ऑप्शन क्या है? – What are Options in Hindi.

Table of Contents

ऑप्शन मूलभूत रूप से फ्युचर और फॉरवर्ड कॉन्ट्रॅक्ट से अलग है। ऑप्शन के कॉन्ट्रॅक्ट के कारण ऑप्शन धारक को कुछ करने का अधिकार मिलता है मगर उस पर यह अधिकार का उपयोग करने की सख्ती नही की जाती है।

इसके विपरीत फॉरवर्ड अथवा फ्युचर्स के कॉन्ट्रॅक्ट में दो पार्टीया कोई भी व्यवहार करने के लिए वचन बद्ध होती है। इसके लिए उन्हे कोई भी किमत नही चुकानी पडती है।

फ्युचर्स का कॉन्ट्रॅक्ट करने के लिए सिर्फ मार्जिन के रूपए देने पडते है पर ऑप्शन का कॉन्ट्रॅक्ट करने के लिए प्रीमियम की पूरी रकम का पेमेंट करने की जरूरत होती है।

ऑप्शन और फ्युचर्स का फर्क आगे दिया है। (Difference between Options and Futures in Hindi.):

ऑप्शन
(Options)
फ्युचर्स
(Futures)
सिर्फ विक्रेता (राईटर) परफॉर्म करने के लिए बद्ध होते है। दोनों पक्ष परफॉर्म करने के लिए बद्ध होते है।
खरीददार को विक्रेता को प्रीमियम चुकाना पडता है। दोनों पक्ष में से किसी को भी प्रीमियम नही चुकाना पडता।
ऑप्शन के खरीददार को अमर्यादित फायदा और मर्यादित नुकसान होने की संभावना होती है। फ्युचर के खरीददार को अमर्यादित फायदा और अमर्यादित नुकसान होने की संभावना होती है।
ऑप्शन के कॉन्ट्रॅक्ट की मुद्दत पूरी हो उससे पहले कभी भी उसे एक्ससाईझ किया जा सकता है। फ्युचर्स कॉन्ट्रॅक्ट को दोनों पक्षो ने निश्चित की हुए तारीख को ही स्विकार करना पडता है।

ऑप्शन के प्रकार (Types of Options in Hindi.):

ऑप्शन के दो मुख्य प्रकार होते है – कॉल ऑप्शन और पुट ऑप्शन।

कॉल ऑप्शन में खरीदार को खरीदी का अधिकार मिलता है, परंतु उस पर खरीदी करने की सख्ती नही की जाती।

कॉन्ट्रॅक्ट के अंतर्गत निश्चित किए असेट को निश्चित किए भाव पर अथवा भविष्य में निश्चित की गई तारीख को खरीदी करने की जिम्मेदारी उन पर नही होती है।

दुसरे शब्दो में बताना हो तो कॉल ऑप्शन में खरीदार को ईच्छा हुई तो वह राईटर से याने की कॉल ऑप्शन के विक्रेता से शेअर्स की डिलिवरी माँग सकता है। अगर ऐसा नही करना हो तो वह इस कॉल ऑप्शन को लॅप्स होने भी दे सकता है।

पुट ऑप्शन में खरीदार को बिक्री करने का अधिकार मिलता है, परंतु उस पर बिक्री करने की सख्ती नही की जाती। कॉन्ट्रैक्ट के अंतर्गत निश्चित किए असेट को निश्चित किए भाव पर अथवा भविष्य में निश्चित की गई तारीख को बिक्री करने की जिम्मेदारी उन पर नही होती है।

दुसरे शब्दो में बताना हो तो पुट ऑप्शन में खरीदार को ईच्छा हुई तो वह राईटर को याने की पुट ऑप्शन के विक्रेता को शेअर्स की डिलिवरी दे सकता है। अगर ऐसा नही करना हो तो वह इस पुट ऑप्शन को लॅप्स होने भी दे सकता है।

