डेरिवेटीव्हज परिभाषा (Derivatives Definition):-

डेरिवेटिव (Derivatives) वे वित्तीय सौदे हैं, जिनकी कीमत किसी अन्य एसेट पर आधारित होती हैं। किसी भी डेरिवेटिव (Derivatives) सौदे का मूल्य उसके अंतर्निहित एसेट के मूल्य के अनुसार निर्देशित होता है-अर्थात् किसी भी समय, किसी भी डेरिवेटिव (Derivatives) में शामिल निवेशक का नफा-नुकसान इस अंतर्निहित एसेट के प्रदर्शन पर निर्भर करता है।

वित्तीय बाजार में वैसे तो कई प्रकार से डेरिवेटिव (Derivatives) सौदे किए जाते हैं, फिर भी मुख्यत: तीन प्रकार के डेरिवेटिव (Derivatives) सौदे सब जगह प्रचलन में हैं

  1. ऑप्शंस,
  2. फ्यूचर्स,
  3. फॉरवर्ड्स

‘फ्यूचर’ तथा ‘ऑप्शन’ के सौदे कई क्षेत्रों में किए जाते हैं । यद्यपि फॉरवर्ड सौदों का भी बाजार उपलब्ध है, परंतु नए निवेशक के लिए डेरिवेटिव्ज बाजार (Derivatives Market) में फ्यूचर्स और ऑप्शन्स सौदे ही अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं।

फ्यूचर तथा ऑप्शन डेरिवेटिव (Derivatives) सौदों की एक ऐसी स्थिति है, जिसमें इन सौदों की कीमत इनके अंतर्निहित एसेट की कीमत के अनुसार निर्धारित होती है।

अंतर्निहित एसेट की स्थिति में परिवर्तन से इन डेरिवेटिव (Derivatives) सौदों की कीमत में परिवर्तन आता है, अत: यह जानना बहुत आवश्यक है।

ज्यादातर लोगों में यह धारणा बनी हुई है कि डेरिवेटिव (Derivatives) सौदे स्टॉक मार्केट से ही संबंधित होते हैं, जबकि तथ्य यह है कि डेरिवेटिव मार्केट बहुत विशाल है तथा स्टॉक मार्केट इसका पसंदीदा अंग है।

डेरिवेटिव (Derivatives) सौदे कॉमोडिटी मार्केट में भी बहुत प्रचलित हैं। डेरिवेटिव (Derivatives) सौदों का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है तथा इस मार्केट में बड़े-बड़े सौदे निपटाए जाते हैं।

डेरिवेटिव (Derivatives) वित्तीय बाजार का वह मेकैनिज्म है, जिसके तहत कोई निवेशक अपने आकलन के अनुसार किसी वस्तु अथवा किसी एसेट के आगामी प्रदर्शन के बारे में अपनी धारणा बनाता है तथा इस धारणा के अनुसार वित्तीय बाजार में सौदे करता है।

पूरे विश्व में डेरिवेटिव (Derivatives) तेजी से प्रचलित हो रहे हैं और इसी के चलते बाजार में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े नए डेरिवेटिव भी शामिल हो रहे हैं।

आजकल डेरिवेटिव (Derivatives) सौदों का इतना प्रचलन बढ़ गया है कि कोई भी व्यक्ति अपने आकलन के अनुसार किसी क्षेत्र की स्थिति को लेकर तथा उसमें संभावित जोखिम के साथ अपना डेरिवेटिव (Derivatives) इंस्ट्रमेंट बना सकता है।

इस प्रकार डेरिवेटिव (Derivatives) सौदों का बाजार दिनोदिन काम्प्लेक्स बनता जा रहा है। प्रत्येक डेरिवेटिव (Derivatives) सौदा दो पार्टियों के बीच में होता है, जिसमें से व्यक्ति अपने आकलन के अनुसार अनुमान लगता है कि आनेवाले समय में किसी अंतर्निहित एसेट की स्थिति कैसी होगी।

डेरिवेटिव (Derivatives) सौदों की तरलता का स्तर बहुत ऊँचा होता है तथा इनसे जुड़ी संभावनाएँ इन सौदों को दिन-प्रतिदिन लोकप्रिय बना रही हैं।

डेरिवेटिव बाजार क्या है? (What is Derivatives Market?)

