कमोडिटी मार्केट क्या है? – What is Commodity Market in Hindi.

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कॉमोडिटी क्या है? – What is Commodity in Hindi.

कॉमोडिटी (Commodity) एक ऐसा कारोबारी उत्पाद है, जिसका उत्पादन, क्रय-विक्रय और उपभोग हो सकता है। आमतौर पर यह एक कच्चा गैर-प्रोसेस उत्पाद है।

लेकिन इन एक्सचेंजों में प्राइमरी क्षेत्र के उत्पादों और निर्मित उत्पादों के भी सौदे होते हैं। भारत में ऐसे कारोबारी उत्पादों की सूची में बहुमूल्य धातु, लौह एवं अलौह धातु, मसाले, दलहन, प्लांटेशन, अनाज, चीनी और कृषि वस्तुएँ शामिल हैं।

कॉमोडिटी ट्रेडिंग क्या है? – What is Commodity Trading in Hindi.

कॉमोडिटी ट्रेडिंग (Commodity Trading) के बाजार में फिलहाल दो तरीके मौजूद हैं. स्पॉट ट्रेडिंग (Spot Trading) व फॉरवर्ड ट्रेडिंग (Forward Trading)। इन दोनों ट्रेडिंग्स को कानूनी मान्यता हासिल है।

यहाँ यह जानना प्रासंगिक है कि कैसे की जाती है कॉमोडिटी ट्रेडिंग (Commodity Trading)!

स्पॉट ट्रेडिंग क्या है? – What is Spot Trading in Hindi.

यह कॉमोडिटी ट्रेडिंग (Commodity Trading) का परंपरागत तरीका है। इसमें कॉमोडिटी (Commodity) खरीदने व बेचनेवाले व्यक्ति किसी खास जगह पर जमा होते हैं। मोल-भाव के बाद खरीदार द्वारा बेचनेवाले को एक खास राशि का भुगतान किया जाता है।

इसके बाद खरीदार को कॉमोडिटी (Commodity) सुपुर्द कर दी जाती है। इसको आप मंडियों में होनेवाली खरीद-बिक्री से जोडकर समझ सकते हैं।

जहाँ किसान अनाज लेकर मंडी में आता है और उसे मंडी में बेचकर पैसे लेकर चला जाता है। इसे ही ‘स्पॉट ट्रेडिंग’ (Spot Trading) या ‘कैश ट्रेडिंग’ (Cash Trading) कहते हैं, क्योंकि इसमें सामान की डिलीवरी और पैसे का भुगतान फटाफट कर दिया जाता है।

स्पॉट ट्रेडिंग (Spot Trading) की कानूनी परिभाषा के अनुसार, “स्पॉट ट्रेडिंग (Spot Trading) का मतलब ऐसी ट्रेडिंग से है, जिसमें सामान की डिलीवरी और पैसे का भुगतान सौदे के समय या सौदे के ग्यारह दिन के भीतर कर दिया जाता है।”

हाँ, पैसे का भुगतान उसी दिन होना है या 11 दिन के भीतर, यह अब उस कॉमोडिटी (Commodity) पर निर्भर करता है, जिसकी ट्रेडिंग की जा रही है।

जिस ट्रेडिंग में सामान की डिलीवरी और पैसे का भुगतान या दोनों में से कोई एक काम सौदा होने के ग्यारह दिन बाद होता है, उसे ‘फॉरवर्ड ट्रेडिंग’ (Forward Trading) कहते हैं।

फॉरवर्ड ट्रेडिंग क्या है? – What is Forward Trading in Hindi.

फॉरवर्ड ट्रेडिंग (Forward Trading) दो या दो से ज्यादा लोगों के बीच होनेवाली ऐसी ट्रेडिंग है, जिसमें कॉमोडिटी (Commodity) बेचनेवाला और खरीदार आपस में करार करते हैं कि भविष्य में आनेवाली किसी खास तारीख को सामान की डिलीवरी और पैसे का भुगतान किया जाएगा।

लेकिन कॉमोडिटी (Commodity) किस भाव (प्राइस) पर खरीदी जाएगी. इस पर सहमति करार के दिन ही हो जाती है।

उदाहरण के लिए अनिल और सुनील नाम के व्यापारी फॉरवर्ड ट्रेडिंग (Forward Trading) के कॉण्ट्रेक्ट पर हस्ताक्षर करते हैं।

अनिल को सौ क्विंटल गेहूँ बेचना है और सुनील खरीदार है। अनिल को छह महीने बाद डिलीवरी देनी है और तभी सुनील को पेमेंट करनी है।

पर गेहूँ की कीमत हस्ताक्षर किए जाने के समय ही तय कर ली जाएगी। यह पूरी प्रक्रिया ‘फॉरवर्ड ट्रेडिंग’ (Forward Trading) कहलाएगी।

फॉरवर्ड ट्रेडिंग (Forward Trading) की एक व्यावहारिक दिक्कत यह है कि यदि सामान की डिलीवरी के दिन खरीदार या बेचनेवाले में से कोई एक करार की शर्ते पूरी करने से मना कर देता है, तब समस्या पैदा होती है।

ऐसी स्थिति आने पर कानून के मुताबिक करारनामे को लेकर कोर्ट में जाया जा सकता है। चूंकि कोर्ट की प्रक्रिया लंबी और पेचीदा है, इसलिए कॉमोडिटी (Commodity) में ‘फ्यूचर ट्रेडिंग’ (Future Trading) (वायदा कारोबार) की शुरुआत हुई।

