक्नीकल अॅनालिसिस सिखाना नहीं है, परंतु यह है कि आप कुशलता से टेक्नीकल अॅनालिसिस की मद्द से स्विंग ट्रेडिंग कैसे कर सकते है।

डिसेन्डीग ट्रायेन्गल (Descending Triangle):

यह ट्रेन्ड रिवर्सल पॅटर्न है। इसकी मदद से आपको किसी भी शेअर्स में कम कालावधी में आनेवाले ट्रेन्ड रिवर्सल के आगामी संकेत मिलते है।

मध्यम कालावधी के निवेशक या ट्रेडर ने इस पॅटर्न में फसे हुए शेअर्स से दूर रहना चाहिए, क्योंकि अगर उन्होंने ऐसे शेअर्स की खरीदी की तो उनकी पूँजी ऐसी स्थिति में यह पॅटर्न कौनसी टाईम फ्रेम में बना हुआ है उसके आधार पर कुछ सप्ताह या कुछ महिनों के लिए अटक कर रह सकता है।

यह पॅटर्न आपको किसी भी शेअर्स को कम कालावधी में बहुत ही अद्भुत टाईमिंग के साथ बिक्री करने का मौका देता है और साथ ही उसके आधार पर आप भाव का प्रोजेक्शन भी कर सकते है।

एक बार कोई भी शेअर्स डिसेन्डीग ट्रायेन्गल पॅटर्न में आने के बाद आगे चलकर जैसे जैसे यह पॅटर्न पूर्णता की ओर आगे बढ़ता है वैसे वैसे भाव के उतार-चढ़ाव की रेन्ज मर्यादित होते जाती है और व्हॉल्यूम कम होते हुए नज़र

आता है। जब भाव पॅटर्न में से बहार आता है अर्थात ब्रेकडाऊन होता है तब गिरावट बहुत ही तीव्र गति से और बढ़ते व्हॉल्युम के साथ होती है।

भाव का आगामी प्रोजेक्शन पॅटर्न के बेस में से एक समान अंतरवाली लाईन खिंचकर हासिल किया जाता है। उसका उदाहरण ऊपर के चार्ट में दर्शाया गया है।

कप और हॅन्डल (Cup & Handle):

यह एक कन्टीन्यएशन पॅटर्न है। जैसे कि हम चार्ट में देख सकते हैं “U” आकार से रिकवरी को चार्ट पर दिखाया गया है जो किसी कप के बॉटम (तल) की तरह नजर आता है और जब ब्रेक आऊट से पहले आनेवाले छोटे करेक्शन को मार्क करके जोड़ा जाता है तब वह एक हॅन्डल की तरह दिखाई देता है।

आखिर में जब सकारात्मक ब्रेकआऊट मिलता है तब भाव टार्गेट की दिशा में आगे बढ़ता है जिसकी गिनती, कप के बॉटम से एक खड़ी लाईन निकाल कर उसके सिरे तक जितना अंतर होता है उतने माप की लाईन उसके सिरे के ऊपर खिंचकर, की जा सकती है जैसे चार्ट में दर्शाया गया है।

इस प्रकार के पॅटर्न का उपयोग करके स्विंग ट्रेडर समय पर ट्रेडिंग दाखिल करने के संकेत हासिल कर सकते है और उसके साथ ही प्राईज प्रोजेक्शन की गिनती भी कर सकते है। जिस के आधार पर अनुभवी लोग अपने ग्राहकों को टार्गेट देते है।

ईन्डीकेटर्स (सूचकों) का महत्व (Importance of Indicators):

एक स्विंग ट्रेडर की तरह आपका हेतू ऐसे शेअर्स हुँढ़ने का होना चाहिए जो मोमेन्टम के साथ बढ़ने की या घटने की तैयारी में होते है, न की ऐसे शेअर्स जो पहले से ही मोमेन्टम में है।

यहाँ पर फर्क यह है कि जिस शेअर्स में पहले से ही मोमेन्टम के साथ चाल स्थापित हुई है उनमें आपके निश्चित कालावधी के अनुसार दाखिल होने का मौका मिलता ही है ऐसा जरूरी नहीं।

जब किसी शेअर्स में सुधार की तैयारी होती है तब ऐसे शेअर्स में समय पर दाखिल होकर उसके बाद दिखनेवाले मोमेन्टम में उसका महत्तम फायदा उठाकर गिनती के अनुसार अच्छे मुनाफे के साथ बाहर निकला जा सकता है।