संक्षिप्तरूप से बताना हो तो निश्चित किए हुए शेअर्स को खरीदने के लिए मिले हुए अधिकार को कॉल ऑप्शन कहते है और निश्चित किए हुए शेअर्स को बेचने के लिए मिले हुए अधिकार को पुट ऑप्शन कहते है। ऑप्शन का कॉन्ट्रॅक्ट कोई भी व्यक्ति कर सकता है।

सामान्य कॉन्ट्रैक्ट के नियमो की तरह ही इस कॉन्ट्रैक्ट का व्यवहार करना पडता है। इस कॉन्ट्रॅक्ट के कानून अथवा नियम कॉन्ट्रॅक्ट के राईटर द्वारा ही निश्चित किए जाते है।

राईटर स्वयं स्टॉक का मालिक होता है। इस कॉल पर अमल किया जाता है तब वह डिलीवरी देने के लिए कॉन्ट्रैक्ट के अंतर्गत बद्ध हो जाता है। राईटर ही कॉल की रूपरेखा तैयार करता है।

इस कॉल की रूपरेखा तैयार करनेवाले के पास कॉल के कॉन्ट्रैक्ट के अंतर्गत आने वाले सभी असेट का मालिकाना हक्क होगा तो उसे कवर्ड कॉल राईटर कहके पहचाना जाता है।

परंतु अगर कॉल राईटर के पास हर किसी असेट का अथवा शेअर्स का मालिकाना हक्क नही है और फिर भी उसने उसकी रूपरेखा (राईट) की है तो उसे अनकवर्ड राईटर कहके पहचाना जाता है। इस ऑप्शन को अनकवर्ड अथवा नेकेड ऑप्शन कॉल कहके पहचाना जाता है।

ऑप्शन राईटर और ऑप्शन खरीददार की जिम्मेदारीयाँ (Obligation of the Option Writer and Option Buyer):

कानुनन देखने जाए तो ऑप्शन (कॉल या पुट) का राईटर ऑप्शन की शर्तो और नियमो का पालन करने की जिम्मेदारी में बद्ध होता है।

दुसरे शब्दों में बताना हो तो ऑप्शन का बायर अथवा खरीददार ऑप्शन का उपयोग करने के अधिकार की खरीदी करता है पर इस ऑप्शन को अमल करने के लिए वो कानुनन बद्ध नही होता है।

ऑप्शन से संबधीत कुछ महत्व के शब्द समुह (Options Terminology in Hindi.):

इंडेक्स ऑप्शन – Index Options in hindi.

इस ऑप्शन के कॉन्ट्रॅक्ट के अंतर्गत असेट के रूप में इंडेक्स पर व्यवहार किया जाता है।

स्टॉक ऑप्शन – Stock Options in Hindi.

स्टॉक ऑप्शन यह व्यक्तिगत स्टॉक का ऑप्शन है। उसका कॉन्ट्रैक्ट करनेवाले असेट धारक को वह असेट कॉन्टॅक्ट में निश्चित किए भाव पर बेचने का अथवा खरीदने का अधिकार मिलता है, परंतु उस पर ऑप्शन को अमल (एक्ससाईझ) करने की सख्ती नही की जाती है।

ऑप्शन का खरीदार – Buyer of an Options in Hindi.

जो व्यक्ति ऑप्शन का प्रीमियम अदा करके उसके अंतर्गत आने वाले असेट की खरीदी करने का अधिकार हासिल करता है उसे ऑप्शन का खरीदार कहते है।

ऑप्शन का विक्रेता या राईटर, ऑप्शन के खरीदार पर ऑप्शन को अमल (एक्ससाईझ) करने की सख्ती नही कर सकते है।

ऑप्शन का राईटर – Writer of an Option in Hindi.

ऑप्शन के कॉल या पुट ऑप्शन लिखने वाले व्यक्ति को ऑप्शन राईटर कहते है। उसे ऑप्शन का प्रीमियम मिलता है।

ऑप्शन का खरीदार, ऑप्शन के विक्रेता या राईटर पर ऑप्शन को अमल (एक्ससाईझ) करने की सख्ती कर सकता है।

कॉल ऑप्शन – Call Options in Hindi.