इसलिए ‘फ्यूचर ट्रेडिंग’ (Future Trading) को ‘फॉरवर्ड ट्रेडिंग’ (Forward Trading) का ही रूप मानकर समझा जा सकता है।

फ्यूचर ट्रेडिंग (Future Trading) (वायदा कारोबार) में इलेक्ट्रॉनिक कॉमोडिटी एक्सचेंज (Electronic Commodity Exchange) के जरिए खरीदार और विक्रेता किसी सामान की फॉरवर्ड ट्रेडिंग (Forward Trading) करते हैं।

इसमें सुरक्षा यह है कि किसी एक पक्ष द्वारा करार तोड़ने की स्थिति में कॉमोडिटी एक्सचेंज (Commodity Exchange) द्वारा दूसरे पक्ष को फौरन करार की शर्तों के तहत सामान की डिलीवरी कर फिर से पैसे का भुगतान किया जाता है।

बदले में कॉमोडिटी एक्सचेंज (Commodity Exchange) करार तोड़नेवाले पक्ष की मार्जिन मनी जब्त कर लेता है।

फ्यूचर ट्रेडिंग क्या है? – What is Future Trading in Hindi.

कॉमोडिटी डेरिवेटिव्स (Commodity Derivatives) की ऑनलाइन खरीद-बिक्री ही फ्यूचर ट्रेडिंग (Future Trading) है।

फ्यूचर परफॉर्मेंस को आधार बनाकर किसी कॉमोडिटी (Commodity) का किसी खास तारीख को आगामी तारीख के लिए (भविष्य के लिए) किया जानेवाला इलेक्ट्रॉनिक सौदा ही फ्यूचर ट्रेडिंग (Future Trading) को निवेशकों के बीच लोकप्रिय बना रहा है।

जैसा कि पिछले उदाहरण में आपने पढ़ा है कि अनिल सुनील से मई महीने में करार करता है कि वह सुनील को 800 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से नवंबर महीने में 100 क्विंटल गेहूँ देगा।

बदले में सुनील यह स्वीकार करता है कि वह नवंबर में इसके बदले 80 हजार रुपए का भुगतान करेगा। इस सौदे का विश्लेषण करें तो यह अपने आप में काफी नायाब है।

पहली बात यह कि मई में नवंबर के लिए सौदा किया जा रहा है, यानी नवंबर के लिए गेहूँ की कीमतें मई में ही तय कर ली जा रही हैं।

दूसरी बात यह कि हो सकता है, सौदे का करार करते वक्त अनिल के पास गेहूँ न हों और सुनील के पास रुपए न हों। यहीं पर बात कॉमोडिटी डेरिवेटिव (Commodity Derivatives) की आती है।

मई में जिस प्रोडक्ट की बिक्री का करार नवंबर के लिए किया जा रहा है, उस प्रोडक्ट को डेरिवेटिव (Derivative) कहते हैं।

कारोबार की इस अनूठी प्रक्रिया को ‘फ्यूचर’ के नाम से जाना जाता है। यह पूरा कारोबार इलेक्ट्रॉनिक कॉमोडिटी एक्सचेंज (Electronic Commodity Exchange) के जरिए होता है।

समझिए स्पॉट ट्रेडिंग को – Understand Spot Trading.

भारत में कॉमोडिटी (Commodity) की स्पॉट ट्रेडिंग (Spot Trading) का तरीका आम है। पर ट्रेडिंग के इस रूप की कई कमियाँ हैं।

इसकी सबसे बड़ी कमी है-कीमतों में एकरूपता का अभाव। फर्ज करें, किसी किसान को एक क्विंटल चावल बेचना है। वह इसे लेकर स्थानीय मंडी में जाता है।

वहाँ चावल की खरीद करनेवाला महाजन कई मसलों पर किसान को बरगला सकता है,

जैसे-महाजन किसान को यह कह सकता है कि उत्पादन ज्यादा होने की वजह से वह सस्ते दाम पर चावल खरीदेगा या फिर स्थानीय स्तर पर सभी महाजन आपस में मिलकर किसान को एक खास कीमत से ज्यादा देने को तैयार न हों।

ऐसे में किसान के पास कोई चारा नहीं होता और वह महाजन की शर्त मानने को मजबूर होता है। इसके अलावा कई और दिक्कतें भी हैं, जैसे भारत में स्पॉट ट्रेडिंग (Spot Trading) का कारोबार काफी बिखरा, अस्पष्ट और अल्प-विकसित है।

इसमें पारदर्शिता नहीं है। इसके उलट कारोबार का माध्यम इलेक्ट्रॉनिक होने से फ्यूचर ट्रेडिंग (Future Trading) में पारदर्शिता है।

लेकिन सन् 2008 में एम.सी.एक्स. द्वारा ‘नेशनल स्पॉट एक्सचेंज’ (National Spot Exchange) और एन.सी.डी.एक्स. द्वारा ‘ऑनलाइन स्पॉट एक्सचेंज’ (Online Spot Exchange) शुरू कर दिए जाने से अब स्पॉट ट्रेडिंग किसानों को स्थानीय कार्टेल से मुक्त करने की दिशा में बढ़ रहा है।

लेकिन यह अभी सभी राज्यों में लागू नहीं हुई है। जिन ए.पी.एम.सी. ने स्थानीय लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए मॉडल बायलाज अपनाया है, वहाँ ‘कम्प्यूटीकृत स्पॉट एक्सचेंज’ (Computerized Spot Exchange) शुरू हो चुका है, और इससे पारदर्शिता बढ़ी है।

कॉमोडिटी ट्रेडिंग के फायदे – Advantages of Commodity Trading.