विविध टेक्नीकल सूचक यह महत्वपूर्ण हथियारों की तरह आपको उपयोगी साबित हो सकते है। एक स्विंग ट्रेडर की तरह आप कोई भी शेअर्स की खरीदी या बिक्री करने के बारे में सोचते है तब निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना जरूरी है।

  • शेअर्स स्थापित ट्रेन्ड में है या कन्सॉलिडेशन में है?
  • अगर ट्रेन्ड स्थापित है तो उस स्थापित ट्रेन्ड में कितनी ताकत है?
  • मोमेन्टम कैसा है?
  • किस स्तर पर आप सुनिश्चित कर सकते है कि अब मोमेन्टम बढ़नेवाला है?
  • किस स्तर पर आप सुनिश्चित कर सकते है कि अब मोमेन्टम घटनेवाला है?
  • आपको कोई ट्रेन्ड रिवर्सल संकेत मिलते है क्या?
  • शेअर कितने वोलेटाइल है?
  • व्हॉल्युम क्या संकेत दे रहा है?

अलग अलग सूचकों की मद्द से ऊपर के सवालों के जवाब आसानी से हासिल किए जा सकते है। बाज़ार में अनेक सूचक उपलब्ध है, जो उनकी रचना के अनुसार अलग अलग हेतू साध्य करते है।

कुछ सूचकों को लैगींग सूचक कहा जाता है और कुछ सूचकों को लीडोंग सूचक कहा जाता है। हकिकत यह है कि ज्यादातर सूचक वास्तव में लेगांग सूचक ही होते है।

जैसे कि ऊपर दर्शाया गया है, कुछ सूचकों का उपयोग मोमेन्टम जानने के लिए होता है और कुछ सूचकों का उपयोग ट्रेन्ड जानने के लिए होता है। कुछ सूचकों का उपयोग ट्रेन्ड की ताकत जानने के लिए होता है। तो कुछ सूचकों का उपयोग ट्रेन्ड रिवर्सल के संकेत हासिल करने के लिए होता है।

इस लिए ऐसा कहा जा सकता है कि टेक्नीकल अॅनालिसिस के उपयोग की जानकारी होना एक ऐसी जरूरत है जो टेक्नीकल अॅनालिसिस में सफलता हासिल करने के लिए बहुत ही जरूरी है। अब हम कुछ सूचकों के विषय में संक्षिप्त में चर्चा करते है और उनके उपयोग का हेतू जान लेते है।

रीलेटिव्ह स्ट्रेन्थ इन्डेक्स (आर.एस.आई.) (Relative Strength Index):

आर.एस.आई. एक प्रचलित और व्यापक प्रमाण में उपयोग होनेवाला सूचक है।

ज्यादातर अॅनालिस्ट के उपयोग में आनेवाले सूचकों में आर.एस.आई. साधारण रूप से एक निश्चित सूचक होता है।

महत्वपूर्ण स्तर ७०, ५० और ३० का होता है। दुसरा उपयोगी स्तर ४० और ६० का होता है। आर.एस.आई. ० और १०० के दरम्यान घुमते रहता है।

आर.एस.आई. का उपयोग (Use of RSI):

  • ओवर बॉट और ओवर सोल्ड के स्तर को जान लेना : आर.एस.आई. का उपयोग किसी भी शेअर्स में दिर्घ कालावधी की सायकल में कम कालावधी में निर्माण होनेवाले ओवर बॉट और ओवर सोल्ड स्तर जानने के लिए होता है।
  • ट्रेन्ड कौन सी दिशा में है यह जानने के लिए : आर.एस.आई. कुछ स्तर के ऊपर या नीचे घुमते रहकर हमें दर्शाता है कि बाज़ार तेजी की दिशा में है या मंदी की दिशा में।
  • खरीदी और बिक्री करने के आगामी संकेत जानने के लिए : आर.एस.आई. और शेअर्स के भाव के चार्ट के दरम्यान दिखनेवाले डायवर्जन्स की मद्द से आपको कम कालावधी में खरीदी करनी चाहिए या बिक्री करनी चाहिए इसके आगामी संकेत मिल सकते है।
  • मोमेन्टम जानने के लिए : प्रमुखता से आर.एस.आई. की रचना इस लिए नहीं हुई, फिर भी वह हमें मोमेन्टम में दिखनेवाले सुधार को कुछ स्तर के ऊपर या नीचे घूमते रहकर दर्शाता है।