आज के तेज रफ्तार युग में सभी व्यक्तियों को “आसान तरीकों से पैसा कमाए” ऐसा लगता है। हर कोई व्यक्ति ऐशो-आराम के साथ जीना चाहता है बच्चों को अच्छी शिक्षा देकर स्वावलंबी बनाना चाहता है।

कई लोगों को ऐसा लगता है कि कम लागत में आसानी से ज्यादा मुनाफा मिलना चाहिए जैसे कि लॉटरी।

इसलिए शेअर बाज़ार में डेरिवेटिव (Derivatives) नाम का एक सेगमेंट है जिसे आसान शब्दों में सट्टा (Speculation) कहते है। शेअर बाज़ार में इस व्यवहार का एक तरीका है।

साधारण सट्टे के लिए ज्यादा पैसों की जरूरत नहीं। इस में व्यक्ति कम समय में करोड़पती बना है, ऐसा भी सुना है, मगर इसमें बहुत खतरा है।

डेरिवेटीव्हज (Derivatives) के तरीके परदेश से आए है। अमेरिका तथा युरोप में यह ज्यादा प्रचलीत है। यह तरीके हमारे देश में आने से पूर्व जो रीत हमारे देश में होती थी वह डेरिवेटीव्हज (Derivatives) जैसे ही थी।

डेरिवेटीव्हज (Derivatives) के व्यवहार में हम जोखिम स्वयं पर नहीं रखते है। हमारे पास आज जो भी माल है, वह हम अपने पास न रखकर भविष्य में किसी एक महिने की तारीख को उसकी जो कीमत है

उसी में हम बिक्री करते है, इससे अगर भविष्य में उस माल की कीमत बढ़ी तो उसका फायदा हमें नहीं होगा। इसी तरह अगर उस माल की कीमत घट गई तो उससे होनेवाला नुकसान हमें नहीं होगा।

दुसरे शब्दों में कहा जाए तो यह एक प्रकार का बिमा है। पुरे दुनिया के वित्तीय बाजारों में निवेश या स्पेकुलेशन के विभिन्न तरीके हैं। इनमें से सबसे आम तरीका ‘स्पॉट मार्केट’ द्वारा निवेश है।

स्पॉट मार्केट के निवेश में एसेट को खरीद या बेचकर नफा-नुकसान कमाया जाता है। इस प्रकार के निवेश में एसेट की खरीद तथा बिक्री में ट्रांजेक्शन (लेन-देन) का पूरा मूल्य स्थानांतरित होता है।

कई निवेशकों को यह परंपरागत तरीका बंधनवाला लगता है। उनको महसूस होता है कि उपलब्ध धन के हिसाब से इस प्रकार के परंपरागत निवेश में गतिविधियाँ काफी सीमित होती हैं।

साथ ही, यदि कोई निवेशक निकट भविष्य के बाजार का पूर्व आकलन करने की क्षमता रखता है तो उसे अपने पास निवेश के लिए उपलब्ध धन सीमित महसूस होता है। इस प्रकार की परिस्थितियों ने निवेश के दूसरे प्रकार अथवा ढंग को जन्म दिया।

डेरिवेटिव (Derivatives) के द्वारा निवेश इसी प्रकार का एक तरीका है, जिसमें निवेशक को निवेश के लिए उपलब्ध धन की तुलना में कई गुना अधिक मात्रा में निवेश संबंधी गतिविधियों को पूरा करने का अवसर उपलब्ध होता है।

Derivatives Example:-

किसान उसके माल की भविष्य में होने वाली बिक्री का करार वर्तमानकाल में करता है। यह सिर्फ करार होता है, माल की डिलीवरी करार में दिए गए भविष्य की तारीख में ही होती है।

इस तरह दरअसल वह अपने माल की बिक्री वर्तमान में जो कीमत है उसी में करता है। अगर भविष्य में माल की कीमत घट गई तो उससे होनेवाले नुकसान से वह बच जाता है।

इसके विपरीत उसे खुद की सही कीमत मिलती है। इस उदाहरण को डेरिवेटीव्हज (Derivatives) कहा जाता है। इसमें हम देख सकते है कि माल खरीदनेवाला आदमी भविष्य में कीमत बढ़ेगी या घटेगी इसका सही अंदाजा लगा कर ही करार करता है।

इसलिए उसने स्पॉट प्राईज (चालु भाव) देखकर भविष्य की कीमत का अंदाजा किया। इसलिए इसको डेरिवेटीव्हज (Derivatives) कहते है।