कॉल ऑप्शन में खरीदार को असेट खरीदने का अधिकार मिलता है, परंतु उस पर निश्चित तारीख को और निश्चित भाव पर असेट की खरीदी करने की सख्ती नही की जा सकती है।

पुट ऑप्शन – Put Options in Hindi.

पुट ऑप्शन में खरीदार को असेट बेचने का अधिकार मिलता है, परंतु उस पर निश्चित तारीख को और निश्चित भाव पर असेट की बिक्री करने की सख्ती नही की जा सकती है।

ऑप्शन का भाव – Option Price in Hindi.

ऑप्शन खरीदार को जो किमत ऑप्शन बेचने वाले को चुकानी पडती है उसे ऑप्शन का भाव कहते है। उसे ऑप्शन का प्रीमियम इस नाम से भी जाना जाता है।

कॉन्ट्रॅक्ट पूरा होने की तारीख – एक्सपायरेशन डेट – Expiration Date in Hindi.

ऑप्शन के कॉन्ट्रैक्ट में निश्चित की गई तारीख को कॉन्ट्रैक्ट एक्सपायरेशन डेट कहके पहचाना जाता है। उसे स्ट्राईक डेट अथवा मेच्योरिटी डेट (परिपक्वता की तारीख) कहके भी उसे पहचाना जाता है।

स्ट्राईक प्राईज – Strike Price in Hindi.

ऑप्शन के कॉन्टॅक्ट में निर्धारीत किए गए भाव को स्ट्राईक प्राईज या एक्सरसाईज प्राईज कहते है।

अमेरिकन ऑप्शन – American Options in Hindi.

अमेरिकन ऑप्शन इस तरह का ऑप्शन है कि जिसका अमल एक्सपायरी डेट के पहले कभी भी किया जा सकता है। ज्यादातर एक्सचेंजों में अमेरिकन ऑप्शन का ही ट्रेडिंग किया जाता है।

युरोपियन ऑप्शन – European Options in Hindi.

युरोपियन ऑप्शन इस तरह का ऑप्शन है कि जिसका अमल कॉन्ट्रॅक्ट पूरा होने की तारीख को ही किया जा सकता है। अमेरीकन ऑप्शन के औसत में युरोपियन ऑप्शन का विश्लेषण करना आसान है।

इन द मनी ऑप्शन (In – the – Money Option in Hindi.):

इन द मनी ऑप्शन (आईटीएम) यह एक ऐसे प्रकार का ऑप्शन है कि जिसमें उसका होल्डींग धारण करने वाले व्यक्ति ने उसका तत्काल अमल (एक्ससाईझ) किया तो उसे सकारात्मक कॅश फ्लो मिलेगा।

स्ट्राईक प्राईज से असेट का वर्तमान स्पॉट भाव ऊपर हुआ तो ऐसी स्थिति में उस स्ट्राईक प्राईज के कॉल ऑप्शन को इन द मनी कॉल ऑप्शन कहके पहचाना जाता है।

स्ट्राईक प्राईज से असेट का वर्तमान स्पॉट भाव बहुत ही ऊपर हुआ तो ऐसी स्थिति में उस स्ट्राईक प्राईज के कॉल ऑप्शन को डीप इन द मनी कॉल ऑप्शन कहके पहचाना जाता है।

जब स्ट्राईक प्राईज से असेट का वर्तमान स्पॉट भाव नीचे हुआ तो ऐसी स्थिति में उस स्ट्राईक प्राईज के पुट ऑप्शन को इन द मनी पुट ऑप्शन कहके पहचाना जाता है और जब स्ट्राईक प्राईज से असेट का वर्तमान स्पॉट भाव बहत ही नीचे हुआ

तो ऐसी स्थिति में उस स्ट्राईक प्राईज के पुट ऑप्शन को डीप इन द मनी पुट ऑप्शन कहके पहचाना जाता है।

अॅट द मनी ऑप्शन (At – the – Money Option in Hindi.):