ध्यान में रखिए :

आर.एस.आई. का उपयोग और उसका आंकलन ट्रेन्डिंग और रेन्जींग बाज़ार में अलग अलग है।

इसलिए जब आप किसी चार्ट पर नज़र डालते है तब कोई भी सूचक के आधार पर किसी भी चार्ट का अॅनालिसिस करने से पहले आपको जाँच लेना चाहिए कि ट्रेन्ड कैसा है

या बाज़ार कन्सॉलिडेशन में है क्या? अगर आपने इस अभ्यास में चूक की तो बाद में आप उन सूचकों के आंकलन में भी चूक कर सकते है।

उदाहरण के तौर पर आर.एस.आई. के आधार पर वह कुछ निश्चित स्तर के ऊपर या नीचे की दिशा में अटकता है तब बाज़ार ओवरबॉट या ओवरसोल्ड है यह तभी निश्चित किया जा सकता है

जब बाज़ार रेन्ज में घुम रहा हो। परंतु ट्रेन्डिंग बाज़ार में वह ऐसे स्तर के ऊपर या नीचे दिर्घ कालावधी तक रह सकता है और इसलिए ऐसी स्थिति में आप ट्रेडिंग कर सके ऐसे नए संकेत नहीं मिलते।

ट्रेन्डिंग बाज़ार में आर.एस.आई. का उपयोग डायवर्जन्स के संकेत हासिल करने के लिए और मोमेन्टम में दिखनेवाले बदलाव जानलेने के लिए करना चाहिए।

आर.एस.आई. का उपयोग दुसरें सूचकों को साथ में रखकर करना चाहिए। आपका हेतू यह होना चाहिए कि जब आपको कोई ट्रेडिंग करना हो, तब ट्रेडिंग से पहले आपको नकारात्मक या सकारात्मक संकेत मिलते है

उनको आप उपयोग में ला सके ऐसे ज्यादातर सूचकों को उपयोग में लाना चाहिए। हमेशा जरूरी कन्फर्मेशन मिलने के बाद ही ट्रेडिंग करना चाहिए।

स्टॉकेस्टीक (Stochastics):

स्टॉकेस्टीक का उपयोग भी शेअर्स अथवा इन्डेक्स का ओवरबाट आर ओवरसोल्ड स्तर जानलेने के लिए होता है।

स्टॉकेस्टीक में महत्वपूर्ण स्तर ८० और २० का है।

स्टॉकेस्टीक और आर.एस.आई. में से हासिल किए संकेत एकसमान होते है। इसलिए दोनों में से कौनसे सूचक का उपयोग करना है यह निश्चित करना आपके हाथ में है।

लोग दोनों को साथ में रखकर उनका उपयोग करते है, जिसका कुछ विशेष फायदा नहीं होता। इसके बदले विशेष लाक्षणिकता वाले अलग अलग सूचकों को पसंद करके उनका उपयोग करना सही होता है

एक ही विशेषता वाले एक के बदले अनेक सूचकों का उपयोग करने से बचना चाहिए जिनमें एकसमान संकेत मिलते है।

स्टॉकेस्टीक के विषय में महत्वपूर्ण नोट :

स्टॉकेस्टीक कम कालावधी में भाव में दिखनेवाले मोमेन्टम के बदलाओं की बहुत ही सटीक रूपसे नोट करता है परंतु स्टॉकेस्टीक एक तरफा बाज़ार में अच्छा संकेत देने के मामले में निष्फल होता है।

मुविंग अॅवरेज कन्वर्जन्स डायवर्जन्स (एम.ए.सी.डी.) (Moving Average Convergence Divergence – MACD):

मुविंग अँवरेज कन्वर्जन्स डायवर्जन्स (एम.ए.सी.डी.) का निर्माण गेराल्ड ॲपल द्वारा किया गया है। उसमें दो मुविंग अॅवरेज का उपयोग किया जाता है।

मुविंग ॲवरेज के उपयोग के करण, एम.ए.सी.डी. ट्रेन्ड को अपनाने वाला सूचक की तरह काम करता है और साथ ही उसमें दिर्घ कालावधी की मुविंग अॅवरेज को कम कालावधी की मुविंग अवरेज से घटाने के करण वह एक मोमेन्टम ओसिलेटर की तरह भी काम करता है।

