डेरिवेटिव ट्रेडिंग में प्रयुक्त होनेवाली शब्दावली – Terminology Used in Derivatives Trading in Hindi

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डेरिवेटिव ट्रेडिंग (Derivatives Trading) को अच्छी तरह समझने के लिए आवश्यक है कि इसमें प्रयुक्त होनेवाले शब्दों (टर्म) का अर्थ, महत्त्व तथा उनका उपयोग जाना जाए।

चूँकि डेरिवेटिव बाजार (Derivatives Market) सतत विकसित होता जा रहा है,अत: इसमें नए शब्द भी जुड़ते जाते हैं। फिर भी, अब तक व्यवहार में आनेवाले मुख्य टर्म (शब्द) इस प्रकार हैं

डेरिवेटिव (Derivatives)

सरल शब्दों में वित्तीय बाजार में डेरिवेटिव (Derivative) ऐसा प्रोडक्ट या एसेट है, जिसका मूल्य किसी अन्य प्रोडक्ट या एसेट (जो इसके अंतर्निहित है) पर निर्भर करता है।

डेरिवेटिव प्रोडक्ट (Derivatives Product) के अंतर्निहित कोई इक्विटी, डेब्ट, कॉमोडिटी, म्यूचुअल फंड (Mutual Fund) या कोई अन्य एसेट हो सकता है।

बाजार में इस एसेट की माँग आपूर्ति, स्थिति तथा कीमत के अनुसार इसके डेरिवेटिव प्रोडक्ट (Derivatives Product) का मूल्य निर्धारित होता है।

इस प्रकार जो कारक इस एसेट पर प्रभाव डालते हैं, वही इसके डेरिवेटिव प्रोडक्ट (Derivatives Product) के मूल्य को प्रभावित करते हैं।

फॉरवर्ड (Forward)

फॉरवर्ड कॉण्ट्रेक्ट (Forward Contract) दो पार्टियों के मध्य होनेवाला वह करार है, जिसके तहत लेन-देन की कीमत तथा शर्ते वर्तमान में तय कर दी जाती हैं, जबकि सेटलमेंट (Settlement) भविष्य की किसी निश्चित तारीख को किया जाता है।

इस फॉरवर्ड कॉण्ट्रेक्ट (Forward Contract) में यह लाभ है कि भविष्य में होनेवाले ट्रांजेक्शन (लेन-देन) की कीमत तथा अन्य बातें कॉण्ट्रेक्ट (Contract) करते समय ही तय कर दी जाती हैं।

यह कॉण्ट्रेक्ट (Contract) दो पार्टियाँ अपनी सुविधा तथा जरूरतों के अनुसार आपस में करती हैं। अतः प्रत्येक फॉरवर्ड कॉण्ट्रेक्ट (Forward Contract) एक-दूसरे से भिन्न होते हैं तथा ग्राहक की सुविधानुसार होते हैं।

फ्यूचर (Future)

यह कॉण्ट्रेक्ट (Contract) फॉरवर्ड कॉण्ट्रेक्ट (Forward Contract) जैसा लगता है, परंतु उससे भिन्न है। फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट (Future Contract) में दो पार्टियों के मध्य निश्चित कीमत पर, निश्चित समय पर भविष्य में किसी एसेट की खरीद या बिक्री का करार होता है।

फॉरवर्ड कॉण्ट्रेक्ट (Forward Contract) की तरह यह ग्राहक की सुविधानुसार न होकर अतिरिक्त विशेषताओं के साथ होता है तथा एक्सचेंज में इसकी ट्रेडिंग की जा सकती है।

ऑप्शन (Option)

‘ऑप्शन’ ऐसा डेरिवेटिव कॉण्ट्रेक्ट (Derivatives Contract) है, जिसके ऑप्शन धारक (Option Holder) को कॉण्ट्रेक्ट (Contract) के तहत खरीद या बिक्री का अधिकार तो मिलता है, परंतु खरीद या बिक्री का बंधन नहीं होता।

इस प्रकार ऑप्शन धारक (Option Holder) को सुविधा होती है कि कॉण्ट्रेक्ट (Contract) के तहत वह खरीद या बिक्री (जैसा भी कॉण्ट्रेक्ट (Contract) में निर्देशित हो) तभी करे, जब उसे लाभ हो।

यदि ऑप्शन धारक (Option Holder) को महसूस हो कि स्थिति उसके पक्ष में नहीं है तो वह ट्रांजेक्शन करने के लिए बाध्य नहीं है।

ऑप्शन (Option) के दो प्रकार हैं-‘काल ऑप्शन’ तथा ‘पुट ऑप्शन’। काल ऑप्शन (Call Option) में किसी एसेट को खरीदने का अधिकार (बाध्यता नहीं) मिलता है तथा ‘पुट ऑप्शन’ में किसी एसेट की बिक्री करने का अधिकार (बाध्यता नहीं) मिलता है।

वारंट (Warrant)

वित्तीय बाजार में चारों तरफ फैले अनगिनत वित्तीय इंस्ट्रमेंट्स में वारंट भी एक ऐसा प्रस्ताव है, जिसकी प्रकृति ऑप्शन जैसी है।

वारंट’ (Warrant) ऐसा वित्तीय प्रस्ताव है, जो किसी व्यक्ति को, किसी एसेट को, निश्चित मूल्य पर निश्चित अवधि के दौरान क्रय करने का अधिकार देता है।

यह उस व्यक्ति के लिए बाध्यकारी नहीं है। कई शेयरधारकों को कंपनियों की तरफ से अतिरिक्त शेयर की खरीद के वारंट मिलते रहते हैं।

वारंट (Warrant) का प्रयोग किसी समूह को भविष्य के लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से भी किया जाता है। वारंट धारक (Warrant Holder) वस्तुस्थिति का विश्लेषण करके इसका उपयोग करने या न करने के बारे में निर्णय लेता है।

स्वॉप (Swap)

इस प्रकार के डेरिवेटिव इंस्ट्रमेंट (Derivative Instrument) डेब्ट मार्केट (Debt Market) में प्रचलित हैं।

‘स्वॉप’ (Swap) दो पार्टियों के मध्य होनेवाला ऐसा करार (अधिकतर निजी करार) है, जिसके तहत भविष्य में पहले से गणना या फॉर्मूले के अनुसार कैश-फ्लो’ (धन-प्रवाह) को बदला जा सके।