प्राइस रिस्क मैनेजमेंट – Price Risk Management.

प्राइस रिस्क मैनेजमेंट (Price Risk Management) को कॉमोडिटी ट्रेडिंग (Commodity Trading) की सबसे बड़ी खासियत माना जाता है।

किसी कॉमोडिटी (Commodity) की भौतिक क्षति (जलने, नष्ट होने या चोरी होने आदि) के लिए इंश्योरेंस का इंतजाम किया जा सकता है, पर उसकी वैल्यू में गिरावट के लिए किसी तरह का इंश्योरेंस नहीं होता।

आज किसी अनाज की कीमत 1,000 रुपए प्रति क्विंटल है तो आनेवाले दिनों में उसकी कीमत गिरेगी या बढ़ेगी, यह कहना मुश्किल है।

कीमतों का किसी तरह का इंश्योरेंस भी नहीं होता। ऐसी स्थिति में कई दफा ऐसे किसान लगभग बरबाद हो जाते हैं, जो अपना अनाज भविष्य में दाम बढ़ने पर बेचने के लिए सहेजकर रखते हैं और भविष्य में उस अनाज की व मत काफी गिर जाती है।

प्राइस रिस्क (Price Risk) की ऐसी मुश्किल से निबटने में फ्यूचर ट्रेडिंग बेहतर जरिया साबित हो सकती है। यह एक तरह से कॉमोडिटी (Commodity) की कीमतों या वैल्यू के लिए इंश्योरेंस का काम करती है। लिहाजा, इसे ‘हेजिंग इंस्ट्रमेंट’ (Hedging Instrument) भी कहा जाता है।

फर्ज करें कि कोई किसान धान की फसल लगाता है। उसे उम्मीद है कि धान की पैदावार 10 क्विंटल होगी। पर देश भर में धान की फसल बेहतर होने के चलते पैदावार के वक्त धान की कीमत गिर जाएगी।

लिहाजा, वह फसल लगाते वक्त ही अच्छी कीमत पर 10 क्विंटल धान की फ्यचर टेडिंग (Future Trading) कर लेगा। इसे तकनीकी भाषा में कहें, तो किसान खुद खतरे में पड़ने से बचने के लिए ‘प्राइस हेज’ करेगा।

लिहाजा, किसान ‘हेजर’ कहलाएगा। पर किसान का धान खरीदेगा कौन? दरअसल, बाजार में उस वक्त ऐसे लोग भी मौजूद होंगे

जिन्हें यह लग रहा होगा कि आनेवाले दिनों में धान की कीमत कम होने के बजाय बढ़ेगी या फिर कुछ ऐसे लोग भी होंगे

जो जोखिम लेकर भी किसान की शर्त या उससे मिलती-जुलती कीमत पर धान खरीदने को तैयार होंगे! तकनीकी भाषा में ऐसे लोगों को ‘स्पेकुलेटर’ कहा जाता है।

कुल मिलाकर यह कहें कि हेजर का माल स्पेकुलेटर खरीदेगा। करार की शर्त के तहत फ्यूचर ट्रेडिंग की तारीख को किसान खरीदार को 10 क्विंटल धान मुहैया कराकर उसकी पहले से तय कीमत वसूल कर लेगा।

जिस वक्त किसान खरीदार को प्रोडक्ट की डिलीवरी करेगा, उस वक्त दो तरह को संभावनाएँ हैं-धान की बाजार कीमत किसान द्वारा किए गए करार की राशि से या तो कम होगी या ज्यादा।दोनों ही हालात में किसान को कोई नुकसान नहीं होगा।

यदि उस वक्त धान की बाजार कीमत किसान द्वारा तय राशि से ज्यादा है तो खरीदार को फायदा हुआ, पर किसान को नुकसान नहीं, क्योंकि सौदा तय करते वक्त ही किसान ने अपना फायदा सोचकर कीमत तय की थी।

यदि डिलीवरी के वक्त धान की स्पॉट प्राइस सौदे की रकम से कम है तो खरीदार को घाटा होगा। इस हालत में भी किसान फायदे में है।

प्राइस डिस्कवरी – Price Discovery.

फ्यूचर ट्रेडिंग (Future Trading) को प्राइस डिस्कवरी (Price Discovery) का अहम जरिया माना जाता है। आखिर क्या है यह प्राइस डिस्कवरी? इसे उदाहरण से समझा जा सकता है।

फर्ज करें कि किसी किसान को फसल लगानी है, पर वह तय नहीं कर पा रहा है कि कौन सी फसल लगाई जाए जो पैदावार के बाद ज्यादा-से-ज्यादा मुनाफा दे।

अकसर होता यह है कि किसान फसल लगाता है और फसल की पैदावार के वक्त उसकी कीमत इतनी गिर चुकी होती है कि किसान को फायदा तो दूर, उत्पादन लागत भी वापस नहीं मिल पाती।

ऐसी हालत से बचने में फ्यूचर ट्रेडिंग (Future Trading) किसान के लिए एक मानक के रूप में काम करती है। फसल लगाने से पहले वह यह पता कराता है कि किसी फसल की कटाई के महीने के लिए उसकी फ्यूचर प्राइस क्या है।

यानी उसे यदि गन्ने की फसल लगानी है तो वह मई में यह देखेगा कि नवंबर (गन्ने की कटाई का महीना) के लिए गन्ने की फ्यूचर प्राइस क्या है।

इस आधार पर वह अंदाजा लगाएगा कि उसकी उत्पादन लागत को घटाकर गन्ने की फसल लगाने में उसे मुनाफा होगा या नहीं?