ऐसा कहा जा सकता है कि वह ट्रेन्ड और मोमेन्टम दोनों जानने के लिए उपयोगी साबित होता है। उसे मॅकडी अथवा एम.ए.सी.डी. कहा जाता है।

डीफॉल्ट सेटींग (Default Setting): ज्यादातर सभी सॉफ्टवेअर में (१२,२६,९) का सेटींग देखने को मिलता है।

अगर आपको अपनी अलग समय सीमा के अनुसार उसमें अलग सेटींग का उपयोग करना हो तो आपका उसके लिए प्राईज ओसिलेटर, जो एम.ए.सी.डी. के समान एक सूचक है, उसका उपयोग करना होगा।

एक फर्क जो प्राईज ओसिलेटर और एम.ए.सा.डा. के बीच में है वो यह कि एम.ए.सी.डी. की तुलना में प्राईज ओसिलेटर में बननेवाला टॉप और बॉटम प्रतिशतता में दर्शाया जाता है।

बात जब एम.ए.सी.डी. की होती है तब उसकी सेटींग को बदला नहीं जा सकता, क्योंकि उसकी व्याख्या के अनुसार उसमें (१२, २६, ९) के सेटींग का ही उपयोग करना पड़ता है।

अगर आपको २१ और ५० दिनों के मुविंग अँवरेज के संयोजन के सेटींग का उपयोग करना हो तो आपको प्राईज ओसिलेटर का (२१, ५०, ९) के सेटींग के साथ उपयोग करना होगा। यह सेटींग आपके व्यक्तिगत ट्रेडिंग स्टाईल पर निर्भर होती है।

एम.ए.सी.डी. का उपयोग (Use of MACD):

एम.ए.सी.डी. आपको ट्रेन्ड और मोमेन्टम दोनों जानने के लिए मद्द करता है क्योंकि वह एक लेगींग सूचक है। उसमें से मिलने वाले संकेत दुसरे सूचकों से मिलनेवाले संकेतों की तुलना में थोड़ी देर से मिलते है।

वह शून्य की मध्य लाईन के ऊपर और नीचे की दिशा में घुमता रहता है। जब एम.ए.सी.डी. शून्य के ऊपर जाता है तब तेजी की दिशा की चाल स्थापित होती है और जब एम.ए.सी.डी. शून्य के नीचे जाता है तब मंदी की दिशा की चाल स्थापित होती है।

तेजी में जब एम.ए.सी.डी. शून्य के ऊपर से उसके सिग्नल लाईन के नीचे जाता है तब ऐसा कहा जा सकता है कि कम कालावधी में ट्रेन्ड रिवर्सल होने की तैयारी में है।

मंदी में जब एम.ए.सी.डी. शून्य के नीचे से उसके सिग्नल लाईन के ऊपर जाता है तब ऐसा कहा जाता है कि कम कालावधी में ट्रेन्ड रिवर्सल होने की तैयारी में है।

वह एक महत्वपूर्ण सूचक है और आपके चार्टीग सॉफ्टवेअर में उसे प्लॉट करके आपको उस पर नज़र रखनी चाहिए।

ॲवरेज डायरेक्शनल इन्डेक्स (Average Directional Index):

ए.डी.एक्स. स्थापित ट्रेन्ड की ताकत को दर्शाता है। उसका उपयोग स्थापित ट्रेन्ड मजबूत है या कमजोर है यह जानने के लिए होता है।

आपको हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि ए.डी.एक्स. की दिशा आपको कभी भी यह नहीं दर्शाती की स्थापित ट्रेन्ड तेजी का है या मंदी का है, परंतु वह हमेशा यही दर्शाती है कि स्थापित ट्रेन्डकितना मजबूत है।

कई चार्टीग सॉफ्टवेअर में इस सूचक में दुसरी दो लाईने भी होती है जो +Di और -Di जिन्हे डायरेक्शनल इन्डीकेटर कहा जाता है।

ए.डी.एक्स. का उपयोग (Use of Average Directional Index):