बाजार में कई तरह के स्वॉप डेरिवेटिव प्रचलन में हैं। ‘इंटरेस्ट रेट स्वॉप’ (Interest Rate Swap) के तहत दो इंटरेस्ट रेट (Interest Rate) के तहत कैश फ्लो का स्वॉप (बदल दिया जाता है) किया जाता है

तथा ‘करेंसी स्वॉप’ (Currency Swap) के तहत मूलधन तथा ब्याज दोनों को एक साथ अन्य मूलधन तथा ब्याज के प्रवाह को स्वॉप (Swap) किया जाता है। इस प्रकार, मुद्रा का एक अन्य रूप सामने आता है।

एक्सचेंज में ट्रेड किए जा सकनेवाले डेरिवेटिव (Exchangeable Derivatives)

वित्तीय बाजार विभिन्न एसेट से संबंधित कई एक्सचेंज (Exchange) होते हैं। इन एक्सचेंजों में विभिन्न डेरिवेटिव (Derivative) की ट्रेडिंग की जाती है।

एक्सचेंज (Exchange) में ट्रेड किए जानेवाले डेरिवेटिव (Derivative) विशेष आकार के होते हैं तथा विशेष तरीके से ट्रेड (Trade) किए जाते हैं।

ओवर द काउंटर डेरिवेटिव (Over the Counter Derivatives)

इन डेरिवेटिव (Derivative) की ट्रेडिंग एक्सचेंज में न होकर काउंटर पर (दो निजी पार्टियों के मध्य) होती है। इसमें दो पार्टियाँ आपस में बैठकर कॉण्ट्रेक्ट (Contract) का ढाँचा तथा शर्ते अपनी जरूरत व सुविधा के अनुसार तैयार करती हैं।

इस प्रकार के डेरिवेटिव इंस्ट्रमेंट (Derivative Instrument) में काफी लचीलापन होता है तथा इनकी प्रकृति ग्राहकों की सुविधानुसार होती है।

इंडेक्स (Index)

‘इंडेक्स’ (Index) एक संख्या है, जो एक समूह की कीमतों में समय के साथ आए परिवर्तन को आँकती है तथा इस परिवर्तन को प्रदर्शित करती है।

किसी क्षेत्र या समूह में समय के साथ आए परिवर्तन को समझना इंडेक्स (Index) के माध्यम से आसान हो जाता है। समय के साथ इंडेक्स (Index) में आए परिवर्तन से इसके क्षेत्र की गतिविधियों का अंदाजा लगाया जाता है।

इंडेक्स आधारित डेरिवेटिव (Index Based Derivatives)

प्रत्येक डेरिवेटिव (Derivative) के अंतर्निहित कोई एसेट होती है तथा इसी एसेट की स्थिति के आधार पर डेरिवेटिव (Derivative) का मूल्य आँका जाता है।

जब किसी डेरिवेटिव (Derivative) के अंतर्निहित किसी समह (या क्षेत्र) की इंडेक्स (Index) हो तो यह ‘डेटिवेटिव इंडेक्स’ आधारित कहलाता है।

इंडेक्स (Index) के प्रदर्शन से इस डेरिवेटिव (Derivative) का मूल्य जुड़ा होता है। चूँकि इंडेक्स (Index) के प्रदर्शन से किसी क्षेत्र की गतिविधियों का आकलन किया जाता है

अत: किसी निवेशक के लिए किसी क्षेत्र-विशेष से लाभ उठाने के लिए ‘इंडेक्स (Index) आधारित डेरिवेटिव (Derivative) उपयक्त इंस्ट्रमेंट (Instrument) है।

एक्सचेंज में ट्रेडिंग किए जानेवाले फंड (Exchange Traded Funds)

ये वित्तीय इंस्ट्रमेंट (Instrument) म्यूचुअल फंड (Mutual Fund) के रूप में होते हैं, जिनकी ट्रेडिंग एक्सचेंज (Trading Exchange) में संभव है।

ये फंड किसी इंडेक्स (Index) विशेष पर आधारित होते हैं तथा इंडेक्स (Index) में होनेवाले परिवर्तनों के अनुसार प्रदर्शन करते हैं।

इसमें निवेशक अपने निवेश पर नजर रख सकता है तथा इच्छानुसार निवेश को बाहर निकाल सकता है। इसमें म्यूचुअल फंड (Mutual Fund) तथा स्टॉक (Stock) दोनों का मिलाजुला रूप होता है।

कॉस्ट ऑफ कैरी (Cost of Carry)

किसी एसेट की फ्यूचर पोजीशन होल्ड (Future Position Hold) करने में जो अपेक्षित खर्च आता है, उसे ‘कॉस्ट ऑफ कैरी’ (Cost of Carry) कहते हैं।

इसमें एसेट की स्टोरेज कॉस्ट (Storage Cost) तथा एसेट की फाइनेंस करने में लगे धन पर ब्याज शामिल होता है।

किसी एसेट की स्पॉट प्राइस (Spot Price) तथा फ्यूचर प्राइस (Future Price) के अंतर में उस एसेट की ‘कॉस्ट ऑफ कैरी’ (Cost of Carry) तथा इस निवेश से अर्जित आय शामिल होती है।

बैकवार्डशन (Backwardation)

जब बाजार में किसी एसेट की फ्यूचर प्राइस (Future Price) इस एसेट की स्पॉट प्राइस (Spot Price) से कम हो तो इस स्थिति को उस एसेट के लिए ‘बैकवार्डेशन’ (Backwardation) कहते हैं।

बैकवार्डेशन (Backwardation) की स्थिति में ऐसा भी हो सकता है कि एसेट की आगामी समय की फ्यूचर प्राइस इस एसेट की निकट भविष्य की फ्यूचर प्राइस से कम हो!