करार करते समय, माल की जो कीमत है उसे स्पॉट प्राईज कहते है और करार में दी गई भविष्य की तारीख में जो कीमत है उसे फ्युचर मार्केट प्राईज या फ्युचर प्राईज कहते है।

समझ लीजिए कि एक कंपनी के शेअर्स का भाव ५०० रू है और हमें वो शेअर्स खरीदने है। हम ऐसा अंदाजा लगाते है कि उन शेअर्स का भाव भविष्य में ७० या ८० रूपयों से बढ़ेगा

इसलिए अगर हम १०० शेअर्स खरीदते है तो हमें ७ से ८ हजार रूपयों का फायदा होगा परंतु उस वक्त हमारे पास १०० शेअर्स खरीदने के लिए उतनी रक्कम नहीं है तो आप फ्युचर ले सकते है

इसमें आपको पुरी रक्कम के केवल २० % मारजिन पहले देना होगा। इसमें हम देख सकते है कि, हम कम रूपयों में बड़ा व्यवहार कर सकते है |

परंतु इसमें जैसे मुनाफा ज्यादा है वैसे ही घाटा भी ज्यादा है। इसलिए पूरी जानकारी और अनुभव के बाद ही डेरिवेटीव्हज (Derivatives) में व्यवहार करें।

भारत का डेरिवेटीव्हज बाज़ार (Derivatives Market in India):-

भारत में डेरिवेटीव्हज (Derivatives) ट्रेडिंग जून २००० में शुरू हुई और सेबी ने मुंबई स्टॉक एक्सचेंज (BSE) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) और उनके क्लीअरिंग हाउस, कॉर्पोरेशन इत्यादि को डेरिवेटीव्हज (Derivatives) सेगमेंट में ट्रेडिंग और सेटलमेंट करने की अनुमती दी है।

आरंभ में सेबी (SEBI) ने नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के CNX NIFTY इंडेक्स पर आधारित इंडेक्स फ्युचर और मुंबई स्टॉक एक्सचेंज के Sensex इंडेक्स पर आधारित इंडेक्स फ्युचर कॉन्ट्रॅक्ट में ट्रेडिंग करने की अनुमती दे दी।

सेबी (SEBI) ने जुन २००१ में ऑप्शन और जुलाई २००१ में इंडिव्हिजुअल स्क्रिप्ट में ट्रेडिंग करने की मुंबई स्टॉक एक्सचेंज और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज को अनुमती दी।

डेरिवेटिव्ज की जरूरत या उपयोग

बाजार की लगातार बदलती हई स्थितियाँ डेरिवेटिव सौदों की आवश्यकता को जन्म देती हैं। डेरिवेटिव (Derivatives) सौदों में निवेश से पहले निवेशक को बाजार की परिस्थिति का पूरा आकलन करना चाहिए या उसी के अनुसार किसी डेरिवेटिव (Derivatives) सौदे में अपनी पोजीशन (स्थिति) को तय करना चाहिए।

फंड मैनेजमेंट (Fund Management) क्या होता है?

किसी भी धन के साथ उसकी उपयोगिता का महत्त्व जुड़ा है। चूँकि निवेशक के पास सीमित मात्रा में धन उपलब्ध होता है, अत: उसकी कोशिश रहती है कि इस धन को ऐसी रणनीति के तहत निवेश किया जाए,

जिससे अच्छा रिटर्न मिल सके तथा आवश्यकता पड़ने पर उसे तुरंत दुबारा हासिल किया जा सके। डेरिवेटिव (Derivatives) सौदों में स्पॉट मार्केट की तुलना में ये गुण विस्तृत रूप से परिलक्षित हैं।

स्पॉट मार्केट में जहाँ निवेशक को प्रत्येक खरीद के लिए तुरंत धन चुकाना पड़ता है अथवा लाभ मिलने की अवस्था में तुरंत बिक्री करनी पड़ती है तथा इस प्रकार उसके पास उपलब्ध धन की गतिविधियाँ सीमित हो जाती हैं।

वहीं इसके विपरीत, डेरिवेटिव्ज बाजार (Derivatives Market) में निवेशक आगामी बाजार के अपने आकलन के अनुसार तथा अपने पास निवेश करने लायक उपलब्ध धन के अनुसार विस्तृत परिदृश्य में कोई पोजीशन ले सकता है।

इस प्रकार उसी सीमित धन के द्वारा निवेश का परिदृश्य बड़ा हो जाता है। यद्यपि इसमें जोखिम की संभावनाएँ उसी अनुपात में ज्यादा होती हैं।

डेरिवेटिव (Derivatives) सौदों में इस प्रकार का निवेश काफी लिक्विडिटी (तरलता) लिये होता है तथा बाजार की परिस्थितियों के बदलने पर निवेशक अपनी पोजीशन भी तेजी से बदल सकता है।

लिवरेजिंग (Leveraging) क्या होता है?