स्थापित ट्रेन्ड की ताकत को जानलेने के लिए : ए.डी.एक्स. सूचक का उपयोग ट्रेन्ड की ताकत जानने के लिए होता है। उसकी संख्या कुछ स्टार के ऊपर जाने पर, जैसे कि ए.डी.एक्स. २० के ऊपर गया तो वह मजबूत ट्रेन्ड

की निशानी है। जब +Di -Di के ऊपर होता है और ए.डी.एक्स. सुधर रहा हो तो एक मजबूत तेजी का ट्रेन्ड स्थापित होते हुए नज़र आता है, जो चार्ट में खड़ी लाईन से दर्शाया गया है।

जब यह सूचक निचला स्तर दर्शाता है तब शेअर्स को एक सीमित रेन्ज में ट्रेडिंग करते हुए देखा जा सकता है।

इस लिए ए.डी.एक्स. आपको जब निचला स्तर दर्शाता है तब वह शेअर्स से दूर रहना चाहिए। बाज़ार तेजी में हो या मंदी में हो ऐसे शेअर्स को ढूंढ़ना चाहिए जिनमें ए.डी.एक्स. का स्तर उचा है।

महत्वपूर्ण बात : यह सूचक ट्रेन्ड कितना मजबूत है यह दर्शाता है परंतु वह कभी भी ट्रेन्ड की दिशा नहीं दर्शाता।

इसका कारण यह है कि इस सूचक की रचना इस तरह से की गई है कि जब किसी शेअर्स में मंदी का ट्रेन्ड होने पर भी वह ऐसी स्थापित मंदी की ताकत को स्वंय में सुधार से ही दर्शाता है।

आप कभी भी ऐसा मानकर दुविधा में रहना नहीं कि जब मंदी की दिशा की चाल होती है तब दुसरें सूचकों की तरह ए.डी.एक्स. घटनेवाला है।

बढ़ता हुआ ए.डी.क्स. मात्र आपका मित्र होता है। घटता हुआ ए.डी.एक्स. आपके कुछ काम का नहीं होता, खासकर तब जब आपका हेतू स्थापित ट्रेन्ड की ताकत को जानना होता है।

बॉलिंजर बॅन्ड (Bollinger Bands):

इस सूचक की रचना जॉन बॉलिंजर द्वारा सन १९८० की शुरूआत में की गई थी। बॉलिंजर बॅन्ड का हेतू किसी भी शेअर्स के भाव में उसके ऊपरवाले और नीचेवाले भाव के बिच का रीलेटीव्ह डेफीनेशन जानना होता है।

उसकी व्याख्या के अनुसार भाव जब ऊपर के बॅन्ड पर अटकता है तब भाव ऊँचा है ऐसा माना जाता है और भाव जब निचले बॅन्ड पर अटकता है तब भाव नीचे है ऐसा माना जाता है।

इस सूचक में तीन बॅन्ड का समावेश होता है, ऊपरवाला बॅन्ड, मध्य बॅन्ड और नीचेवाला बॅन्ड। मध्य बॅन्ड एक सिम्पल मुविंग ॲवरेज है और उसके द्वारा मध्यम कालावधी के ट्रेन्ड के विषय में जानकारी हासिल की जाती है।

यह बॅन्ड ऊपर और नीचे के बॅन्ड के बेस की तरह भी कार्य करता है। ऊपरवाले, मध्य और निचले बॅन्ड के बिच कितनी जगह हो सकती है उसका आधार शेअर्स या इन्डेक्स में दिखनेवाले वोलॅटीलीटी पर होता है।

बॉलिंजर बॅन्ड के विषय में अधिक जानकारी हासिल करने के लिए आप उसकी वेबसाइट www.bollingerbands.com पर जा सकते है।

मूल सेटींग :

२० दिनों की सिम्पल मविंग ॲवरेज और दो स्टॅन्डर्ड डेविएशन का उपयोग किया जा सकता है। आप अपने व्यक्तिगत ट्रेडिंग प्रणाली के अनुसार उसमें जरूरी बदलाव कर सकते है।

बॉलिंजर बॅन्ड का उपयोग (Use of Bollinger Bands):

• शेअर्स या इन्डेक्स में उंचे या निचले चंचलता का प्रमाण दर्शाने के लिए : बॉलिंजर बॅन्ड संकीर्ण या विस्तारीत होकर बाज़ार में किसी भी शेअर्स या इन्डेक्स में अस्थिरता कम हो रही है या बढ़ रही है इसका निर्देश आपको देता है।