सरकार की नजर – Government Eye

सरकार ने फ्यूचर ट्रेडिंग (Future Trading) और इसके लिए मंच मुहैया कराने तथा कॉमोडिटी एक्सचेंजों में किसी तरह की गड़बड़ी या घपले पर नजर रखने के पुख्ता इंतजाम कर रखे हैं।

इसलिए निवेशक यहाँ बेखौफ निवेश कर सकते हैं।

छह महीने तक के लिए की जा सकती है ट्रेडिंग – Trading Can Be Done for Up to Six Months.

किसी कॉमोडिटी डेरिवेटिव के अधिक-से-अधिक छह महीने बाद तक ही फ्यूचर ट्रेडिंग (Future Trading) की जा सकती है।

यानी मई महीने में ही नवंबर महीने तक के लिए फ्यूचर ट्रेडिंग की जा सकती है। फ्यूचर ट्रेडिंग (Future Trading) की अवधि मोटे तौर पर एक महीने की होती है।

यदि किसी ने जून महीने की फ्यूचर ट्रेडिंग (Future Trading) कर रखी है तो ट्रेडिंग की अवधि 1 जून से शुरू होकर 30 जून को खत्म हो जाएगी। पर मई के तीसरे सप्ताह में ही सौदे का टेंडर पीरियड’ शुरू हो जाएगा।

टेंडर पीरियड में खरीदार और विक्रेता दोनों को यह बताना होता है कि वे सौदे को बरकरार रखना चाहते हैं या नहीं।

यदि इनमें से कोई एक पक्ष सौदा बरकरार नहीं रखना चाहता तो कॉमोडिटी एक्सचेंज किसी अन्य व्यक्ति को उत्पाद बेचकर सौदे से जुड़े पक्ष के हितों की भरपाई करता है।

बदले में सौदे की शर्त तोड़नेवाले पक्ष से जमा कराई गई मार्जिन मनी एक्सचेंज द्वारा जब्त कर ली जाती है।

कॉमोडिटी मार्केट में कौन-कौन हिस्सा ले सकते हैं? – Who Can Participate in the Commodity Market in Hindi.

इस मार्केट में हेजर, आर्बिट्रेजर और सटोरिए बड़े पैमाने पर हिस्सा ले सकते हैं। दूसरे शब्दों में, उत्पादक, ट्रेडर, किसान, निर्यातक और निवेशक भी इस बाजार में भाग ले सकते हैं।

कॉमोडिटी एक्सचेंजों में ट्रेडिंग कैसे होती है? – How to Trade in Commodity Exchanges in Hindi.

स्टॉक मार्केट ऑनलाइन ट्रेडिंग सिस्टम की तरह ही कॉमोडिटी एक्सचेंज भी ऑनलाइन ट्रेडिंग सिस्टम पर ही चलते हैं।

यह एक ऑर्डर आधारित, पारदर्शक सिस्टम है, जिसे एक्सचेंज के सदस्य व सब-ब्रोकर इंटरनेट, वीसैट और लीज्ड लाइन के जरिए खरीद-फरोख्त के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।

वायदा कॉण्ट्रेक्ट का अर्थ – Meaning of Futures Contract.

‘वायदा कॉण्ट्रेक्ट’ भविष्य में निर्धारित एक तिथि पर क्रेता (बायर) या विक्रेता (सेलर) द्वारा सुनिश्चित मात्रा और गुणवत्ता की कॉमोडिटी (Commodity) का परस्पर सहमति का एक ‘विशेष करार’ है।

हाजिर बाजार और वायदा बाजार में अंतर – Difference between Spot Market and Futures Market in Hindi.

हाजिर बाजार में कॉमोडिटी (Commodity) की भौतिक खरीद या बिक्री आमतौर पर भावतोल के आधार पर होती है और उसकी डिलीवरी होती है, जबकि वायदा बाजार में कॉमोडिटी की भौतिक रूप से अधिकार नहीं होने के बावजूद खरीद या बिक्री हो सकती है।

वायदा बाजार के सौदे मूल संपत्ति की मानकीकृत अनुबंधीय समझौते के तहत निर्दिष्ट गुणवत्ता, मात्रा और डिलीवरी के माध्यम से होते हैं, जिसके सेटलमेंट की गारंटी विनियमित कॉमोडिटी एक्सचेंजों (Commodity Exchange) द्वारा दी जाती है।

हेजिंग क्या है? – What is Hedging in Hindi.

‘हेजिंग’ (Hedging) का अर्थ फिजिकल मार्केट में पोजीशन के विपरीत वायदा या ऑप्शन मार्केट (Option Market) में पोजीशन बनाना है। इससे भाव में अचानक घट-बढ़ से उत्पन्न जोखिम को कम या सीमित किया जाता है।

इस प्रणाली का उद्देश्य एक बाजार के घाटे को दूसरे के लाभ से पूरा करना है।

सटोरियों की आवश्यकता – Bookies Required.

सटोरिया ऐसे रोबारी होते हैं, जो वायदा भावों की घट-बढ़ का लाभ उठाने के लिए बाजार में प्रवेश करते हैं। ऐसे कारोबारी के पास भौतिक रूप से माल नहीं होता है

लेकिन वह बाजार में ऐसा जोखिम उठाता है, जिससे ‘हेजर्स’ बचना चाहते हैं। इससे बाजार में आवश्यक तरलता आती है।

कॉमोडिटी मार्केट में आर्बीट्रज का तात्पर्य – Arbitrage in the Commodity Market Implies.