सामान्यतया किसी एसेट की फ्यूचर प्राइस (Future Price) उस एसेट की स्पॉट प्राइस (Spot Price) से ज्यादा होती है

क्योंकि इसमें उस एसेट की स्टोरेज कीमत तथा ब्याज दर (Cost of Carry) शामिल होती हैं। इस स्थिति को ‘कोंटिन्गो’ कहते हैं।

इम्लाइड वोलाटिलिटी (Implied Volatility)

यह इस बात का पैमाना है कि कोई एसेट या स्टॉक (Stock) की कीमतें कितनी परिवर्तनशील हैं।

यदि किसी एसेट की कीमतों में (High Volatility) शीघ्र उतार-चढ़ाव है तो इस स्थिति को सही प्रकार से भापकर ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है। यद्यपि ऐसी एसेट की ट्रेडिंग जोखिम भरी भी होती है।

फॉरवर्ड डेरिवेटिव सौदे (Forward Derivatives Deal)

‘फॉरवर्ड कॉण्ट्रेक्ट’ (Forward contract) दो पार्टियों के मध्य किसी एसेट की खरीद तथा बिक्री को लेकर वर्तमान में होनेवाला वह करार है, जिसकी कीमतें तथा अन्य तौर-तरीके (फीचर) करार होने के दिन ही तय कर दिए जाते हैं।

केवल इसका सेटलमेंट भविष्य में निर्धारित समय पर होता है।

इस फॉरवर्ड कॉण्ट्रक्ट (Forward contract) के तहत एक पार्टी किसी एसेट को भविष्य में निर्धारित समय पर पहले से तय कीमतों तथा शर्तो पर बेचने पर तथा दूसरी पार्टी इन्हीं कीमतों तथा शर्तों पर उसी निर्धारित समय पर खरीदने को राजी होती है।

फॉरवर्ड कॉण्ट्रक्ट (Forward contract) की ट्रेडिंग एक्सचेंज (Trading Exchange) के दायरे से बाहर होती है। यह दो पार्टियों के मध्य होनेवाला कस्टमाइज्ड ग्राहक की सुविधानुसार सौदा है, न कि किसी एक्सचेंज में होनेवाला स्टैंडराइज्ड (नियत मानकों पर आधारित) सौदा।

दोनों पार्टियाँ द्विपक्षीय आधार पर लचीलेपन का रुख अख्तियार करते हुए आपसी सुविधानुसार इस प्रकार का ‘फॉरवर्ड कॉण्ट्रेक्ट’ करती हैं।

इस फॉरवर्ड कॉण्ट्रक्ट (Forward contract) में जोखिम भी बना रहता है। अर्थात् दोनों पार्टियों में से कोई एक पार्टी डिफाल्ट कर जाए (सौदे की शर्तों का पालन न करे)

तो दूसरी पार्टी को राहत देने के लिए गारंटी देनेवाला ‘सेटलमेंट मेकैनिज्म’ मौजूद नहीं होता (क्योंकि ये सौदे एक्सचेंज में ट्रेड नहीं होते)। फॉरवर्ड (Forward) सौदे के कुछ फीचर (तौर-तरीके) इस प्रकार हैं

सौदे का आकार (Contract Size)

कॉण्ट्रेक्ट (Contract) साइज से तात्पर्य है इसके अंतर्निहित एसेट की मात्रा।

चूँकि फॉरवर्ड सौदे कस्टमाइज्ड (ग्राहक की सुविधानुसार) होते हैं, अत: कॉण्ट्रेक्ट (Contract) का साइज भी आपसी सुविधा तथा जरूरत के अनुसार तय होता है। कॉण्ट्रेक्ट (Contract) साइज ‘ऑड’ भी हो सकती है।

निपटान तिथि (Expiry Date)

जिस नियत दिन फॉरवर्ड कॉण्ट्रेक्ट (Forward Contract) का सेटलमेंट किया जाना तय किया जाता है, वह इस कॉण्ट्रेक्ट (Contract) की ‘Expiry Date’ (निपटान तिथि) कहलाती है।

दोनों पक्ष अपनी सुविधानुसार इसे तय करते हैं। किसी तीसरे पक्ष (एक्सचेंज या अन्य बॉडी) का इसमें कोई दखल नहीं होता।

एसेट का प्रकार (Type of Asset)

यदि कोई डेरिवेटिव (Derivative) सौदा एक्सचेंज के माध्यम से ट्रेड किया जाता है तो एक्सचेंज के नियमानुसार तय एसेट ही कॉण्ट्रेक्ट (Contract) में शामिल की जा सकती है।

चूँकि फॉरवर्ड कॉण्ट्रेक्ट ऐसा डेरिवेटिव (Derivative) सौदा है, जो एक्सचेंज के दायरे से बाहर रखकर ट्रेड (Trade) किया जाता है।

अत: एसेट के प्रकार का चयन तथा एसेट की संरचना में परिवर्तन, दोनों पार्टियाँ अपनी सुविधा तथा जरूरत के अनुसार कर सकती हैं। फिर भी, अधिकतर सौदे स्टैंडर्ड एसेट को अंतर्निहित रखकर ही किए जाते हैं।

एसेट की गुणवत्ता (Quality of Asset)

एक्सचेंज द्वारा ट्रेड किए जानेवाले सौदे की अंतर्निहित एसेट में कोई कमी आ जाए तो ऐसी एसेट की लिक्विडिटी (तरलता-नकदी में बदलने की क्षमता) कम हो जाती है; क्योंकि ऐसी एसेट निर्धारित मानकों से मैच नहीं होती।

फॉरवर्ड कॉण्ट्रेक्ट (Forward Contract) में यह फायदा है कि ऐसी एसेट भी ट्रेड की जा सकती है, क्योंकि दोनों पक्षों को इसकी जानकारी होती है तथा इसके परिणाम की जानकारी होती है और सौदे की शर्तों में इसकी कमी की भरपाई करने की व्यवस्था तय कर दी जाती है।

ऑप्शन (Option)

‘ऑप्शन’ वर्तमान में वित्तीय बाजार का सर्वाधिक पसंदीदा डेरिवेटिव (Derivative) है। ऑप्शन (Option) से जुड़े कुछ ऐसे लाभ, जो सामान्य ट्रेडिंग तथा निवेश में उपलब्ध नहीं हैं, इसे आकर्षक डेरिवेटिव इंस्ट्रमेंट (Derivative instrument) बनाते हैं।

ऑप्शन (Option) के साथ बड़ी मात्रा में लीवरेज जुड़ी होती है।हालाँकि ऑप्शन डेरिवेटिव ट्रेडिंग (Option Derivatives Trading) में कुछ खतरे भी जुड़े रहते हैं, जिन्हें सदैव ध्यान में रखना निवेशकों के लिए आवश्यक है।