भाव ऊपरवाले और नीचेवाले बॅन्ड पर अटक कर अलग अलग संकेत देता है। पर जब भाव ऊपरवाले या नीचेवाले बॅन्ड को तोड़ता है, इसका अपना ही महत्व होता है।

मूविंग ॲवरेज (Moving Average):

ज्यादातर अॅनालिस्ट एक निश्चित संख्या में हर एक चार्ट पर मूविंग अँवरेज प्लॉट करके रखते है। दो प्रकार के मुविंग ॲवरेज का उपयोग प्रचलित है,

एक्सपोनेन्शिअल मुविंग ॲवरेज और सिंपल मुविंग ॲवरेज। कम से कम तीन दिन से लेकर २०० दिनों तक के मुविंग ॲवरेज को चार्ट पर प्लॉट किया जाता है। कई लोग ३, ७, २१, ५० और २०० दिनों के मुविंग ॲवरेज को संयोजित करके उसका उपयोग करते है।

मुविंग अँवरेज का उपयोग (Use of Moving Average):

ट्रेन्ड जानने के लिए और निश्चित करने के लिए : आगे दर्शाए गए चार्ट पर आप देख सकते है कि दोनों ५० दिनों की एक्सपोनेन्शिअल मुविंग अवरेज (ई.एम.ए.) और २०० दिनों की एक्सपोनेन्शिअल मुविंग अँवरेज दर्शाती है कि स्थापित ट्रेन्ड ऊपर की दिशा का है।

जब दिर्घ कालावधी की मुविंग अँवरेज ऊपर की दिशा में बढ़ने लगता है तब कहा जा सकता है कि स्थापित तेजी का ट्रेन्ड कुछ समय तक तो रहेगा।

इसी तरह से जब कोई दिर्घ कालावधी की मुविंग ॲवरेज नीचे की दिशा में घटने लगता है तब ऐसा कहा जा सकता है कि स्थापित मंदी का ट्रेन्ड कुछ समय तक तो रहेगा।

मूविंग अँवरेज, सपोर्ट और रेजिस्टन्स की तरह भी काम कर सकता है।

जैसे कि आप ऊपर के चार्ट में देख सकते है, मविंग ॲवरेज एक राजस्टन्स की तरह भी काम कर सकती है और आगे चलकर एक सपोर्ट का तरह मा काम कर सकती है।

टेन्ड स्थापित होता है तब बाजार में मविंग ॲवरेज की मद्द से खरीदी और बिक्री करने के संकेत भी हासिल किए जा सकते है।

जब छोटी मूविंग ॲवरेज जैसे कि ३ दिनों की मूविंग अँवरेज अपने से बड़ी मूविंग अवरेज जैसे कि ७ दिनों की मूविंग अवरेज को ऊपर की दिशा में काटती है तब आपको खरीदी का संकेत मिलता है।

उसी तरह से जब बड़ा मूविंग ॲवरेज जैसे कि ७ दिनों की मूविंग ॲवरेज अपने से छोटी मूविंग ॲवरेज जैसे कि ३ दिनों की मूविंग ॲवरेज को ऊपर से नीचे की दिशा में काटती है तब आपको बिक्री का संकेत मिलता है।

ऊपरवाले चार्ट में इस प्रकार के क्रॉसओवर और क्रॉसडाऊन के कारण मिलनेवाले खरीदी संकेत और बिक्री संकेत दिखाए गए है।

जब आपको मूविंग अवरेज के आधार पर खरीदी या बिक्री के संकेत मिलते है तब उनका उपयोग करने से पहले दुसरे सूचक जैसे कि आर.एस.आई. और एम.ए.सी.डी. जो आपके निरीक्षण में है उनकी जाँच करने के बाद ही निर्णय लेना चाहिए।

नोट : आपको कभी भी किसी भी एक सूचक में मिलनेवाले संकेतों के आधार पर निर्णय नहीं लेना चाहिए। दुसरें सूचकों में मिलनेवाले संकेतों को जाँचने के बाद ही आपको निर्णय लेना चाहिए।

मूविंग अँवरेज एक महत्वपूर्ण टेक्नीकल टुल है, जिसका उपयोग आपको टेक्नीकल अॅनालिसिस में करना चाहिए।

कुछ प्रचलित ट्रेन्ड निश्चित करनेवाले मूविंग ॲवरेज :

