क्या आपको पता है की डेरिवेटिव बाजारों का रेग्युलेटरी फ्रेमवर्क क्या है (What is the Regulatory Framework of Derivatives Markets in Hindi)? अगर आपको पता नहीं है तो आप इस ब्लॉग को पूरा पढ़े.

डेरिवेटिव बाजारों का रेग्युलेटरी फ्रेमवर्क क्या है – What is the Regulatory Framework of Derivatives Markets in Hindi.

सेबी ॲक्ट और सिक्योरिटीज कॉन्ट्रॅक्ट (रेग्युलेशन) ॲक्ट – एससी(आर)ए के अंतर्गत तैयार किए गए नियम और स्टॉक एक्सचेन्ज के नियमों और उपनियमों के अंतर्गत डेरीवेटीव्ह के ट्रेडींग का नियमन किया जाता है।

सिक्योरिटीस कॉन्ट्रॅक्ट (रेग्युलेशन) ॲक्ट, १९५६ [एससी(आर) ए] (Securities Contracts(Regulation) Act, 1956 [SC(R)A]:

सिक्योरिटीज कॉन्ट्रॅक्ट (रेग्युलेशन) ॲक्ट, १९५६ एससी(आर)ए में सिक्योरिटीज ट्रेडींग के सब पहलुओं पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नियंत्रण रखने का प्रावधान किया गया है। उसी हिसाब से स्टॉक एक्सचेन्ज व्यवस्थित तरीके से चलना चाहिए इसका प्रबंध भी किया गया है।

एससी(आर)ए के अंतर्गत केंद्र सरकार को बाजार का नियंत्रण और निचे के मुद्दो पर ध्यान रखने का अधिकार मिला है।

  • किसी भी बारे में मान्यता देने की प्रक्रिया पर और हर बार पर्यवेक्षण के माध्यम से शेअर बाजार पर ध्यान रखने का अधिकार।
  • सिक्योरिटीज के कॉन्ट्रक्ट पर ध्यान रखने का अधिकार।
  • स्टॉक एक्सचेन्ज में सिक्योरिटीज के लिस्टिंग पर ध्यान रखने का अधिकार।

सिक्योरिटीज में होने वाले अवांछनीय लेनदेन पर नियंत्रण रखने के लिए सिक्योरिटीज कॉन्ट्रॅक्ट (रेग्युलेशन) ॲक्ट की रचना की गई थी।

इस कायदे की मदद से सिक्योरिटीज पर होने वाले व्यवहार को विनियमित कर के अवांछनीय लेनदेन को नियंत्रीत किया जा सकता है।

यह एक मुख्य कायदा है जिसकी मदद से भारत में सिक्योरिटीज के ट्रेडींग का नियमन किया जाता है। एससी(आर)ए में ‘सिक्योरिटीज’ इस शब्द की व्याख्या दी गई है। कलम २(एच) में किए प्रावधान के अनुसार सिक्योरिटीज में निचे दिए इन्स्ट्रमेन्ट का समावेश होता है।

  1. शेअर्स, स्क्रिप, स्टॉक, बॉन्ड, डिबेंचर स्टॉक अथवा बिक्री करने लायक सिक्योरिटीज अथवा इन्कोर्पोरेट की गई कोई भी कंपनीयाँ अथवा कोर्पोरेट बॉडी के इन्स्टमेन्ट का समावेश होता है।
  2. डेरीवेटीव्ह
  3. निवेशक को कोई भी सामुहीक बचत योजना के अंतर्गत इश्यु कर के दिए गए युनिट अथवा दुसरे इन्स्ट्रमेन्ट।
  4. सिक्योरिटी रिसिप्ट
  5. सरकारी सिक्योरिटीज
  6. केन्द्र सरकार ने सिक्योरिटीज कहके घोषित किए हुए अन्य इन्स्ट्रमेन्ट।
  7. सिक्योरिटीज पर दिया जानेवाला ब्याज के युनिट अथवा राईट के युनिट।

कलम २(एए) में किए प्रबंध अनुसार डेरिवेटिव्ह में निचे के मुद्दो का समावेश होता है। (As per Section 2(aa), Derivatives Include in Hindi):