इन संभावित खतरों से उठी चेतावनियों को नजरअंदाज करना भारी नुकसान को आमंत्रण दे सकता है।

‘ऑप्शन’ ऐसा डेरिवेटिव इंस्ट्रमेंट (Derivative Instrument) है, जिसके तहत निवेशक को कोई निर्धारित एसेट निर्धारित कीमत पर भविष्य में निर्धारित तारीख पर खरीदने या बेचने का (जैसा भी सौदा किया जाए) अधिकार तो होता है, परंतु ऐसा करने की बाध्यता उस निवेशक पर नहीं होती।

बाजार की बदली हुई स्थिति के चलते निवेशक अपना नुकसान देखकर ऑप्शन (Option) के ट्रांजेक्शन से अलग हो सकता है।

यद्यपि ऐसा करने पर उसके द्वारा चुकाया गया ‘ऑप्शन-प्रीमियम’ वापस नहीं लौटाया जाता, जो कि सौदे को निभाने पर होनेवाले नुकसान का बहुत छोटा भाग होता है।

उदाहरण के तौर पर, कोई निवेशक डेरिवेटिव बाजार (Derivatives Market) में रिलायंस इंडस्ट्री के 1,000 शेयर 2,300 रुपए प्रति शेयर की दर से भविष्य में निर्धारित तारीख पर खरीदने के लिए ऑप्शन का सौदा करता है।

अब यदि निर्धारित तारीख पर बाजार में रिलायंस इंडस्ट्री के शेयर का भाव 2,600 रुपए है तो वह निवेशक इस ऑप्शन सौदे को जरूर निभाना चाहेगा, क्योंकि इस सौदे के तहत उसे बाजार भाव से कम कीमत पर रिलायंस इंडस्ट्री के शेयर मिल रहे हैं।

इस स्थिति के विपरीत, यदि निर्धारित तारीख पर रिलायंस इंडस्ट्री के शेयर का बाजार भाव 2,000 रुपए है तो निवेशक स्वयं को ऑप्शन सौदे से अलग रखना चाहेगा, क्योंकि ऑप्शन सौदे के तहत शेयरों की खरीद करने पर उसे बाजार की तुलना में नुकसान होगा।

ऑप्शन सौदे से स्वयं को अलग रखने पर निवेशक को ‘ऑप्शनप्रीमियम’ के तहत जमा की गई राशि पर अधिकार त्यागना होगा।

विभिन्न प्रकार के ऑप्शन (Different Types of Options)

डेरिवेटिव बाजार (Derivatives Market) में कई प्रकार के ‘ऑप्शन-इंस्ट्रमेंट’ उपलब्ध रहते हैं। बाजार की स्थिति का आकलन तथा विभिन्न ऑप्शन को पूरा करने की शर्तों के अनुसार कोई निवेशक स्वयं के लिए सही ऑप्शन का चुनाव कर सकता है।

कॉल ऑप्शन (Call Option)

इस इंस्ट्रमेंट (Instrument) के तहत निवेशक को यह अधिकार होता है कि वह कोई एसेट निर्धारित कीमत पर भविष्य में निर्धारित तारीख पर खरीदे।

यद्यपि उस निर्धारित तारीख पर उस निवेशक पर इस एसेट को खरीदने का बंधन नहीं होता। कॉल ऑप्शन’ के तहत किसी एसेट की खरीद करने के पीछे निवेशक का यह आकलन होता है कि बाजार में भविष्य में इस एसेट की कीमत बढ़ेगी।

निवेशक इस एसेट की कीमत में वृद्धि के द्वारा लाभ अर्जित करता है।

यदि बाजार का घटनाक्रम निवेशक के पूर्व आकलन के अनुसार न हो तथा उस एसेट की कीमत में गिरावट दर्ज हो और निवेशक यह महसूस करे कि कॉल ऑप्शन के तहत तय की गई एसेट को निर्धारित कीमत पर खरीदने में नुकसान है

तो वह इस सौदे (कॉल ऑप्शन) से स्वयं को अलग कर सकता है। ऐसी स्थिति में सौदा करते समय निवेशक द्वारा जमा किया गया ऑप्शन प्रीमियम जब्त कर लिया जाता है।

कॉल ऑप्शन (Call Option) पूरा न किए जाने की स्थिति में निवेशक को केवल ऑप्शन प्रीमियम की राशि के बराबर घाटा होता है, जो ऐसी स्थिति में सौदे को निभाए जाने पर होनेवाले नुकसान से काफी कम होता है।

उदाहरण के तौर पर, एक निवेशक 5 मई, 2008 को एक कॉल ऑप्शन (Call Option) सौदा करता है, जिसके तहत उसे मई माह के आखिर में भेल (BHEL) के 1,000 शेयर 1,890

रुपए प्रति शेयर की दर से खरीदने का अधिकार मिलता है। इस सौदे की प्रीमियम राशि वह जमा कर देता है।

अब यदि मई माह के आखिर (अंतिम गुरुवार) में इस शेयर की कीमत 2,150 रुपए प्रति शेयर (1,890 रुपए से अधिक) है तो निवेशक इस सौदे को निभाना चाहेगा, क्योंकि इससे उसे लाभ अर्जित होगा।

इस स्थिति के उलट यदि मई माह के आखिर में इस शेयर की कीमत बाजार में 1,700 रुपए (1,890 रुपए से कम) है तो निवेशक स्वयं को इस सौदे से अलग रखना चाहेगा, क्योंकि सौदा निभाने पर उसे अवश्यंभावी नुकसान होगा।

निवेशक द्वारा स्वयं को सौदे से अलग रखने की स्थिति में उसके द्वारा जमा की गई प्रीमियम राशि नहीं लौटाई जाएगी।

पुट ऑप्शन (Put Option)

यह कॉल ऑप्शन (Call Option) के ठीक उलट होता है। इस ‘पुट ऑप्शन’ के तहत निवेशक को यह अधिकार हासिल होता है कि वह किसी एसेट को निर्धारित कीमत पर भविष्य में निर्धारित तारीख पर बेच सके।