आर्बीट्रेज (Arbitrage) दो विभिन्न बाजारों के भावों के अंतर का लाभ उठाने के उद्देश्य से, दोनों बाजारों में एक ही समय खरीद और बिक्री करते हैं।

आर्बीट्रेज को चलाने वाले घटक या तो वास्तविक होते हैं या विभिन्न स्थानों में माँग और आपूर्ति के बीच का संतुलन हैं।

कॉमोडिटी एक्सचेंजों में कौन सौदा करते हैं? – Who Deals in Commodity Exchanges in Hindi.

कॉमोडिटी एक्सचेंजों (Commodity Exchange) की सदस्यता का प्रारूप स्टॉक एक्सचेंजों जैसा है। एक्सचेंज के सदस्य और सदस्यों के पंजीकृत, मान्य/प्राधिकृत ग्राहक ही कॉमोडिटी एक्सचेंजों (Commodity Exchange) में कारोबार कर सकते हैं।

कॉमोडिटी में कॉस्ट ऑफ कैरी के विभिन्न तत्व – Various Elements of Cost of Carry in Commodity.

एक कॉमोडिटी (Commodity) के ‘कॉस्ट ऑफ कैरी’ (Cost of Carry) में ब्याज, बीमा, स्टोरेज खर्च और खर्चों सहित कुल खर्च शामिल हैं।

सामान्यत: एक्सचेंज में कॉमोडिटी (Commodity) का वायदा भाव, हाजिर भाव और कास्ट ऑफ कैरी (Cost of Carry) सहित होता है।

परिपक्वता तिथि पर वायदा कॉण्ट्रैक्ट के भाव का क्या होता है? – What Happens to the Futures Contract Price on the Maturity Date in Hindi.

परिपक्वता तिथि पर वायदा भाव हाजिर भावों के साथ एकाकार हो जाते हैं।

कॉमोडिटी के वायदा में मार्जिन मनी के मायने और उद्देश्य – Meaning and Purpose of Margin Money in Commodity Futures.

  1. मार्जिन मनी सदस्यों द्वारा एक्सचेंज को दी गई सेक्यूरिटी डिपॉजिट है, ताकि उनके द्वारा एक्सचेंज में सूचीबद्ध विभिन्न कॉण्ट्रेक्टों में सौदे किए जा सकें। ग्राहक एक्सचेंज के सदस्यों को यह राशि जमा कराते हैं और सदस्य उसे एक्सचेंजों में जमा करा देते है।
  2. एक्सचेंजों द्वारा मार्जिन मनी कलेक्ट करने का उद्देश्य सदस्यों के डिफाल्ट होने या उनके ग्राहकों द्वारा देयताएँ न चुकाने की स्थिति में काउंटर पार्टी को जोखिम से बचाना है।यह ‘नियामक वायदा बाजार आयोग’ (एफ.एम.सी.) द्वारा निर्धारित जोखिम प्रबंधन प्रणाली का हिस्सा है।
  3. सदस्यों/ग्राहकों द्वारा किसी कॉण्ट्रेक्ट में नई खरीद या बिक्री की पहल करने से पूर्व उस कॉण्ट्रेक्ट के वैल्यू का न्यूनतम प्रतिशत एक्सचेंज को जमा कराना ‘आरंभिक मार्जिन’ कहलाता है।
  4. कॉण्ट्रेक्ट की समाप्ति के अंतिम दिनों में (टेंडर अवधि से शुरू और डिलीवरी/ निपटान तक) एक्सचेंज द्वारा लगाई गई अतिरिक्त मार्जिन है। यह राशि क्रय एवं विक्रय, दोनों के बकाया पोजीशनों पर लागू होती है।

मार्क-टू-मार्केट क्या है? – What is the Mark-to-Market in Hindi.

प्रत्येक करोबार दिन के अंत में ट्रेडर/ग्राहक के मार्जिन खाते को सहभागी के लाभ या हानि के सामने सामंजस्य किया जाता है।

प्रत्येक ट्रेडिंग दिन के भावों में बदलाव पिछले दिन के बंद भाव की तुलना करने पर उक्त लाभ-हानि का पता चलता है।

भावों के इस घट-बढ़ को दैनिक मार्जिन खाते से समायोजित किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया को ‘मार्क-टू-मार्केट’ कहते हैं।

ओपन पोजीशन का निपटान – Settlement of Open Positions.

किसी कॉण्ट्रेक्ट की समाप्ति तिथि के दिन या उससे पूर्व ओपन पोजीशन को बंद (एक्सवायर अप) नहीं होने के मामले में लॉन्ग/शॉर्ट पोजीशन को देखते हुए ट्रेडर को उक्त कॉमोडिटी की डिलीवरी या तो लेनी पड़ती है या उतारनी पड़ती है।

इसका निपटान कॉण्ट्रेक्ट के अंतर्गत निर्दिष्ट सेटलमेंट मोड के अनुसार होता है।

एक्सचेंजों पर ट्रेड का तरीका – Method of Trade on Exchanges.

एक्सचेंज पर प्रत्येक ट्रेड दैनिक आधार पर मार्क-टू-मार्केट (एम.टी.एम.) के आरंभिक मार्जिन द्वारा समर्थित होते हैं।

इसके बाद सदस्यों के सेटलमेंट खाते में बकाया राशि को तद्नुसार डेबिट या क्रेडिट किए जाते हैं। इनका भुगतान इलेक्ट्रॉनिक रूप से क्लियरिंग बैंकों द्वारा प्रोसेस किया जाता है।

देय तिथि की दर (डी.डी.आर.) – Due Date Rate (DDR)

यह वह दर है, जिस पर कॉण्ट्रेक्ट का निपटान समाप्ति के दिन किया जाता है। आमतौर पर यह कॉण्ट्रेक्ट की समाप्ति के कुछ दिन पूर्व हाजिर भावों का लिया गया औसत है।

हेज खरीदना और बेचना – Buying and Selling Hedges.