ॲट द मनी ऑप्शन (एटीएम) यह एक ऐसे प्रकार का ऑप्शन है कि जिसमें उसका होल्डींग धारण करने वाले व्यक्ति ने उसका तत्काल अमल (एक्ससाईझ) किया तो उसे कोई भी कॅश फ्लो नही मिलेगा।

स्टाईक प्राईज और असेट का वर्तमान स्पॉट भाव एक समान हआ तो ऐसी स्थिति में उस स्ट्राईक प्राईज के कॉल या पुट ऑप्शन को इन द मनी ऑप्शन कहके पहचाना जाता है।

आऊट ऑफ मनी ऑप्शन (Out – of – the – Money Option in Hindi.):

आऊट ऑफ मनी (ओटीएम) यह एक ऐसे प्रकार का ऑप्शन है कि जिसमें उसका होल्डींग धारण करने वाले व्यक्ति ने उसका तत्काल अमल (एक्ससाईझ) किया तो उसे नकारात्मक कॅश फ्लो मिलेगा।

स्ट्राईक प्राईज से असेट का वर्तमान स्पॉट भाव नीचे हुआ तो ऐसी स्थिति में उस स्ट्राईक प्राईज के कॉल ऑप्शन को आऊट ऑफ मनी कॉल ऑप्शन कहके पहचाना जाता है।

स्ट्राईक प्राईज से असेट का वर्तमान स्पॉट भाव बहुत ही नीचे हुआ तो ऐसी स्थिति में उस स्ट्राईक प्राईज के कॉल ऑप्शन को डीप आऊट ऑफ मनी कॉल ऑप्शन कहके पहचाना जाता है।

जब स्ट्राईक प्राईज से असेट का वर्तमान स्पॉट भाव ऊपर हुआ तो ऐसी स्थिति में उस स्ट्राईक प्राईज के पुट ऑप्शन को आऊट ऑफ मनी पुट ऑप्शन कहके पहचाना जाता है और जब स्ट्राईक प्राईज से असेट का वर्तमान स्पॉट भाव बहुत ही ऊपर हुआ

तो ऐसी स्थिति में उस स्ट्राईक प्राईज के पुट ऑप्शन को डीप आऊट ऑफ मनी पुट ऑप्शन कहके पहचाना जाता है।

ऑप्शन का आंतरीक मुल्य – इन्ट्रिन्सिक व्हॅल्यु (Intrinsic Value of an Option in Hindi.):

ऑप्शन पर लिए गए प्रीमियम को दो विभागो में विभाजित किया जा सकता है। एक आंतरीक मुल्य और दुसरा टाईम व्हॅल्यु।

आंतरीक मुल्य सिक्योरिटीज के मुल्य का निर्देश करता है और उसका मुल्य सिक्योरिटीज के भाव में ही समाया होता है।

ऑप्शन का आंतरीक मुल्य यह असेट का स्पॉट भाव और स्ट्राईक प्राईज के बीच का अंतर जितना होता है।

कॉल ऑप्शन का आंतरिक मूल्य, यह असेट के स्पॉट भाव में से स्ट्राईक प्राईज को घटाने पर मिलता है।

पुट ऑप्शन का आंतरिक मूल्य, यह स्ट्राईक प्राईज में से असेट के स्पॉट भाव को घटाने पर मिलता है।

अगर ऑप्शन इन द मनी है तो ही उसका कोई आंतरीक मुल्य होगा। ॲट द मनी ऑप्शन और आऊट ऑफ मनी ऑप्शन का आंतरीक मुल्य शुन्य होता है।

ऑप्शन का टाईम व्हल्यू (Time Value of an Option in Hindi.):

ऑप्शन का प्रीमियम और उसके आंतरीक मुल्य के अंतर को ऑप्शन की टाईम व्हॅल्यू कहके जाना जाता है। कॉल और पुट दोनों ऑप्शन की टाईम व्हॅल्यू होता है।

कॉन्ट्रक्ट पूरा होने की कालावधी जितनी दूर होगी ऑप्शन का टाईम व्हॅल्यू उतना अधिक होता है। ऑप्शन की मुद्दत पूरी होती है तब ऑप्शन की कोई भी टाईम व्हॅल्यू नही होती है।