यद्यपि ऐसा करना निवेशक के लिए बाध्यकारी नहीं है।

उदाहरण के लिए, डेरिवेटिव बाजार में एक पुट ऑप्शन (Put Option) (हिंदुस्तान जिंक के 1,000 शेयरों का लॉट 695 रुपए प्रति शेयर की दर से) निवेशक द्वारा 5 मई, 2008 को खरीदा जाता है, जिसे मई माह के अंतिम गुरुवार को पूरा करना है।

यदि मई माह के अंतिम गुरुवार (21 मई) को हिंदुस्तान जिंक के शेयर की कीमत 695 रुपए से कम है तो निवेशक पुट ऑप्शन (Put Option) पूरा करना चाहेगा, क्योंकि इससे उसे लाभ होगा।

इसके विपरीत, यदि इस दिन (20 मई, गुरुवार) हिंदुस्तान जिंक के शेयर की कीमत 695 रुपए से अधिक है तो निवेशक पुट ऑप्शन सौदे को छोड़ना चाहेगा, क्योंकि सौदा निभाने पर उसे घाटा होगा तथा वह प्रीमियम राशि को जाने देगा।

पुट ऑप्शन (Put Option) किसी एसेट की निर्धारित कीमत प्राप्त करने में सहायक होता है। बाजार के गिरने की अवस्था में निवेशक को यह ऑप्शन सुरक्षित करता है।

इस प्रकार बुद्धिमत्तापूर्वक उपयोग किए जाने पर यह इंस्ट्रमेंट (पुट ऑप्शन) निवेशक द्वारा कमाए जानेवाले फायदों को सुरक्षित करता है।

अमेरिकन ऑप्शन (American Option)

यह ऑप्शन सौदों (कॉल तथा पुट) का ऐसा रूप है, जिसमें सौदे को इसकी अवधि के दौरान किसी भी समय पूरा किया जा सकता है।

इस प्रकार यदि निवेशक चाहे तो अपनी लाभान्वित स्थिति के अनुसार सौदे की अवधि के बीच में ही सौदे को पूरा कर सकता है।

उदाहरण के तौर पर, एक निवेशक ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के 1,000 शेयर का कॉल ऑप्शन मई माह के प्रारंभ में 2,200 रुपए प्रति शेयर की दर से खरीदा है।

मई माह के मध्य में इस शेयर की कीमत 2,850 रुपए हो जाती है तथा निवेशक का अनुमान है कि माह के अंत तक इस शेयर की कीमत में गिरावट दर्ज होगी, तब वह माह के मध्य में ही

कॉल ऑप्शन (Call Option) पूरा करके लाभ अर्जित कर सकता है। उसे मई माह के अंत तक इंतजार करने की आवश्यकता नहीं होती।

यूरोपियन ऑप्शन (European Option)

इस प्रकार के ऑप्शन सौदे निर्धारित तारीख से पहले नहीं निपटाए जा सकते हैं। अत: यूरोपियन ऑप्शन के सौदे उन सेक्टर के लिए उपयुक्त होते हैं, जहाँ जल्दी उतार-चढ़ाव दर्ज नहीं होते।

ऑप्शन में प्रयुक्त शब्दावली (Terminology Used in Options)

ऑप्शन की कार्य-प्रणाली को भली-भाँति समझने के लिए इससे जुड़ी शब्दावली को जानना आवश्यक है

ऑप्शन धारक (Option Holder)

ऑप्शन सौदों (कॉल तथा पुट) को खरीदनेवाला ‘ऑप्शन होल्डर’ कहलाता है। सौदे को पूरा करने संबंधी निर्णय ऑप्शन होल्डर के हाथ में होता है।

ऑप्शन राइटर (Option Writer)

ऑप्शन सौदों के एक सिरे पर ऑप्शन होल्डर होता है तो दूसरे सिरे पर ऑप्शन राइटर। ऑप्शन राइटर के पास सौदों को नकारने का अधिकार नहीं होता।

कॉल ऑप्शन (Call Option) के तहत जब ऑप्शन होल्डर कोई निश्चित एसेट पूर्व निर्धारित कीमत पर खरीदने को तत्पर होता है तो ऑप्शन राइटर को यह एसेट उस पूर्व निर्धारित कीमत पर बेचनी पड़ती है।

इसी प्रकार, पुट ऑप्शन (Put Option) के तहत जब ऑप्शन होल्डर कोई निश्चित एसेट पूर्व निर्धारित कीमत पर बेचने को तत्पर होता है

तो ऑप्शन राइटर (Option Writer) को यह एसेट उस पूर्व निर्धारित कीमत पर खरीदनी पड़ती है। ऑप्शन होल्डर (Option Holder) द्वारा ऑप्शन राइटर (Option Writer) को सौदे की प्रीमियम राशि चुकाई जाती है।

एक्सरसाइज प्राइस (Exercise Price)

किसी भी ऑप्शन सौदे (कॉल तथा पुट) की निश्चित कीमत तय होती है, जिस पर ऑप्शन होल्डर (Option Holder) किसी निश्चित एसेट को खरीदता या बेचता है।

उस पूर्व निर्धारित कीमत को उस ऑप्शन सौदे की ‘एक्सरसाइज प्राइस’ कहते हैं।

ऑप्शन एक्सरसाइज (Option Exercise)

जब ऑप्शन सौदे के तहत किसी एसेट की खरीद या बिक्री (पूर्व निर्धारित कीमत पर) होती है तो इसे ‘ऑप्शन एक्सरसाइज होना’ या ‘सौदा पूरा करना’ कहते हैं।

ऑप्शन प्रीमियम (Option Premium)

ऑप्शन (Option) के सौदे (कॉल तथा पुट) करते समय ऑप्शन होल्डर (Option Holder) द्वारा कुछ राशि (प्रति शेयर के हिसाब से) ऑप्शन राइटर (Option Writer) को अदा करनी पड़ती है।

इस राशि को ‘ऑप्शन प्रीमियम’ कहते हैं। यह प्रीमियम राशि पूरे सौदे के शुल्क के रूप में ऑप्शन राइटर (Option Writer) को मिलती है, भले ही ऑप्शन होल्डर द्वारा सौदा पूरा न किया जाए।

उदाहरण स्वरूप कॉल ऑप्शन (Call Option) सौदे के तहत किसी व्यक्ति (ऑप्शन होल्डर) ने रिलायंस एनर्जी के 1,000 शेयर का लॉट 1,450 रुपए प्रति शेयर के भाव से खरीदे तथा इस पर प्रति शेयर 50 रुपए की प्रीमियम राशि ऑप्शन राइटर (Option Writer) को अदा की।