  • २० दिन अर्थात कम कालावध का टेन्ड।
  • ४० दिन अर्थात मध्यम कालावधी का ट्रेन्ड।
  • २०० दिन अर्थात दिर्घ कालावधी का ट्रेन्ड।

दिर्घ कालावधी की तेजी है, ऐसा तब कहा जा सकता है जब :

  • ऊँचा बॉटम और अधिक ऊँचा टॉप चार्ट पर बनते हुए दिखाई देता हो।
  • चार्ट पर दिखनेवाले सभी मूविंग अँवरेज बढ़ते हुए दिखाइ देते हो।
  • बढ़ोतरी दिखाई देती है तब वह बढ़ते हुए व्हॉल्युम के साथ दिखाई दे तो।
  • भाव की चाल उसके सभी मूविंग ॲवरेज के ऊपर हो।

दिर्घ कालावधी की मंदी है, ऐसा तब कहा सकता है जब :

  • जब निचला टॉप और अधिक निचला बॉटम चार्ट पर बनते हुए दिखाई देता हो।
  • चार्ट पर दिखनेवाले सभी मूविंग ॲवरेज घटते हुए दिखाई देते हो।
  • गिरावट दिखाई देती है तब वह बढ़ते हुए व्हॉल्युम के साथ दिखाई दे तो।
  • भाव की चाल उसके सभी मूविंग ॲवरेज के नीचे हो।

मूविंग ॲवरेज के आधार पर किया गया अभ्यास जब अलग अलग टाईम फ्रेम में किया जाता है तब वह एक महत्वपूर्ण टेक्नीकल टुल के तौर पर आपके लिए पर्याप्त होता है। जिसकी मद्द से आप बाज़ार में अच्छे मौके का भरपूर फायदा ले सकते है।

व्हॉल्युम का महत्व (Importance of Volume):

व्हॉल्यूम का अभ्यास बहुत ही जरूरी है। व्हॉल्यम आपको स्थापित ट्रेन्ड की ताकत का अंदाजा देता है। एक मजबूत तेजी की चाल में बढ़ोतरी बढ़ते व्हॉल्युम के साथ आना चाहिए और करेक्शन कम व्हॉल्युम के साथ आना चाहिए।

उसी तरह से जब मजबूत मंदी का समय होता है तब गिरावट के दिनों में अधिक व्हॉल्युम होना चाहिए और बढ़ोतरी के दिनों में व्हॉल्युम कम होना चाहिए।

ट्रेन्ड रिवर्सल का संकेत मिला है, ऐसा तब कहा जा सकता है जब :

  • बहुत ही अधिक व्हॉल्युम के साथ भाव में बहुत ही कम प्रमाण में फर्क आता है।
  • सामान्य से अधिक व्हॉल्युम के साथ भाव में मजबूत सुधार या गिरावट आता है।

ज्यादातर ट्रेन्ड तब आगे बढ़ते हुए नज़र आता है जब :

  • सामान्य से अधिक व्हॉल्युम के साथ भाव बढ़ते हुए नज़र आता है।
  • सकारात्मक ब्रेकआऊट सामान्य से अधिक व्हॉल्यूम के साथ आता है।
  • सामान्य से कम व्हॉल्युम के साथ भाव में बहुत ही कम प्रमाण में फर्क आता है।

दुसरें कई सूचकों का अभ्यास जैसे कि फिबोनसी अंक, पिवट पॉईन्ट आदि जानलेने से आपके निर्णय क्षमता में सुधार हो सकता है।

आपको ध्यान में रखना चाहिए कि टेक्नीकल अॅनालिसिस के अभ्यास का संभव हो उतने सरल तरीके से उपयोग करने का प्रयत्न करना चाहिए।

बिना कारण अधिक सूचकों का उपयोग करके और अपूर्ण जानकारी के साथ कठिन व्यूहरचना करके उसमें उलझने की जरूरत नहीं।

कॅन्डलस्टिक का महत्व (Importance of Candlesticks):

जापानी कॅन्डलस्टिक का उपयोग बहुत ही कुशलता पूर्वक ट्रेन्ड रिवर्सल और ट्रेन्ड कन्टीन्युएशन का संकेत हासिल करने के लिए किया जा सकता है।

जापान में उसका उपयोग दशकों से चलते आ रहा है और अब भारतीय ट्रेडर द्वारा उसका बहुत उपयोग किया जाता है।