डेरिवेटिव (Derivatives) सौदों का सबसे बड़ा लाभ है कि निवेशक अपने पास उपलब्ध धन की तुलना में कई गुना अधिक बड़े सौदे की पोजीशन ले सकता है, क्योंकि डेरिवेटिव (Derivatives) सौदों में सौदे की कुल कीमत का कुछ भाग ही चुकाना पड़ता है।

इन डेरिवेटिव (Derivatives) सौदों के अंतर्निहित एसेट के मूल्य में जो परिवर्तन सौदे के अंतराल के दौरान आता है, उसी के अनुसार निवेशक लाभ-हानि उठाता है।

इस प्रकार डेरिवेटिव (Derivatives) सौदे की अंतर्निहित एसेट का पूरा मूल्य निवेशक को सौदे के लिए नहीं चुकाना पड़ता। निवेशक अपने पास उपलब्ध धन को डेरिवेटिव (Derivatives) सौदे में हो सकनेवाली हानि की सीमा तक आँककर निवेश कर सकता है।

इस प्रकार, उसकी वित्तीय गतिविधियाँ अब कई गुना बढ़ जाती हैं।

शॉर्ट टर्म नजरिया (Short Term View):-

बाजार में किसी भी एसेट को देखने का, आँकने का नजरिया भिन्न-भिन्न लोगों का अलग-अलग हो सकता है। कुछ लोगों के आकलन के अनुसार किसी एसेट की कीमतों के निकट भविष्य में कोई बदलाव नहीं आएगा।

इसके विपरीत, कुछ निवेशक इसी एसेट की कीमतों में गिरावट का अनुमान लगाते हैं, वहीं कुछ अन्य निवेशक इसी एसेट की कीमतों में वृद्धि की संभावनाएँ भी तलाश सकते हैं।

प्रत्येक निवेशक अपने आकलन के अनुसार लाभ उठाना चाहता है तथा डेरिवेटिव्ज बाजार (Derivatives Market) इन सभी निवेशकों के लिए एक साथ अवसर उपलब्ध करवाता है।

साथ ही, बाजार की बदलती परिस्थिति अथवा निवेशकों के बदलते आकलन के अनुसार उन्हें अपनी पोजीशन बदलने की सुविधा भी उपलब्ध करवाता है।

डेरिवेटिव्ज बाजार (Derivatives Market) निवेशकों को निकट भविष्य के लिए शॉर्ट टर्म नजरिया अपनाकर निवेश के अवसर उपलब्ध करवाता है।

हेजिंग (Hedging) क्या होता है?

कोई निवेशक विभिन्न प्रकार के सौदों तथा इंस्ट्रमेंट में अपना निवेश करता है। जब बाजार की परिस्थितियाँ उसके आकलन से विपरीत दिशा में गति करने लग जाएँ

तो उससे भारी नुकसान की संभावनाएँ पैदा हो जाती हैं। इस खतरे को कम करने के | लिए निवेशक के पोर्टफोलियो (Portfolio) में ऐसा तत्त्व होना आवश्यक है, जिसमें वह अपने घाटे को कम कर सके।

डेरिवेटिव (Derivatives) सौदों में यह अंतर्निहित गुण होता है कि निवेशक बदली । हई परिस्थितियों के अनुसार तुरंत अपनी पोजीशन बदल सकता है।

यह गुण वित्तीय बाजार में ‘हेजिंग’ (Hedging) के नाम से जाना जाता है। डेरिवेटिव (Derivatives) सौदों में अंतर्निहित हेजिंग (Hedging) की यही व्यवस्था इन सौदों को निवेशकों में लोकप्रिय बनाती है।

निवेश का पोर्टफोलियो (Portfolio) बनाने तथा उसे मेंटेन करने के साथ ही यह भी आवश्यक हो जाता है कि बाजार के गिरने की स्थिति में इस पोर्टफोलियो (Portfolio) में होनेवाले भारी नुकसान से बचाया जा सके।