हेज खरीदने का अर्थ कैश मार्केट (Cash Market) में शॉर्ट पोजीशन के सामने हेज के लिए वायदा कॉण्ट्रेक्ट खरीदना है। सेलिंग हेज का अर्थ कैश मार्केट में लॉन्ग पोजीशन के सामने वायदा कॉण्ट्रेक्ट को बेचना है।

हेजिंग के मुख्य लाभ – Main Benefits of Hedging.

यह फिजिकल कॉमोडिटी (Commodity) से जुड़े भाव के जोखिम को कम या सीमित करता है। इसमें कच्चे माल की कीमत और अंतिम उत्पादों के भाव लॉक हो जाते हैं, ताकि लाभ सुनिश्चित हो सके।

वायदा भावों का हाजिर भावों से एकाकार होने का अर्थ – Meaning of Forward Prices Being Equal to Spot Prices.

कॉमोडिटी (Commodity) वायदा कॉण्ट्रेक्ट की समाप्ति तिथि तक पहुँचते ही वायदा भाव का झुकाव या एकाकार उक्त कॉमोडिटी (Commodity) के हाजिर भावों की ओर होने लगता है। इसे ‘वायदा भाव को हाजिर भाव से एकाकार होना’ कहते हैं।

लिमिट ऑर्डर और मार्केट ऑर्डर में अंतर – Difference Between Limit Order and Market Order.

लिमिट ऑर्डर (Limit Order) क्रय या विक्रय के भाव नीचे और ऊपर में सुनिश्चित करता है। दूसरी तरफ, ऐसे ऑर्डर देने पर मार्केट ऑर्डर (Market Order) चल रहे भाव पर निष्पादित हो जाता है।

ऑर्डर देने पर यदि कोई सौदा नहीं होता है तो ट्रेडिंग सिस्टम अंतिम कारोबारी भाव को मार्केट ऑर्डर (Market Order) सिस्टम में रखता है।

स्टॉप लॉस ऑर्डर – Stop Loss Order.

स्टॉप लॉस ऑर्डर (Stop Loss Order) कॉमोडिटी (Commodity) के वायदा भाव में व्यापक घट-बढ़ में हानि को सीमित करने के लिए दिया जाता है।

ये ऑर्डर सिस्टम में सस्पेंडेड’ या ‘एबेयांस मोड’ में होते हैं और ये तभी एक्टिवेट होते हैं, जब ऐसा भाव आता है। इससे वर्तमान पोजीशन बंद करने में मदद मिलती है।

डे ऑर्डर और गुड-टिल-डेट ऑर्डर व गुड-टिल-कैंसल्ड ऑर्डर – Day Order and Good-Till-Date Order and Good-Till-Canceled Order.

  1. डे ऑर्डर (Day Order) कारोबारी दिन में डे ट्रेडिंग (Day Trading) के लिए उपलब्ध रहते हैं। सभी डे ऑर्डर (Day Order) दिन की समाप्ति तक पूरा नहीं होने पर अंत में कैंसिल हो जाते हैं।
  2. गुड-टिल-डेट ऑर्डर (Good-Till-Date Order) कॉण्ट्रेक्ट के अंतिम कारोबार दिन या निर्दिष्ट तिथि, जो भी पहले हो, तक सौदे के लिए चालू रहता है।
  3. गुड-टिल-कैंसल्ड ऑर्डर (Good-Till-Date Order) तब तक जारी रहता है, जब तक उसे एक्सक्यूट या कैंसल नहीं किया जा सके; चाहे इसमें कितने भी दिन या सप्ताह क्यों न लगें। निवेशक ज्यादातर जी.टी.सी. ऑर्डर का इस्तेमाल वर्तमान भाव से अधिक भाव पर लिमिट सेट करने के लिए करते हैं। एक जी.टी.सी. ऑर्डर कॉण्ट्रेक्ट की समाप्ति तक एक्सक्यूशन या कैंसिलेशन, जो भी पहले हो, के लिए उपलब्ध रहता है।

कॉमोडिटी फ्यूचर्स कॉण्ट्रेक्ट की लाइफ व समाप्ति – Life and Termination of Commodity Futures Contracts.

  1. कॉमोडिटी फ्यूचर्स कॉण्ट्रेक्ट (Commodity Futures Contracts) की लाइफ वह अवधि है, जब तक कॉण्ट्रेक्ट ट्रेडिंग के लिए उपलब्ध होता है। भारत में यह फिलहाल एक महीने से कुछ महीनों के बीच है।
  2. कॉण्ट्रेक्ट के विनिर्देशन के मुताबिक, कॉण्ट्रेक्ट के अंतिम कारोबारी दिन ही समाप्ति तिथि है, जिस दिन सेटलमेंट भाव निर्धारित होते हैं।
  3. समाप्ति तिथि के दिन अवकाश होने पर कॉण्ट्रेक्ट अगले कारोबारी दिवस पर समाप्त होता है। यदि अंतिम कारोबारी दिन के दिन अचानक छुट्टी घोषित होती है, ऐसे में कॉण्ट्रेक्ट अगले कारोबारी दिन बंद होगा।

प्राइस लिमिट सर्किट फिल्टर या डेली प्राइस रेंज – Price Limit Circuit Filter or Daily Price Range.