  1. एक डेब्ट इन्स्ट्रमेन्ट से प्राप्त की गई कोई भी सिक्योरिटी, शेअर्स, लोन, वगैरे फिर वो सुरक्षित हो अथवा असुरक्षित हो रिक्स इन्स्ट्रमेन्ट हो अथवा डिफरन्स कॉन्ट्रॅक्ट हो अथवा सिक्योरिटी का और कोई भी रूप हो, सभी का डेरिवेटिव्ह में समावेश किया जाता है।
  2. भाव अथवा इन्डेक्स का भाव अथवा कॉन्ट्रॅक्ट के अंतर्गत आने वाले सिक्योरिटीज के भाव में से खुद का मुल्य निश्चित करने वाला कॉन्ट्रॅक्ट और बाद में कलम १८अ में किए प्रावधान के अंतर्गत अन्य कायदों में कोई भी प्रबंध किया हो तो उस को भी ध्यान में न लेकर कलम १८अ के प्रावधान को अमल में लाके डेरिवेटिव्ह के कॉन्ट्रैक्ट को कायदे से मान्यता देने की प्रावधान किया गया है।
  • सरकार ने मान्यता दी हो ऐसे स्टॉक एक्सचेन्ज में उस का ट्रेडींग होना चाहिए।
  • सरकार ने मान्य किए स्टॉक एक्सचेन्ज के क्लिअरीगं हाऊस में स्टॉक एक्सचेन्ज द्वारा तैयार किए गए नियमों और उपनियमों के अनुसार ही उनको सौदे करने चाहिए।

द सिक्योरिटीज लॉ (अमेन्डमेंन्ट) ॲक्ट १९९५ (The Securities Laws (Amendment) Act, 1995 in Hindi):

एससी(आर)ए १९५६ के कलम २ (डी) में सिक्योरिटीज के ऑप्शन की व्याख्या की गई है।

उसकी व्याख्या के अनुसार खरीदने का अथवा बेचने का अधिकार मिलवा के देने वाले अधिकार की खरीदी अथवा बिक्री करने का कॉन्ट्रॅक्ट अथवा फ्युचर्स में सिक्योरिटी की बिक्री अथवा खरीदी करने के अधिकार को मिलवा के देने वाले अधिकार की खरीदी अथवा बिक्री करना है।

उसी अनुसार उस में तेजी, मंदी, तेजीमंदी, गल्ली, पुट, कॉल इन सौदो का समावेश होता है।

एससी(आर)ए १९५६ के कलम २० के अंतर्गत सिक्योरिटी के ऑप्शन पर प्रतिबंध की जानकारी दी थी और इस कायदे का अमल चालु होने के बाद सिक्योरिटी के ऑप्शन के सब सौदो को गैर कानुनी माना जाता है।

ऑप्शन के कॉन्ट्रॅक्ट को मान्यता देने के लिए सिक्योरिटीज कॉन्ट्रॅक्ट (रेग्युलेशन) अॅक्ट, १९५६ में निचे दिए अनुसार बदला गया था।

सिक्योरिटीज लॉ अमेन्डमेंन्ट ॲक्ट १९९५ के जरिए यह फेरबदल किया गया था। यह नई सुधारणा २५ जनवरी १९९५ को अमल में लाई गई और इसके तहत सिक्योरिटी में ऑप्शन के कॉन्ट्रॅक्ट करने की कानुनी इजाजत मिली।

द सिक्योरिटीज लॉ अमेंन्डमेंन्ट ॲक्ट १९९५, इस कायदे पर अमल चालु होने से भारतीय शेअर बाजार के इतिहास में नए पर्व को प्रारंभ हुआ।

उस के बाद सिक्योरिटीज लॉ ॲक्ट १९९९ के जरिए नई सुधारणाए की गई थी। यह सुधारणा दाखील कर के सरकार ने डेरिव्हटिव्ह के व्यवहार करने के लिए इजाजत दी थी।

सिक्योरिटीज अ‍ॅन्ड एक्सचेन्ज बोर्ड ऑफ इंडीया ॲक्ट, १९९२ (Securities and Exchange board of India Act, 1992 in Hindi):

सेबी अ‍ॅक्ट १९९२ में सिक्योरिटीज और एक्सचेन्ज बोर्ड ऑफ इंडीया की रचना की गई थी।

सेबी की रचना के पीछे का पहला मूलभूल हेतु निवेशकों के हित का रक्षण करना था और दुसरा हेतु सिक्योरिटीज मार्केट के विकास को बढावा देना था। सिक्योरिटीज मार्केट का नियंत्रण और नियमन करना उस के पिछे का तीसरा हेतु था।

सेबी के नियंत्रण का कार्यक्षेत्र कॉर्पोरेट द्वारे इश्यु किए गए कॅपीटल और सिक्योरिटी के ट्रान्सफर तक विस्तरित है। वैसे ही सब इन्टरमिडेटरीओ और सिक्योरिटी मार्केट से संबंधीत सब खिलाडियों पर नियंत्रण रखना यह भी उस के पिछे का एक हेतु है।

सेबी को उचित लगे उस तरीके से वो उपर दर्शाए गए काए को पूर्ण करने के लिए जवाबदार है। सेबी को निचे दिए अनुसार अधिकार मिले है।