इस प्रकार ऑप्शन होल्डर (Option Holder) को यह सौदा 1,500 रुपए प्रति शेयर में पड़ा। यदि निर्धारित तारीख को शेयर के भाव 1,500 रुपए प्रति शेयर से ऊपर हो तो ऑप्शन होल्डर (Option Holder) इस सौदे को एक्सरसाइज करके लाभ कमाएगा।

अन्यथा वह सौदे को निरस्त करना चाहेगा तथा ऑप्शन राइटर (Option Writer) प्रीमियम राशि को पहले की भाँति अपने पास ही रखेगा।

एट मनी ऑप्शन, इन मनी ऑप्शन तथा आउट मनी ऑप्शन (At Money Option, in Money Option and Out Money Option)

ऑप्शन सौदों (कॉल तथा पुट) में ऑप्शन राइटर (Option Writer) द्वारा एसेट की बाजार कीमतों की तुलना लगातार सौदे की एक्सरसाइज प्राइस से की जाती है, ताकि लाभ की स्थिति में ऑप्शन होल्डर सौदे को पूरा कर सके।

जब एसेट की बाजार कीमत सौदे में दर्ज एक्सरसाइज प्राइस के बराबर हो तो इस स्थिति को ‘एट मनी ऑप्शन’ कहते हैं। इस स्थिति पर ऑप्शन होल्डर (Option Holder) को कोई लाभ अथवा हानि दर्ज नहीं होती।

जब बाजार में एसेट की कीमत ऐसी स्थिति में हो कि सौदे को पूरा करने पर ऑप्शन होल्डर को लाभ अर्जित हो, ऐसी स्थिति को ‘इन मनी ऑप्शन’ कहते हैं।

कॉल ऑप्शन (Call Option) में जब एसेट की बाजार कीमत एसेट की एक्सरसाइज कीमत से अधिक हो तो ऐसी स्थिति इन मनी ऑप्शन कहलाती है।

पुट ऑप्शन (Put Option) में जब एसेट की एक्सरसाइज कीमत इस एसेट की बाजार कीमत से अधिक हो तो ऑप्शन होल्डर (Option Holder) को लाभ होता है, अतः ऐसी स्थिति इन मनी ऑप्शन (Money Option) कहलाती है।

कई बार बाजार का घटनाक्रम निवेशक के आकलन के विपरीत घटित होता है।

ऐसी स्थिति में जब ऑप्शन (Option) सौदे के तहत एसेट की एक्सरसाइज प्राइस इस एसेट की बाजार कीमत की तुलना में इस स्थिति में हो कि सौदा पूरा करने पर ऑप्शन होल्डर (Option Holder) को नुकसान हो, इस स्थिति को ‘Out Money Option’ कहते हैं।

फ्यूचर्स (Futures)

वित्तीय बाजार के डेरिवेटिव सेगमेंट (Derivatives Segment) (हिस्से) में ‘फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट’ दो पार्टियों के मध्य ऐसा सौदा है, जिसके तहत वे भविष्य में नियत दिन पर किसी निश्चित एसेट का निर्धारित कीमत पर खरीद-बिक्री का करार करते हैं।

देखने में फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट (Future Contract) फॉरवर्ड कॉण्ट्रेक्ट (Forward Contract) की तरह ही प्रतीत होता है

परंतु फॉरवर्ड कॉण्ट्रेक्ट (Forward Contract) के विपरीत फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट (Future Contract) की ट्रेडिंग स्टॉक एक्सचेंज के तहत की जाती है तथा फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट (Future Contract) के विस्तृत विवरण पूर्व निर्धारित होते हैं।

फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट (Future Contract) के अधिकतर मानक एक जैसे होते हैं, अत: फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट (Future Contract) की तरलता (लिक्विडिटी) फॉरवर्ड कॉण्ट्रेक्ट से कहीं अधिक होती है।

फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट (Future Contract) को पूरा करने के लिए इस कॉण्ट्रेक्ट की परिपक्वता तारीख तक इंतजार करने की आवश्यकता नहीं होती, अपितु आवश्यकता पड़ने पर निवेशक अपनी पूर्व स्थिति के विपरीत नई स्थिति अख्तियार कर सकता है।

इस प्रकार निवेशक अपनी जरूरत के अनुसार निर्णय ले सकता है। फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट्स स्टॉक एक्सचेंज के तत्त्वावधान में निपटाए जाते हैं तथा ये स्टैंडराइज्ड प्रकृति के होते हैं।

फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट (Future Contract) में किसी एसेट के प्रकार (क्वालिटी) तथा मात्रा (क्वांटिटी) पूरी तरह स्पष्ट होती है, जिससे इस कॉण्ट्रेक्ट (Contract) के शामिल होनेवाले निवेशक को इस फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट (Future Contract) के प्रभाव का पूरा दायरा समझ में आ जाए।

किसी भी फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट (Future Contract) का समापन दिवस (एक्सपायरी डेट) स्पष्ट रूप से परिभाषित होता है। भारतीय स्टॉक एक्सचेंजों में यह प्रत्येक माह के अंतिम गुरुवार को नियत होता है।

फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट (Future Contract) में एक्सपायरी डेट के साथ ही एसेट के ट्रांजेक्शन तथा डिलीवरी के समय का उल्लेख भी होता है।

प्राइस कोटेशन (Price Quotation)

फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट (Future Contract) में ‘प्राइस कोटेशन’ का उल्लेख रहता है, जिसके अनुसार एसेट की कीमतों में अपेक्षित परिवर्तन स्वीकार किया जा सके।

सेटलमेंट (Settlement)

फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट (Future Contract) में दो तरीकों से सौदों का सेटलमेंट किया जाता है

पहला तरीका ‘कैश सेटलमेंट’ का है, जिसके तहत निर्धारित समापन तारीख पर एसेट की कीमतों में परिवर्तन के अनुसार कैश का लेन-देन करके सौदे का निपटान किया जाता है।

दूसरे तरीके के तहत एसेट की वास्तविक डिलिवरी की जाती है। कई बार एसेट के स्थानांतरण के लिए अलग व्यवस्था की जाती है।