  1. एक्सचेंज सामान्य कारोबारी सत्र में प्रत्येक कॉमोडिटी में प्रतिशत घट-बढ़ के हिसाब से सर्किट फिल्टर सूचित करता है। दूसरे शब्दों में, सर्किट फिल्टर किसी विशिष्ट सत्र में कारोबारी कॉण्ट्रेक्ट में उपलब्ध अधिकतम रेंज को दरशाता है।
  2. सर्किट फिल्टर प्रत्येक कॉमोडिटी (Commodity) पर निर्भर होते हैं। यह वायदा कॉण्ट्रेक्ट के डिजाइन के समय उल्लेखित ऐतिहासिक घट-बढ़ पर निर्भर होता है।
  3. सर्किट फिल्टर लिमिट से अधिक पर ऑर्डर पंच करने से ट्रेडिंग सिस्टम ऐसे सौदों को ऑटोमैटिकली रद्द कर देता है।

कॉण्ट्रेक्ट विनिर्देशन में उल्लेखित प्राइस कोट, टिक साइज व बेस वैल्यू के मायने – Price Quote, Tick Size and Base Value Mentioned in the Contract Specification.

  1. कॉण्ट्रेक्ट में उल्लेखित ‘प्राइस कोट’ का अर्थ ऐसे स्थान/मार्केट से है, जहाँ कॉमोडिटी के वायदा भावों के लिए स्पॉट बाजार से संदर्भ भाव लिये जाते हैं। ये स्थान/मार्केट उक्त कॉमोडिटी के लिए प्रमुख उत्पादन केंद्र और या ट्रेड सेंटर हैं। उदाहरण के लिए, रबर का प्राइस कोट केरल में एक्स कोटायम है, जो प्रमुख उत्पादन और ट्रेड सेंटर है। इसी तरह सोना वायदा कॉण्ट्रेक्ट का प्राइस कोट एक्स अहमदाबाद है।प्राइस कोट में सभी सेल्स टैक्स/वेट या अन्य टैक्स और लेवीज भी समाहित होते हैं।
  2. ‘टिक साइज’ का अर्थ न्यूनतम भाव अंतर या सिस्टम में दो भावों के बीच जरूरी गुणांक है।
  3. स्टैंडर्ड यूनिट के आधार पर ट्रेडिंग के लिए कॉण्ट्रेक्ट के बोले जानेवाले भाव को ‘कोटेशन’ या ‘बेस वैल्यू’ कहा जाता है। जैसे कि सोने के कॉण्ट्रेक्ट में कोटेशन या बेस वैल्यू 10 ग्राम है।

कॉण्ट्रेक्ट विनिर्देशन में निर्धारित ट्रेडिंग यूनिट व अधिकतम ऑर्डर साइज – Trading Unit and Maximum Order Size as Specified in the Contract Specification.

  1. एक्सचेंज में कारोबार होनेवाले वायदा कॉण्ट्रेक्ट की लॉट साइज ‘ट्रेडिंग यूनिट’ (Trading Unit) है। जैसे सोने के कॉण्ट्रेक्ट में ट्रेडिंग यूनिट (Trading Unit) एक किलोग्राम है।
  2. एकल क्रय-विक्रय के मार्फत निर्दिष्ट अधिकतम मात्रा ‘अधिकतम ऑर्डर साइज’ है।

कॉमोडिटी में डिलीवरी पे-आउट व फंड्स पे-आउट – Commodity Delivery Pay-out and Funds Pay-out.

  1. कॉमोडिटी में डिलीवरी पे-आउट (Delivery Pay-out) का अर्थ एक्सचेंज मान्य वेयरहाउस के क्रेता द्वारा डिलीवरी उठाने से पूर्व का समय है।
  2. डिलीवरी के समय फंड्स का पे-आउट (Funds Pay-out) का अर्थ क्रेता द्वारा कॉमोडिटी की डिलीवरी उठाने के बाद विक्रेता सदस्य के सेटलमेंट एकाउंट में फंड्स के ट्रांसफर से है।

डिलीवरी लॉजिक में सेलर ऑप्शन का अर्थ व क्रेता का चयन – The Meaning of the Seller Option in the Delivery Logic and the Selection of the Buyer.

  1. सेलर ऑप्शन में विक्रेता को कॉण्ट्रेक्ट की टेंडर/डिलीवरी अवधि के दौरान के ओपन पोजीशन की डिलीवरी देने का ऑप्शन होगा। इस मामले में यह क्रेता पर निर्भर होगा कि वह मार्ड मात्रा की डिलीवरी उठाए या पेनाल्टी का भुगतान करे।
  2. सेलर ऑप्शन में डिलीवरी उतारने के आशय भेजने पर विक्रेता की मात्रा का क्रेता के आशय से मिलाया जाता है। यदि डिलीवरी आशय के लिए पर्याप्त क्रेता के नहीं होने पर डिलीवरी ओपन पोजीशन धारकों (कॉण्ट्रेक्ट के क्रेता) को रैंडम आधार पर मार्क की जाती है और उनके द्वारा डिलीवरी उठाना अनिवार्य होता है।
  3. सेलर आप्शन में डिलीवरी उतारनेवाले विक्रेता के आशय को डिलीवरी उठानेवाले क्रेता के आशय का मिलान किया जाता है। इसमें पर्याप्त क्रेता के नहीं होने पर डिलीवरी ओपन लॉन्ग पोजीशन धारकों (कॉण्ट्रेक्ट क्रेता) को रैंडम आधार पर दी जाएगी और यह उनके लिए डिलीवरी उठाने या पेनाल्टी भरने के लिए अनिवार्य होगा।

कंपल्सरी डिलीवरी – Compulsory Delivery.