कॅन्डलस्टिक, जानकारी देने के विषय में अधिक प्रभावशाली और उपयोगी साबित होते है। जो आपको कॅन्डल देखते ही स्पष्ट हो जाता है, वह दुसरे प्रकार के चार्ट में जानना कठिन होता है।

एक बार आपने कॅन्डलस्टिक का उपयोग किया तो फिर आप दुसरे चार्ट का उपयोग कभी भी नहीं करोगे।

सरल प्रकार के कॅन्डल जैसे कि हॅमर, ईन्वर्टेड हॅमर, बलिश या बेअरीश एन्गल्फींग कॅन्डल द्वारा आप महत्वपूर्ण ट्रेन्ड रिवर्सल के संकेत हासिल कर संकते है।

आपको ऐसे कॅन्डल को ढूंढ़ना सिखना चाहिए और एक बार आपको किसी भी कॅन्डल के लक्षण के अनुसार संकेत और कन्फर्मेशन मिलता है तो आप खरीदी या बिक्री कर सकते है।

आप दो बुनियादी प्रकार के कॅन्डल को ऊपर चित्र में देख सकते है। काला कॅन्डल मंदी का कॅन्डल है और सफेद कॅन्डल तेजी का कॅन्डल है।

बाज़ार में किसी भी दिन अस्थिरता के आधार पर कॅन्डल साईज में विविधता नज़र आती है। कॅन्डलस्टिक की मद्द से आप चार्ट का बहुत अच्छी तरह से उपयोग कर सकते है।

विविध कॅन्डलस्टिक पॅटर्न की अधिक चर्चा केस स्टडी के पाठ में की गई है।

हॅमर और हँगिंग मॅन (Hammer & Hanging Man):

जब वह पॅटर्न बॉटम के नजदीक तैयार होता है तब उसे हॅमर कहते है और जब वह पॅटर्न टॉप के नजदीक तैयार होता है तब उसे हँगिंग मॅन कहते है।

शूटिंग स्टार (Shooting Star):

यह एक मंदी का संकेत देनेवाला रिवर्सल पॅटर्न है। इस प्रकार की मंदी दर्शानेवाली कॅन्डल में कन्फर्मेशन लेना जरूरी होता है, जो तिसरे दिन भाव गॅप के साथ नीचे खुलने पर मिलता है।

ड्रॅगन फ्लाय डोजी और ग्रेव्हस्टोन डोजी (Dragonfly Doji & Gravestone Doji):

वह कहाँ पर बने है, उसके आधार पर वह मजबूत ट्रेन्ड रिवर्सल का संकेत देते है। ऐसे कई कॅन्डलस्टिक का संयोजन उपलब्ध है

जिसकी विस्तार पूर्वक चर्चा मैंने अपनी किताब ‘टेक्नीकल अॅनालिसिस और कॅन्डलस्टिक की पहचान’ में की है। जिसे पढ़कर आप टेक्नीकल अॅनालिसिस का संपूर्ण ज्ञान हासिल कर सकते है।

महत्वपूर्ण नोट :

एक निश्चित संख्या में सूचकों का उपयोग करना चाहिए और तभी कदम आगे बढ़ाना चाहिए जब आपको एक से बढ़कर अधिक सूचकों में समान संकेत मिलते है।

एक साथ बहुत ज्यादा सूचकों का उपयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से आप दुविधा में पड़ सकते है।

आपको संपूर्णरूप से क्या चल रहा है इस पर जोर देकर जब सटीक संकेत मिलते है तभी ट्रेडिंग करनी चाहिए और जब इस तरह की पुष्टी करनेवाले संकेत नहीं मिलते, तब ट्रेडिंग से दूर रहना सिखना चाहिए।

हम आशा करते है की हमारी ये टेक्नीकल अनालिसिस और स्विंग ट्रेडिंग – Technical Analysis and Swing Trading in Hindi ब्लॉग पोस्ट आपको पसंद आयी होगी अगर आपको शेयर मार्किट से जुड़ा कोई भी सवाल है तो आप कृपया कमेंट में जरूर पूछे।

।। धन्यवाद ।।

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शेयर बाज़ार का मूल ज्ञान - Share Market Basics In Hindi · मार्च 4, 2021 पर 3:28 अपराह्न

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