ट्रेडींग के लिए उचित पर्याय का चयन करना (Selection of Eligible Options for Trading in hindi.):

ऑप्शन ट्रेडींग के लिए किसी भी शेअर का चुनाव करने से पहले निचे दी बातो को ध्यान में रखा जाता है।

  • ऑप्शन के लिए पसंद किए गए शेअर्स का टॉप २०० स्क्रिप्ट में स्थान होना चाहिए। पिछले छह महीनों में उनके मार्केट कॅपिटलाईझेशन के आधार पर उनका चयन किया जाना चाहिए। हर किसी कंपनी का फ्लोटींग अर्थात बाजार में लेन देन हो रहे शेअर्स का ॲवरेज मार्केट कॅपिटलाईझेशन रू.७५० करोड से कम नही होना चाहिए। फ्रि फ्लोट मार्केट कॅपिटलाईझेशन अर्थात प्रमोटर को छोडकर दुसरे सामान्य शेअर होल्डर के हाथ में कम से कम ३० प्रतिशत होल्डींग होना चाहिए।
  • मूल्य की गीनती की तरह होनेवाले दैनिक वॉल्युम के दृष्टी से भी ऑप्शन ट्रेडींग के लिए पसंद किए गए शेअर्स टॉप २०० शेअर्स के लिस्ट में होना चाहिए। पिछले छह महीनों में उनके वॉल्युम को ॲवरेज निकाल कर यह गिनती करनी पडती है। उसका व्यवहार करने के लिए नकद बाजार में आपने चुने हुए स्क्रिप्ट का रोज का व्हॉल्युम रू. ५ करोड से कम नही होना चाहिए।
  • पिछले छह महीनों के ट्रेडींग के कुल दिनो में से ९० प्रतिशत दिनो में उस स्क्रिप्ट का ट्रेडींग होना चाहिए।
  • स्टॉक में हर रोज देखे जानेवाले चढाव उतार और इंडेक्स में हर रोज देखे जानेवाले चढाव उतार का रेशिओं चार से अधिक नही होना चाहिए।
  • जिस कंपनी के शेअर्स में ऑप्शन का कॉन्टॅक्ट किया हो उस कंपनी की बाजार में प्रतिष्ठा कैसी है यह देखना जरूरी है।
  • ऑप्शन को अमल (एक्ससाईझ) किया गया हो तो कितनी संख्या से शेअर्स की डिलीवरी देने की जरूरत पड़ती है यह देखना चाहिए।
  • किस भाव से शेअर्स की डिलीवरी देनी पडेगी यह देखना जरूरी है। स्टॉक की डिलीवरी जिस किमत पर देनी पडती है उस स्ट्राईक प्राईज अथवा एक्ससाईज प्राईज कहके पहचाना जाता है।
  • कॉन्ट्रॅक्ट जिस तारीख को पूरा होता है उसे कॉन्ट्रॅक्ट पूर्ण होने की तारीख कहके पहचाना जाता है।

अमेरिकन और युरोपियन ऑप्शन में का फर्क (Difference between American and European Options in Hindi.):

अमेरिकन और युरोपियन ऑप्शन का मूल फर्क ऑप्शन के अमल की कालावधी में होता है।

अमेरिकन ऑप्शन को एक्सपायरी डेट के पहले कभी भी अमल (एक्ससाईझ) किया जा सकता है पर युरोपियन ऑप्शन को एक्सपायरी डेट पर ही अमल (एक्ससाईझ) किया जा सकता है।

एक्सचेंज ट्रेडेड ऑप्शन और ओवर द काऊन्टर ऑप्शन का फर्क (Difference between Exchange Traded Options and Over – the – Counter Options in Hindi.):

एक्सचेंज ट्रेडेड ऑप्शन का टेडींग नियोजित एक्सचेंजों में ही होता है और वह स्टॅन्डर्डईज ऑप्शन होते है।