कंपल्सरी डिलीवरी के मामले में क्रेता व विक्रेता दोनों के लिए टेंडर/ डिलीवरी पीरियड के समय ओपन पोजीशन को यदि कॉण्ट्रेक्ट की समाप्ति के समय डिलीवरी के लिए मार्क की जाती है, को उक्त कॉमोडिटी की डिलीवरी लेना और उतारना अनिवार्य होगा।

ऑड लॉट क्या है? – What is Odd Lot in Hindi.

कॉण्ट्रेक्ट की समाप्ति के समय यदि एक सदस्य के पास ओपन पोजीशन है, जो डिलीवरी लॉट के गुणांक में तबदील नहीं हो सकता है, तो ऐसे लॉट को ‘ऑड लॉट’ कहते हैं।

इलेक्ट्रॉनिक कॉमोडिटी एक्सचेंज क्या है? – What is an Electronic Commodity Exchange in Hindi.

पूँजी बाजार में स्टॉक एक्सचेंजों की तरह कॉमोडिटी एक्सचेंज भी एक एसोसिएशन या कंपनी है, जो जींसों (कॉमोडिटी) में वायदा कामकाज सुलभ कराता है।

कॉमोडिटी डेरिवेटिव्स (Commodity Derivative) की खरीद-फरोख्त ‘नेशनल कॉमोडिटी एक्सचेंजों’ (National Commodity Exchange) के जरिए की जाती है। वैसे तो देश में कई कॉमोडिटी एक्सचेंज (Commodity Exchange) हैं

पर इनमें से दो इलेक्ट्रॉनिक एक्सचेंज (Electronic Exchange) प्रमुख हैं पहला है ‘मल्टी कॉमोडिटी एक्सचेंज’ Electronic Exchange) (एम.सी.एक्स.) और दूसरा है ‘नेशनल कॉमोडिटी डेरिवेटिव एक्सचेंज’ (National Commodity Derivatives Exchange) (एन.सी.डी.एक्स.) तथा इनके अलावा बाईस प्रादेशिक एक्सचेंज हैं।

ये एक्सचेंज अपनी सेवाओं के बदले कारोबार करनेवालों यानी कॉमोडिटी (Commodity) के खरीदार और विक्रेता से मार्जिन मनी लेते हैं।

बदले में किसी एक पक्ष द्वारा कारोबार की शर्त तोड़ने पर दूसरे पक्ष को करार की शर्तों के अनुसार प्रोडक्ट की डिलीवरी या पैसे का भुगतान करते हैं।

विश्व में प्रथम कॉमोडिटी एक्सचेंज की स्थापना – Establishment of the First Commodity Exchange in the World.

विश्व में प्रथम कॉमोडिटी एक्सचेंज (Commodity Exchange) की स्थापना ‘शिकागो बोर्ड ऑफ ट्रेड’ (सीबोट) के नाम से सन् 1848 में शिकागो के व्यापारियों के एक समूह द्वारा की गई थी। समूह की इच्छा ट्रेड के लिए एक केंद्रीय बाजार स्थल बनाना था।

पहले चार साल तक यह फ्लोर स्टोर के अहाते में था। इससे पूर्व किसानों के उत्पादों के क्रेता पाना मुश्किल था। वे अपने उत्पाद शिकागो में बेचने ले जाते थे।

इसमें परिवहन खर्च इतना हो जाता था कि किसानों को अपने उत्पादों को निकट की झील में फेंकना पड़ता था।

विश्व के प्रमुख कॉमोडिटी एक्सचेंज – World’s Leading Commodity Exchanges.

कॉमोडिटी फ्यूचर्स (Commodity Futures) और ऑप्शन के कॉण्ट्रेक्टों में कारोबार किए जानेवाले विश्व – के प्रमुख कॉमोडिटी एक्सचेंजों में ‘न्यूयार्क मेटल एक्सचेंज’ (नायमेक्स), ‘दालियन कॉमोडिटी एक्सचेंज’ (डीसीई), ‘शिकागो बोर्ड ऑफ ट्रेड’ (सीबोट), टोकियो कॉमोडिटी एक्सचेंज’ (टोकोम), ‘लंदन मेटल एक्सचेंज’ (आईसीई) और ‘सेंट्रल जापान कॉमोडिटी एक्सचेंज’ (सी-काम), न्यूयॉर्क बोर्ड ऑफ ट्रेड’ (नायबोट) व टोकियो ग्रेन एक्सचेंज’ (टीजीई) आदि प्रमुख नाम हैं।

।। धन्यवाद ।।

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डेरिवेटिव क्या है? - What Is Derivatives In Hindi. · नवम्बर 15, 2020 पर 10:19 अपराह्न

[…] कमोडिटी मार्केट क्या है? – What is Commodity Market in Hin… […]

भारत में डेरिवेटिव बाजार - Derivatives Market In India In Hindi. · नवम्बर 16, 2020 पर 8:45 अपराह्न

[…] कमोडिटी मार्केट क्या है? – What is Commodity Market in Hin… […]

डेरिवेटिव मार्केट का बढ़ता चलन - Increasing Trend Of Derivatives Market In Hindi. · नवम्बर 18, 2020 पर 1:18 पूर्वाह्न

[…] कमोडिटी मार्केट क्या है? – What is Commodity Market in Hin… […]

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