  • स्टॉक एक्सचेन्ज और अन्य कोई भी सिक्योरिटी के बाजार में होने वाले व्यापार का नियमन करने का अधिकार।
  • स्टॉक ब्रोकर और सब ब्रोकर का रजिस्ट्रेशन करने का और उन का नियमन करने का अधिकार।
  • स्वनियत्रंण से चलने वाली संस्थाओ का नियमन और उन को बढावा देने का अधिकार।
  • धोखाधड़ी और अनुचित व्यवहार पर रोक लगाने का अधिकार है।
  • इन्स्पेक्शन करने वालो से जानकारी हासिल करने का और स्टॉक एक्सचेन्ज, म्युच्युअल फंड और सिक्योरिटीज मार्केट से संबंधित व्यक्ति अथवा मध्यस्त संस्थाओं की चेकिंग और ऑडीट करने का अधिकार।
  • केन्द्र सरकार द्वारा सिक्योरिटी कॉन्ट्रॅक्ट रेग्युलेशन अ‍ॅक्ट, १९५६ अंतर्गत आने वाले अधिकार का उपयोग करने की और उस के अंतर्गत उस को दिए कामगिरी को पूरा करने की जिम्मेदारी है।

डेरिवेटिव्हके ट्रेडिंग का नियमन (Regulation for Derivatives Trading in Hindi):

भारत में डेरिवेटिव्हस ट्रेडींग के लिए योग्य रेग्युलेटरी फ्रेम वर्क विकसीत करने के लिए डॉ. एल.सी गुप्ता के अध्यक्षपद के अंतर्गत सेबी ने २४ सभासदो की समिती की रचना की थी। मार्च १९९८ में इस कमिटी ने अपनी रिपोर्ट पेश की।

सेबी ने इस समिती के सिफारिश का स्वीकार किया था। इस समिती ने दिए हुए सलाह को देख के सेबी ने भारतीय डेरिवेटिव्हस ट्रेडींग में उन का थोडा थोडा इस्तेमाल करने का निर्णय लिया था।

सेबी ने ११ मई १९९८ से स्टॉक का इन्डेक्स फ्युचर्स चालु किया था। सुचना के रूप में इस समिती ने सिफारिश किए नियमों और उपनियमों का भी सेबी ने स्विकार किया था।

स्टॉक फ्युचर्स के नियमन और ट्रेडींग के लिए और उसी तरह डेरिवेटीव्ह कॉन्ट्रॅक्ट के सेटलमेन्ट के लिए उन्हों ने यह नियम बताए थे।

एससी (आर) ए में किए प्रावधान के बाद सिक्योरिटीज की ट्रेडींग का नियमन करने के लिए रचना विकसीत की गई थी।

एससी (आर) ए में की सुधारणा में डेरिवेटिव्ह को सिक्योरिटीज के कार्यक्षेत्र में समाविष्ट किया गया था। इस कायदे के प्रावधान के अंतर्गत रह के डेरिवेटिव्ह का ट्रेडींग करना संभव हो उस के लिए यह बदलाव किए गए थे।

१. एल.सी.गुप्ता कमिटी ने निर्धारित किए पात्रता मापदंडों को पुरा करने वाले एक्सचेन्ज, डेरिवेटिव्ह में ट्रेडींग का कारोबार शुरू करने के लिए एससी(आर)ए, १९५६ की धारा ४ के तहत मान्यता प्राप्त करने के लिए सेबी को आवेदन कर सकते है।

डेरिवेटिव्ह एक्सचेन्ज विभाग के लिए अलग गवर्निग काऊन्सील होनी चाहिए। गवर्निग काऊन्सील के कुल सभासद के अधिकतम ४० प्रतिशत सभासद ट्रेडींग के अथवा क्लिअरिंग मेम्बर के प्रतिनिधीत्व करते होने चाहिए।

एक्सचेन्ज के अधिकारियों ने उन के सभासदो के जरिए की जानेवाली बिक्री के कार्य पध्दती का नियमन करना चाहिए। डेरिवेटीव्ह का कोई भी कॉन्ट्रॅक्ट चालु करने से पहले उन्होने सेबी से पहले ही इजाजत लेनी चाहिए।

२. एक्सचेन्ज में कम से कम ५० सभासद होने जरूरी है।

३. एक्सचेन्ज के अस्तित्व में होनेवाले विभाग में से सभासद डेरिवेटिव्ह के विभाग के सभासद आपने आप बनते नहीं है। सभासदो को डेरिवेटिव्ह विभाग के लिए एल.सी.गुप्ता कमिटी ने निर्धारित किए पात्रता मापदंड को पुरा करना पडता है।

४. सेबी ने मान्यता दिए हो ऐसे क्लिअरिंग कॉर्पोरेशन अथवा क्लिअरिंग हाऊस के जरिए ही डेरिवेटिव्ह के सौदों का क्लिअरिंग और सेटलमेन्ट होना चाहिए।