स्टॅन्डर्डईज का अर्थ निचे दिया है।

  • ऑप्शन के इस कॉन्ट्रॅक्ट के अंतर्गत आने वाले असेट एक समान होते है।
  • उनका स्ट्राईक प्राईज एकदम बराबर होता है और उसका कॉन्ट्रैक्ट पूरा होने की तारीख भी निश्चित की जाती है।
  • ऑप्शन के इस कॉन्ट्रैक्ट के ट्रेडींग का वक्त भी निश्चित किया होता है। उसका ट्रेडींग आखरी दिन में भी पहले से ही निश्चित किया होता है। और आपकी ईच्छा के अनुसार अन्य विशिष्ट बातो का भी उसमें समावेष किया जाता है।

ओवर द काऊन्टर ऑप्शन अथवा ओटीसी ऑप्शन एक प्रचलित अथवा कस्टमाईज किया हुआ ऑप्शन होता है।

उसकी बिक्रि एक्सचेंज के जरिए करने के बजाय सिधे डीलरों के जरिए की जाती है।

इस प्रकार के कॉन्ट्रॅक्ट सामान्यरूप से बैक जैसे संस्थाकिय निवेशकों द्वारा कमर्शिअल क्लायन्टस् के लिए कस्टमाईज ब्याज दर और करन्सी ऑप्शन के लिए किए जाते है।

इस ऑप्शन का कॉन्ट्रैक्ट करनेवाली पार्टीयाँ खुद की जरूरत के अनुसार उस ऑप्शन की शर्ते और नियम निश्चित करते है।

ऑप्शन की खरीदी के फायदे (Advantages of Buying Options in Hindi.):

  • कॉल अथवा पुट ऑप्शन के खरीददार को खरीदी करने के लिए भरे हुए प्रीमियम की रकम जितने जोखीम का सामना करना पडता है। ऑप्शन बेचनेवालो को अमर्यादित जोखीम का सामना करना पडता है।
  • विपरीत स्थिति में ऑप्शन की खरीदी करनेवाला इस ऑप्शन को अमल (एक्ससाईझ) न करते हुए उसे लॅप्स होने दे सकता है। दुसरे शब्दो में बताना हो तो ऑप्शन यह उसके धारक अथवा खरीदार के उपर की जिम्मेदारी अथवा बोझ नही बनता है। कॉन्टॅक्ट की सब जिम्मेदारी ऑप्शन विता पर होती है।

ऑप्शन लिखने के घाटे (Disadvantages of Writing Options in Hindi.):

  • ऑप्शन की बिक्रि करनेवाले को ऑप्शन राईटर कहके पहचाना जाता है। यह ऑप्शन कॉल अथवा पुट इन दोनो में से किसी भी एक प्रकार का हो सकता है। सामान्यरूप से ऐसा बताया जाता है कि निवेशकों ने ऑप्शन राईट नही करना चाहिए, अर्थात नही बेचना चाहिए क्योंकि ऑप्शन के राईटर को अमर्यादित नुकसान और मर्यादित फायदा होने की संभावना होती है।

।। धन्यवाद ।।

Important Links:-

Open Demat & Trading Account in Zerodha – https://zerodha.com/?c=NH6775

88 / 100
श्रेणी: Share Market

3 टिप्पणियाँ

स्टॉक ऑप्शन क्या है और स्टॉक ऑप्शन का उपयोग क्या है? - What Is Stock Options In Hindi. · दिसम्बर 12, 2020 पर 9:10 अपराह्न

[…] ऑप्शन क्या है? – What are Options in Hindi. […]

ऑप्शन की किमत निश्चित करने की पद्धती - Pricing Of Options In Hindi. · दिसम्बर 14, 2020 पर 8:31 अपराह्न

[…] ऑप्शन क्या है? – What are Options in Hindi. […]

इंडेक्स ऑप्शन क्या है? - What Is Index Options In Hindi. · दिसम्बर 15, 2020 पर 9:01 अपराह्न

[…] ऑप्शन क्या है? – What are Options in Hindi. […]

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

hi_INHindi