इस प्रकार की व्यवस्था हेजिंग (Hedging) कहलाती है। इसके लिए आवश्यक है कि निवेश के पोर्टफोलियो (Portfolio) में ऐसा तत्त्व मौजूद हो, जो उसे विपरीत परिस्थितियों में भारी नुकसान से बचा सके।

अतिरिक्त चुनाव

बाजार में अनगिनत निवेशक अलग-अलग बौद्धिक तथा वित्तीय क्षमताओं के होते हैं। इसी प्रकार उनकी चरित्रगत विशेषताएँ भी अलग-अलग होती हैं।

इन भिन्नताओं के चलते सभी निवेशकों के लक्ष्य या उद्देश्य अलग-अलग होते हैं। ऐसी स्थिति में डेरिवेटिव (Derivatives) सौदे ऐसे इंस्ट्रमेंट हैं, जो निवेशकों द्वारा अलग-अलग चुनाव करके उनके वित्तीय लक्ष्य हासिल करने की सुविधा प्रदान करते हैं।

गतिमान प्रकृति

डेरिवेटिव्ज बाजार (Derivatives Market) का पूरा क्षेत्र अपनी प्रकृति के तहत विभिन्न दिशाओं में बहुत गतिमान होता है। इस बाजार की यह प्रकृति इसे निवेश के अन्य परंपरागत तरीकों से अलग करती है।

निवेश के परंपरागत तरीकों में जहाँ एक निश्चित तरीका तथा निश्चित लक्ष्य निर्धारित होते हैं, वहीं डेरिवेटिव्ज बाजार (Derivatives Market) में निवेशक बाजार की स्थिति का आकलन अपनी क्षमताओं के अनुसार करके निवेश करते हैं।

डेरिवेटिव्ज बाजार (Derivatives Market) का कैनवास बहुत विस्तृत होता है। डेरिवेटिव्ज बाजार (Derivatives Market) में कोई निवेशक बाजार की स्थिति के सर्वथा भिन्न तरीका अपनाकर भी निवेश कर सकता है।

इस प्रकार विभिन्न रणनीतियों का उपयोग करके निवेशक डेरिवेटिव्ज बाजार (Derivatives Market) को गतिमान् बनाते हैं।

रचनात्मकता (Creativity):-

चूँकि डेरिवेटिव्ज बाजार (Derivatives Market) में निवेश के द्वारा लाभ केवल बाजार की स्थिति के अनुसार ही नहीं कमाया जा सकता है, अपितु इस बात पर लाभ निर्भर करता है कि निवेशक बाजार का किस प्रकार आकलन करता है।

इस प्रकार रचनात्मकता का इस बाजार में पूरा उपयोग होता है। डेरिवेटिव्ज बाजार (Derivatives Market) कई निवेशकों की क्षमता को सामने लाने का अवसर उपलब्ध करवाता है।

डेरिवेटिव का उपयोग (Use of derivatives):-

अलग-अलग परिस्थितियों तथा तरीकों के अनुसार डेरिवेटिव के कई उपयोग हैं। डेरिवेटिव (Derivatives) इंस्ट्रमेंट को प्रयोग करने के लिए स्पष्ट उद्देश्य का होना आवश्यक है।

परिस्थितियाँ डेरिवेटिव इंस्ट्रमेंट की आवश्यकता पैदा करती हैं; परंतु अंत में यह सबसे महत्त्वपूर्ण है कि निवेशक इन इंस्ट्रमेंट का व्यावहारिक रूप में किस प्रकार प्रयोग करते हैं।

साधारण निवेश (Simple investment):-

कई लोगों का सोचना है कि डेरिवेटिव (Derivatives) निवेश का मात्र एक रास्ता है और इस प्रकार ऐसे लोग डेरिवेटिव (Derivatives) बाजार में सामान्य तरीके से ही निवेश करते हैं। ऐसे निवेशकों का तरीका परंपरागत निवेश के अनुसार ही होता है।

मध्यस्थता (आर्बीट्रेज) के अवसर का उपयोग

वित्तीय बाजार में आर्बीट्रेज (Arbitrage) के चलते कई बार नए अवसर उपलब्ध होते हैं। इस स्थिति का लाभ उठाने के लिए निवेशक अपनी एक निश्चित पोजीशन अख्तियार कर लेता है। यदि परिस्थितियाँ इस निवेशक के आकलन के अनुसार गति करती हैं