स्पॉट प्राइस (Spot Price)

विभिन्न एसेट की ट्रेडिंग के लिए स्पॉट मार्केट उपलब्ध रहता है। स्पॉट मार्केट (Spot Market) में सौदा तत्काल निपटाया जाता है।

किसी एसेट की स्पॉट मार्केट (Spot Market) में की गई ट्रेडिंग के दौरान दर्ज कीमत को उस एसेट की उस समय पर ‘स्पॉट प्राइस’ कहते हैं।

फ्यूचर प्राइस (Future Price)

फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट (Future Contract) में किसी एसेट की दर्ज की गई वह कीमत, जिस पर इस एसेट का ट्रांजेक्शन भविष्य की निर्धारित तारीख (सौदे की समापन तारीख) पर किया जाएगा, इस एसेट की ‘फ्यूचर प्राइस’ कहलाती है।

निवेशकों के अपने आकलन के अनुसार किसी एसेट की फ्यूचर प्राइस इस एसेट की स्पॉट प्राइस से ज्यादा या कम हो सकती है।

समापन तारीख (Expiry Date)

किसी भी फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट (Future Contract) में उस कॉण्ट्रेक्ट की समापन तारीख का उल्लेख रहता है। इस तारीख से पहले तक इस कॉण्ट्रेक्ट की ट्रेडिंग की जा सकती है।

इस तारीख से किसी फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट (Future Contract) की शेष आयु (रेजिडुअल लाइफ) का पता चलता है, जो निवेशकों के लिए महत्त्वपूर्ण है।

फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट साइकल (अवधि) (Future Contract Cycle)

जिस अवधि के लिए किसी फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट (Future Contract) का अस्तित्व रहता है, वह इसका ‘फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट साइकल’ कहलाता है। यह अवधि एक माह, तीन माह या कोई अन्य समयावधि हो सकती है।

बेसिस (Basis)

किसी एसेट की फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट (Future Contract) में दर्ज फ्यूचर प्राइस तथा किसी भी समय (फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट साइकल के दौरान) इस एसेट की स्पॉट प्राइस के अंतर को ‘बेसिस’ कहते हैं।

किसी भी एसेट के लिए यह बेसिस लगातार बदलता रहता है, क्योंकि इस एसेट की स्पॉट प्राइस बदलती रहती है।

सामान्यतया, किसी एसेट की फ्यूचर प्राइस इस एसेट की स्पॉट प्राइस (Spot Price) से अधिक होती है। इस प्रकार बेसिस धनात्मक (पॉजिटिव) होता है; परंतु कई बार स्थितियाँ विपरीत भी हो सकती हैं।

कॉस्ट ऑफ कैरी (Cost of Carry)

किसी एसेट को स्टोर करने के लिए स्टोरेज कॉस्ट लगती है तथा इसमें निवेश करने पर लगनेवाले धन पर ब्याज भी लगता है।

इस कारण किसी भी एसेट की फ्यूचर प्राइस उस एसेट की स्पॉट प्राइस से अधिक होती है। किसी एसेट को वर्तमान से भविष्य में किसी नियत तारीख तक इसके मूल स्वरूप में बनाए रखने में लगे व्यय को ‘कॉस्ट ऑफ कैरी’ कहते हैं।

इनीशियल मार्जिन (Initial Margin)

किसी फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट (Future Contract) में शामिल होने के लिए जो धन जमा करना पड़ता है, वह ‘इनीशियल मार्जिन’ कहलाता है।

मार्क टू मार्केट मार्जिन (Mark to Market Margin)

फ्यूचर ट्रेडिंग (Future Treading) की कार्य-प्रणाली में प्रतिदिन निवेशक की स्थिति एसेट की बाजार कीमत के अनुसार ऑकी जाती है

जिसके अनुसार या तो निवेशक को अतिरिक्त मार्जिन जमा करना पड़ता है या उसके खाते में घटे हुए मार्जिन के कारण धन जमा होता है। इसे ‘मार्क टू मार्केट मार्जिन’ कहते हैं।

फ्यूचर स्ट्रेटेजी (Future Strategy)

डेरिवेटिव सेगमेंट की फ्यूचर ट्रेडिंग (Future Treading) में विभिन्न निवेशक अलग-अलग रणनीतियाँ अपनाते हैं। चूँकि प्रत्येक निवेशक का अपना अलग उद्देश्य तथा अलग नजरिया होता है, इस प्रकार उसकी स्ट्रेटेजी भी भिन्न होती है।

इस कारण डेरिवेटिव बाजार (Derivateve Market) में कई तरह की स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं तथा उनसे जुड़े रिस्क भी अलग-अलग होते हैं।

निवेशक अपने नजरिए एवं उद्देश्य के अनुसार स्पेकुलेशन हेजिंग तथा आर्बीट्रेज की पोजीशन लेते हैं।

पूरी फ्यूचर स्ट्रेटेजी को सावधानीपूर्वक बनाकर सही तरीके से लागू करने पर ही उद्देश्य हासिल हो सकता है, अन्यथा कुछ चीजों के बदलने से परिदृश्य विपरीत भी हो सकता है।

तेजी का नजरिया

इंडेक्स डेरिवेटिव (Index Derivatives)

बहुधा गतिविधियाँ इस प्रकार घटित होती हैं, जो बाजार के पक्ष में होती हैं। इसके अतिरिक्त बड़ी कंपनियों का अच्छा प्रदर्शन तथा अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों द्वारा ऊँची रेटिंग दरशाए जाने पर भी बाजार के पक्ष में माहौल बनता है।

इन परिस्थितियों से धारणा बनती है कि स्टॉक एक्सचेंज (Stock Exchange) की इंडेक्स (Index) में वृद्धि होगी। ऐसे हालात में ‘इंडेक्स फ्यूचर’ का प्रभावी उपयोग किया जा सकता है।

बाजार में निफ्टी के फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट (Future Contract) की प्रचुरता से ट्रेडिंग की जाती है। बाजार में इनका निश्चित लॉट (तय मात्रा) होता है तथा इकाई के रूप में तथा गुणक (मल्टीपल्स) के रूप में इसे खरीदा जा सकता है।