एल.सी.गुप्ता समिती ने तैयार किए पात्रता मापदंडों को पुरा करने वाले क्लिअरिंग कॉर्पोरेशन अथवा क्लिअरिंग हाऊस, यह पात्रता के लिए सेबी से अर्ज कर सकते है।

५. डेरिवेटिव्ह के दलाल अथवा डीलर और क्लिअरिंग के सभासद इन सभी को सेबी के पास रजिस्ट्रेशन करना जरूरी है।

वर्तमान स्टॉक एक्सचेन्ज के दलाल के पास उन्हों ने किए रजिस्ट्रेशन के बाद ये और एक रजिस्ट्रेशन करना जरूरी है।

डेरिवेटिव्ह के क्लिअरिंग कॉर्पोरेशन अथवा क्लिअरिंग हाऊस के मेम्बर की कम से कम नेटवर्थ रूपए तीन करोड़ होना जरूरी है। सभासदो की नेटवर्थ निचे दिए अनुसार गिनी जा सकती है।

कॅपिटल + फ्री रीजर्व – नॉन ॲलॉवेबल अॅसेट

जहाँ, नॉन अॅलॉवेबल अ‍ॅसेट में फिक्स अ‍ॅसेट, प्लेज की गई सिक्योरिटीज, मेंम्बर्स कार्ड, नॉन अॅलॉवेबल सिक्योरिटी याने लिस्ट न हुई हो ऐसी सिक्योरिटीज का समावेश होता है।

उस में बॅड डिलिवरी, डाउटफुल डेब्ट और अ‍ॅडवान्स, इन्टान्जिबल असेट (अमूर्त संपत्ति) और मार्केट में बिक्री हो सके ऐसे सिक्योरिटीज का ३०% मूल्य का समावेश किया गया है।

६. कॉन्ट्रॅक्ट का न्यूनतम मूल्य रू. दो लाख से कम नहीं होना चाहिए। फ्युचर्स के जो कॉन्ट्रैक्ट दाखील किए जानेवाले है उनकी भी जानकारी एक्सचेन्ज निर्देशित करना शुरू कर देता है।

७. कॅपिटल की पर्याप्तता के आधार से आरंभिक मार्जिन की जरूरत और निवेश की मर्यादा जुडी है। उसी अनुसार खिलाडियों की लिए पोजिशन में नुकसान होने के जोखीम के आधार पर मार्जिन की मांग को निश्चित किया जाता है।

सेबी और एक्सचेन्ज के अधिकारियों को कुछ कालावधी अनुसार इस से संबंधित हेतु को स्पष्ट करना पडता है।

८. एल.सी.गुप्ता कमिटी की रिपोर्ट में निश्चित किए अनुसार ‘तुम्हारे ग्राहक को पहचाने’ इस के अंतर्गत आने वाले नियम पर अमल करना जरूरी है।

डेरिवेटिव्ह के विभाग के सभासदो को डेरिवेटिव्ह के ट्रेडींग में रहनेवाली जोखीम की जानकारी देनी पड़ती है।

इस के लिए उन को क्लायन्ट को रिस्क डिस्क्लोजर डॉक्यूमेन्ट देना पडता है। यह डॉक्युमेन्ट क्लायन्ट को देने के बाद उस के दुसरे पत्र पर क्लायन्ट का हस्ताक्षर लेके वह संभाल के रखनी पडती है।

९. ट्रेडींग मेम्बर के पास ऐसे अनुभवी लोग होने चाहिए जिन्होंने सेबी का सर्टिफीकेशन प्रोग्राम पास किया हो।

हम आशा करते है की हमारी ये डेरिवेटिव बाजारों का रेग्युलेटरी फ्रेमवर्क क्या है (What is the Regulatory Framework of Derivatives Markets in Hindi)? ब्लॉग पोस्ट आपको पसंद आयी होगी अगर आपको शेयर मार्किट से जुड़ा कोई भी सवाल है तो आप कृपया कमेंट में जरूर पूछे।

।। धन्यवाद ।।

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फ्युचर्स और ऑप्शन मार्केट में प्रवेश कैसे करना चाहिए - How To Enter Future And Options In Hindi. · दिसम्बर 22, 2020 पर 8:54 अपराह्न

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फ्युचर्स और ऑप्शन में ट्रेडींग किस तरह से करना चाहिए - How To Trade In Future And Option In Hindi. · दिसम्बर 25, 2020 पर 8:31 अपराह्न

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फ्युचर्स और ऑप्शन के कॉन्ट्रॅक्ट स्पेसिफिकेशन - Future And Options Contract Specification In Hindi. · जुलाई 9, 2021 पर 8:35 अपराह्न

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