तो इस निवेशक को भारी लाभ होता है। डेरिवेटिव (Derivatives) सौदे के द्वारा ऐसी परिस्थितियों का अधिकतम लाभ उठाया जा सकता है। यहाँ महत्त्वपूर्ण है कि ऐसी परिस्थितियाँ लंबे समय तक नहीं बनी रहतीं, अत: इन परिस्थितियों को जल्दी से भुनाया जाना आवश्यक है।

ऐसा डेरिवेटिव (Derivatives) के माध्यम से किया जा सकता है। इसके विपरीत, डेरिवेटिव (Derivatives) ट्रांजेक्शन में घाटे की आशंका भी बनी रहती है।

आर्बीट्रेज क्या है? (What is Arbitrage):-

अतिरिक्त पूँजी का फैलाव कई लोगों के पास अतिरिक्त धन सदैव रहता है। ऐसे लोग उन क्षेत्रों तथा अवसरों की तलाश में रहते हैं, जहाँ वे अपने इस अतिरिक्त धन को निवेश कर धन के प्रवाह को बनाए रख सकें।

डेरिवेटिव (Derivatives) द्वारा निवेश का रास्ता इस श्रेणी के निवेशकों के लिए उपयुक्त विकल्प है। डेरिवेटिव्ज बाजार (Derivatives Market) में हर वक्त कुछ-नकुछ घटित होता रहता है, अत: ऐसे निवेशकों का धन सदैव रोलिंग में रहता है तथा निश्चित अंतराल में उन्हें रिटर्न भी मिलता रहता है।

वे लोग, जो सदैव अतिरिक्त धन कमाने की सोच रखते हैं तथा घाटे की परवाह नहीं करते, उन निवेशकों के लिए डेरिवेटिव बाजार पसंदीदा जगह है।

यद्यपि यहाँ घाटे की संभावना सदैव बनी रहती है, फिर भी अतिरिक्त धन का अच्छा विकल्प मानकर ऐसे लोगों के लिए डेरिवेटिव सौदा एक अच्छा एसेट है।

अतिरिक्त पोजीशन वित्तीय बाजार में प्राय: डेरिवेटिव (Derivatives) का उपयोग अतिरिक्त पोजीशन अख्तियार करने के लिए किया जाता है। वित्तीय बाजार में कई निवेश पहले से किए होते हैं।

यदि इन निवेशों के बदले डेरिवेटिव (Derivatives) इनवेस्टमेंट का प्रयोग किया जाए तो अतिरिक्त पोजीशन अख्तियार की जा सकती है। यदि यह सब सही तरीके से घटित हो तो इसका परिणाम बहुत लाभकारी होता है।

ऐसी अतिरिक्त पोजीशन सदैव अच्छा विकल्प हो, यह जरूरी नहीं। परंतु कुछ परिस्थितियों में यह प्रभावकारी होती है। अतिरिक्त पोजीशन अख्तियार करने के दौरान जोखिम का ध्यान सदैव दिमाग में रखना चाहिए।

सटटेबाजी (स्पेकुलेशन) – विश्व भर के बाजारों में डेरिवेटिव (Derivatives) का सबसे ज्यादा उपयोग स्पेकुलेशन (सट्टेबाजी) के लिए किया जाता है। आम निवेशक के लिए डेरिवेटिव का यह तरीका सही नहीं है, क्योंकि यदि बाजार की स्थितियाँ अपेक्षानुसार घटित न हों तो भारी नुकसान अवश्यंभावी है।

जो लोग घाटा उठाने की क्षमता रखते हैं, वे अपने निवेश की जरूरतें डेरिवेटिव में सट्टेबाजी के माध्यम से पूरी कर सकते हैं। सट्टेबाजी का प्रयोग अधिक लाभ कमाने के उद्देश्य से किया जाता है

तथा इसमें जोखिम का स्तर भी काफी ऊँचा होता है। अत: स्पेकुलेशन का तरीका सभी निवेशकों के लिए एक जैसा उपयोगी नहीं है। फिर भी, डेरिवेटिव्ज बाजार (Derivatives Market) में अधिकांश निवेशकों की प्राथमिकता सट्टेबाजी द्वारा निवेश की होती है।

।। धन्यवाद ।।

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श्रेणी: Share Market

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