तेजी के नजरिए से फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट (Future Contract) खरीदने पर इंडेक्स बढ़ने की स्थिति में लाभ तथा इंडेक्स गिरने पर नुकसान होता है। इस प्रकार की ट्रेडिंग में कम मार्जिन मनी पर अपेक्षाकृत बड़ी पोजीशन ली जा सकती है।

निवेशक अपने नजरिए तथा उद्देश्य के अनुसार एक माह या दो माह, तीन माह के फ्यूचर कॉण्ट्रेवट खरीद सकता है।

स्टॉक डेरिवेटिव (Stock Derivatives)

इंडेक्स डेरिवेटिव की तरह स्टॉक डेरिवेटिव में भी तेजी का नजरिया अपनाया जा सकता है। कंपनी के अच्छे प्रदर्शन या कंपनी की विस्तार योजनाओं संबंधी सूचनाओं के आधार पर कंपनी के स्टॉक (शेयर) की कीमतों में वृद्धि की अपेक्षा की जाती है।

स्टॉक की कीमतों में वृद्धि के नजरिए से निवेशक स्टॉक फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट (Stock Future Contract) में अपनी पोजीशन ले सकता है। कंपनी के स्टॉक के लॉट (न्यूनतम शेयर संख्या जैसे 500 शेयर, 1,000 शेयर इत्यादि) फ्यूचर मार्केट (डेरिवेटिव सेगमेंट) में उपलब्ध होते हैं।

इन्हें मार्जिन मनी पर खरीदकर पूरे लॉट पर एक्सपोजर लिया जा सकता है। फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट के समापन पर स्टॉक की कीमतों का मिलान इनकी स्पॉट प्राइस से किया जाता है तथा फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट साइकल के दौरान स्टॉक की कीमतों में आए उतार-चढाव के अनुसार निवेशक को लाभ-हानि होती है।

स्टॉक फ्यूचर ट्रेडिंग (Stock Future Treading) में मार्जिन मनी (अपेक्षाकत काफी कम धन निवेश) पर पूरे एक्सपोजर का उपयोग किया जा सकता है

परंत चैंकि स्टॉक (Stock) की कीमतों में बदलाव इंडेक्स की तुलना में ज्यादा होता है, अत: लाभ-हानि का दायरा भी बड़ा होता है-अर्थात् स्टॉक डेरिवेटिव में इंडेक्स डेरिवेटिव की तुलना में ज्यादा रिस्क होता है।

मंदी का नजरिया

इंडेक्स डेरिवेटिव (Index Derivatives)

कई बार वित्तीय बाजार का घटनाक्रम इस प्रकार होता है कि शेयर बाजार में गिरावट की संभावना बनती है-जैसे सरकारी नीतियों में आंशिक परिवर्तन, अंतरराष्ट्रीय रेटिंग, एजेंसियों द्वारा दरशाई गई निम्न रेटिंग या कई बड़ी कंपनियों द्वारा औसत प्रदर्शन।

फ्यूचर ट्रेडिंग (Future Trading) के माध्यम से निवेशक ऐसी पोजीशन ले सकता है, जिसमें इंडेक्स (Index) में गिरावट दर्ज होने पर उसे लाभ अर्जित हो।

इसमें निवेशक द्वारा ‘इंडेक्स’ के फ्यूचर बेचे जाते हैं तथा एक पोजीशन अख्तियार की जाती है। इसे ‘फ्यूचर को शॉर्ट करना’ कहते हैं।

जब कीमतें उस स्तर से गिरती हैं, जब निवेशक ने फ्यूचर शॉर्ट किए थे तो निवेशक को अपनी अख्तियार की गई पोजीशन के चलते लाभ होता है।

फ्यूचर्स (Future) को मार्केट लॉट के अनुसार बेचा जाता है। फ्यूचर सौदे की पूरी कीमत का कुछ प्रतिशत मार्जिन मनी के तौर पर चुकाया जाता है, जिस पर पूरे सौदे को एक्सपोजर मिलता है।

निवेशक अपने नजरिए तथा उद्देश्य के अनुसार एक माह, दो माह या तीन माह के फ्यूचर शॉर्ट करता है।

स्टॉक डेरिवेटिव (Stock Derivatives)

डेरिवेटिव सेगमेंट में स्टॉक (शेयर्स) के फ्यूचर उपलब्ध रहते हैं तथा इंडेक्स फ्यूचर की स्थिति इसमें भी लागू की जा सकती है।

जब निवेशक को यह प्रतीत हो कि कोई स्टॉक ओवर वैल्यूड है या किसी वजह से उसकी कीमतों में गिरावट आ सकती है तो वह निवेश के तौर पर अपनी पोजीशन अख्तियार कर सकता है। इसमें निवेशक द्वारा स्टॉक के फ्यूचर बेचे जाते हैं।

स्टॉक की कीमतों के गिरावट आने पर निवेशक को लाभ होता है। फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट (Future Contract) के समापन पर ‘फ्यूचर प्राइस’ का मिलान स्टॉक की ‘स्पॉट प्राइस’ से किया जाता है।

फ्यूचर कॉण्ट्रेक्ट (Future Contract) साइकल के दौरान स्टॉक की कीमतों में आए उतार-चढ़ाव के अनुसार निवेशक को लाभ-हानि होती है। निवेशक अपने नजरिए तथा उद्देश्य के अनुसार एक माह, दो माह या तीन माह के स्टॉक फ्यूचर बेचता है।

।। धन्यवाद ।।

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श्रेणी: Share Market

3 टिप्पणियाँ

शेयर बाजार से जुड़े अर्थव्यवस्था के महत्त्वपूर्ण पहलू - Important Aspects Of The Stock Market Economy In Hindi. · नवम्बर 19, 2020 पर 8:32 अपराह्न

[…] डेरिवेटिव ट्रेडिंग में प्रयुक्त होने… […]

सेबी - इनसाइडर ट्रेडिंग का निषेध (SEBI - Prohibition Of Insider Trading In Hindi) · नवम्बर 20, 2020 पर 10:24 अपराह्न

[…] डेरिवेटिव ट्रेडिंग में प्रयुक्त होने… […]

स्टॉक मार्केट के बड़ी गिरावटें - Stock Market Crashes In Hindi. · नवम्बर 21, 2020 पर 8:42 अपराह्न

[…] डेरिवेटिव ट्रेडिंग में प्रयुक्त होने… […]

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